Friday, 28 October 2011

गजल


आगि पजरलै जखन, धुआँ उठबे करत यौ।
इ प्रेम मे डूबल मोन खिस्सा रचबे करत यौ।

किया करेज पर खंजर नैनक अहाँ चलेलौं,
ककरो खून भेलै इ दुनिया बूझबे करत यौ।

होइ छै प्रेमक डोरी तन्नुक, एकरा जूनि तोडू,
जोडबै तोडल डोरी गिरह बनबे करत यौ।

राम-नाम मुख रखने प्रेमक बाट नै धेलियै,
प्रेमक बाट जे चलबै मुक्ति भेंटबे करत यौ।

बीत-बीत दुनियाक प्रेमक रंग मे रंगि दियौ,
"ओम"क इ सपना अहाँ संग पूरबे करत यौ।
---------------- वर्ण १८ ----------------

Tuesday, 25 October 2011

गजल


मुस्की अहाँक हमर काल बनल अछि।
नैनक चालि जी केँ जंजाल बनल अछि।

अहाँ केँ देखि सुरूज कोनटा नुका गेल,
लाल अहाँक एहन गाल बनल अछि।

लिखते रहै छी पाती अहाँ केँ प्रिये हम,
राखै छी घरे पातीक टाल बनल अछि।

हमरो सुधि कखनो लियौ ने प्रियतम,
अहीं केँ सुमिरैत की हाल बनल अछि।

"ओम" दीप बनि जरै इजोत अहीं लग,
देखू प्रेमक खिस्सा विशाल बनल अछि।
-------------------वर्ण १५--------------------

गजल


आउ मिल मोनक दीप जराबी दियाबाती आबि गेलै।
सिनेह तेल, हिया बाती बनाबी दियाबाती आबि गेलै।

अंगना मे फेरता ऊक बाबा दुख रोग भगाबै लेल,
डाह-घृणा केँ हम ऊक घुमाबी दियाबाती आबि गेलै।

दरिद्रा आब कतौ नै रहतै जे सूप डेंगाओल जैत,
मैंया संगे सगरो सूप डेंगाबी दियाबाती आबि गेलै।

हलुआ-पूडी, लड्डू-बताशा सबहक घर बनल छै,
आइ खूब प्रेम-मधुर खुआबी दियाबाती आबि गेलै।

मँहगी, गरीबी, बेरोजगारी, हिंसा केँ नाच पसरल,
"ओम" संग इ सब दूर भगाबी दियाबाती आबि गेलै।
-------------------वर्ण २०--------------------

Monday, 24 October 2011

गजल


पिया हमर रूसल जाइत किछ नै बजै छैथ।
करब हम कोन उपाय ककरो नै सुनै छैथ।

बड्ड जतन सँ कोठा बनल जे सून पडल छै,
कत' सँ भेंटल हकार पिया घुरि नै तकै छैथ।

आउ सखि शृंगार करू मोर पिया केँ मोन भावै,
कोन निन्न मे सूतला हमरा किया नै देखै छैथ।

चानन काठ केर महफा छै बहुत सजाओल,
ओहि मे ल' चलल पिया केँ कनियो नै कनै छैथ।

सासुरक सनेस पर "ओम" केँ लागल उजाही,
नैहरक सखा सभ छूटल यादि नै आबै छैथ।
----------------वर्ण १८-----------------

गजल


पिया हमर रूसल जाइत किछ नै बजै छैथ।
करब हम कोन उपाय ककरो नै सुनै छैथ।

बड्ड जतन सँ कोठा बनल जे सून पडल छै,
कत' सँ भेंटल हकार पिया घुरि नै तकै छैथ।

आउ सखि शृंगार करू मोर पिया केँ मोन भावै,
कोन निन्न मे सूतला हमरा किया नै देखै छैथ।

चानन काठ केर महफा छै बहुत सजाओल,
ओहि मे ल' चलल पिया केँ कनियो नै कनै छैथ।

सासुरक सनेस पर "ओम" केँ लागल उजाही,
नैहरक सखा सभ छूटल यादि नै आबै छैथ।
----------------वर्ण १८-----------------

गजल


धार नहि होइ ए मुक्त, बान्ह केँ कोना के तोडब।
बहैत हवा मुट्ठी मे बन्न हम कोना के करब।

सपना होइ छै सपना कतबो सोहाओन हुए,
निन्न टूटै पर ओकरा अपन कोना के कहब।

अनकर आस बेनियाक बसात सत्ते कहै छै,
ककरो मुँह केँ ताकैत आस मे कोना के रहब।

नोंचि लेलियै कियाक अहाँ सुन्नर पंख चिडै केँ,
बिन पंख आकाशक नोत आब कोना के पूरब।

बिलमि जइयो कनी "ओम"क गाम मे किछ खन,
केहन छै गाम हमर से अहाँ कोना के बूझब।
-----------------वर्ण १८-----------------

Saturday, 22 October 2011

गजल


गुनगुनाइत प्रेमक गीत लs कंठ भेल सधुन सितार पिया
सिनेह खेल काल कियैक ऐना देखबैत छी लटमझार पिया

काटु जुनि एहन जोर सँ बड्ड दुखाइत अछि ई लहरचुट्टी
देखु सम्हैर चलु सुकुमार आंगुर नै आबि जाय मोचार पिया

कचोर हरियर गभाइत धान सन गम्हरैत ई स्त्री-यौवन
एहन तन तरुण केर भुखायल छैक सगर संसार पिया

सुमधुर अहाँक प्रीत संग गमकैत अछि हमर सुबदन
प्रेम-पाशक बान्हु जुनि छान खसब हम धड़मबजार पिया

अनुराग-बिराग आतिपाति खेलि कतैक स्नेह-कलह करब
उढ़ैर रहल आब मोन मे उठल सभ मधुरस शृंगार पिया

"शांतिलक्ष्मी" कहैत छथि ऐना जुनि विचलित मोन हौउ हे सखि
भरि आँखि सुप्रीतरस लs मुस्कैत भावैं भs गेलाह देखार पिया


................वर्ण २४.............

अक्षय कुमार चौधरीजी केँ समर्पित

गजल

लटपटायल देश के अहां से किछु अपेक्षा छैक
संदेहयुक्त नेतृत्व मे अहां से किछु अपेक्षा छैक

मनुख छी बचल अछि मनुखत्व एखनहु धैरि
भेडी के चालि नहि चली आई देशक अपेक्षा छैक

प्रगती के नाम पर पाश्‍चात्‍य सभ्यता नकल केल
एकल ने संयुक्त बनी समाजक ई अपेक्षा छैक

जे छल आधार ओ सृजक करै छथि एकांतवास
वृधाश्रम समाप्त करी पितर के ई अपेक्षा छैक

अतिथि देव भवह अपन जे ई परिचय छल
पाहुन के स्वागत करी संस्कारक ई अपेक्षा छैक

मैथिली के नाम पर आई गर्व करै छी देश पर
बेटी के भेटय सम्मान हृदय के ई अपेक्षा छैक


---वर्ण - १९ ---

उपेन्द्रनाथ झा "व्यास" रूबाइयात-ए-ओमर खैयाम (मैथिली पद्यानुवाद-सौजन्य मयंक झा)

Thursday, 20 October 2011

गजल

मोनक आखर मुहे परसितहु
आई यदि अहां रुकिये जयतहु

अहां चल जायब नहि बुझलाहु
की जैते जे हम झुकिये जयतहु

किछु गॅप झांपल विश्वास तोड़ल
की होएते यदि बुझिए जयतहु

गेलहु विदेश देलहु नहि ध्यान
की होएते यदि रुकिये जयतहु

पता जे रहितय प्रेम नगर के
कहुना कय के घुसिये जयतहु

Wednesday, 19 October 2011

गजल



पले पल अपन अंतर्मनक आगि मे सुनगैत अंशुमाला भs गेलहु
खने हर्ख स्मृतिक, खने दुखक आगि मे पजरैत, अंशुमाला भs गेलहु

जीवनक बदलैत मौसमक डुबैत-उगैत चान सुरुजक रूप धs
खने स्याह अन्हार, खने इन्द्रधनुखक विहुँसैत अंशुमाला भs गेलहु

अल्हड़ कुमारिक सिहरैत सर्दी मे जाधरि गुदगुदी रहैक मुस्कैत
लोक कहै हम ओसाइत इजोरियाक ठहकैत अंशुमाला भs गेलहु

मधुगंध आ नव आस लs कs जखन आयल बियाह राति केर बसंत
मोन मे रहै भ्रम हम उखा-अरूषक बिहुँसैत अंशुमाला भs गेलहु

प्राणक प्यास आ टुटल आस लs कs जखन आयल गुरदा-रोगक ग्रीष्म
पीय विस्वासघातक प्रचंड दुपहरी मे जड़ैत अंशुमाला भs गेलहु

शुभेच्छुक आशीख आ मायक वात्सल्य वरखा आपस अनलैथ पावस
हम घुरि नव उम्मेदक दियाबाति मे टिमकैत अंशुमाला भs गेलहु

"शांतिलक्ष्मी" कहैथ स्त्रीशक्तिक पावनि तिहार लs घुरि आयल अछि जाड़
मानु हे सखि, अहाँ तँ धुमन आरतीमे गमकैत अंशुमाला भs गेलहु

.........................वर्ण २७....................

(अपन अनचिन्हार सखि Anshu Mala Jha के समर्पितl
एहि गजल मे अंशुमाला शब्दक प्रयोग कतहुँ व्यक्तिवाचक नहि अछिl
शाव्दिक अर्थक अनुसार शब्दक प्रयोग प्रकाशक लड़ीक रूप मे भेल अछिl)


ई गजल " मिथिला-दर्शन" केर अंक मइ-जून २०१२मे प्रकाशित भेल।

Tuesday, 18 October 2011

गजल


कोशिश केलहु लिखबाक ग़ज़ल
लिखतहि कपाड मिसरा ख़सल

प्रथम शेर अहां शुरू केलहु
दुनु पाँति बहर ने लेलहु ?

मिलायल मिसरा कहुना कहुना
खट द बहरायल बहर पहुना

हम छी पूज्य ग़ज़ल क लेल
हमर बिना ग़ज़ल नहि भेल

हमर स्वरूप अछि आधा दर्जन
नाम कहब त मोडब गर्दन

झेललाहु हम बहरक कहर
आब नहि छोडब कोनो कसर

एतबहि मे घुसि काफिया पैसल
नहि मिलायब त रहब बैसल

बड्ड मुश्किल से जोडल सब किछ
मोने सोचलहु आब भेलहु फरीच्छ

टरटरायत जे निकलल वर्ण
हे बहिरे अपन पातु कर्ण

समाजवाद थिक हमर धर्म
गिनती राखू करू कर्म

हमर संख्या राखू ध्यान
नही त बिसरू ग़ज़ल गुण गान

कोन करम कयल हे भगवान
किया देलहु हम ग़ज़ल पर ध्यान ?

गजल

करेजा हमर काटि लेलक ओ हन्सैत हन्सैत
प्रेम पाश मे ओझरा देलक ओ हन्सैत हन्सैत

अज्ञानी के प्रेमी बना देलक ओ हन्सैत हन्सैत
चंचलता के गंभीर केलक ओ हन्सैत हन्सैत

आब नीन चैन उड़ा देलक ओ हन्सैत हन्सैत
प्रेमक पाठ त पढ़ा देलक ओ हन्सैत हन्सैत

गेल विदेश अलग केलक ओ हन्सैत हन्सैत
हमरा कना के छोडि देलक ओ हन्सैत हन्सैत

मिलन विरह मिला देलक ओ हन्सैत हन्सैत
जीवनक मोल सिखा देलक ओ हन्सैत हन्सैत

गजल

जादू-मंतर मारि देलकै ओ जाइत-जाइत

मोन केकरो हरि लेलकै ओ जाइत-जाइत


जकरा अबिते भोर आबि गेलै ठोर पर

आँखिमे साँझ आनि देलकै ओ जाइत-जाइत


हाथ थरथराइत छलैक फूलों तोड़बासँ

कोमल मोन तोड़ि देलकै ओ जाइत-जाइत


उखरल छलैक सुलबाइ मुदा तैओ देखू

आँकर-लोहा पचा लेलकै ओ जाइत-जाइत


अनचिन्हारक ठोर सटलै अनचिन्हारसँ

मुदा मुँह तँ घुमा लेलकै ओ जाइत-जाइत



**** वर्ण---------17*******

Rajendra Bimal in conversation with Dhirendra Premarshi (Chaubatiya 3)

Ek Misiya

Monday, 17 October 2011

गजल



पले पल प्रेमक प्यास लागय आब फ़ेर कहिया मिझायब यौ
रूइसकेँ तँ जाइत छी परायल पिया फेर कहिया आयब यौ

पचासे हजारक लेल ऐना तामसायल छी कथी लय पीतम
काज अस्सल फेरसँ हम अपन माय बाबुजी केँ बुझायब यौ

परुके साल एल.सी.डी. आओर फ़ीज बाबुजी रहैथ कीन देने
कहै छलाह अपन जमायक एहिना सभ सsख पुरायब यौ

मोटरोसाइकिलक सsख अहाँक ओहो जल्दीये कय देता पुरा
बस आब दसे हजार रुपैया बचल आरो छैक बचायब यौ

बाबुजीक आय छैक बड़ कम खर्चा अथाह अपरम पार यौ
तैपर मासेमास भायकेँ पढ़ेवाक खर्चा होस्टल पढ़ायब यौ

साल दुई साल तक छैक सेहो दस लाख दान-दहेजक खर्चा
वयस बितल जाइत छोटकी बोहिन केँ पहिने बिहायब यौ

बर हाथ लगैल बेटीक ऐतै करैथ बाबुजीयेक बड़प्पन
बुझनुक लोक स्वयं अहाँ छीहै हम गमारीन की बुझायब यौ

कहै छी हम बेचि लिय हमर सभटा गुड़िया गहना जेब़र
सोन शृंगार नय रहत तेँकि पिया हम उढ़ैर नै जायब यौ

हम अहाँकेँ छौड़ि कतय जायब पिया, छौड़ि कतय जायब यौ
चाहे मैरि-जैरि आब वा सदेह सिते जकाँ मैटिये समायब यौ

"शांतिलक्ष्मी" कहैत छथी यौ अहाँ तिरहुतक सर्वपुज पाहुन
और कतैक दिन धरि विदेहक बेटी जाति केँ सतायब यौ


....................वर्ण २४..................

गजल


रूसल छै कपार कहियो बौंसेबे करतै।
मोन रहतै टूटल कते जोडेबे करतै।

सागरक कात सीप बिछैत रहब हम,
कोनो सीप मे कखनो मोती भेंटेबे करतै।

क्षितिजक बाट केँ हम धेने छी सदिखन,
आकाश मे हमरो हिस्सा कनी हेबे करतै।

सजबै छी अपन उपवन एहि आस मे,
उजडल घर मे सुगंध भरेबे करतै।

कियो मानै नै मानै "ओम" इ कहिते रहत,
नैन रहतै नै पियासल जुडेबे करतै।
.......................वर्ण १६.......................

गजल

दौडैत हन्फैत औनाएत जिनगी
तपैत भीजैत सिहरैत जिनगी

हन्सैत मुस्काएत जिवैत जिनगी
सुतैत पडैत मदमस्त जिनगी

उसर ज़मीन के तकैत जिनगी
मडुआक रोटी मे कनैत जिनगी

न्रित्य संगीत मध्य झूमैत जिनगी
देश विदेश खूब घुमैत जिनगी

सुखाड्क मारि सहैत जिनगी
करजा क बोझ उठ्बैत जिनगी

मधुशाला- प्याला मे छनैत जिनगी
लहना के टाका मे देखैत जिनगी

पेट मे पैसल बौवाएत जिनगी
डाक्टर ले पडल मरैत जिनगी

गजल

अहां के रूप आन्खि फरफरेबई या
ई फुजल केश मेघ गड्गडेबै या

अहां चलु नई अपन तिरछा चालि
ई चालि प्रीतक रोड कड्कडेबै या

खिलखिला हंसु नई केवल मुस्काओ
अहान्क हँसी करेजा धड़धड्बै या

नुहु नुहु आओ हृदय मिलन लेल
अहां के स्वास हवा सरसरेबई या

जुनि कहु ई डगरिया नई आयब
ई गप हमर देह थर्थरेबय या

Sunday, 16 October 2011

गजल

सोना भेटत सस्ता महँग चाउर देखब एक दिन

लोक एहिना तँ लूटत हबाउर देखब एक दिन


देशमे लोकसभा-विधानसभा बनि गेल शोकसभा

भूखल जनता तँ देतै धमाउर देखब एक दिन


हुनकर धोधिए देखि तँ मेटा गेल आब भूख हमर

अहूँ तँ एहिना करब चराउर देखब एक दिन


एकौ बेर देखि लेत हमरा अहाँके संग मे सजनी

तँ लोक जरत आ बनत छाउर देखब एक दिन


नोरक खिच्चरि दर्दक तिलबा आ कष्टक चुड़लाइ

एहिना अनचिन्हारक जड़ाउर देखब एक दिन



**** वर्ण---------20*******

गजल

बाट टूटैत रहलैक हर समय

लक्ष्य छूटैत रहलैक हर समय


भाइ बाढ़ि-भूकंप आबै की नै आबै

बान्ह टूटैत रहलैक हर समय


समय सतयुग होइ की कलयुग

ओ तँ लुटैत रहलैक हर समय


भाइ धर्मक युद्ध होइ की अधर्मक

सेना कटैत रहलैक हर समय


बेसी तेज दौगने नै भेटत पदक

ओ तँ खसैत रहलैक हर समय



**** वर्ण---------14******

गजल

बेमार छी मुदा बेमार नहि लगैत छी

दबाइ खाइ से कहिओ नहि चाहैत छी


हमरा अँहा नीक लगै छी सभ दिनसँ

मुदा प्रेम अछि से कहि नहि पबैत छी


विसर्जन बला मुरती छी हम धारमे

भसा देल गेलहुँ मुदा नहि डुबैत छी


सभ दिन हमरा लेल मधुश्रावनिए

टेमी दगेलाक बादो नहि कुहरैत छी


एकरा तँ प्रेम कहिऔ की स्वार्थ कहिऔ

आब तँ हुनके इसारा पर चलैत छी


**** वर्ण---------15*******

Saturday, 15 October 2011

गजल


क्षणे मे एना कोना अजबे क्षनाँक भs गेलय
सुतली बुढ़ी क्षणे मे कोना टनाँक भs गेलय

ई देह आकि प्राणोक छैक गजवे महत्तम
हँसैत-खेलैत साँस क्षणे मे जाँक भs गेलय

निरोग बुढ़ीकेँ मरै मे छैक किछु गरबर
की कहुँ जखन जनमले बुराँक भs गेलय

कुटौन-पिसौन कैय बुढ़ी बेटाकेँ पोसलैनि
वैह माय बेटाक लेल दम नाँक भs गेलय

बच्चा मे बेटा सभ तेँ रहै बड़ सुसंसगर
आंखि-पांखि भेलै बेटा सभ उराँक भs गेलय

बुढ़ी केँ बेटा सभ सेँ रहै बड़ बड़ सेहन्ता
हुनक सभटा लिलसा फाँक-फाँक भs गेलय

"शांतिलक्ष्मी"केँ शंके भेनय कहियौ की बजती
दुनियाँ बड्ड जालीम दुष्ट चलाँक भs गेलय

...........................वर्ण १७..................

गजल

धधकलै सौंसे घरक लोकवेद डिविया लुक्का भs गेलय
फेरो बेटीये भेलय सुनिते अगिलग्गिक धुक्का भs गेलय

ससुर सौस दुनु प्राणिक मुँह बिधुयैल बकोर लागल
अधकचरुस तमाकु सन धुयैन मुँह हुक्का भs गेलय

बर ओम्हर तामसेँ बताह जकाँ बौतलैल फिरै सगरे
घर मे जेना कि एखने चोरी चपाटी घरढुक्का भs गेलय

माय बाप परसौतीक गलैनक मारे कतियैल फिरैत
गरकैत फुटल फेकल खाली-पैसा वाला चुक्का भs गेलय

दर दुश्मनक करेज जुरैले तेँ ते हँस्सै-बाजै मुसकावै
मुँह लाल सिनुरिया आम डम्हकैत देखनुक्का भs गेलय

अपना बेचारी प्रसवक पीड़ो सँ बेशी मोनक बेथै मरै
मुँह फूल मौलायल वा फुलिकेँ-चुटकल फुक्का भs गेलय

’शांतिलक्ष्मी’ तेँ समाजक आचार देखि भालरि सन काँपय
कलपैत छाति पर दनदन बरसैत मुक्का भs गेलय

.........................वर्ण २२.........................

गजल

कोम्हरसँ अएलै एहन फसादी रे जान

रे जान की लगलै बड़का पसाही रे जान


ओ जे मोटेलै बलू से कोना मोटेलै रे जान

खेने हेतै सभटा धन सरकारी रे जान


ओ तँ काजो करैए उपरसँ लातो खाइए

होइए एहने बुड़िबक बिहारी रे जान


पघिलैए जे लोहे जकाँ जमैए मोमे जकाँ

रे जान की कहबै ओहए सुतारी रे जान


हेतै कोना समाधान हड़तालेसँ रे जान

रे जान की तोड़बै कोना इ दिहाड़ी रे जान



**** वर्ण---------16*******

Friday, 14 October 2011

गजल

मिलत जखन आन्खि से आन्खि तखन पता चलत
हिलत जखन करेज कनी तखन पता चलत

एखन त बौराई टौवाइ छी मदमस्त भेल रहू
कन्छी मुस्की जे बेधत हृदय तखन पता चलत

दियौ गप उडाउ खिल्ली अहां छी मनमत्त अबूझ
आन्खि से जखन निन्न उडत तखन पता चलत

मुस्काई छी उधियाय छी त अबढन्ग बनल रहू
अधर से जे अधर मिलत तखन पता चलत

बिसरब दुनिया ओ भज़ार ई ठीक सत्य वचन
जखन होएत वाक हरण तखन पता चलत

गजल


जखन मोन मे प्रेमक आँकुर फूटल, तखन प्रेमक गाछ निकलबे करत।
जखन जवानीक ककरो लुत्ती लागल, तखन प्रेमक धधरा उठबे करत।

प्रेम छै रामायण, प्रेम छै गीता पुराण, प्रेम छै पूजा-पाठ, प्रेम ईश-भगवान,
जखन इ मोन पवित्र मंदिर बनल, तखन प्रेमक मुरूत बसबे करत।

जिनगी कछेर बनल इ प्रेम छै धार, प्रेम इ समाज बनबै प्रेम परिवार,
जखन हिय सिनेहक संगम रचल, तखन प्रेमक इ गंगा बहबे करत।

प्रेम केँ बान्हत डोरी एखन नै बनल, प्रेम मुक्त छै सदिखन सहज सरल,
जखन जिनगी-आकाशक सीमा हटल, तखन प्रेमक चिडैयाँ उडबे करत।

"ओम"क निवेदन अहाँ कते नै सुनब, एना अहाँ चुप रहि कते मूक बनब,
जखन याचना अहाँक मोन मे ढुकल, तखन प्रेमक भिक्षा त' भेटबे करत।

गजल

अहाँ गप्प हमरा संग एहिना करैत रहू

आ एहिना मोन हमर अहाँ जुड़बैत रहू


ने तँ मोन भरतै ने करेज भरतै केकरो

हम अँहाके छूब अहाँ हमरा छूबैत रहू


चलू दोस्त नहि दुश्मने बनि जाउ हमर

आ करेजसँ करेज भिरा अहाँ लड़ैत रहू


बरसतै अमरित केर बरखा करेजमे

बस खाली अहाँ कनडेरिए तँ देखैत रहू


अनचिन्हार लिखत प्रेमक पाँति गजलमे

करेज पर हाथ राखि एकरा पढ़ैत रहू



**** वर्ण---------17*******

Thursday, 13 October 2011

गजल


मैथिलिये केँ सभ दिन तँ खोरि-खोरि खाइत छी
तैयौ हुनके सेवा मे एना कियै नितराइत छी

जे दिये दही-चुरा दिस तकरे के राखै छी नीति
अपना मुंहेँ सैह बाजय मे किये चोराइत छी

जाधरि खेलौ ताधरि गेलौ के रखने छी नियत
राखिकेँ भरि मुंह मधुर कियै गोंगियाइत छी

बुझलौ जे पाग बदलै मे अछि बड्ड चट्टकैति
अछि सभ तेँ बुझिते तखन कियै औनाइत छी

पैर छुबि-छुबि सभ दिन बढ़लौ ये अहाँ आगु
सत कही तेँ हमरा पर कियै खिसियाइत छी

निकाललौ बेगरता तँ टीक पकड़ै के आदत
कियै घाट-घाटक पानि पिवै एना बौवाइत छी

"शांतिलक्ष्मी" बुझैत अछि अहाँक सभटा अस्सल
झटकल डेग मे कोना आगु बढ़ल जाइत छी

गजल


पुत कपुत एना हेबै तँ कोना चलतै
माय विदेह केँ कनेवै तँ कोना चलतै

माय मरै भुक्खे, पड़ै अहाँकेँ की अंतर
मोन केँ ऐना जँ बौरेबै तँ कोना चलतै

परदेस भल्हौं होइ अहाँ मुँहपुरुख
निजदेस सँ जँ परेलै तँ कोना चलतै

मानलौं माय भेली पिछिता अहाँ अधुना
माय केँ तेँ दुतकरवै तँ कोना चलतै

पड़ोसी भेली धनुखैनि माय दलिदर
तेँकि माय केँ जँ छोड़वै तँ कोना चलतै

अपनाकेँ खोरनाठी अनका सिक्कीपंखा
ई दुई रीत जँ चलेबै तँ कोना चलतै

माय-बापे सँ होइ छै सुजन परिचय
माय-देसक नै ठेकानै तँ कोना चलतै

बुझलौ जे रोटी लेल छै ई सभ चटुता
कर्ज दुधेक नै चुकेवै तँ कोना चलतै

अपना मोने मे छै नीति अनीतिक रीत
पुत सुमातेक बोहेतै तँ कोना चलतै

"सभ्य"केर कुभाखा मोन केँ लागै सुन्दर
भाखा मैयेक जँ हरेलै तँ कोना चलतै

भाखा आन खेलकै कतै सरकारी टाका
मैथिलि खैरातो बिलोलै तँ कोना चलतै

"शांतिलक्ष्मी" कहती अहाँसँ बस एतबे
स्वगौरव अहीं दबेबै तँ कोना चलतै


गजल

बात जे झंपबै त ओ जडिएबे करत
चुल्हि चढल खापडि करिएबे करत

कतबहु दाबब गप के दबत नहि
लोक त लोक छैक ओ चरिएबे करत

तनला से सहो चलत नहि कोनो काज
मुस्टंडा मानत नहि फरिएबे करत

नहि पडू मुखिया ओ पंचक चक्कर मे
ओकर त काज छैक भरिएबे करत

आपस मे गप करू करू राफ ओ साफ
धीरज धरू मामिला सरिएबे करत

गजल

फेर से ओ जिनगी घुरि आयल
फेर अहां क याद घुरि आयल

छोडल छल सबटा याद अदौ
विस्मृत स्मृति फेर जुडि आयल

लकधक साड़ी खनखन हँसी
लाजक लाली कोना मुडि आयल

आमक गाछी चुप चुप अधर
डभ्कैत आन्खि मोन चुडि आयल

छल विदा करेज पर पाथर
बिसरब सब से फुरि आयल

किएक भेटल ओ पुरना पोथी
आखर देखि याद घुरि आयल

गजल

हमर मोन नहि भरैए मिलनक बेरमे

इ तँ अनचिन्हार बुझैए मिलनक बेरमे


जेहने विरह हो तेहने सिनेह सदिखन

अनचिन्हार मोन पड़ैए मिलनक बेरमे


इ जे देखै छी हमर देहक भाषा- अभिलाषा

आब अनचिन्हार कहैए मिलनक बेरमे


आब भगवानो जनैत छथिन्ह मोनक बात

देखू अनचिन्हार अबैए मिलनक बेरमे


हुनक रीत हुनकर प्रीत हुनकर गीत

आब अनचिन्हार लगैए मिलनक बेरमे



**** वर्ण---------19*******

गजल

नई जाएब परदेश, अहां एहिना तकैत रहू
खोलब हृदय के तार अहां एहिना तकैत रहू

सखा भजार चुटकी लय के करैथ हँसी ठिठोली
अहां लेल दुनिया बिसरब एहिना तकैत रहू

सर समाजक कोनो चिंता ने अहांक रूपक आगू
दीन ईमान सेहो बिसरब एहिना तकैत रहू

गीत ग़ज़ल छन्द ओ कविता लिखब देखैत रहू
प्रणय निवेदन करू स्वीकार नैना तकैत रहू

ज़मीन जथा किछु नहि चाही नहि चाही रंजो-द्वेष
सुगम सिनेह केर पावन महिना तकैत रहू

गजल

आन्खि खोलि देखू प्रकाश भ गेल
आबो जागू देखू प्रकाश भ गेल

अदौ स पडल रसातल छोडू
उपर ताकू ई आकाश भ गेल

उत्थान लेल आहांक जीजीविषा
देखू आई ओ स्वप्न आश भ गेल

लोक भेटल जीवन यात्रा मध्य
किछु लोक ओही मे ख़ास भ गेल

जागल लोक ओ समाज जागल
देखू मिथिला के विकास भ गेल

Wednesday, 12 October 2011

गजल

हमर मोनक अहीं गूगल अहीं युआरेल छि
अहींक प्रेमक स्क्रैप सौं हमर भरल गीमेल छि !

ऑरकुट पर मुँह ठोर अइछ कने दोसर रंग
फेसबुक पर तेसरे रंग इ कोन खेल छि !

विडियो में चैट खातिर लेलौं हम थ्री गी
पोप केलक मेसेज अहाँ बीजी भ गेल छि !

आईटी सन सैद्खन अपडेटेड अहाँक स्टेटस
विन्डोजक प्रोसेसर में अहाँ एप एन्ड्रोआईड छि !

नेटवर्कक् अई माया सौं तरंगित अइ तन मन
अहीं जिनगीक प्रोग्रामक सॉफ्टवेर भ गेल छि !

स स्नेह
विकाश झा

गजल

आइ काल्हि सब दिस भ्रष्टाचार छै
चोर लूटेरा सबहक ई संसार छै

लाख करोड़ो अरबो खाकै बैस गेला
सुनै छियै ओकरे सबहक सरकार छै

उज्जर उज्जर कपड़ा सुन्दर सुन्दर बात
जनता के ठगबाक ई हथयार छै

लाख लगा क' जीती करोड़ो पाबी फेर
राजनीति नहि छै आब ई व्यापार छै

घाव नहि अछि आब सड़ैत सड़ैत कैँसर भ' गेल
काटू ई सभ आंग के ई बेकार छै

गांधी नेहरु लाल बहादुर कत' गेला
ई युग के ओहने नेता दरकार छै

ककरा पर आब आस राखू के अछि अप्पन
साधु लगैए जे चोरक सरदार छै

गजल


ताकलौं एना किया कोनो पैघ बात भय गेलै।
मोन डोलै हमर पीपरिक पात भय गेलै।

बिन पीने इ निशाँ किया हमरा लागै लागल,
हमरा बूझि केँ शराबी लोक कात भय गेलै।

हमरा हमरे सँ चोरी अहाँ कोना कय लेलौं,
बन्न छल हिय-खिडकी कोनो घात भय गेलै।

प्रेमक सींचल जिनगी आब भेलै रसगर,
सुखायल चाउर छलै मीठ भात भय गेलै।

सभ ओझरी सँ हम भिन्ने नीक रहैत रही,
नैन-ओझरी लागल "ओम"क मात भय गेलै।

Tuesday, 11 October 2011

गजल


आगि लागल मोनक धाह केँ रोकि देलियै।
कोनो दुख गहीर छल, मुस्की मारि देलियै।

अपन मोनक धार कियो कोना के रोकत,
इयाद जे हमरा करेज मे भोंकि देलियै।

आँखिक कोर भीजल नोर किया नै खसल,
कृपणक सोन जकाँ ओकरा राखि देलियै।

नोर इन्होर होइ छै एहि सँ बाँचि के रहू,
फेर कहब नै अहाँ किया नै टोकि देलियै।

"ओम"क फाटल छाती कियो देख नै सकल,
कोनो जतन सँ ओकरा हम सीबि देलियै।

गजल

बाउ किछु विरोधाभास तँ विचित्रे बुझाइत छैक

देखू पेटक आगि तँ पानिसँ नहि मिझाइत छैक


राम नाम तँ सत्त थिक मुदा श्मसाने धरि किएक

लोक रामसँ बेसी रावणें लेल घुरिआइत छैक


बम-गोली चलए लगलैक एना भए कए आब

देखू फटक्को छुटला पर लोक चकुआइत छैक


आब लोक छल-छद्म करए लगलै खुल्लमखुल्ला

शांति-महल पर युद्ध पताका फहराइत छैक


जले जिनगी थिक भेटत हरेक पोथीमे लिखल

बाढ़िमे तँए चारु दिस जिनगीए देखाइत छैक



**** वर्ण---------19*******

गजल

गामक इयाद पिया मोन पडाय ये।
बड़ रहलो शहर चलू घुरि चलू

शहरक इजोत नीक नै बुझाय ये।
लालटेन दिस आब चलू घुरि चलू॥

पिज्जा, कोला, बर्गर सों मोन अघाय ये।
मकई के रोटी लेल चलू घुरि चलू॥

हिप-होप, रैप, नै चित्त क सोहाय ये।
गामक ढोलीबा लग चलू घुरि चलू॥

दिल्ली सों आब सुनील मोन डराय ये
गामक दिस लौट चलू, चलू घुरि चलू॥

Friday, 7 October 2011

मैथिली गजलशास्त्र-१४

मैथिली गजलक पहिल दुर्भाग्य तखन देखा पड़ैत अछि जखन एतए गजलकेँ मुस्लिम धर्मसँ जोड़ि कऽ देखल जाए लगलै आ मुस्लिम धर्म आ ओकर साहित्यकेँ अछोप मानि लेल गेलै। गजलक प्रारम्भ इस्लामक आगमनसँ पूर्वक घटना अछि आ अवेस्ता आ वैदिक संस्कृत मध्य ढेर रास साम्य अछि। दोसर दुर्भाग्य मायानंद मिश्रक ओ कथन भेल जाहिमे ओ घोषणा केलथि जे मैथिलीमे गजल लिखले नै जा सकैए, हुनकर तात्पर्य दोसर रहन्हि मुदा लोक अही तरहेँ ओकरा प्रस्तुत करए लागल, कारण ओ स्वयम् गीतल नामसँ गजल लिखलन्हि। मैथिली गजलमे "अनचिन्हार आखर" सन ब्लाग उपस्थित भेल जतए बहर (छन्दयुक्त) गजल आ गजलकारक लाइन लागि गेल। मुदा सभसँ बड़का दुर्भाग्य ई भेलै जे मैथिलीक किछु तथाकथित शाइर सभ रामदेव झा द्वारा बहर संबंधी विचारकेँ नकारि देलन्हि ( देखू- लोकवेद आ लालकिलामे देवशंकर नवीन जीक आलेख)। जँ वर्तमानमे गजलक परिदृश्यकेँ देखी तँ मोटामोटी दूटा रेखा बनैत अछि (जकरा हम दू युगक नाम देने छी) पहिल भेल "जीवन युग" आ दोसर भेल "अनचिन्हार युग"। आब कने दूनू युग पर नजरि फेरल जाए।


1) जीवन युग- ऐ युगक प्रारंभ हम जीवन झासँ केने छी जे आधुनिक मैथिली गजलक पिता मानल जाइ छथि मुदा ओ कम्मे गजल लीख सकला। मुदा हुनका बाद मायानंद, इन्दु, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, विभूति आनंद,सरस, रमेश, नरेन्द्र, राजेन्द्र विमल, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, रौशन जनकपुरी, अरविन्द ठाकुर, सुरेन्द्र नाथ, तारानंद वियोगी आदि गजलगो सभ भेलाह। रामलोचन ठाकुर जीक बहुत रचना गजल अछि मुदा ओ अपने ओकर क्रम-विन्यास कविता-गीत जकाँ बना देने छथिन्ह मुदा किछु गजलक श्रेणीमे सेहो अबैए। ऐ “जीवन युग”क गजलक प्रमुख विशेषता अछि बे-बहर अर्थात बिन छंदक गजल। ओना बहरकेँ के पूछैए जखन सुरेन्द्रनाथ जी काफियाक ओझरीमे फँसल रहि जाइ छथि। एकर अतिरिक्त आर सभ विशेषता अछि ऐ युगक। आ जँ एकै पाँतिमे हम कहए चाही तँ पाँति बनत---" गजल थिक, ई गजल थिक, आ इएह टा गजल थिक"।

2) आब कने आबी " अनचिन्हार युग" पर। ऐ युगक प्रारंभ तखन भेल जखन इंटरनेटपर मैथिलीक पहिल गजल आ शेरो-शाइरीकेँ समर्पित ब्लाग "अनचिन्हार आखर" ( http://anchinharakharkolkata.blogspot.com ) क जन्म भेल।आ ऐ अन्तर्जालक “अनचिन्हार आखर” जालवृत्तक नामपर हम ऐ युगक नाम "अनचिन्हार युग" रखलहुँ अछि। ऐ युगक किछु विशेषता देखल जाए-



• गजलक परिभाषिक शब्द आ बहरक निर्धारण---- ई सौभाग्य एकमात्र "अनचिन्हारे आखर"केँ छैक जे ओ हमरासँ १३ खंडमे (एखन धरि १३ खण्ड) "मैथिली गजल शास्त्र" लिखेलक। आ ई मैथिलीक पहिल एहन शास्त्र भेल जइमे गजलक विवेचन मैथिली भाषाक तत्वपर कएल गेलै। तकरा बाद आशीष अनचिन्हार सेहो "गजलक संक्षिप्त परिचय" लीख ऐ परंपराकेँ पुष्ट केलथि। आ एकरे फल थिक जे सभ नव-गजलकार बहरमे गजल कहि रहल छथि।

• स्कूलिंग ---- "अनचिन्हार आखर" गजल कहेबाक परंपरा शुरू केलक आ तइमे सुनील कुमार झा, दीप नारायण "विद्यार्थी", रोशन झा, प्रवीन चौधरी "प्रतीक", त्रिपुरारी कुमार शर्मा, विकास झा "रंजन", सद्रे आलम गौहर, ओमप्रकाश झा, मिहिर झा, उमेश मंडल आदि गजलकार उभरि कए अएलाह।

• गजलमे मैथिलीक प्रधानता----"अनचिन्हार युग" सँ पहिने गजलमे उर्दू-हिन्दी शब्दक भरमार छल आ मान्यता छल जे बिना उर्दू-हिन्दी शब्दक गजल कहले नै जा सकैए। मुदा "अनचिन्हार आखर" ऐ कुतर्ककेँ धवस्त केलक आ गजलमे १००% मैथिली शब्दक प्रयोगकेँ सार्वजनिक केलक।

• गजलक लेल पुरस्कार योजना--- "अनचिन्हार आखर" मैथिली साहित्य केर इतिहासमे पहिल बेर गजल लेल अलगसँ पुरस्कार देबाक घोषणा केलक। ऐ पुरस्कारक नाम "गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा" पुरस्कार अछि।

• उपर चारू विशेषताक आधारपर एकटा अंतिम मुदा सभसँ बड़का विशेषता जे निकलल ओ थिक मायानंद मिश्रक ओइ कथनक खंडन, जकर अभिप्राय छल जे मैथिलीमे बहरयुक्त गजल लिखल नै जा सकैए। "अनचिन्हार आखर" सरल वार्णिक, वार्णिक आ मात्रिक छन्दक अतिरिक्त फारसी/ उर्दू बहरमे सेहो मैथिली गजल लिखबाक शास्त्र ओ उदाहरण खाँटी मैथिली शब्दावलीमे प्रस्तुत केलक।

मैथिलीमे गजल- रामदेव झा




ई कटिंग रामदेवजीक बालकसँ प्राप्त भेल अछि।

गजल


अभय कान्त झा दीपराज कृत -ग़ज़ल



सोचैत छथि किछु लोकनि अक्सर- हमर कप्पार जरल अछि |
उठावय में जे भारी अछि, एहन किछु भार परल अछि ||

जखन विश्वास अपना पर, अहाँ के नहिं रहत बाँचल,
ओहू शेरक नज़र सँ मोन घबरायत जे मरल अछि ||

कोना ओहि आदमी के जीत भेंटतै वा सफल होयत ....?
जे बस हरदम बनल कोढ़ियाठ, बिस्तर ध क परल अछि ||

पड़ोसी भाई के कनियाँ, अहाँ के साइर और भौजी,
लगैत अछि देह हुनकर माटि नहि, कुन्दन सँ गढ़ल अछि ||

बहुत किछु ज्ञान रहितो हम, बहुत गलती सँ नहिं बचलौं,
तेना लागल जेना दारु, एखन माथा में चढल अछि ||

परीक्षा के जखन हम नाम सुनैत छी त कँपैत छी,
लगैत अछि- सबटा बिसरल रहैत छी, जे की पढल अछि ||

जों राखब मोन में संतोष, थोरबो में खुशी भेंटत,
ओ गाछी काल्हि फेर फरत, जे कम एहि बेर फरल अछि ||

जे करक अछि अहाँके काज, करब जों, त भ जायत,
जों देहक दर्द के अनुभव करब, लागत जे बढल अछि ||

निराशा मोन में जों अछि, त रस्ता नहिं कटत कखनों,
बुझायत ई- जेना किछु काँट सन तरवा में गड़ल अछि ||

भेंटल जे हैसियत, ओहि सँ, करू उपकार दुर्बल के,
ओ पोखरि कोन काजक ? जे भरल अछि किन्तु सड़ल अछि ||

रचनाकार - अभय दीपराज

अरबी-फारसी-उर्दूक अन्य काव्य विधा

अरबी-फारसी-उर्दूमे गजल छोड़ि आन बहुत काव्य विधा छैक। जकर संक्षिप्त विवरण हम एहिठाम दए रहल छी।

1) कसीदा--------- कसीदा शाइरीक ओ रूप थिक जाहिमे अपन लोकक प्रशंसा आ विपक्षीक खिद्धांश हो। कसीदामे कमसँ कम 19 शेर भेनाइ जरूरी छैक। अधिकतम शेरक कोनो संख्या नहि। कसीदा दू प्रकारक होइत छैक।
तमहीदिया---एहन कसीदा जकर शुरुआत प्रेम, मिलन, मस्ती आदिसँ हो ओकरा तमहीदिया कहल जाइत छैक। एहि कसीदामे पाँच टा भाग होइत छैक---- तश्बीब, गुरेज, मद्ह, दुआ एवं खात्मा। शुरुआतकेँ तश्बीब कहल जाइत छैक। मुख्य वर्णय विषय जाहिठामसँ मोड़ल जाइ छैक तकरा गुरेज कहल जाइत छैक। मुख्य विषयकेँ मद्ह कहल जाइत छैक। प्रशंसा वा खिद्धांश बला भागकेँ दुआ कहल जाइत छैक आ कसीदाक अंतिम भागकेँ खात्मा कहल जाइत छैक।
खिताबिया----- खिताबिया कसीदामे बिना कोनो भूमिकाकेँ मुख्य विषय कहल जाइत छैक।
मैथिलीमे अनेक कसीदा भेटत। विद्यापतिक ( ज्योतिरीश्वरक पछाति बला विद्यापति ) अनेक गीत शिव सिंहक कसीदा थिक। एहि प्रकारे आनो मैथिली कविक लिखल कसीदा भेटत।
2) मनसवी----- मैथिलीक प्रबंध काव्य अरबी-फारसी-उर्दूक मनसवीक बराबर अछि। ओना मनसवीक शाब्दिक अर्थ दू भाग बला वस्तु छैक। मुदा साहित्यिक रूपमे मनसवी ओहन काव्य रुपकेँ कहल जाइत छैक जकर हरेक पाँतिमे काफिया केर प्रयोग होइक। मनसवीक शुरुआत हस्द (मंगलाचरण) आ अंत कोनो ने कोनो उपदेशसँ हेबाक चाही। मनसवीक लेल बहरे-मुतकारिब, हजज,खफीफ,रमल,सरीअ आदि उपयुक्त रहैत छैक।
3) फर्द--------फर्द शाइरीक ओहन विधा थिक जकर शेरक कोनो पाँतिमे काफिया नहि होइत छैक।
4) बन्द--------बन्द एहन काव्य विधा भेल जकरा शाइर हम्त, नात,मनकतब, कौवाली, मर्सिया आदिमे सुगमता पूर्वक करैत छथि। बन्द कोना कहल जाइत छैक से देखू--- पहिने एकटा शेर लिखू आ तकरा बाद दूसँ दस धरिक एहन पाँति कहू जकर काफिया उपरका शेरक काफियासँ मेल नहि खाइत हो मुदा अपना आपमे ओकर काफिया मेल खाइत होइक। आ तकरा बाद अंत मे एकटा एहन पाँति कहू जकर काफिया पहिल शेरक काफियासँ मेल खाइत हो। इ भेल बन्द। बन्द दू प्रकारक होइत छैक। पहिल भेल तरजीअ बन्द आ दोसर भेल तरकीब बन्द। एकटा बन्द जँ पूरा भए गेल तकरा बाद कोनो गजल या कसीदा कहए जाए तखन ओ तरजीअ बन्द कहल जाइत छैक। जँ बन्दक अंतिम पाँतिक काफिया शुरुआती शेरक काफियासँ मेल नहि खाइत हो तखन ओकरा तरकीब बन्द कहल जाइत छैक।
5) कता---- कता मने टुकड़ा होइत छैक। एहिमे कमसँ कम दूटा शेर आ बेसीसँ बेसी सत्रह टा शेर होइत छैक। हरेक पहिल शेर दोसर शेर पर निर्भर हेबाक चाही। एहि विधाक पहिल आ तेसर पाँतिक एवं दोसर आ चारिम पाँतिक काफिया मिलबाक चाही।संगहि-संग एकर शुरुआत दीर्घ-दीर्घसँ हेबाक चाही
6) रुबाइ----------रुबाइमे दू टा शेर मने चारि पाँति (आधिकतम) होइत छैक। एकर हरेक पाँतिमे मात्र एकैस मात्रा हेबाक चाही। संगहि-संग एकर शुरुआत दीर्घ-दीर्घसँ हेबाक चाही। पहिल शेरक दूनू पाँति आ दोसर शेरक दोसर पाँतिक काफिया सामान हेबाक चाही। जँ दोसर शेरक पहिलो पाँतिमे समान काफिया छैक तँ आरो नीक।
7) हम्त-------------शाइरीक एहि विधामे बंदा (भक्त) आ खुदा (भगवान)क बातचीतकेँ विषय बनाएल जाइत छैक।
8) नात------------शाइरीक इ विधा इस्लाममे बहुत पवित्र मानल जाइत छैक। एहि विधामे शाइर पैगम्बर हजरत मुहम्मद आ हुनकासँ जुरल चीजक प्रशंसा कहैत छैक। एकरा कहैत कालमे माथ पर रुमाल या कपड़ा राखल जाइत छैक जेना की हिन्दु धर्ममे दुर्वाक्षत एवं अन्य धार्मिक विधिमे माथ पर गमछा वा धोतिक ढ़ेका खोलि माथ पर राखि लैत छथि। गायनके बेरमे नात दू रुपें गाओल जाइत छैक। पहिल समूहमे आ दोसर असगरें। एहिठाम मोन राखू वैदिक ॠषि वेदक ॠचाक पाठ सेहो एही दू रुपे करैत छलाह। नात रदीफ युक्त आ बिना रदीफक दूनू तरहें लिखल जाइत छैक।
जहाँ धरि हमरा ज्ञान अछि मैथिलीमे लिखित रूपमे सोमदेव जी पहिल बेर नात लिखला मुदा ओहि नात सभमे व्याकरणक अभाव अछि । देखू सोम पदावली।
9) मनकबत--------औलिया (सिद्ध फकीर)क उपर लिखल गेल अशआर (शाइरी)केँ मनकबत कहल जाइत छैक। हम्त, नात आ मनकबत तीनू एकै शैली थिक मुदा विषय अलग-अलग रहैत छैक। केखनो काल कए इ तीनू रुबाइ, कता बंद आदिकेँ मिला कए लिखल जाइत अछि।
10) मर्सिया (मरसिया)----- मैथिलीक निर्गुण आ अरबी-फारसी-उर्दूक मर्सिया एकै मतलबकेँ प्रतीक अछि। अंग्रेजीमे एकरा एलिजी कहल जाइत छैक। ओनाहुतो मैथिलीमे सराप देल जाइत छैक जे हम तोहर अँकुरी खेबौ। आ उर्दूमे बददुआ देल जाइ छैक जे हम तोहर मर्सिया कहबौ। दूनूक एकै मतलब छैक। मर्सिया 6-6 पाँतिक (मने तीन-तीन शेरक) समूह होइत छैक। आ इ सत्तरसँ अस्सी टा समूहक भए सकैत अछि।
11) मुस्तजाद------जखन गजल समेत शाइरीक हेरक विधाक हरेक पाँतिमे कोनो उद्येश्य पूर्ण वाक्य या वाक्यांश जोड़ि देल जाइत छैक तखन ओकरा मुस्तजाद कहल जाइत छैक। केखनो काल शाइर गजलक मतलाक बाद कोनो उद्येश्य पूर्ण वाक्य या वाक्यांश जोड़ि दैत छथि आ तकरा बाद आन शेर कहैत छथि। एहनो काव्यकेँ मुस्तजाद कहल जाइत छैक।
12) नज्म------ एकै भाव पर तुकांत एवं वज्नदार पाँतिक समूहकेँ नज्म कहल जाइत छैक। मुदा आब उर्दूमे सेहो बिना काफिया आ वज्न नज्म आबि गेल अछि जे की शुद्ध रूपसँ  आधुनिक कविता जकाँ अछि मने कौआक टाँग आ बेंगक टांग मिला कए जे कविता लिखल गेल हो से|


13) मुजरा----- गजल, नज्म,कसीदा, रुबाइ कता, बन्द आदिक समूह पर साज-बाजक संग स्त्री नाच-गानकेँ मुजरा कहल जाइत छैक। इ विशुद्ध रुपसँ नबाबी परंपराक प्रतीक थिक। इ शाइरीक रूप तँ नहि मुदा एकर अंग मानल जाइत अछि। जाहिठाम मुजरा आदि होइत हो ताहिठामकेँ मोहफिल कहल जाइत छैक।


14) कौवाली------किछु शेर, बन्द, रुबाइ, कता आदिकेँ जोड़ि कए एकटा कौवाली बनैत छैक। कौवालीक जन्मदाता अमीर खुसरो मानल जाइत छथि आ ओहि समयमे ओकरा कौल कहल जाइत छलैक। आ इ काव्य मात्र धार्मिक रूप लेल छलैक। मुदा बादमे विलासिताक प्रतीक बनि गेल। नबाबी कालमे कौवालीक रुप स्त्री-पुरूष केर उत्तर-प्रतिउत्तर रुपमे बदलि गेल आ बादमे एही रुपकेँ मान्य मानल गेल। मुदा एखनो बहुत कौवाली असँगरे सेहो गायन कएल जाइत छैक। इ काव्यविधा उत्तेजक आ मनलग्गू होइत छैक।

15) गजलकेँ अलावे एकटा आर टर्म छै उर्दूमे जकरा हजल कहल जाइत छै। आब इ बूझी जे गजल आ हजलमे की अंतर छै। व्याकरण मने रदीफ, काफिया आ बहर गजल आ हजल लेल एक समान छै। मुदा कथन अलग-अलग जतए गजल पूरा-पूरी गंभीर बातसँ बनै छै ओतहि हजल हास्यक फुलझरीसँ। मने हजल आ गजलमे खाली गंभीरताक अंतर छै। हमरा जहाँ धरि बुझाइत अछि जे मुसलमान शासक सभ राज-काजक बीचमे बोर भए जाइत छलाह तखन इ हजल सुनाएल जाइत छल हेतै।

16) माहिया--- ई विधा मूलतः पंजाबी साहित्य केर थिक आ पंजाबीसँ उर्दूमे आएल आ तकरा बाद सभ भाषामे पसरल। ई विधा मात्र तीन पाँति केर होइत छै जाहिमे पहिल पाँतिमे 12 मात्रा दोसरमे 10 मात्रा आ फेर तेसरमे 12 मात्रा होइत छै आ सङ्गे-सङ्ग पहिल पाँति आ तेसर पाँतिमे काफिया ( तुकान्त ) होइत छै... तँ देखी एकर संरचनाकेँ------

पंजाबीमे माहियाक पहिल पाँतिक संरचना अधिकांशतः 2211222 अछि मने दीर्घ-दीर्घ-लघु-लघु-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ।
तेनाहिते दोसर पाँतिक संरचना अछि 211222 दीर्घ-लघु-लघु-दीर्घ-दीर्घ-दीर्
आ फेर तेसर पाँतिक संरचना पहिल पाँतिक बराबर अछि मने 2211222 मने दीर्घ-दीर्घ-लघु-लघु-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ।

ओना ई अधिकांश संरचना अछि। ऐकेँ अलावे किछु हेड़-फेड़क संग आन-आन संरचना सेहो भेटैत अछि। मुदा ई निश्चित छै जे हरेक पाँतिमे दीर्घक बेसी संख्या रहने लयमे ई खूब आबि जाइत छै

माहिया छन्दमे अर्थक चारि तरहें विस्तार होइत छै...

१) या तँ पहिल आ दोसर पाँति मीलि कए एकटा अर्थकेँ ध्वनित करै आ तेसर पाँति अलग रहै,
२) या तँ दोसर पाँति आ तेसर पाँति मीलि कए कएटा अर्थकेँ द्वनित करै आ पहिल पाँति अलग रहै,
३) या तीनू पाँति मीलि कए एकटा अर्थकेँ ध्वनित करै
४) या दोसर पाँति एहन होइ जे पहिलो पाँति सङ्ग मीलि अलग अर्थ दै वा तेसर पाँति सङ्ग मीलि अलग अर्थ दै। 

माहिया छन्दक स्थायी अधार श्रृगांर रस थिक मुदा आधुनिक समयमे ई हरेक विषयमे लिखल जाइत अछि। उदाहरण स्वरूप देखू हमर दूटा माहिया---


१) तीरसँ ने तरुआरिसँ
हम डरै छी आब 
हुनक नजरिकेँ मारिसँ 


२) डोलैए मोन हमर
उठल आँखिसँ भाइ
करेज मथैए हमर


मैथिलीमे ई माहिया छन्द अज्ञात अछि.. आउ एकरो आगू बढ़ाएल जाए..... खास कए जे कवि श्रृगांर रसमे भीजल रहै छथि।

Wednesday, 5 October 2011

गजल

कोनो सोहके केखनो नहि बिसारि राखब

मोनक गाछ केखनो नहि झखारि राखब


अबिते हएत मारिते रास कनैत आँखि

अहाँ थोड़ेक हँसी संगमे सम्हारि राखब


बहिते-बहैत बन्हा जाएब अहाँ बान्हसँ

संगमे हरदम कनिकबो जुआरि राखब


अबैत रहलाह नव-नव बिक्रमादित्य

कन्हासँ कहिआ इ बैताल उतारि राखब


नै कानू अबिते हएत रिलीफ लेने नेता

घर-दुआरि बना आँगन बहारि राखब



**** वर्ण---------16*******

मास सितम्बर 2011क लेल गजल पुरस्कार योजनाक पहिल चरण

हमरा इ सूचित करैत बड्ड नीक लागि रहल अछि जे " अनचिन्हार आखर"द्वारा स्थापित पुरस्कार " गजल कमला-कोशी-बागमती-महानंदा" पुरस्कारक पहिल चरण ( मास सितम्बरक लेल ) पूरा भए गेल अछि। मास सितम्बरक लेल ओम प्रकाश (ओम प्रकाश झा) जीक एहि रचना के चयन कएल गेलैन्हि अछि। हुनका बधाइ।

थान केँ नपबाक फेर मे गज फेकल जाइ ए।
आकाश छूबाक फेर मे जमीन छूटल जाइ ए



भाँति-भाँति के सुन्नर फूल लागल फुलवारी मे,
कमल लगेबाक फेर मे गेंदा टूटल जाइ ए।



चानी सँ संतोख भेल नै, आब सोनक पाँछा भागू,
सोन कीनबाक फेर मे इ चानी रूसल जाइ ए।



दूरक चमकैत वस्तु अंगोरा भय सकै अछि,
मृगतृष्णाक फेर मे देखू मृग कूदल जाइ ए।



चानक इजोरिया मे काज "ओम"क होइते छल,
भोर-इजोरियाक फेर मे चान डूबल जाइ ए।

Tuesday, 4 October 2011

गजल

कथा जखन बिआहक लागल हेतैक

गरीबक बेटी तँ बड्ड कानल हेतैक


गोली लागल देह भेटत दसो दिशामे

कुशलक खोंइछ तँ कतौ बान्हल हेतैक


डेगे-डेग निद्रा देवीक प्रचार-प्रसार

आब केना कहू जे केओ जागल हेतैक


सड़ि गेलै एहि पोखरिक सुन्दर पानि

जुग-जुगान्तरसँ नहि उड़ाहल हेतैक


विश्वास करु समान कम नहि भेटत

देखिऔ बाटेमे बाट भजारल हेतैक



**** वर्ण---------15*******

Monday, 3 October 2011

गजल


मोनक आस आब टुअर भेल।
तृष्णा एखनहुँ नै दुब्बर भेल।

अन्हार सँ झरकैत रहलहुँ,
इजोत नै कखनो हमर भेल।

मधुमाछी मधु बनबैत रहै,
मधु सदिखन अनकर भेल।

कुहेसक मारल बाट कानैए,
रौद नै एखन सनगर भेल।

चीनी फाँकैत तबाह भेल "ओम",
मधुर कियाक नोनगर भेल।

गजल

एहि पारसँ ओहि पार धरि किछु नै बदलैए
ओ उतरैए नाङरि पकड़ि किछु नै बदलैए

सोगे नुनिआएल लोक खसैए राजपथ पर
आ चुप्प रहि जाइए चिकरि किछु नै बदलैए

बत्तीस टका बला गरीब नै गरीब लाख बला
इतिहास तँ अबैए नमरि किछु नै बदलैए

बेर-बेर ओकर आँखि मिलै छै आ झुकि जाइ छै
आ सौंसे चकुआइए सम्हरि किछु नै बदलैए.

भाइ एखनो विद्रोहकेँ पाप कहैए सरकार
आ सौंसे देखैए गुम्हरि किछु नै बदलैए


गजल

हम कीनल खुशी पर नाचू कतेक

हम लोहाक कंठसँ बाजू कतेक


रहस्य बेपारक बुझबै नहुँ-नहुँ

कमजोर हाथमे तँ तराजू कतेक


आधुनिको नै उत्तर-आधुनिक जुग

भावनाकेँ बेचैत लोक चालू कतेक


ने माए ने बाप ने तँ भाए ने बहीनि

इ सार-सरहोजि-सारि-साढ़ू कतेक


मनुख तँ बनि जाइए अनचिन्हार

इ जानबरक रूप चिन्हाबू कतेक


**** वर्ण---------14*******

Sunday, 2 October 2011

गजल

गजल
बड़को बड़का केँ नहि छै आब सठ्ठा
के आब केकरा दैए घी आ मठ्ठा

इलेक्ट्रोनिक मीडियाक जमाना इ आबि गेल
नवयुग मे नहि भेटत स्लेट आ भठ्ठा

गामो मे स्क्वायर फूट मे आब बिकाइए जमीन
बिसरि जायब किछु दिन मे धूर आ कठ्ठा

मिथिला बासी छी तैँ मैथिली बाजै छी
यार दोस्त सँ करै छी हँसी ठठ्ठा

इटांक घर ककरो होइ छल पहिने
गाम गाम मे खुजि गेल आब त' भठ्ठा

सिल्क पॉलिस्टर कीमती वस्त्र,पोशाक भेलै
के पहिरैयै मोट झोट आ लठ्ठा

दुखना,फेकना,रौदिया सभ परदेसी भेल
के जाइयै आब कान्ह पर ह'र ल' हठ्ठा

चोर चोर मौसयौत भाई जखने भ' गेल
के खोलत आब ककर कच्चा चिठ्ठा

जनता महंगाइ सँ त्राहि त्राहि करै
भ्रष्टाचारी खाइए घी आ मठ्ठा

गांधी बाबा आबि क' देशक हाल देखू
कतेक अहाँ के लिखू चिठ्ठी चिठ्ठा

Saturday, 1 October 2011

गजल

इजोत लेल अन्हेर नगरी जाइत लोक

सपनेमे तँ सपनाक भात खाइत लोक


खेत तँ आब पटाओल जाइछ शोणितसँ

पानि महँक तेले जकाँ तँ छताइत लोक


जकरा जतेक भेटैक सएह बड़ अगत्ती

खएलाक पछातिओ तँ गुंगुआइत लोक


छोड़लकै डनिञाँ तेहन ने अगिनबान

मोनेमे पजरि मोनेमे पझाइत लोक


बसातक कमी तँ छैक गामोक बगैचामे

आक्सीजनेक बोतलमे तँ औनाइत लोक



**** वर्ण---------16*******

गजल

पूछए लागल पात नुका कए रातिमे
बूझए लागल पात नुका कए रातिमे


हम तँ बेशर्मीक हद टपि गेलहुँ
हूथए लागल पात नुका कए रातिमे


नै छै पाइ जे कराओत इलाज दर्दक
कूथए लागल पात नुका कए रातिमे


सुआद तँ लगलैक खाली शोणित केर
चूसए लागल पात नुका कए रातिमे


अनचिन्हार स्पर्शक रहस्य बुझलहुँ
छूबए लागल पात नुका कए रातिमे



**** वर्ण---------15*******
तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों