Wednesday, 30 November 2011

रुबाइ


संगी सभ सँ नीक शराब छै, देखू कहियो नै बदलै छै।
एकर निशाँक नै जवाब छै, देखू कहियो नै बदलै छै।
टूटल करेज जोडि दै ए, दुखक ताप केँ करै शीतल,
फेर कहियै कोना खराब छै, देखू कहियो नै बदलै छै।

गजल


पता नै कोन आगि मे जरैत रहल करेज हमर।
पानि नै खाली घीए टा चाहैत रहल करेज हमर।

आनक मरल आत्मा केँ जीया केँ राखैक फेर मे फँसि,
नहुँ-नहुँ सुनगैत मरैत रहल करेज हमर।

एतेक मारि खेलक झूठ प्रेमक खेल मे जमाना सँ,
कियो देखलक नै कुहरैत रहल करेज हमर।

फेर कतौ नै कियो बम फोडि केँ अनाथ करै ककरो,
सूर्योदय होइते धडकैत रहल करेज हमर।

अपना केँ नित जीयाबै मे करेजक खून करैत छी,
खसि-खसि केँ देखू सम्हरैत रहल करेज हमर।

दुख आ सुख मे अंतर करै मे नै ओझरा केँ कखनो,
नब गीत सदिखन गबैत रहल करेज हमर।
---------------- वर्ण २० -----------------------
गुरूदेव आशीष जी केँ सादर समर्पित।

गजल

वाह कतेक मजा अबै छै उठा-पटकमे
सरकारो तक बदलै छै उठा-पटकमे



इ हार-जीत छै मात्र जनताक दृष्टि-भ्रम
कंबल तर दारू चलै छै उठा-पटकमे



के दोस्त के दुश्मन कहब बड्ड मोश्किल
रंग जे अपन देखबै छै उठा-पटकमे



नीक काज करत से केकरो फुरसति कहाँ
देखू सभ लागल रहै छै उठा-पटकमे



महँगी छै आतंकवादो छै तैओ जिनगी छै
जिनगी एनाहिते चलै छै उठा-पटकमे

Tuesday, 29 November 2011

गजल



आईना सदिखन हमरा सत्ते कहै छै।
हमर रूप हमरे देखबैत रहै छै।

चलि गेलौं त' बूझलौं अहाँ हमर नै छी,
बनल विश्वासक किला एहीना ढहै छै।

धार केँ कोन मतलब भूमिक दर्द सँ,
जेम्हरे मोन भेल धार ओम्हरे बहै छै।

देखू प्रेमक अकाल नै छै एहि गाम मे,
उधारक प्रेमक बाढि सँ गाम दहै छै।

ककरो मारबाक चोट सहि लेत "ओम",
मुदा बूझै नै प्रेमक मारि कोना सहै छै।
-------------- वर्ण १५ ---------------


ई गजल " मिथिला-दर्शन" केर अंक मार्च-अप्रैल २०१२मे प्रकाशित भेल।

रुबाइ


पीनाई त' हम छोडि देब, मुदा पीनाई हमरा नै छोडै ए।
जीनाई त' हम छोडि देब, मुदा जीनाई हमरा नै छोडै ए।
होश मे आबै ले पीनाई छै बड्ड जरूरी, सुनि लिय' यौ दोस्त,
पीबि केँ हम होश मे छी, ढनमनेनाई हमरा नै छोडै ए।

रुबाइ

हम कहाँ पीबैत छलहु मित्र , हमरा त पिया देलक
हम कहाँ जीबैत छलहु मित्र , हमरा त जिया देलक
पैमाना छे खाली जाम पर जाम हम कहाँ लैत छलहु
बैसल छलहु चुपचाप सूनपन जाम दिया देलक

गजल

गाछी के रास्ता कोइली के कुहकब अहां क गीत सुना गेल

हिलोर लैत सरिसब के फूल अहां क चलब देखा गेल


स्वर्ण रंजित लटकल मोजर अहां क हार भरमा गेल

पोखरिक बीच बतख जुगल, पुरना स्मृति उभरा गेल


हमर स्पर्श लजबिज्जी सों जेना अहां क देह सिहरा गेल

बहैत पुरबा पातक दोग सों जेना खानगी पहुँचा गेल


शांत पोखरि चमकैत पानि जेना अहां क आन्खि देखा गेल

महुवक रस चुबैत देह पर प्रेम रस सों नहा देल


पीपरक छाह आ अहां क स्मृति आब हमर आन्खि मुना गेल

भुकलक कुकूर टूटल सपना हमरा सत्य देखा गेल


--वर्ण - २२----

Monday, 28 November 2011

गजल


लोक कहइये नाम हमर अहाँ लैत रहे छी

हम तं अपने दर्द में ओझरायल रहैत छी

... हम नै नुकायल नै घबरायल रहैत छी
कियेक सोचक दोग मे अहाँ भासियेल रहैत छी

अहाँ मोन पाडलों ते हमरा यादि भ गेल
कियक हम सदिखन ओनायल रहै छी

छीन लेलों हमर ठोरक हंसी सभटा
केकरो कहाँ सँ अहाँ किएक बतियैत रहैत छी

के हमरा लेल बेकल, के बाट जोहै छैथ
तैयो अहाँ से मिलय ले बौआयल रहैत छी

अहाँ मानु नै मानु मुदा साँच तं इ 'भावना'
हम जिनगी से बढ़ी अहाँ सँ पियार केने छी !!

गजल



आइ-काल्हि सदिखन हम अपने सँ बतियाईत रहै छी।
लोक कहै ए जे हम नाम अहींक बडबडाईत रहै छी।

सब बैसार मे आब चर्चा कर' लागलौं अहींक नाम केर,
सुनि केँ कहै छै सब जे निशाँ मे हम भसियाईत रहै छी।

हमरा लागै ए निशाँ आब टूटि गेल छै पीबि लेला केँ बाद,
सोझ रहै मे छलौं अपस्याँत, आब डगमगाईत रहै छी।

एते बेर नाम लेलौं अहाँक हम, कहियो त' सुनने हैब,
कोन कोनटा मे नुकेलौं अहीं केँ ताकैत बौआईत रहै छी।

एक चुरू अपने हाथ सँ आबि केँ पीया दितिये जे "ओम" केँ,
मरि जइतौं आराम सँ हम, जाहि लेल टौआईत रहै छी।
----------------------- वर्ण २२ -----------------------

ई गजल " मिथिला-दर्शन" केर अंक मार्च-अप्रैल २०१२मे प्रकाशित भेल।

Friday, 25 November 2011

गजल



नित पूछै छै किछ सवाल इ जिनगी।
करै सदिखन नब ताल इ जिनगी।

कखनो बनि दुखक घुप्प अन्हरिया,
लागै मारि सँ फूलल गाल इ जिनगी।

सुखक राग कखनो सुनाबै एना केँ,
रंगल बनि कतेक लाल इ जिनगी।

कहै जिनगी होइत छै जीबैक नाम,
ककरो लेल होइ ए काल इ जिनगी।

जिनगी केँ बूझै मे "ओम" ओझरायल,
जतबा बूझलौं लागै जाल इ जिनगी।
------------- वर्ण १४ -------------

ई गजल " मिथिला-दर्शन" केर अंक मार्च-अप्रैल २०१२मे प्रकाशित भेल।

गजल

आँखी स पिबऽ दिय एक पैग के त बात या
कैह त पायब हुनका ओ राज के त बात या

नै कोनो सिकवा गीला नै कोनो फरियाद या
हम समझै छी आहाक हालात के त बात या

हम आहाक सामने जाहिर कऽरी या नै कऽरी
जान लेब हमर की इ जजबात के त बात या

तपलीफ में छी हम जख्म अहिक नाम स
मैन लेलो हम एकरा सौगात के त बात या

आई तक "मोहन जी" हारलथि नै कोनो खेल स
जे मिलल तकदीर स ओ म्हात के त बात या


Thursday, 24 November 2011

गजल



एकटा खिस्सा बनि जइते अहाँ संकेत जौं बुझितहुँ।
हमही छलहुँ अहाँक मोन मे कखनो त' कहितहुँ।

लोक-लाजक देबाल ठाढ छल हमरा अहाँ केँ बीच,
एको बेर इशारा दितियै हम देबाल खसबितहुँ।

अहाँक प्रेमक ठंढा आगि मे जरि केँ होइतौं शीतल,
नहुँ-नहुँ भूसाक आगि बनि केँ किया आइ जरितहुँ।

सब केँ फूल बाँटै मे कोना अपन जिनगी काँट केलौं,
कोनो फूल नै छल हमर, काँटो त' अहाँ पठबितहुँ।

जाइ काल रूकै लेल अहाँ "ओम" केँ आवाज नै देलियै,
बहैत धार नै छलहुँ हम जे घुरि केँ नै अबितहुँ।
------------------ वर्ण २० ---------------------

ई गजल " मिथिला-दर्शन" केर अंक मार्च-अप्रैल २०१२मे प्रकाशित भेल।

गजल

बैसल छैथ हृदय में हुनका कोना बिसराबी हम
अंकित छैथ एहि दिल में,चित्र कोना मेटाबी हम !

मुरझा क दिलक कली चैल गेलैथ बहार जकां
फेरो एहि बगिया में हुनका कोना बजाबी हम !

जिनगी क प्रार्थना में हुनका रखलों सदिखन
की की जुलूम ओ केलैथ से कोना बताबी हम !

साँस, खियाल आ सपना सभ टा ते हुनके अछ
प्रेमक रस्म अहिं कहू असगर कोना निभाबी हम !

उठल हूक करेज में आंखि नोर से हमर भरि गेल
"भावना" टूटल हृदयक ककरो कोना देखाबी हम !!

गजल

सोचलो नै हम निक-बेजैई, देखलो सुनलो किछो नै /
मंगलो भगवान स हर समय, आहा सिवा किछो नै //

देखलो,चाहलो अहिके, सोचलो अहिके पुजलो अहिके /
"मोहन जी" के वफ़ा खता, आहाक खता किछोबो नै //

हुनका पर हमर आँख त, मोती बिछेलक दिन-रैत भैर /
भेजलो ओहे कागज हुनका, हम त लिखलो किछोबो नै //

एक साँझ के देहलीज़ पर,बैसल छलैथ ओ देर राती तक /
आँईख स केलैथ बात बहुत, मुह स कहलैथ किछ्बो नै //

पांच-दस दिन के बात या,दिल ख़ाक में मिल जायत /
आईग पर जखन कागज राखब, बाकी बचत किछ्बो नै //

रचनाकार :- अजय ठाकुर (मोहन जी)

Wednesday, 23 November 2011

गजल


हमर नजरि मे पैसि केँ हमर नजरि बनि फडकि रहल छी।
पोर-पोर मे अहीं समेलौं, सीना मे हमर अहीं धडकि रहल छी।

विरह-विष सँ मोन पीडित छल, अहाँक प्रेमक अमृत भेंटल,
प्रेम-सुधा सँ मोन नै भरै, जतबा पीबि ओतबा परकि रहल छी।

हृदयक छल बाट सुखायल, जेकरा सिनेह अहाँक भीजायल,
छन-छन भीजि प्रेमक बरखा मे, तखनो किया झरकि रहल छी।

जिनगीक रौदी केँ अहीं भगेलौं, अहाँ प्रेम-मेघ केर छाहरि केलौं,
भरल हमर आकाश प्रेम सँ, अहाँ छी बिजुरि तडकि रहल छी।

भाव-शून्य "ओम"क छल जे अंतर, जिनगी मे आबि मारि केँ मंतर,
अहीं बनलौं गजल कविता, बनि भाव मोन मे बरकि रहल छी।
--------------------------- वर्ण २५ ---------------------------

गजल

सुगँधसँ सराबोर सुगन्धित सुंदर सजनी सुगँधा
आबि हमर ह्रदय बसली अदभुत सुंदरी  सुगँधा 

जिनक सुगँध चहुदिस नभ-थल कए कण-कण मे 
हमर रोम-रोम में  वसल छथि प्राणेश्वरी  सुगँधा 

सुर केँ श्याम जएना  राधाक नटवर मुरली वजैया
ओ छथि समाएल हमर श्वाँस-श्वाँस मे सगरी सुगँ
धा

जिनक निसाँ   में रचलहुँ हम सुर-सुगन्धित  सुगँधा 
ओ छथि हमर ह्रदय केँ रानी प्राण में बसली सुगँधा 

ध्यानमें मानमें जिनकर आनमें अर्पित अछि 'सुगँधा'
भूल हुए तँ मानियों  जाएब 'मनु' कए  सजनी सुगँधा

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-२१) 
जगदानंद झा 'मनु' : गजल संख्या -१ 

गजल


अहाँ लग आबैक मोन करैत अछि
नव चोट खेवाक फेर मोन करैत अछि !

सभ दिसि पसरल अछि ख़ुशी लहरि
... ग़ज़ल गुनगुनेवाक मोन करैत अछि !

दुनिया के हम बड़ अजमेने छी आब
अहाँक अजमाबैक मोन करैत अछि !

ओ गप्प रहि रहि अवैत अछि यादि
जकरा बिसरेबाक मोन करैत अछि !

ठोर पर 'भावना' क खेलैत अछि हंसी
जखन नोर बहेबाक मोन करैत अछि !

कतेको बेर ह्रदय पर बिजुरी खसल
तैयो मुस्कुरेबाक मोन करैत अछि !

बदलि देलों आब अहाँ जिनगी हमर
दर्द अप्पन देखेवाक मोन करैत अछि !!

Tuesday, 22 November 2011

गजल


भेंटलै जखने नबका मीत पुरना केँ कोना छोडि देलक।
जकरा सँ छल ठेहुँन-छाबा, हमर मोन के तोडि देलक।

सपथक नै कोनो मालगुजारी, सपथक नै बही बनल,
संग जीबै-मरैक सपथ खा केँ जीबतै डाबा फोडि देलक।

ओकरा लग छै ढेरी चेहरा, हमरा लग बस एके छल,
अपन भोरका मुँह पर नब मुँह साँझ मे जोडि देलक।

जिनगी-खेत मे विश्वास-खाद द' प्रेमक बीया हम बुनल,
धोखा केर कोदारि चला केँ देखू लागल खेती कोडि देलक।

"ओम" प्रेमक घर बनेलक, ओकरा बिन छै सून पडल,
बाट जे जाइ छल ओहि घर मे, कोनो जोगारे मोडि देलक।
---------------------- वर्ण २२ --------------------

गजल

प्यार करे के सजा बहुत नीक दैत अछी कनियाँ
मैर जाउ त जिबै के दुआ दैत अछी दुनियां

"मोहन जी" कोन सूरज छथि जे इलज़ाम नै सहतैथ
मिथिला में पत्थर के भगवान बना दैत अछी दुनिया

इ जख्म प्यार के देखब नै ककरो
आनि क पूरा बाजार सजा दैत अछी दुनिया

किस्मित पर नाज़ नै करू मिथिला वाशी
हाथ के लकीर मिटा दैत अछी दुनिया

शादी के बाद मारे के उपाय करे अछी कनियाँ
जिबे के उपाय सिखा दैत अछी दुनिया

गजल


नोर भरल अछि नयनामे

कुचरय कौआ अंगनामे


नोकरी भेटि गेलनि बौआ कें

राति देखलियनि सपनामे


सुनैछी बिजली रहतै भरिदिन

दरभंगा आ पटनामे


चारि बरख सं संग रहैछी

की दीय' मुंहबजनामे


की भेटल की हेरा गेल अछि

ताकि रहल छी अपनामे


'गजल'

जिनगी की कहु एहेन अंजान बाट मे चलल जा रहल अछि
भोर ठीक सों भेल नहि मुदा सांझ ढलल जा रहल अछि

मोजर त खूब लागल छल गाछ मे
टुकला ठीक सों भेल नही मुदा मोजर झरल जा रहल अछि

कियो अन्न बिन तरपै अछि त कियो पानी बिन
ककरो पानी भेटल नई मुदा ककरो गिलास मे मदिरा भरल जा रहल अछि

ककरो चूल्हा अन्न बिन बुझायल अछि
महगा बेचे के चक्कर मे ककरो कोठी मे अन्न सरल जा रहल अछि

बाहारक लगाल आगी देखी सब कियो बुझायात
के बुझायेत मोनक आगी जे बिन धधरे जरल जा रहल अछि

कियो मरि के जिब रहल अछि
कियो जी के जेना मरल जा रहल अछि

रवि मिश्रा’भारद्वाज’
ग्राम : ननौर
जिला : मधुबनी

Monday, 21 November 2011

गजल

गजल

अहाँ सँ मिलवा लेल आयल छलों
आबि बहुत पछ्तेलहूँ हम

सोचि दूरी एहि असगरपन कें
ओहि राति बड देर धरि जागलों हम

पुरबैया केर झोंक जकां लोग कतेक
आयल, कतेको सँ ओकतायलहूँ हम

जाहि सोच में डूबल छलाह
ओहि 'भावना' सँ घबरेलहूँ हम .

गजल

लट्टू घुमै छे धरती घुमै छे

देखु देखु पूरा ब्रह्मांडे घुमै छे


सुख घुमै छे और दुख घुमै छे

देखु त पूरा जिंदगिए घुमै छे


राज घुमै छे और राजा घुमै छे

दुनु क संग संग प्रजा घुमै छे


दिनो घुमै छे आ रातियो घुमै छे

रौदी संग संग छाहरि घुमै छे


सत्य घुमै छे आ असत्य घुमै छे

दुर्गुण संग संग गुणो घुमै छे

--वर्ण - १2

गजल

गजल ----- जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'

स्वप्नलोकमे घुमा-घुमा क'

बहुत कनेलहुं हंसा-हंसा क'


पाथर नहि डूबैछ पानिमे

कहलनि हमरा सुना-सुना क'


दुनिया छुटलनि,रम नहि छुटलनि

थाकि गेलहुं हम बुझा-बुझा क'


मच्छर,बाघ,सांप दुनियामे

सबदिन रहलहुं नुका-नुका क'


हम जनैछी स्वयं कें रखलहुं

कोना एखनधरि बचा-बचा क'


काल्हि आउ, कहइत छथि हाकिम

सबदिन अहिना बजा-बजा क'

Sunday, 20 November 2011

गजल


गजल ----- जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'
स्वप्नलोकमे घुमा-घुमा क'
बहुत कनेलहुं हंसा-हंसा क'।


पाथर नहि डूबैछ पानिमे
कहलनि हमरा सुना-सुना क'।


दुनिया छुटलनि,रम नहि छुटलनि
थाकि गेलहुं हम बुझा-बुझा क'।


मच्छर,बाघ,सांप दुनियामे
सबदिन रहलहुं नुका-नुका क'।


हम जनैछी स्वयं कें रखलहुं
कोना एखनधरि बचा-बचा क'।


काल्हि आउ, कहइत छथि हाकिम
सबदिन अहिना बजा-बजा क'।



गजल

ताकु जुनि आदिक सुआद-भाव बानरक मुंह पर
मोती सनक नोर कियै खसैव कुकुरक गुंह पर

निवाहै नारी पतिव्रत छुतहर छुतहर वर लै
निर्लज्ज केँ कतो नोर खसय बिमारि-स्त्रीक ऊंह पर

कोयलीक बोल गाबि कवियित्री भेलीह स्वर-कोकील
बहीर-भुंच केँ कत्तौ आह उठै कोयलीक कुंह पर

ढ़ुंहै जवानी हुनकर उमड़ैत कोशीक ढ़ौंह सन
मोनक अपंग केँ तरंग कत्तs जवानीक ढ़ुंह पर

समाजक डंड सेहो भ गेलय निपट अपंग आब
अंतरात्माक लाज कहाँ अबंडक सुसुरमुंह पर

"शांतिलक्ष्मी"ये की सब चिन्है स्त्री केँ सतवैत सपौल केँ
छथि के आइ जे नाथ चढ़ौते एहि साँपक पुंह पर

....................वर्ण २०....................

गजल

गजल -------- जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'
गोबर नीपल आंगन थीक
तैपर सुन्दर अरिपन थीक।


गुटखा,सिगरेट,पान,तमाकुल
सभ मनुक्खक दुश्मन थीक।


काजक आगू भोजक पाछू
ई अपनेक बडप्पन थीक।


मण्डलजीक 'बिसांढ' पढू
बूझब की जन-जीवन थीक।


बिष प्रत्यक्ष प्रसंशामे अछि
भागू भागू गहुमन थीक।


अन्ना आ अरविन्दक जोडी
एक राम एक लछुमन थीक।


अजब नशा अछि गीत-गजलमे
उत्सवमे इ तन-मन थीक।

Saturday, 19 November 2011

गजल

ई दुनिया मे प्यार करत के
ई जिनगी बेकार करत के

ई दुनीया धनवान सभक छै
निर्धन के सत्कार करत के

मीत हमर मुख सँ नहि बाजै
नीक जकाँ व्यवहार करत के

ओ त'निन्नो मे नहि आबै
सपना हमर साकार करत के

नेता अप्पन घर भरै ए
भारत के उद्धार करत के

पाँच बरिस नहि घुमि के ताकै
उन्नति पर विचार करत के

मैथिली मिश्री जकाँ मधुर छै
बाजि क' देखू मारि करत के

उगना बनिक' शंकर अयला
एहि गप सँ इंकार करत के

एहि ठाम कमला बलान बहैए
कोशी जीक तट पार करत के

‎'गजल'

जिनगी किया एना तंग लागै या
रांगल त छि मुदा बेरंग लागै या

बचपन बितेलौ रेत, मे जवानी खेत मे
कोना कततै बुढापा ऐकता जंग लागै या

जे दोस्त बनि दूस्मन भेल छल दूर
बेचारा भेल लाचार आब त ऒहो संग लागै या

मोजर नहि केलौ जकरा कहीयो
भैल शक्ति क्षिन्न आब ऒहो दबंग लागै या

गजल

सरस्वतीक सम्मान करू
तखनहि कन्यादान करू।

ऐंठ कते रहि गेल पात पर
अन्नक नहि अपमान करू।

सभ सं पाछां ठाढ भेल जे
तकर दुखक अनुमान करू।

सभहक धरती,सभ ले'धरती
सभक सुखक निर्माण करू।

छागर नहि,पाखण्ड,ढोंग केर
अपनहि सं बलिदान करु।

सुलभ,सुगम हो बाट जीवनक
नव-नव अनुसंधान करू।

रहय शीर्ष पर भरि दुनियामे
तेहने हिन्दुस्तान करू।

Friday, 18 November 2011

गजल


कतौ छै रौदी प्रचंड, कतौ बरखा सँ हरान छै।
कतौ छै फूजल मोन, कतौ बन्न पेटी मे प्राण छै।

ककरो भेल अपच, कियो देखू भूखले मरल,
कतौ छै होइत भोज, कतौ उजडल दोकान छै।

एके कलम सँ लिखलक किया भाग्य नै विधाता,
कतौ छै तृप्त हृदय, कतौ छूछे टा अरमान छै।

कियो मुट्ठी मे समेटने कते इजोत छै बैसल,
कतौ छै जे सून घर, कतौ भरल इ दलान छै।

अचरज सँ देखै छै "ओम" लीला एहि दुनियाक,
कतौ छै इ मौनी खाली, कतौ बखारी भरि धान छै।
------------------- वर्ण १८ ------------------

गजल

नयन कटाक्ष करै परिहास देखे हौले हौले
चलय तीर आ बढय पीर सखि गे हौले हौले

नीन उडल चैन मरल नैनन देखई स्वप्न
लोकलाज और अमिट प्यास बढ्लै हौले हौले

भेलहु मतसुन्न छल एक्के धुन रही औले बौले
मुखरा जे तोहर आगू हम्मर नाचे हौले हौले

बहकल चीर नैन नीर लाल भेल मुह लाजे
राति अनहार लाज ठाढ चललहू हौले हौले

पातक फर फर छातीक धर धर धरू धीर
सबटा सोझरा जेतैक समय संग हौले हौले

--वर्ण - १८ --

गजल

घुप्प अन्हार जीवन मे चाही एक मुट्ठी ईजोत
कोन जुगते आब बान्हि राखी एक मुट्ठी ईजोत
परित्यक्ता बनाय अहां के नोतल जे अनहरिया
प्राण विहीन शरीर के चाही एक मुट्ठी ईजोत
स्वर्ग और नर्क छैक एतहि भ्रमित छैक मनुख
नर्क के स्वर्ग बनेबा ले चाही एक मुट्ठी ईजोत
धर्म त धर्म छे सदगति करबै छैक सदिखन
सदगति के पावै लेल चाही एक मुट्ठी ईजोत
अज्ञानता छैक कारण समाजक अवनति लेल
ज्ञान दीप जरबै लेल चाही एक मुट्ठी ईजोत
--वर्ण - १९ --
तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों