Friday, 27 May 2011

रुबाइ



भेसैए करेज मे हुनकर इयाद
लेसैए करेज मे हुनकर इयाद
हम जाएब तँ कहू कोम्हर जाएब
खीचैए पएर के हुनकर इयाद

Thursday, 26 May 2011

गजल

दिल तोड़ि के जे हँसल हम घबरा गेलों
फेर हँसि के जे
कानल हम घबरा गेलों

एकतरफा प्यार में पड़ल रही दुनु गोटे
जखन जानलों एही बात हम घबरा गेलों

प्यार में बिकल घर-बार ते कोनो चिन्ता ना
मुदा प्यारे जखन बिकल हम घबरा गेलों

मुखचन्द्र देखि के फुसलाबैत रही दिल के
ओ पराs गेल हमरा से ते हम घबरा गेलों

ग़ज़ल हम लिखय रही ओकरा बिसारि के
ओ याद जखन आएल ते हम घबरा गेलों

रुबाइ




आँखि मे नोर मोन मे दर्द नुका राखू
ठोर पर सदिखन हँसी बचा राखू
केओ ने केओ दुख बुझबे टा करत
ताँ मधुर बोल सँ आँगन सजा राखू

Wednesday, 25 May 2011

गजल

मालक खातिर माल-जाल बनल लोक
देखाँउसक खातिर कंगाल बनल लोक


भूखक दर्द होइत छैक इजोतो सँ तेज
पेटक खातिर दलाल बनल लोक


वृत टूटल मिलल समानान्तर रेखा
बिनु कागजीक प्रकाल बनल लोक


सत्य-सत्य ने रहल ने रहल फूसि- फूसि
अपनेक लेल अपने जंजाल बनल लोक


सुस्जित आनन चानन ललाट
नुनिआएल देबाल बनल लोक

गजल

एहि रुपें सभ मे करार हेतैक
खाए लेल मनुखे जोगाड़ हेतैक


बनि गेल मीडिआ पोर्नोग्राफी
आब सए मे सए फिराड़ हेतैक


सेक्स, बलात्कार बढ़ि रहल अविराम
लोक मे बहिनोक ने विचार हेतैक


वयस सँ पहिनेहें बच्चा जवान
अर्पूणे पंचमे बर्खे रति-झमार हेतैक


चेतह अनचिन्हार कने बिलमि जाह
खने मे लोक बेसम्हार हेतैक

मैथिली गजलशास्त्र-१३

"हमरा मानसपटलपर मैथिलीक सम्मानित आलोचक श्री रमानन्द झा रमणक ओ वाक्य औखन ओहिना अंकित अछि जाहिमे ओ मैथिलीक वर्तमान गीत-गजलकेँ मंचीय यश एवं अर्थलाभक औजार कहिकऽ एकर महत्वकेँ एकदम्मे नकारि देने रहथि (सन्दर्भ- मिथिला मिहिर, फरबरी-१९८३); ...कोनो आलोचककेँ एहेन गैर जिम्मेदारीवला वक्तव्य देबाक की अधिकार? भारतीय संविधानमे भाषणक स्वतंत्रता एकटा मौलिक अधिकार छैक तेँ?(सियाराम झा सरस, दीपोत्सव, १८/१०/९०; आमुख, लोकवेद आ लालकिला)
वियोगी लोकवेद आ लालकिलाक एकटा दोसर आमुखमे लिखै छथि- छन्दशास्त्रक नियमपर आधारित होयबाक उपरान्तो एहिमे गजलकारकेँ गणना-नियमक स्वातन्त्र्यक अधिकार रहैत छैक।” (!)
गजल कतेको ढंगसँ कतेको बहरमे कतेको छन्दमे लिखल जा सकैए, ई सत्य अछि, मुदा गणना नियमक स्वातन्त्र्यक अधिकार ने मात्रिक गणनामे छैक आ ने वार्णिक गणनामे।
देवशंकर नवीन लिखै छथि –...पुनः डॉ. रामदेव झाक आलेख आएल। एहि निबन्धमे दूटा अनर्गल बात ई भेल, जे गजलक पंक्ति लेल, छन्द जकाँ मात्रा निर्धारण करए लगलाह..
लोकवेद आ लालकिलामे गजल शुरू हेबासँ पहिने कएकटा आलेख अछि, मैथिली गजलपर कोनो सकारात्मक टिप्पणी तँ नै अछि ऐ सभमे, हँ मुदा समीक्षककेँ लाठी हाथे ई सभ मैथिली गजल थिक, गजले टा थिक कहबापर विवश करैत प्रहार सभ अवश्य अछि।
हाइकूमे सिलेबल आ वर्णक मिलानी अंग्रेजी हाइकूक आरम्भिक लेखनमे नै भऽ सकल, देखल गेल जे ५/७/५ सिलेबलमे बहुतरास अल्फाबेट आबि गेल, जापानीमे ओतेक अल्फाबेट ५/७/५ सिलेबलमे नै छल। मैथिलीक आरम्भिक हाइकूमे सेहो ५/७/५ सिलेबलक अनुकरण करैत ज्योति चौधरी अपन कविता संग्रह अर्चिस्मे बेसी वर्णक प्रयोग केलन्हि। तेँ हम सलाह देलहुँ जे मैथिली हाइकू सरल वार्णिक छन्दक आधारपर लिखल जाए जइमे ह्रस्व-दीर्घक विचार नै हुअए। संस्कृतमे १७ सिलेबलबला वार्णिक छन्दमे नोकमे नोक मिला कऽ १७ टा वर्ण होइ छै- जेना शिखरिणी, वंशपत्र पतितम्, मन्दाक्रान्ता, हरिणी, हारिणी, नरदत्तकम्, कोकिलकम् आ भाराक्रान्ता। से ५/७/५ मे १७ सिलेबल लेल १७ टा वर्ण हाइकू लेल गेल, से आब ज्योतिजी सेहो लऽ रहल छथि, हम सेहो लऽ रहल छी आ मिहिर झा, इरा मल्लिक, उमेश मंडल, रामविलास साहु, सुनील कुमार झा सेहो लऽ रहल छथि। रुबाइमे हमर सलाह छल जे एतए सरल वार्णिक छन्दक प्रयोग सम्भव नै अछि, कारण एकर प्रारम्भ दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ वा दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व सँ होइत अछि से चाहे तँ ह्रस्व-दीर्घक मिलानी खाइत वर्णिक छन्दक प्रयोग करू वा मात्रिक छ्न्दक। रुबाइक चतुष्पदीमे पहिल दोसर आ चारिम पाँती काफिया युक्त होइत अछि; आ मात्रा (वा वार्णिकमे वर्ण)२० वा २१ हेबाक चाही। कारण चारू पाँती चारि तरहक बहर (छन्द) मे लिखल जा सकैए से निअमकेँ आगाँ नमरेबाक आवश्यकता नै छै, हँ ई निर्णय करैए पड़त जे चारू पाँतीमे वार्णिक वा मात्रिक गणना पद्धति जे ली, से एक्के हेबाक चाही।
गजलमे मुदा अहाँ वार्णिक, सरल वार्णिक वा मात्रिक छन्दक प्रयोग कऽ सकै छी, मुदा एक गजलमे दूटा बौस्तु मिज्झर नै करू। बिन छन्द वा बहरक गजल अहाँ कहि सकै छी, समीक्षककेँ लुलुआ कऽ आ लाठी हाथे; मुदा ओ गजल नै हएत, उर्दू/ फारसीमे तँ मुशायरामे अहाँकेँ ढुकैये नै देत। आ आब जखन रोशन झा, प्रवीण चौधरी प्रतीक, आशीष अनचिन्हार, सुनील कुमार झा सन युवा गजलकार अन्तर्जालपर एकटा टिप्पणीक बाद सरल वार्णिक छन्दमे गजलकेँ संशोधित कऽ सकै छथि तँ लालकिलावादी गजलकार लोकनि किए नै कऽ सकै छी? मायानन्द मिश्र गीतल कहि आ गंगेश गुंजन गजल सन किछु मैथिलीमे कहि जे गलत परम्पराकेँ जारी रखबाक निर्णय लेने छथि तकरा बाद मुन्ना जी आ आशीष अनचिन्हार जँ बिना छन्द/ बहरक गजल लिखै छथि तँ एकरा हम मायानन्द मिश्र, गंगेश गुंजन आ लालकिलावादी अ-गजलकार लोकनिक दुष्प्रभावे बुझै छी।
लोकवेद आ लालकिला:
आत्ममुग्ध आमुख सभक बाद ऐ संग्रह मे कलानन्द भट्ट, तारानन्द वियोगी, डॉ. देवशंकर नवीन, नरेन्द्र, डॉ. महेन्द्र, रमेश, रामचैतन्य धीरज, रामभरोस कापड़ि भ्रमर, रवीन्द्र नाथ ठाकुर, विभूति आनन्द, सियाराम झा सरस आ सोमदेवक गजल देल गेल अछि।
कलानन्द भट्ट
भोर आनब हम दोसर उगायब सुरुज
करब नूतन निर्माण हम बनायब सुरुज
सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१७ वर्ण दोसर पाँती- १८ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल।
मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-२१ मात्रा, दोसर पाँती- २१ मात्रा, मात्रा मिलि गेलसे आब ह्रस्व दीर्घ पर चली। पहिल पाँती दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व (एतए दूटा लगातार ह्रस्वक बदला एकटा दीर्घ दऽ सकै छी, से दोसर पाँतीमे देखब)। दोसर पाँती- ह्रस्व-हस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ- ह्रस्व-हस्व- ह्रस्व-हस्व-दीर्घ- ह्रस्व-हस्व- ह्रस्व-हस्व-ह्रस्व। मुदा एतए गाढ़ कएल अक्षरक बाद क्रमटूटि गेल।
तारानन्द वियोगी
दर्द जँ हद केँ टपल जाए तँ आगि जनमै अछि
बर्फ अंगार बनल जाए तँ आगि जनमै अछि

सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१९ वर्ण दोसर पाँती- १८ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल।
मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-२५ मात्रा, दोसर पाँती- २५ मात्रा, मात्रा मिलि गेलसे आब ह्रस्व दीर्घ पर चली। दीर्घ (संयुक्ताक्षरकेँ पहिने)-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्र्अस्व-ह्रस्व।(एतए दूटा लगातार ह्रस्वक बदला एकटा दीर्घ दऽ सकै छी, से दोसर पाँतीमे देखब)। दोसर पाँती- दीर्घ (संयुक्ताक्षरकेँ पहिने)-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ एतए क्रमभंग भऽ गेल।

देवशंकर नवीन
अँटा लेब समय-चक्र, सहजहि एहि आँखि बीच
नबका प्रभात लेल, क्रान्ति कोनो ठानि लेब
सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१९ वर्ण दोसर पाँती- १६ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल।
मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-२५ मात्रा, दोसर पाँती- २५ मात्रा, मात्रा मिलि गेलसे आब ह्रस्व दीर्घ पर चली। ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व (एतए दूटा लगातार ह्रस्वक बदला एकटा दीर्घ दऽ सकै छी, से दोसर पाँतीमे देखब)। दोसर पाँती- ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ- मुदा एतए गाढ़ कएल अक्षरक बाद क्रमटूटि गेल।

नरेन्द्र
निकलू तँ सजिकऽ सजाकेँ
बासन ली ठोकि बजाकेँ
सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१० वर्ण दोसर पाँती- ९ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल।
मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-१३ मात्रा, दोसर पाँती-१४, मात्रा गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल।
डॉ महेन्द्र
चलैछ आदमी सदिखन चलैत रहबा लए
जीबैछ आदमी सदिखन कलेस सहबा लए
सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१८ वर्ण दोसर पाँती- १८ वर्ण। मुदा तेसर शेरमे दोसर पाँतीमे १६ वर्ण आबि गेल अछि। मात्रिकमे सेहो उपरका दुनू पाँतीमे क्रमसँ २४ आ २५ वर्ण अछि।
रमेश
जखन-जखन साओनक ओहास पड़ैए
हमर छाती मे गजलक लहास बरैए
सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१६ वर्ण दोसर पाँती- १६ वर्ण। मुदा दोसर शेरक पहिल पाँतीमे १५ वर्ण। मात्रिक मे सेहो उपरका दुनू पाँतीमे २२ वर्ण अछि। मुदा ह्रस्व-दीर्घ गणनामे दोसरे शब्दमे ई मारि खा जाइए।
ई दोष शेष गजलकारमे सेहो देखबामे अबैए।

एकर अतिरिक्त सुरेन्द्रनाथक गजल हमर हथियार थिक , सियाराम झा सरसथोड़े आगि थोड़े पानि”, रमेशक नागफेनीआ तारानन्द वियोगीक अपन युद्धक साक्ष्य मे सँ किछु किताब लाठी हाथे मैथिली साहित्यमे गजल संग्रहक रूपमे साहित्य अकादेमीक सर्वे ऑफ मैथिली लिटेरेचरक उत्तर जयकान्त मिश्र संस्करणमे आबि गेल अछि, किछु ऐ सहित्यक इतिहासक अगिला संस्करणमे आबि जाएत! अरविन्द ठाकुरक गजल सेहो पत्र-पत्रिकामे गजल कहि छपि रहल अछि जे अही परम्पराकेँ आगाँ बढ़बैत अछि।
जँ ई सभ गजल नै छी तँ पद्य तँ छी आ तइ रूपमे एकर विवेचन तँ हेबाके चाही। ऐ क्रममे रवीन्द्रनाथ ठाकुरक लेखनी एक रंग अनेक देखू। मैथिली गजल संग्रहक रूपमे ई पोथी आइसँ २५ बर्ख पूर्व आएल। सोमदेव आ भ्रमरक संग हिनको गजल लालकिलावादक परिभाषामे नै अबैत अछि। गजल नै मुदा पद्यक रूपमे एकर स्थान मैथिली साहित्यमे सुरक्षित छै, मुदा ई आन वर्णित गजलक तथाकथित संकलनक विषयमे नै कहल जा सकैए।
एक छन्द, एक बाँसुरी, एक धुन सुनयबालेऽ
लियौ ई एक गजल, आई गुनगुनयबालेऽ
(रवीन्द्रनाथ ठाकुर लेखनी एक रंग अनेक”)



हमर मैथिली रुबाइ आ मैथिली गजल बहर/ छन्द मे लिखल नीचाँ देल जा रहल अछि:


रुबाइ

कारी अनहार मेघ आ नै होइए
कत्तौ बलुआ माटि खा नै होइए
दाहीजरती देखि हिलोरै-ए मेघ
भगजोगनी भकरार जा नै होइए

गजल (बहरे मुतकारिब)

अहाँ बूझि लै छी जुआरी अनेरे
जिबै कोन बैबे नियारी अनेरे


हहारो उठेलौं नचारी गबेलौं
सिहाबै किए छी मदारी अनेरे


जतेको नबारी छबारी बुरैए
घुरेबै कियो नै सुतारी अनेरे


घरोमे उपासे बहारो निरासे
दहारे अकाले हियासी अनेरे


चलै छी खटोली उठा ऐ भरोसे
भसाठी अबैए डरै छी अनेरे

गजल (बहरे मुतकारिब )


उचरि नरूप अपन लिखैब तखन किने
उतर दछिन डगहर बहैब तखन किने
कनकन करत बनत सदिखन तलिया यौ
सुअद पैब जौँ अहँ झखैब तखन किने

मनक भूख असगर नुकैब बुझल अछि
अपन बोल-वाणी घुरैब तखन किने

खधाइ गढ़ अछि भरल सभतरि दहारे
जलक धार बिच घर भरैब तखन किने

निमहतासँ निभता निभैब सिखल नहि
नव युग कनिक उगल बुझैब तखन किने

पड़ाइनपर कनैत अछि भाग जँ कतौ
गजेन्द्र मन बूझै हियैब तखन किने

बहरे मुतकारिब मुतकारिब आठरुक्न फ ऊ लुन (U।।) चारि बेर

गजल- (गायत्री गजल)

गुमकी लागै राति बुलैत चान झपाइ छी
घुरि जाइ गाम मुदा बीचे असकताइ छी

चरको परियानि ई बनेलौं कएक बेर
उबेरक बाट ताकी आ सुरुज कहाइ छी

अकास बिच सतरंगा पनिसोखा उगलैए
निराशसँ आगू जाइ बीचेमे लेभराइ छी

जे काज होइए पछता से काज ताकी हम
अगता काज आबैए जान कोना गमाइ छी




ओकरा देखि बुझलहुँ गढ़निक सोपान
बनैत- बनैत बनै मूर्ति अहाँ देखाइ छी


ढङीला छौरा धरैए भेष रूप बदलैत
दोहरी ई नस-नस बुझी हम चिन्हाइ छी

जे संगमे अछि सेहो छोड़ने अहाँ जाइ छी
राखब की लगैए पकड़ै लेल पड़ाइ छी

कानमे ठेकी आँखिमे गेजर मूह दुसैए
लेरचुब्बा नै डिग्गा मदारी जे कहै जाइ छी

बूझी बाजी करतेबता सँ बढ़ू एक्के सुरे
पेटो पानि नै मूह दुसै कनीले हुसाइ छी

छोड़ि कऽ चलि गेल छाह, परात, इजोरिया
ऐरावत दोसराइत अहाँ की कसाइ छी

टिप्पणी:गायत्री: ई चारि प्रकारक होइत अछि- द्विपदी, त्रिपदी, चारि पदी आ पाँचपदी। चारि पदी मे ८-८ अक्षरक पद आ एक पदक बाद अर्द्धविराम आ दू पदक बाद पूर्णविराम दए सकै छी। माने एक गायत्री शेर तैयार।

गजल




नोर झरैए मोनक दागनि दगै छी
तराटक लागलए आ बातो बकै छी

कोनटा बचल नै एकान्ती ले एकोटा
अन्हरोखे उठै छी आ गनती गनै छी

अन्हरियासँ बेसी अन्हार जिनगीमे
ई इजोरिया किए अहाँ मुँह दुसै छी

पिआ गेलाह देशान्तर दूरस्त देस
कियो नै घुरै अछि से आसो नै तकै छी

भोरे अहाँ बिनु दिन फेर बजरल
ऐरावतसँ भारी ऐ दिनकेँ देखै छी

गजल




गुम्म भेल जे ठाढ़ भेल छी मुनल मूह मटकुरिए नीक
बाट तकै बहार भेल गजर-गजर तकनहिए नीक

धन भेल थोड़ बिपत बड़ जोर प्रेमक राग बिसरलौं
प्रेम दफानि बिसारै से गदह-पचीसी बुझनहिए नीक

जे देखलक बरियारक गाछ कहलक बिरदाबन ईहे
उड़कुस्सी लागै दलानपर छै आब उजड़नहिए नीक

जकरा कतहु ने छै पुछारी से अछि सौराठक नोतिहारी
चन्द्रोगत नै प्रेम अछिञ्जल से आब बिसरनहिए नीक

हाथी अपने पएरे भारी चुट्टी अपने पएरे भारी अछि
ऐरावत प्रेम-जिंजीरसँ छारल तैं ठोकरेनहिए नीक



गजल (बिना रदीफक)


छोट-छीन सन बात बहुत अछि
मुँह बिधुऔने ठाढ़ बहुत अछि

ककरा की कहबै के पतिआएत
गह-गहमे अर्थात बहुत अछि

भयौन बनि ओ अछि ठाढ़ सोझाँमे
हाथक गहमे हाथ बहुत अछि

नीक काज देखि गुमसुम छी ठाढ़
चबासी दऽ दियौ बात बहुत अछि

ओकरहि पाछाँ सभ चलू चलै छी
बदलि देत विश्वास बहुत अछि

दोस्तियारी बिना ई राह कठिन अछि
निभरोस रहू तँ काल्हि कठिन अछि

अनठेने नै दै छी कान बात किए यौ
घृणो तँ करू जँ सएह भरल अछि

केलहुँ जखन जे काज सेहो नै हट्ठे
भेल नै होअए से काज केलहुँ अछि

सनेस हमर जे नीक नै लगलनि
प्रेमक दूट आखर केओ सुनै अछि

जे फुलवाड़ी लगा कृपा करै जाइ छी
आपरूपी बूढ़ नेना बनैत अछि

बिसबासी लोक जे जीवनमे हमर
प्रेम लै-दै बला समाजक परिचर

चिन्ताक मोटगर रेख कपारपर
छल छोट से बनल आब छेबगर

जतेक माँगलक देलहुँ बेशिये कऽ
रेख नहि आओल कखनो माथपर

जकरा पदक होश बेहोश बनौने
घृणा चक्कूओसँ बेशी अछि धरगर

दोसराक दर्दसँ दुखी भेलहुँ अछि
नेनोसँ बेशी जे भेलहुँ सुखितगर

खेत-खम्हारक काज कऽ सकलहुँ
सप्पत देल गप्प निमाहि देलहुँ

बिसबास रहए तेँ झगड़ा-झाँटी
पाइ तँ आएल समए गमेलहुँ


झगड़ा करैत छी बहुत अहाँसँ
प्रेम करैत छी बुझा ने सकलहुँ

आकांक्षाक पजरैत अग्निक बिच
पैघ छी तकर चेन्हासी कहलहुँ

देखै छी बजै ने छी कोना ने ई कहू
हमहूँ ओहिना घुरा कऽ कहलहुँ

भय रहित सत्यसँ भेँट भेल
सुरेब सम्पूर्ण छल अविचल

चित्रक रंगक करतब लेल
उद्देश्यक पाछाँ भटकि रहल

बड़का सन काजक छाह अछि
देखल विस्तृत सुन्दर बनल

आजुक बात खतम होएत यौ
भोरुका बसात से बिर्रो बनल

पूछू सभसँ आ छोड़ू नै ककरो
नव विहान किए छल रोकल

दिन-राति बीतल से मोन पड़ल ऐ
अपन आ आनोपर भरोस अछिये

आस्ते सँ जे सिहकि उठल ई बसात
अन्तर्मनक शक्ति बदलि देत सत्ते

विश्वासपर अडिग चलि रहल छी
नवजीवनपथ समस्या ने कोनो ऐ

सिखबाक ई इच्छा खतम भऽ गेने की
मगजक शान्ति भेटत के ई कहै ऐ

ओहि सोचल बुनल असत्य बातक
सत्यक प्रति ई नरम जे भेलहुँ ऐ

मोन पाड़ल नीक खराप बिसरि कऽ
मित्र बढ़ल अछि आ शत्रु कमल ऐ
छातीक धरधड़ी घटि बढ़ल अछि
पएर थाकल बेहोशी थम्हल नहि

प्रेममे पड़ि घुरमि हम रहल छी
साँस फुलल आ उद्वेग कमल नहि

निन्नक मारल अछि आँखि फुलल ई
प्रेमक सभटा आख्यान कहल अछि

कहू किए अछि ई चित घबड़ाएल
स्मृति हँसि सूरति बदलल अछि

माँछ बिनु पानिक उन्टा प्रेम हम्मर
प्रेम पाबि खटबताह बनल अछि

हँसैत ओकर जे मुँह हम देखल
सुन्दर सलिल ई धार बहल अछि

आस बहुत छल क्षणमे से बीतल
आस निराशमे कोनो अन्तर नहि

प्रेम पियासल मोन भेल उचाट ई
ई बिसरि गेने तँ बाट बहुत अछि
बकथोथीसँ काज चलत नै
आत्म प्रशंसे बात बनत नै

भौकीसँ हम नै घबड़ाएब
पथमे प्रतिकार करब नै

भार मिलि- कऽ सभ उठबै छी
उठल नै आ की गुड़कल नै

खतम करू बात बड्ड भेल
ठठा हँसू तँ बात बढ़त नै

देखि छूबि अनुभूतिक क्षण
ई पाँती इतिहास बनत नै
9
अकत तीत प्रेमक जे पथिक अदौकालसँ
धतालबूढ़ प्रेमकेँ बोहेलक दुनू हाथसँ

निर्मल आंगुरसँ छूबै जे ओकर पुठपुरी
फरफैसी पसारै निदरदी अगिलकण्ठ जँ

निमरजना प्रेम जे छलै धपोधप निश्छल
बिदोरै लेल प्रेमीकेँ छलै ओ कड़ेकमान तेँ

अकरतब कर्तव्यमे भेद नै बुझलकै जे
जराउ प्रेमक गप्प नै कहियो नुकेलकै जँ

खञ्जखूहर ऐरावत नै बाटक छेँ बाटमे
धांगि बाट बनेबाक दाम अगूबार पेने छेँ




10
अंतहीन अंत ऐ सोचनीक होइए
भासो नै बनैए नै चित्र पूर होइए

ऐ रंग आ तरंगक नै भेटैए बाट
सोचैत भँसियाइत मगज फटैए

नै बाजैए बाट जे छोड़ि चललौं कतऽ
आँखि बाजैए बिनु बजने बुझबैए

आदति जे लागल वेदना सहबाक
गेंठ बनैए से सोहनगर लगैए

ई गुमकी बढ़ल खत्म हएत की
खरचण्डाली प्रेम पिसीमाल भेलैए


11

रातिक इजोरिया देखि रहल तारा कहलक
तरेगन छोट तैयो इजोतक खिस्सा कहलक

चन्द्रमाक इजोतक चर्च तँ बड़ होइ छै
एहि पिरौँछ इजोतक खेरहा कहलक

उज्जर दपदप इजोतक ई इजोरिया
देत संग अन्हरियामे फरिछा कहलक

पिरौँछ सरिसव फूल हँसि रहल अछि
ई इजोरिया पिरौंछ किए ने से कहलक

12
जे ई गप अहाँ हमरासँ ने कहितौं


जे फूसि-फटक हमरासँ ने करितौं



मोनमे रखबाक हमरा जे रहितै

तँ कोनो आन बहन्ना नै बना सकितौं



ई ठोढ़क फुफरी चानिपर पसेना

घाम चुबैत सुगन्धि पाबि सुरकितौं



आरि-धूर बाटे चली आ जा कऽ पहुँची

बीच सड़क ठाढ़ छै रोकि ने सकलौं

रुबाइ




हमर हाथ सँ अहाँक हाथ छूटत नहि
प्रेमक तन्नुक ताग तोड़ने टूटत नहि
जाहि दिन बिसरि जाएब अहाँ हमरा
तकरा बाद हमर आँखि देखत नहि

गजल


(१)
हुनका सों हँसि के बाजलों ते हल्ला मचि गेल
हुनक मुँह दिस ताकलों तs हल्ला मचि गेल

रूपक चन्द्रमा के कारी अमावस केने रही
चमकैत पूर्णिमा के देलों तs हल्ला मचि गेल

ओ नैनक कटार से सबके ये घायल केने
हम नजैर से जे ताकलों तs हल्ला मचि गेल

हुनक रूपक लाइट भक्क-भक्क जरैत ये
सबहक डिबिया मिझेलों तs हल्ला मचि गेल

ओ आँखिक इशारा जे मारलक मुंडेर पर
हम फादि गेलों जे देबार तs हल्ला मचि गेल

अहों लिखूं ग़ज़ल ओ कहैत रहे सदिखन
करिया
कलम जेs उठेलों तs हल्ला मचि गेल

(२)

चमरपट्टी में गाय मरल ते कोनो बात नै
बभनपट्टी में बेंग मरल हल्ला मचि गेल

हमर झोपड़ी खसाs के ओ महल बना लेलाs
फेर से दुछत्ती जे बनेलों ते हल्ला मचि गेल

ओ नोटक जोड़ पर बड़का नेता बनि गेल
हमर ईमान नै बिकल ते हल्ला मचि गेल

विदेशो में रहि, नै बिसरल अपन माटि के
एता गामों में बाजलों मैथिली हल्ला मचि गेल

नै बिसरब अपन माटि के करियों ई प्रण
जे सुनलक हमर ई गोप हल्ला मचि गेल


Tuesday, 24 May 2011

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आँखि देखबाक मूँह कहबाक लेल
हाथ पकड़बाक ठोर चुमबाक लेल
ने पक्का ने खढ़क घर काज आएत
करेज बनलै केकरो रुकबाक लेल

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छौड़ा के फैशन कमाल केने छै
कान में बाली ठोर लाल केने छै
नटुआ ओ बनि गेल शहर में आबि के
छौड़ी के जेना ओ चाल केने छै

Monday, 23 May 2011

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शहर में छौड़ी के फुटी गेल करम
लाज के गठरी बनि गेल बेशरम
अमेरिका के हवा में रंग गेल ऐना
नै किछु ईमान बचल नै बचल धरम

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शहरक छौड़ी के आँगी छोट भए गेल
नागिन जोंका केश बाबकट भए गेल
शहर के हवा कहु आ अमेरिका के रंग
छौड़ी के डिरेस पेंट शर्ट भए गेल

Saturday, 21 May 2011

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अहाँक नजरि सँ हम घबाह भए चुकल
लटाढ़म सँ हम तबाह भए चुकल
लोक हमरा की ने की कहैए झुढ्ढे
हम अहाँक प्रेम मे खटबताह भए चुकल

Friday, 20 May 2011

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कने चीखि लिअ काँच-कूँच प्रेम हमर
नून-अनून,झाँस-झूँस प्रेम हमर
भने तोरा लेल मधुए बोरल बोल
मुदा लोकक लेल काँट-कूश प्रेम हमर

Thursday, 19 May 2011

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तोरा चाहबौ हम जान सँ बेसी
आन-बान-शान खनदान सँ बेसी
जहिआ चुनबाक हएत संसार मे
हम तोरे चुनबौ जहान सँ बेसी

Wednesday, 18 May 2011

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हमरा देखि लिअ अँहा के हमरे सप्पत
बाँहि मे घेरि लिअ अँहा के हमरे सप्पत
अँहा के हमर सप्पत हमर प्रेमक सप्पत
मोन मे जोड़ि लिअ अँहा के हमरे सप्पत

गजल

कोहबर के घाम महैंक उठल मौह सन
रुचलौं आहाँ राईत गुदगर रौह सन !

चतुर्थी अबैत बेस भेलौं समर्थ
पाकल यौवन भातिक लौह सन !

पाटिया बनल पट्काक अखारा
टसक्लौं ने आहाँ नबका चौह सन !

भोरे बिधकरी जे केलैन खखाश
चुप्पे मठेरलौं बतही पुतौह सन !

अहिबातलक पातिल सेहो मिंझा गेल
सांसक बिर्रो छल नागक फौंह सन !

Tuesday, 17 May 2011

कता





जे लोकक थारिए ढ़कोसि जाइए
दू दिनक उपास मे संत बनि जाएत
जे लोकक हँसिए भकोसि जाइए
उपदेशक बात वएह कहि जाएत

गजल

हुनकर बेवफाई से धधकल आगिक लुत्ती बनि गेलों
पहिने रही ठीक-ठाक आब बहसल अगत्ती बनि गेलों

कहलक रहे ओ मरतो दम तक देब अहाँक साथ

दुखक आँचि जे एलाह कनिकटा, मोमबत्ती बनि
गेलों

कहलो जे हुनका अहाँक संग नै ये बहुत दिनक

लीपैट गेल ऐना देह में, की अमरलत्ती बनि
गेलों

पूजा के नाम से जिनका सिसकारी छुट
ैत रहे
ओ पियार में परि के गोसाँय भगवत्ती बनि
गेलों

Monday, 16 May 2011

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आँखि मे मोन मे करेज मे अनचिन्हार
असगरें अनचिन्हार हेंज मे अनचिन्हार
प्रेम ने माँगै लाली रे पलंगिया
माटि पर अनचिन्हार सेज पर अनचिन्हार

Sunday, 15 May 2011

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देह हुनकर घाम सँ नहाएल अछि
मानू धार मे कमल फुलाएल अछि
रचब अनचिन्हार आखर हुनके लेल
एहने बात मोन मे आएल अछि

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भ्रष्ट सिस्टम मे पप्पू पास होइते रहत
बदमाश लेल मधुमास होइते रहत
जहिआ धरि जनता बनल रहत बेशरम
तहिआ धरि देशक नाश होइते रहत

Saturday, 14 May 2011

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यौवन मचान सन गात सोनलत्ती छऊ,
काया कनोजैर सन घाम धूपबत्ती छऊ,
रसगर ठोर तोहर तोरलक सबूर के ,
मातल आँखी बुझ जरदाक पत्ती छऊ!

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आहाँ रूपक भेरियाधसान लागल अई,
छोरा संग बुढबोक आन जान लागल अई
आबो समेटू अपन भाभट दसगरदा
आँगन में घट्कक दलान लागल अई

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कोना कहू कहितो ई लाज होईया ,
बिनु टाका कूटमैतीक ने काज होईया,
सेहनता अई बेटी महफा में बैसती,
किये मैथिल भेलौं ई संताप होईया

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सगर जिनगीक तोरा सौं मीत जोरलौं,
एक दोसरक बेगरता सौं प्रीत जोरलौं
गरबहिंयाँ द दुनु गोटे बन्हलौं सिनेहके
तोहर नेहक गिलेबा सौं भीत जोरलौं

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आँखिक नोर के पहिचान नै सकलो
ठोरक मुस्कान के जानि नै सकलो
बुझलो तखन हम चेहरा केर भाषा
दिलक नजैर से जों मुखड़ा कs ताकलो

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हुनकर आगु में ठमकै के दम नै भेल
छोडि देलक तइयो प्यार कम नै भेल
एकरा अहाँ प्रेम कहु आs थेथरपनी
करेजो टूटल तइयो हमरा गम नै भेल

Thursday, 12 May 2011

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सात रंग सँ रंगल चेहरा अहाँक
सातो स्वर सँ सजल चेहरा अहाँक
बहुत मेहनति बुझि पड़ैए विधाताक
सात जनम मे बनल चेहरा अहाँक

Wednesday, 11 May 2011

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अँही छी जकरा लेल जीबै छी हम
फाटल-चीटल करेज सीबै छी हम
हम नहि जा सकलहुँ कोनो मन्दिर-मस्जिद
आइ धरि अँहिक बाट जोहै छी हम

Tuesday, 10 May 2011

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नै कुनू बात आs गोप नीक लागय ये
नै कुनू ग़ज़ल नै गीत हमरा भावय ये
जहिया से भेल हमरा हुनका सों पियार
नै हुनकर सिवा दोसर नजर आबय ये

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देखते जों मोन में टीस उठि जाय
दूनू टा आँखी में नोर भरि जाय
ते बुझियो ई छौड़ा के
टूटल ये दिल
गबरू जबान जों बताह बनी जाय

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प्रेम मे खून सुखा नोर बनि जाएत
हुनक ठोरक हँसी भोर बनि जाएत
चिन्हार मरबे करत हुनका देखि-देखि
अनचिन्हार जीबि चितचोर बनि जाएत

Monday, 9 May 2011

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जिनगी अमोल तोहर कोंख भेटल माँ,
तोरे आँचर में हमरा भरोस भेटल माँ,
सब आफद अनेरे उरल कपूर सन ,
तोहर ममता के जखने बसत भेटल माँ!

गजल

गजल
काइल्ह आँईखक आहँक हम तरेगन छलौं,
आई तरेगन बना किये दूर केलौ !

सब आखर सिनेहक हम गुनैत छलौं
आई आखर किया आहाँ बिसरा गेलौं !

हम एसगर अहिं संग दोसर भेलौं
आई तेसर बना किया आन केलौं !

ठोर आहाँक ने कहियो हम चुम्मा केलौं
आई नोरक किये ठोर चुम्मा देलौं !

तीर तरकस जकाँ संग सैद्खन छलौं,
आई तीरे लगा किये पीर देलौं !!

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अकबार के जरुरत केकरा नै पड़त
ससुरार के जरुरत केकरा नै पड़त
भेटते नै ये कियो जिनगी में नै ते
पियार के जरुरत केकरा नै पड़त

कता

जिनका लेल छोड़ी देलोंउ ख़ुशी के हम
ओ हमरा ख़ुशी के लेल छोड़ि देलक
कोनाक समझाऊ हुनकर ख़ुशी रही हम
अनझक्के में जे हमर दिल तोड़ि देलक

जनवरी २०११ सँ अप्रैल २०११ धरिक गजल पुरस्कार

हमरा इ सूचित करैत बड्ड नीक लागि रहल अछि जे " अनचिन्हार आखर" द्वारा स्थापित पुरस्कार " गजल कमला-कोशी-बागमती-महानंदा" पुरस्कारक पहिल चरण ( मास जनवरी सँ अप्रिल धरि) पूरा भए गेल अछि। मास जनवरी सँ लए कए अप्रिल धरिक जनिका जाहि रचना लेल चयन कएल गेलैन्ह अछि तकर सूची एना अछि।
त्रिपुरारी कुमार शर्माक एहि रचनाकेँ जनवरी मास लेल चयन कएल गेलैन्ह अछि----------
कोरा में माथा रइख कS सुतइ के इच्छा अछि
अहाँ नजदीक आबि क’ मरइ के इच्छा अछि

टहटहाइत इजोरिया में फेर आउ एक बेर
टहटहाइत इजोरिया में देखइ के इच्छा अछि

कोनो बात नइ छै प्राण चइल गेलय त’ की
अहाँ के आइबते अर्थी से उठइ के इच्छा अछि

पड़ल जखन साँझ मोन भ’ गेल बड्ड निराश
अहाँ लेल भरि जिनगी बैठइ के इच्छा अछि

उड़ल जाइ छी एखन फेर नील गगन दिस
अहाँ संग नील गगन में उड़इ के इच्छा अछि

सदरे आलम गौहरजीक एहि रचनाकेँ मास फरवरी लेल चयन कएल गेलैन्ह अछि-----

जहिआ-जहिआ कौआ बाजे टाटपर
देखै छी हम ओ तँ अबैए बाटपर

ताकै छल पोखरि-झाखरि गेलै कहाँ
आँखि झुका बैसल छथि भाइ तँ घाटपर

निन्नो हेतै केना माए-बापकेँ
बेटी बैसल सदिखन जकरा माथपर

सौंसे घरमे पाबनि मनबैए इ सभ
सदिखन बैसल बूढ़ा खोंखथि खाटपर

झिल्ली-मुरही-कचरी आबो भेटत
आबि तँ देखू अप्पन गामक हाटपर

सुनील कुमार झाक एहि रचनाक चयन मार्च मास लेल कएल गेल अछि-------

अनकर मचान पर, आशीष जी के दालान पर,
मिथिला के शान पर लिखय लए तैयार छि.
गामक गोप के, गामक लोग लए,
गामक भाषा में,परसय लए तैयार छि

मिथिला के रंग के, मैथिल के ढंग के,
मिथिला के मंच पे आनय लए तैयार छि,

मिथिला के गोप से, मैथिल के ढ़ोब से,
नै अनचिन्हार छि, हम 'झा' सुनील कुमार छि..

विकास कुमार झाक एहि रचनाक चयन मास अप्रिलकेँ लेल कएल गेल अछि-----

मोन मुंगबा फुटईया मीत हमर ,
सोझा अबैईथ जखन प्रीत हमर !
हुनक जूट्टी में गूहल भबित हमर ,
हुनक गजरा गछेरने अतीत हमर !
खाम्ह कोरो बनल मोन चीत हमर ,
हुनक लेपट सौं छारल अई भीत हमर !
हुनक नख शिख में नेह निहीत हमर ,
हुनक कोबरे करत मोन तिरपित हमर !
हम हुनके सिनेह ओ सरीत हमर ,
हुनक मुस्की सौं जागे कबीत हमर

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हुनका देखिते बजा गेल आइ लव यू
मोन करेज पर लिखा गेल आइ लव यू
आब एकरा प्रेम कहू की बतहपनी
सुतली राति मे बजा गेल आइ लव यू

Sunday, 8 May 2011

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हिम्मति रखने काज सदा बनि जाएत
देह तँ जरत नाम मुदा रहि जाएत
इ जे देखा रहल समस्या केर पहाड़
ठानि लेब तँ रुइ जकाँ उड़ि जाएत

Saturday, 7 May 2011

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तरक्कीयो से हमरा ख़ुशी नै भेटल
नौकरीयो हमरा परदेश मs भेटल
जिनकर कृपा से पहुंचलों ये एता
ओ माय से मिलय के छुट्टी नै भेटल

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सटल ठोर ते सिसकारी परबे करत
कटल मोंछ ते टिटकारी परबे करत
गाम जाय रही मोंछ पर ताव देने
छुटल ट्रेन ते लिलकारी परबे करत

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भेटत खुशी केकरो देखलाक बाद
केकरो ठोर सँ नाम सुनलाक बाद
कहबा मे लागत बरु एकै-दू छन
मजा भेटत आइ लव यू कहलाक बाद

Friday, 6 May 2011

रुबाइ

मल्लाहक भाग से माँछ नै मरय ये
घोर-चौबटिया पर लहास नै जरय ये
कतनो देखाय लीया पोथी आ पतरा
गिध्धक शाराप से गाय नै मरय ये

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जिबए ले दुनिया में किछु ख़ास नै ये
सब कुछ ये पासे मुदाs पास नै ये
तोड्लक जे हमर करेज ओ छौड़ी
अछैत जिनगी, जिबए के आस नै ये

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अपन बाँहि में अहाँ के गछारि लेब हम
नजरि सँ करेज में उतारि लेब हम
एक बेर हँ तँ कहि कए देखिऔ
सगरो बाट पर आँचर पसारि देब हम

Thursday, 5 May 2011

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हुनक सोह टीसईया काँट बबूर जेना ,
आँईख भिजैईया तारी खजूर जेना ,
हुनके रूपक चिप्पी लगेलौं करेज में,
वो अघाई छईथ कछहरिक हजूर जेना !

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ईशा आ पैगम्बरक झगरा सुनलौं,
अन्हरा जिहाद के फतबा सुनलौं,
सुनलौं निछा गेलई लादेन परसु ,
आई फेर केदन लादेन भेल इ की सुनलौं !

रुबाइ

चक्का तिलकोर से अघाय गेलों हम
माछक-झोर, घी में नहाय गेलों हम
ई नै ये कोनो गामक भोज केर किस्सा
पहिलुक बेर नबका जमाय भेलों हम

रुबाइ

पुछलक कियो हमरा, किया कानय छि
विधना केर रीत ये ,किया नै मानय छि
कोनाक कही हम ओ निर्लज्जी के किस्सा
टूटल जे दिल ते मोने-मोन कानय छि

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ठोर सँ ठोर सटतै तँ गीत जनमत
आँखि सँ आँखि मिलतै तँ प्रीत जनमत
दुश्मनी मे जिनगी केखनो नहि बिताउ
हाथ मे हाथ देबै तँ मीत जनमत

Wednesday, 4 May 2011

गजल- (गायत्री गजल)

गुमकी लागै राति बुलैत चान झपाइ छी

घुरि जाइ गाम मुदा बीचे असकताइ छी



चरको परियानि ई बनेलौं कएक बेर

उबेरक बाट ताकी आ सुरुज कहाइ छी



अकास बिच सतरंगा पनिसोखा उगलैए

निराशसँ आगू जाइ बीचेमे लेभराइ छी



जे काज होइए पछता से काज ताकी हम

अगता काज आबैए जान कोना गमाइ छी



ओकरा देखि बुझलहुँ गढ़निक सोपान

बनैत- बनैत बनै मूर्ति अहाँ देखाइ छी



ढङीला छौरा धरैए भेष रूप बदलैत

दोहरी ई नस-नस बुझी हम चिन्हाइ छी



जे संगमे अछि सेहो छोड़ने अहाँ जाइ छी

राखब की लगैए पकड़ै लेल पड़ाइ छी



कानमे ठेकी आँखिमे गेजर मूह दुसैए

लेरचुब्बा नै डिग्गा मदारी जे कहै जाइ छी



बूझी बाजी करतेबता सँ बढ़ू एक्के सुरे

पेटो पानि नै मूह दुसै कनीले हुसाइ छी



छोड़ि कऽ चलि गेल छाह, परात, इजोरिया

ऐरावत दोसराइत अहाँ की कसाइ छी



टिप्पणी:गायत्री: ई चारि प्रकारक होइत अछि- द्विपदी, त्रिपदी, चारि पदी आ पाँचपदी। चारि पदी मे ८-८ अक्षरक पद आ एक पदक बाद अर्द्धविराम आ दू पदक बाद पूर्णविराम दए सकै छी। माने एक गायत्री शेर तैयार।

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बाट जोहैत-जोहैत आन्हर भेलहुँ
अबाइ सुनैत-सुनैत पाथर भेलहुँ
ने ओ एलथि ने हुनक इयाद आएल
बूझू सभ सुख रहितो पातर भेलहुँ

Tuesday, 3 May 2011

गजल

अहूँ पड़ाएल छलहुँ हमहूँ पड़ाएल छलहुँ
अहूँ घबड़ाएल छलहुँ हमहूँ घबड़ाएल छलहुँ


साइत एहने भेट लिखल छल कपार मे
अहूँ लजाएल छलहुँ हमहूँ लजाएल छलहुँ


रुकलाहा जिनगीक लेल सौरी बेर-बेर सौरी
अहूँ उबिआएल छलहुँ हमहूँ उबिआएल छलहुँ

शेर चल गेल आब ताल दए की हएत
अहूँ सुटिआएल छलहुँ हमहूँ सुटिआएल छलहुँ

रहि गेलहुँ अनचिन्हार करेज सटेलाक बादो
अहूँ अगुताएल छलहुँ हमहूँ अगुताएल छलहुँ

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मेकअप के जरुरत नै चाँद कs पड़त
अहाँक रूप ये चाँद सन मानय पड़त
चक्क से जे चमकल मुखड़ा अहाँक
तोड़ी लेलक सब कियो चौठक बरत

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अपन सपना अपने मेटाs लेलों हम
अपन भागक दीपक मेझा लेलों हम
ओ कहलक कनिकटा इजोत कs दियो
अपना घरक फक्क से जला लेलों हम

Monday, 2 May 2011

गजल

ग़ज़ल

हमरा दिल के तोड़ि देलहुँ
हमरा सँ मुह मोड़ि लेलहुँ
छोड़ि क एसगर हमरा अहाँ
हमरा सँ दूर कतहु चलि गेलहुँ ।।

मोनक बात मोने मे रखलहुँ
कहियो अहाँ स नहि कहलहुँ
दूइए दिनक भेंट घांट मे
प्रेम अहाँ स कए लेलहु।।

बाट अहाक तकैत रहलहुँ
मुदा अहाँ नहि अएलहुँ
दूर जाकए हमरा स अहाँ
हमरा मोन के तड़पबैत रहलहुँ।।

याद सताबैए अहाँक त
मोन पड़ैए ओ सभ दिन
जहिया रहैत छलहुँ अहाँ
हमरा स बड्ड खिन्न।।

सपना मे अहिं के देखैत रहलहुँ
अहिंक वियोग मे तड़पैत रहलहुँ
मुदा किशन सन प्रेमी केँ अहाँ
अनपढ़ गंवार बुझैत रहलहुँ ।।

जहिए देखलहुँ एक नज़र अहाँ के
तहिए मोन मे बसि गेलहुँ अहाँ
मुदा हमरा पवित्र प्रेम के
अहाँ नहि बुझि सकलहुँ ।।

आब बुझहब मे आबि रहल अछि हमरा
अहाँक प्रेम मे हम की नहि केलहुँ
मुदा तइयो हमरा मधुबनी मे छोड़ि अहाँ
हमरा स दूर कतहु चलि गेलहुँ ।।

दिल सँ हम साँचो प्रेम केने रही
अहू त ई गप हमरा एक बेर कहने रही
मुदा किएक से अहिं कहू
हमरा सँ दूर अहा कतए चलि गेलहुँ ।।

ज अहू साँचो के प्रेम केने होएब
त मोन पड़ैत होएब हम
मोन सँ निकलैत होयत एकटा गप
कारीगर अहाँ संगे ई की केलहुँ हम।।

हृद्य सँ प्रेम केनिहार बुझहत
प्रियतम सँ दूर हेबाक वियोग
कोना क हम सहलहुँ कनेक अहू बुझहू
निश्छल प्रेम केन रही सभ दिन त कहलहुँ ।।

लेखक:- किशन कारीगर।
तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों