Thursday, 29 April 2010

मैथिली गजलशास्त्र-५


वेद-ए-मुकद्दस मे वेदक विषएमे अली सरदार जाफरी लिखै छथि- शुऊरे-इन्साँ के आफताबे-अजीम की अव्वलीं शुआएँ- मनुष्यक चेतनाक पहिल किरिण
जेना तमिलमे संस्कृत शब्दक आ तुर्कीमे अरबी शब्दक बहिष्कारक आन्दोलन चलल तहिना फारसीमे (फारसक प्राचीन ग्रन्थ अवेस्ता आ वैदिक-संस्कृतक मध्य समानता द्रष्टव्य) सेहो अरबी शब्दक बहिष्कार आ तकरा स्थानपर आर्य भाषा-समूहक शब्दक ग्रहणक आन्दोलन चलल अछि। मैथिलीमे सेहो हिन्दी-उर्दू शब्दक बहुलतासँ प्रयोग भाषाक अस्तित्वपर संकट जेकाँ अछि, खास कऽ मिथिलाक्षरक मैथिल ब्राह्मण संप्रदाय द्वारा दाह-संस्कार कएलाक बाद।
आब उर्दू गजलपर आबी। १८९३ ई.मे हाली मुकद्दमा-ए-शेर-ओ-शायरी लिखलन्हि जे हुनकर काव्य-संग्रहक भूमिका छल। ओहि समए धरि उर्दू गजलक विषय आ रूप दुनू मृतप्राय छल से हाली विषय-परिवर्तनक आह्वान तँ केबे कएलन्हि संगहि काफिया आ रदीफक सरल स्वरूपक ओकालति कएलन्हि। ओ लिखै छथि जे एकाधे टा शेर आइ-काल्हि नीक रहैए आ शेष गजल फारसीक शब्द सभसँ भरि देल गेल शेरक संकलन भऽ जाइए जाहिसँ ओकर स्तरहीनतापर लोकक ध्यान नञि जाए। से उर्दू गजल धार्मिक कट्टरतापर व्यंग्यक क्षेत्रमे फारसी गजलसँ आगाँ बढ़ि गेल।

संगीत आ गजल गायन
ठाठ कल्याणक अन्तर्गत राग यमनमे त्रिताल १६ मात्रा (दू पाँतिक अनुष्टुप् – ३२ अक्षर) क एतए प्रयोग भऽ सकैए। ठाठ बिलावलक अन्तर्गत राग बिलावल एकताल १२ मात्राक होइत अछि, एतए गायत्री-२४ अक्षरक गजलक प्रयोग भऽ सकैए। कारण वार्णिक गणनाक उपरान्त रेघा कऽ गायककेँ कम गाबए पड़तन्हि आ शब्द/ अक्षरक अकाल नहि बुझना जाएत।
ई मात्र उदाहरण अछि आ से गायकक लेल मैथिली गजल लिखनिहारक लेल नहि।
मैथिलीमे एखन धरि जे गजल लिखल गेल अछि ओहिमे बहरक एकरूपताक कोनो विचार नहि राखल गेल अछि। ने से बहर-विचार फारसी काव्यशास्त्रक हिसाबसँ राखल गेल छै आ ने भारतीय काव्यशास्त्रक हिसाबसँ। आ ताहि कारणसँ मैथिली गजल सभकेँ “गजल सन कविता” मात्र कहि सकै छिऐ। ओना बहरक एकरूपता गजलकार लोकनि द्वारा गजल लिखलाक बाद एक गजलपर आध घण्टा लगेला मात्रसँ कएल जा सकैए।


गजल
सहस्राब्दीक हारि हमर आ जीत ओकर, नै जातिवादीक सोझाँ होएब लरताङर
भेष बदलि जातिपंथी जीति रहल कवि, ऐलुष नै फेर हम हएब लरताङर

एहि भू मार्गक अछि तँ गप्पे विचित्र सन, प्रकाश आएल अछि भेल अन्हार निवृत्त
मयूरपंखी पनिसोखा उगल छै एखने, इन्द्रक मेघकेँ सोंखि करब लरताङर

बनि बाल बुद्धि हम पुछने आइ छलहुँ, ई सत्य अहिंसाक पथ ई विजयक पथ
जीतल जाइए असत्यक रथ हुनकर, टनकाएब नै फेर होएब लरताङर

रस्ता चलैत छलहुँ दिन राति सदिखन, से भेल जाइत छारन नव रस्ता बनल
छी देखि रहल रस्ताक केंचुली भरिगर, गऽ जाइत आगाँ नहि होएब लरताङर

अबैए ओ सत्यक क्षण कोन विपदा बनि, अछि आएल दौगल ओ सुनझाएल अछि
पोखरिक जाइठपर भेल ठाढ़ छी हम, छछड़बाएब घर नै हैब लरताङर

छनगा पीबि शिव देखि रहल चारूकात, विषहन्त ओ घूमि रहल बनल बसात
तांडव ई अहाँक बुद्धि कहैए से त्रिकटु, तगबाए तकरा नै होएब लरताङर

हे भाइ ऐरावत अछि आइ झूमि रहल, कदैमे करैत ओ कदमताल विकराल
चरखा कत्तिनक टकुआ काटब देखल, नहि कदरियाएब खोभब लरताङर





गजल
बरसातिक ई राति बनल सुखराति हे कालि
करब षोडशोपचार आर दए बलि हे कालि

बाल बसन्त भैया बढ़थु बहिनक अछि आस
आस्तीक करैत भैया लेल सुधियो नहि हे कालि

लाल झिंगुर, लाल सिन्दुर, लाल अड़हुल फूल
ताहूसँ लाल देखल ई दृश्य-देश मिथि हे कालि

स्वप्नक सोझाँ सत्यक नै अछि आब कोनो मोल
पोखड़ि झाँखड़ि सगरि घूमि ई देखलि हे कालि


अमुआ फड़ए लदा लदी डारि लीबि-लीबि जाए
ओकर नम्रतामे कोनो अगुताइ सुनलि हे कालि


ऐरावत गजल सन कविता देखू देलनि ई
मैथिलीक गरिमा एहिठाँ देखू सदति हे कालि


गजल

जाइत-जाइत देखल ओ ठाढ़ आर मेघडम्बर सन छाती
भैयाक पीठ धोबिया पाट हुनकर मेघडम्बर सन छाती

पड़ल फेर अकाल करैत हाक्रोस छथि ओ ठाढ़ भेल कात
छाती धकधक उन्नत्त ठाढ़ि दुआर मेघडम्बर सन छाती

देखल ई चित्कार हम भऽ सोझाँ ठाढ़ देबै ओकरा हुतकारी
संकट प्रहारमे धैर्य अपरम्पार मेघडम्बर सन छाती

देखल हुनका आइ छन्हि मुँह क्लान्त मुदा नहि कोनो बात
कर्तव्यक बिच कोनो विश्राम डगर मेघडम्बर सन छाती

सुनू सुनू भाइ गप भेल असम्हार करू पुकार समधानि
भेल मानवक ई हाल करू दुत्कार मेघडम्बर सन छाती

ऐरावत देखल घुरचालि बनल हथियार ओ लेने जाल
छी तैयो ठाढ़ की हम क्षितिजक पार मेघडम्बर सन छाती

(क्रमशः भाग-६ मे)

Tuesday, 27 April 2010

मैथिली गजलशास्त्र-४



मैथिली गजलशास्त्र- भाग-४

आउ आब गजल कही:

गायत्री गजल
छै सुनि देखि रहल , छै ककरासँ ककर
कोन गपक सहल, छै ककरासँ ककर

हे अछि देखि सहल, अछि की टीस उठल
रे चिन्हलकेँ चीन्हल, छै ककरासँ ककर

ई सभ सत्यक संगी , सभ छै भेष बदलि
के अछि मुँह फेरल, छै ककरासँ ककर


हे बिजुलौका देखियौ, छै उकापतङ्ग जेकाँ
की माथ सुन्न कएल, छै ककरासँ ककर

अगिनवान मैथिली, की सुखि जाएत धार
कहै किदनि कहल, छै ककरासँ ककर

करू कोन समझौता, करू कोन निपटारा
के ललकारि रहल, छै ककरासँ ककर

के अछि उठा रहल, अछि के झुका रहल
के अछि बाजि रहल, छै ककरासँ ककर

ऐरावत छै चकित, अछि की सोचि रहल
ई कर्णधार बँचल, छै ककरासँ ककर

त्रिष्टुप् गजल
अछि चोरबा संग देखू ठाढ़, देखैत रहलि डकलिलामी
नहि होएत आब बरदाश्त, डाक- डकौअलि डकलिलामी

ई सुरकि रहल छल आब, नै भेटत आब फेर की खाद्य
अछि कोना भेल ई असम्हार, डघरब चलि डकलिलामी


कोना तड़फड़िया सभ अछि, डगहर थस लेने की बात
नञि निचेन भेल अछि बाप, ओ मुहानी आनि डकलिलामी


औ बुझारति होएत फेरसँ, भेल की ई ढिंढमदरा आब
ई ढाबुस बेंगक अछि ठाढ़, ई ककर चालि डकलिलामी

पुक्की पाड़ि के रहल पुकारि, बहीर बनि भने अछि ठाढ़
नहि ककरो सुनब पुकार, ई हथौड़ा मारि डकलिलामी

कहू यौ किएक छी हूस ठाढ़, ऐरावतक फोंफक अबाज
नहि किए बनल बौक ठाढ़ , चिपैले सुआदि डकलिलामी

जगती गजल
भगवानक बनाओल ई गाम, जखन अछि हो भोर बकटेंट
नहि तँ भेटत की कोनो विराम, अछि भेल कोना भेर बकटेंट


औ की नहि भेटत आबहु त्राण, छी सुनल सएह सरनरिया
कोना मिरदङिया देलक थाप, ई मिरहन्नी शेर बकटेंट


जाए रहल पछताए रहल, नहि बाट कोनो सुझाए रहल
अछि गोलहत्थी खाइत ई छौड़ा, पँचागि ई बिहटार बकटेंट


मोचण्ड बूड़ि रौदमुँहा होइत, साँझक लकधक बैसि रहल
धमधूसर सभ बेर लगौरी, आनि रहल गनौर बकटेंट


गदा रे गुइँ गुइँ मार गदा रे, गदा रे पुइँ पुइँ, मुक्का मारल
गताखोरक छै ई हेँज चलल, गतात संग पथार बकटेंट

बेराम पड़ब नै आउ सकल, बेपर्द करब बेदरंग भेल
ऐरावत चीन्हि बेपारी सभकेँ, करू भाषाक व्यापार बकटेंट

(क्रमशः भाग-५ मे)


पोस्ट स्क्रिप्ट:एखन धरिक गजलशास्त्रक प्रस्तुतिपर किछु टिप्पणी एतए प्रस्तुत अछि:

गंगेश गुंजन

ग़ज़ल पर संपादकीय मे स्थान देब एकटा गंभीर संपादन-बोधक व्यवहार बुझायल। तें एकर स्वागत आ बधाइ ।
ग़ज़लक बुनियादी अर्थ-शृंखला मे स्त्री, सुन्दर स्त्री एक खूब प्रशस्त अर्थ भेलैक। स्त्री अर्थात सौन्दर्य, शक्ति, प्रेम, आनन्द, सृष्टिक सब सं मधुर गीत।
ग़ज़ल तें कविता-विधाक सर्वोत्तम 'विधा' सेहो ( यद्यपि ई विवादहीन मान्यता नहिं तथापि...)
एक समय हिन्दी मे (प्रायः) शाइर इक़बालक कहल छनि-.....शाइरी इल्म से नहीं आती ' (पहिल पांती बिसरै छी)
अपन ग़ज़ल-कोटिक रचना कें, मैथिली हो बा हिन्दी, हम "ग़ज़ल नुमा" कहैत रहलियैक। तकरो आशय यैह। मैथिलीक अत्यल्पे ग़ज़ल हएत जे ग़ज़लक एहि बुनियादी लक्षणक ल'ग मे देखाय। ओना हमर पाठकीयताक सीमा अछि। तें अप्रिय मुदा यथार्थ थिक जे मैथिलीक एहि २०१० ई. मे लिखल जा रहल ग़ज़ल-अधिकांश ग़ज़ल हिन्दी-कविताक ' गुप्तकालीन कविता मात्र बुझाइछ। तुकबन्दी । प्रिय साकेतानन्दक शब्द मे- अहा ! ग्राम जीवन भी क्या है...कहीं लौकियां लटक रही हैं ..।( आदरणीय मैथिली शरण गुप्तजीक कविताक ई अनविकल उद्धरण थिक)। हिन्दीक दुष्यन्त कुमारक ग़ज़ल मात्र अपन आधुनिकताक कारणें बा छुच्छ प्रगतिशीलताक कारणें नहि, युग-जीवनक जन-युग-जीवनक ईमानदार अभिव्यक्ति सहज तासीरक कारण सेहो एतेक प्रख्यात-प्रशस्त भेलनि। भरिसके कोइ कहि सकैछ जे कोनो ने कोनो रूपें दुष्यन्तजी कें नहि पढ़ने होथि। नहियों होति तं पढ़ि लेब उपकारके हेतनि। हृदय चाही, आत्मदान । '
शुद्ध सौंदर्ये बनैत अछि आनन्द । मनुष्यक महान आनन्द दुःखेक चरम निरानन्दताक चिर वांछित दुर्लभ चित्तावस्था होइछ। जकरा कविता मे "ब्रह्मानन्द सहोदर" सेहो कहल गेल। से सौन्दर्य ब्रह्मान्ड मे "कविते"टा रचि सकैये ।
हमर उक्ति के रूढ़,निंघेस तथाकथित धर्ममार्गी अध्यात्मक रंगे मे नहि देखल-मानल जाय, से विनती ।
इल्म सेहो तखने पाठककें स्पन्दित करैत छैक।
" कहिये कुछ आसान ग़ज़ल
हर एक दिल की जान ग़ज़ल
जन-मन को दिखलाये राह
भटके मत सुनसान ग़ज़ल
एहि प्रकरण मे अपन "ग़ज़लनुमा"क किछु शेर मोन पड़ि जयबाक कवि-भावुकता कें माफी भेटओ।
गंगेश गुंजन

तारानन्द वियोगी
बहुत सुन्दर आ सम्पन्न विवेचन।गायनक सम्बन्ध मे बेस मेंही विवेचन अछि।दोसर भागक प्रतीक्षा रहत।
फेर:
वेद मे सब किछु छै।ओहि मे रसायन विज्ञान छै। कम्प्यूटर आ इन्टरनेट छै।ओहि मे एड्स के इलाज छै।ओहि मे परमाणु विज्ञानो छै।वेद जिन्दाबाद छै। गजल के बापक दिन छियै जे ओ वेद मे नहि रहतै?लेकिन बन्धु, हमर विचार जे फारसीक काव्यशास्त्र के हिन्दुत्वीकरण के बदला मौलिक गजल-रचना मे हिन्दुत्व आनल जाय तं से बेसी श्रेयस्कर।की करबै? दिल पर पाथर राखि लिय" जे ओहि विधर्मी सभक लग मे सेहो काव्य छलै, काव्यशास्त्र छलै।
उत्तर:१.गजलक बापक दिन छिऐ वा नै से तँ नञि बुझल अछि, मुदा वेदमे आन चीज जे होइ मुदा गजल नञि छै आ ओ काव्यशास्त्र फारसक फेर अरबक अछि से जगतख्यात अछि, एहिमे हमरा वा ककरो कोनो संदेह नञि होएबाक चाही।
२. फारसीक काव्यशास्त्रक हिन्दुत्वीकरणक संबंधमे हमरा नञि बुझल अछि आ मौलिक गजल रचनामे कोना हिन्दुत्व आनल जाए सेहो हमरा नञि बुझल अछि। काव्यकेँ "हिन्दु" आ "विधर्मी" शब्दावलीसँ दूर राखल जाए सएह नीक, हँ "मैथिली गजल" शब्दक प्रयोगमे हमरा कोनो आपत्ति नञि, आ तकरा हिन्दुत्वीकरण मानल जाए तँ हमर कोनो दोख नहि।
३.ओहि "विधर्मी"(अहाँक शब्दमे) लग सेहो काव्यशास्त्र रहै- ई विश्वास करबामे ककरो करेजपर पाथर नञि राखए पड़तै कारण जतेक सौँसे विश्वमे मिला कऽ कवि/ काव्यशास्त्री भेल होएताह ओहिसँ बेशी कवि/ काव्यशास्त्री अरबी-फारसीमे भेल छथि।
४.प्रायः मैथिली भाषामे गजल जे हम लिखी तँ छन्दशास्त्रक अनुसार लिखी, आ से छन्दशास्त्र हम अरबी-फारसीक प्रयुक्त करी, प्रायः अहाँक मंतव्य से अछि। मुदा ओ ट्राइ कऽ कए हम नञि आनो भाषाबला सभ (जेना अंग्रेजी गजलक शास्त्रकार लोकनि)थाकि गेल छथि, ओहिमे ने लय बनि पबै छै आ ने सरलता आबि पबै छै। ऋगवैदिक छन्दशास्त्र टगण-मगण सँ बेशी वैज्ञानिक आ सरल छै आ मैथिली गजल लिखबा-पढ़बा-गुनगुनएबामे लोककेँ सुविधा होएतैक से हमर विश्वास अछि- वेदक समएमे हिन्दू शब्दक जन्मो नहि भेल रहै से वैदिक छन्दशास्त्रक प्रयोग मात्र मैथिली गजलकेँ हिन्दू बना देतै से हमरा नञि लगैए।
५.तहिना जखन हम "मैथिली हाइकूशास्त्र" लिखने रही तहिया सेहो हमरा लग "वार्णिक" आ "मात्रिक"मे एकटा चयन करबाक छल, आ तहियो हम "वार्णिक"क अक्षर गणना पद्धतिक चयन कएलहुँ। "शिन्टो" धर्मावलम्बी जापानी (किछु बौद्ध सेहो) सभक लिपि आ तकर छन्दशास्त्र जे प्रयोग करी तँ मैथिलीमे हाइकू कहियो नञि लिखल जा सकत; कारण ओकर काव्यशास्त्र जापानी भाषा आ ओकर कएक तरहक लिपिक सापेक्ष छै आ ओहिमे धर्म अबितो छलै (टनका/ वाका- ईश्वरक आह्वाण)। अरबी-फारसी गजल मुदा धर्म निरपेक्ष छै, मुदा ओकर काव्यशास्त्र ओकर अपन भाषा-लिपि लेल छै। से भाषा-निरपेक्ष ने जापानी काव्यशास्त्र भऽ सकै छै आ ने अरबी-फारसी काव्यशास्त्र।
सादर
गजेन्द्र


गौतम राजरिशी
पिछला तीन-चार दिन स पढि रहल छि इ आलेख....हिंदी आ उर्दू के ग़ज़ल-शास्त्र स त भलि भांति परिचित रहि, मैथिली के लेल जानकारी बड निक लागल। बहुत मेहनत आ लगन स लिखल आलेख- सेव कs लेलौं घोटै खातिर। मुदा आलेख के आखिर पंक्ति "मैथिली गजलकेँ सेहो ई छूट भेटबाक चाही" स सहमत नै छि। कविता के अ-कविता होय लs दियो, मुदा ग़ज़ल के सर्वदा ग़ज़ल ही रहैक चाहि...अ-ग़ज़ल नै। हमर उस्ताद कहित छथिन कि रचना करि काल सुविधा नै खोजबाक चाहि।

अपनेक फोन नंबर चाहि गजेन्द्र जी...मैथिली शब्द के उच्चारन हेतु किछु शंका निदान करबाक अछि। ग़ज़ल त सब टा खेल अछि उच्चारणक...
उत्तर:राजर्षिजी
मैथिलीमे उच्चारण निर्देश, मैथिली गजल-शास्त्र- भाग-२ मे देल गेल अछि।
हमर मो.नं. ९९११३८२०७८ अछि।
सादर

आशीष अनचिन्हार
काफिया केखनो शब्दक नहि , वर्ण आ मात्राक होइत छैक। जेना हमरापर आ ओकरापर दूनू शब्द मे र काफिया छैक। तेनाहिते आरे आ माँड़े(हमर गजलक) मे ए मात्रा कफिया छैक।
एकै भाव बला गजल दूषित मानल जाइत अछि।
उत्तर:मैथिली आ संस्कृतमे मात्र तुकान्त (अन्तक तुक) लयक निर्माण नहि करै छै, मुदा करितो छै।
से ई गप जे-
जे तुक मिलानीक दृष्टिएँ ओहूमे शब्दक आरम्भ-मध्य-आखिरीक किछु अक्षर नहि बदलै छै।
सायास लिखल गेल अछि।

Friday, 23 April 2010

मैथिली गजलशास्त्र- भाग-३




आब मैथिली गजलक किछु कठिनाह विषएपर आबी।
कठिनाह विषए किछु विविधता आनत आ मैथिलीक परिप्रेक्ष्यमे नूतनता सेहो, मुदा ततेक कठिनाह सेहो नहि।

वैदिक आ मैथिली छन्दक गणना अक्षरसँ होइत अछि से तँ कहिये गेल छी, गुरु-लघुक विचार ओतए नहि भेटत। मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ लौकिक संस्कृत आ हिन्दीसँ प्रभावित छथि मुदा गएर मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक शब्दावलीमे ढेर रास शब्द भेटत जे वैदिक संस्कृतमे अछि मुदा लौकिक संस्कृतमे नहि, तेँ कम दूषित आ खाँटी मैथिली भाषा हुनके लोकनिक अछि आ तेँ छन्दक गणना अक्षरसँ करबाक आर बेशी आवश्यकता।
गायत्री-२४ अक्षर
उष्णिक्- २८ अक्षर
अनुष्टुप् – ३२ अक्षर
बृहती- ३६ अक्षर
पङ्क्ति- ४० अक्षर
त्रिष्टुप्- ४४ अक्षर
जगती- ४८ अक्षर

शूद्र कवि ऐलुष आ आन गोटे द्वारा रचित ऋक् वेद मे गायत्री, त्रिष्टुप् आ जगतीक छन्द सर्वाधिक परिमाणमे भेटैत अछि से एहि तीनूपर विचारी।

गायत्री: ई चारि प्रकारक होइत अछि- द्विपदी, त्रिपदी, चारि पदी आ पाँचपदी। चारि पदी मे ८-८ अक्षरक पद आ एक पदक बाद अर्द्धविराम आ दू पदक बाद पूर्णविराम दए सकै छी। माने एक गायत्री शेर तैयार। ओना एहिठाम हम स्पष्ट करी जे गायत्री मंत्र नहि छंद छैक। लोक जकरा गायत्री मंत्र कहैत छैक ओ सविता मंत्र छैक जे गायत्री छंद मे कहल गेल छैक।

त्रिष्टुप्: चारि पद, ११-११ अक्षरक पद आ एक पदक बाद अर्द्धविराम आ दू पदक बाद पूर्णविराम दए सकै छी। माने एक त्रिष्टुप् शेर तैयार।

जगती: चारि पद १२-१२ अक्षरक पद आ एक पदक बाद अर्द्धविराम आ दू पदक बाद पूर्णविराम दए सकै छी। माने एक जगती शेर तैयार।



आब जेना पहिने कहल गेल अछि जे गायत्रीमे एक-दू अक्षर कम वा बेशी सेहो भए सकैत अछि माने २२ सँ २६ अक्षर धरि गायत्रीक प्रकार भेल- विराड् गायत्री भेल- २२ निचृद् गायत्री भेल- २३ भुरिग् गायत्री भेल- २५ आ स्वराड् गायत्री भेल २६ अक्षरक। तँ निअमक अन्तर्गत भेटि गेल ने छूट आ स्वतंत्र भऽ गेल ने मैथिली गजल।

पूर्ण विराम छोड़ियो सकै छी।



आउ आब गजल कही:



गायत्री गजल
त्रिष्टुप् गजल
जगती गजल
(क्रमशः भाग-४ मे)

Tuesday, 13 April 2010

गजल

गीत जं गाबी तं कोनो दर्द जागय
अतल मोनक दोग मे क्यो टीस बागय

ई शहर, ई सडक, ई वीरान मन
अहँक बीतल नेह सन किछु अपन लागय

प्रीत जे बिलहय अहँक मुस्की तरुण
सैह हमरा सं हमर बलिदान मांगय

हुलकि रहले लगे कोनो क्रान्ति छाया
आर मोनक शान्ति कत्तहु दूर भागय

Wednesday, 7 April 2010

गजल

1.
आदमी छल - छद्मकं मोहरा बनल ।
आब गामो पर शहरकं पहरा पड़ल ।


मनुक्खे रहल, मनुक्ख्ता लुटि गेलई।
लट पांचाली के पेᆬर सँ खुजले रहल ।


रंग अपनहुँ के आब जर्द सन भऽ गेलई।
जिनगीकं महल आई खंडहर सन ढ़हल।


आब कंकंरा सँ कंहतई मोनकं व्यथा।
कंान मालिकंो के तऽ छई पाथरे बनल।


अपनो पर कंोना आब कंोई भरोसा कंरय।
सांस-सांसो मे माहुर आछ भरल पड़ल।


बाटकं धूरा जकंाँ उड़िते रहि गेलहुँ।
आँखि कंानल मुदा मोन नहिये भरल।







2
रूप के चर्चा कंरू कंी, भूख सँ आछ आँत बैसल ।
बाले-बच्चे भुखले सुततै, ताहि लेल हरहोरि पैसल।


साँझकं साँझ बितै छै जकंरा से गरीबी रेखा सँ उपर ।
बड़कंा बड़कंा कंोठा सोफा सैह सभ अनुदान हँसोथल ।

रखवारी के भार जकंर छल सैह सभ बटमारी केलकंई ।
चोरहो के शोर कंरत के भाग भरोसे आछ जे बाँचल ।



एहि गाम मे कंौआ- वुᆬक्वुᆬर-नढ़िया सँगे रहैत आछ ।
उपर सँ भने कंटाउझ मालपुआ धरि आपस मे बाँटल ।


असोथकिंत जे राति भेल छई, धिंगी-धिंगी दिन भेलई ।
हाथ के हाथ ने सुझि रहल छै आँखिये मे जाला छाड़ल ।


कंाँट-वुᆬश के बोन मे भटकैत, सौंसे देह शोणिते शोणित ।
भविष्य ओकंर कंी जे बनि-बनि बरछी कंोंढ़ मे भोंकंल ।


3
धज्जी रातुकं श्याह आँचर मे, अहल भोर के ताकिं रहल छी ।
अपन आंगन मे ठाढ़ हम, आई अपने घर के ताकिं रहल छी ।


आहत मोनकं घायल तड़पन, पेᆬरो आई कंनाबऽ आयल ।
जतऽ जलन के पीड़ा कंम हो, ओहन छाँह के ताकिं रहल छी ।


दोसरा कें किं दोष देबई हम, अपनो सभ तऽ अंठिये बनला ।
याद ने कंोनो बाँचल रहि जाय, ओहन ठौर के ताकिं रहल छी ।


बगबाहो अपनहिं हाथें, आई कंलम-बाग सभ जारऽ आयल ।
तड़पन जतऽ तड़पि रहि जायत, ओहने कंहर के ताकिं रहल छी ।


बिसरि गेल जे याद छलै, से सपना किंयैकं याद दियौलकं ?
नोर ने ढ़रकंय जाहि पलकं सँ, एहन आँखि के ताकिं रहल छी ।


निकंलि गेलहुँ आछ सुन्न राह पर, अन्हारेकं टा सम्बल केवल ।
अपन-आन केयो कंतहु नहि, आई ओहन दर के ताकिं रहल छी ।

Monday, 5 April 2010

मैथिली गजल-शास्त्र- भाग-२

मैथिलीमे उच्चारण निर्देश:



दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य मे जीह तालुसँ , मे मूर्धासँ आ दन्त मे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोगगड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि।
ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि) से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी।
अछि- अ इ छ ऐछ
छथि- छ इ थ छैथ
पहुँचि- प हुँ इ च
आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि।
फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र ।
उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू।
रहए- रहै मुदा सकैए- सकै-ए
मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना
से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा।
पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए
छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो।
संयोगने- संजोगने
केँ- के / कऽ
केर- क (केर क प्रयोग नहि करू )
क (जेना रामक) रामक आ संगे राम के/ राम कऽ
सँ- सऽ
चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- राम सऽ रामकेँ- राम कऽ राम के

केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ
क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक
कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ
सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ
सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित।
के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक
नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै

त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)।
राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि)
सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन)
पोछैले/
पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन)
पोछए/ पोछै
ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि)
ओइ/ ओहि
ओहिले/ ओहि लेल
जएबेँ/ बैसबेँ
पँचभइयाँ
देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित)
जकाँ/ जेकाँ
तँइ/ तैँ
होएत/ हएत
नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ
सौँसे
बड़/ बड़ी (झोराओल)
गाए (गाइ नहि)
रहलेँ/ पहिरतैँ
हमहीं/ अहीं
सब - सभ
सबहक - सभहक
धरि - तक
गप- बात
बूझब - समझब
बुझलहुँ - समझलहुँ
हमरा आर - हम सभ
आकि- आ कि
सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि)
मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ।
एकटा दूटा (मुदा कैक टा)
बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि।आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ )
अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचाएक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison detre एत्स्हो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)।
अइमे, एहिमे
जइमे, जाहिमे
एखन/ अखन/ अइखन

केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित)
भऽ
मे
दऽ
तँ (तऽ त नहि)
सँ ( सऽ स नहि)
गाछ तर
गाछ लग
साँझ खन
जो (जो go, करै जो do)
लिखू मैथिली गजल:
६ सँ १० टा शेर मोटामोटी एकटा गजलक निर्माण करत। मुदा कोनो ६-७ टा शेरकेँ एकक बाद दोसर लिखि देबै तँ गजल नञि बनि जाएत।
एहिमे दू-चारि टा गपपर ध्यान देमए पड़त।
जेना वर्ड डोक्युमेन्टमे जस्टीफाइ कएलासँ पाँतिक आदि अन्तमे एकरूपता आबि जाइ छै तहिना यदि शेरक दुनू पाँती गजलक सभ शेरमे बिनु जस्टीफाइ केने पाँतिक आदि अन्तमे एकरूपता रहए तँ कहल जाएत जे एकहि बहरमे अछि एहि तरहक शेरक समुच्चय एकटा गजलक भाग होएबाक अधिकारी होएत (मैथिलीक सन्दर्भमे वार्णिक छन्दक गणना पद्धति जे भाग- मे देल गेल अछि माने

हलंतयुक्त्त अक्षर-0
संयुक्त अक्षर-1
अक्षर अ सँ ह -1 प्रत्येक।
, से उपयोगमे कएल जाए ओहि आधारपर १९ बहरक बदला छोट-मझोला पैघ आकारक पाँतिक उपयोग कएल जाए- नामकरणक कोनो आवश्यकता नहि)) ; संगहि गजलक पहिल शेरक दुनू पाँतीक अन्त मे शेष शेरक दोसर पाँतीक अन्त मे एक वा एकसँ बेशी शब्दक समूह दोहराओल जाएत (रदीफ) सेहआवश्यक ओना बिनु रदीफक सेहो गजल कहि सकै छी-एक्के भावपर सेहो जजल कहि सकै छी, बिनु मतलाक बिनु मकताक (लोक तँ मकतासँ सेहो गजलक प्रारम्भ करै छथि) सेहो गजल लिखि सकै छी- शेरक दुनू पाँती गजलक सभ शेरक बहरमे एकरूपता सेहो नहि राखि सकै छी- मुदा सभ अपवादे स्वरूप, अपवाद तँ अपूर्ण रहिते अछि। मतला एकसँ बेशी सेहो भऽ सकैए। गजल कोन शेर हुस्न--गजल (सभसँ नीक शेर) अछि ताहिमे ओहि गजलक विभिन्न समीक्षकक मध्य मतभिन्नता रहि सकैत अछि। फेर काफिया ओना तँ गजलक सभ शेरमे रहै छै (रदीफक पहिने) शब्द बदलै छै (एकाध बेर पुनः प्रयोग कऽ सकै छी) मुदा ध्यानसँ देखलापर लागत जे तुक मिलानीक दृष्टिएँ ओहूमे शब्दक आरम्भ-मध्य-आखिरीक किछु अक्षर नहि बदलै छै। माने लय रहबाके चाही।

आब आऊ किछु गजल सुनी:
सबसबाइत गप्प छल तकैत हमरापर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया युक्त शब्द हमरापर)
आबैत छलए खौंझाइत सेहो ओकरापर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया युक्त शब्द ओकरापर)

होएत हँसारथि की रहि जाएत चुकड़िऔने मोन मारि (२३ वार्णिक मात्रा )
बाजत नै मुँह फुलौने, रहत मुदा मोनपर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया युक्त शब्द मोनपर)

ईह कहलकै जे, मोने-मोन प्रसन्न अछि मारने गबदी (२३ वार्णिक मात्रा )
बुझैए सभ हमहीं बुझै छी, नियारे-भासपर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया युक्त शब्द नियारे-भासपर)

माने तोहूँ तोहर बापो हमर सार सम्बन्ध फरिछा देबौ (२३ वार्णिक मात्रा )
गप्पी छथि ! मुँह घुमेने देखैए कोना मचानपर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया युक्त शब्द मचानपर)

बुझै सभटा छी से नै जे नै बुझै छी मुदा मोना कहैए साइत (२३ वार्णिक मात्रा )
बड़बड़ाइए बाइमे, माने अछि स्वयम् पर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया युक्त शब्द स्वयम् पर)

"ऐरावत" बुझैत बुझि गेल छी जे सृष्टिक पहिलुके राति (२३ वार्णिक मात्रा )
सभ चरित्र रहल देखैत, एक-दोसरापर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया युक्त शब्द एक-दोसरापर)
तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों