Saturday, 31 March 2012

गजल




जिनगी केर बाट पर काँट सौँसे गाड़ल छै,
नियति केर टाट बेढ़ सगरो दफानल छै ।

माय-बाप,भाय-बन्धु, छै झुठहि संबध सभ,
मोह-जाल ओझरायल जिनगी गतानल छै ।

कनियो जँ ढीठ बनि सुनलक कियो मन के,
छूतहर घैल बनल समाजो से बारल छै ।

लुटि-कुटि जीवन भरि आनल से बाँटि देल,
खाली हाथ आब देखि परिजन खौंझायल छै ।

बुढ़ भेल, दुरि गेल फकरा बनि बैसल छै
"चंदन" कहय केहन दुनिया अभागल छै ।

-----वर्ण-१७-----

गजल


उ ग़ज़ल नीपरहल छथि हम तस्वीर लिखै छी
अपने हाथ सँ अपन तक़दीर लिखै छी
फाइट गेलसम्बंधक जुआन कोमल नस
फेर महकइत नज़रक तीर लिखै छी
चीखइतअछि आहट कानइत अछि सन्नाटा
जखन तरपैत तन्हाई के जंज़ीर लिखै छी
इ हम नयकहैय छी केओ और कहैय छथिन
कि जतबे लिखै छी बेनज़ीर लिखै छी
हम दुनूगोटा मिल क इ कि करै छी
अहाँ साँस लिखै छी हम शरीर लिखै छी

Friday, 30 March 2012

गजल

बाल गजल




एकटा एहन नेनाक मनक बात लिखबाक प्रयास केने छी जिनक माँ आब एहि दुनियाँ मे नहि अछि । अहाँ सब पढ़ू आ कहू जे केहन अछि आ की एकरा बाल गजल क'हज जा सकै यै की नहि ?
आइ तारा केर नगरी सँ एथिन माँ ,
अपन कोरा झट द' हमरा उठेथिन माँ ,
खेलबै माँ संग आ रूसबै हँसबै ,
पकड़ि आँङुर गाम-घर मे बुलेथिन माँ ,
थाकि जेबै जखन , भोजन करा हमरा ,
गाबि लोड़ी आँचरक त'र सुतेथिन माँ ,
राम कक्का के परू छैक मरखहिया ,
सुरज के बकरी सँ हमरा बचेथिन माँ ,
हमर संगी संग माँ के घुमै सर्कस ,
आबि घर हमरो सिनेमा ल' जेथिन माँ ,
कत' सँ एलै मेघ कारी इ , अंबर मे ,
"अमित" मन डेराइ यै कखन एथिन माँ . . . । ।
फाइलातुन-फाइलातुन-मफाईलुन
2122-2122-1222
बहरे-कलीब
अमित मिश्र

गजल




देखियौ यौ बदैल गेलै जमाना
सब जन क रहल मनमाना

छोट -पैघ सब आइ काल्हि भैया
रुपैया कए सब भेल दिवाना

छोटका बच्चा कहै यै दूर छि जो
नहि खेबै साग रोटी वला खाना

की करतै मनुखो एहि जग में
महगाई छै मनुखक दिवाना

भूखल रहब मुदा गामे ध क
"मुकुंद " खाएत मिथिले के खाना

बर्ण-१२
मुकुंद "मयंक "

घोघ उठबैत गजल


मैथिली गजलक पहिलुक प्रकाशित पोथी "उठा रहल घोघ तिमिर" पढबाक सौभाग्य भेंटल। ऐ गजल संग्रहक गजलकार श्री विभूति आनन्द छथि। एहि पोथी मे कुल चौंतीस गोट गजल अछि। पूरा पोथी केँ एकहि बैसार मे पढि गेलहुँ आ बेर-बेर पढलहुँ। सबसे पहिने हम श्री विभूति आनन्दजी केँ मैथिली गजलक पहिलुक संग्रह प्रकाशित करबा लेल धन्यवाद दैत छियैन्हि।
एहि पोथीक भूमिका मे गजलकार कहै छथि जे "मैथिलीक गजल सोझे-सोझ हिन्दी सँ प्रभावित अछि मुदा हिन्दी जकाँ जमल नञि अछि एखनो धरि।" आगू हुनकर कहनाई छैन्हि- "पारम्परिक व्याकरण सम्बन्धित अगणित त्रुटि सभ ठाम लक्षित होएत। ओना हम दुस्साहसपूर्वक साहस करैत रहलहुँ अछि जे कथ्य-सामंजस्य लए व्याकरण दिस सँ यदि मूँहो घूमा लेल जाए तँ कोनो हर्ज नञि। किए तँ हम मानैत छी जे ई पाठ्यक्रमक वस्तु नञि अछि। विद्यार्थी मूर्ख नञि बनत। तैं की ------------------------ व्याकरण सँ भयभीत भऽ नञि लिखल जाए।" गजलकारक पहिलुक कथनक सम्बन्ध मे हमर निवेदन अछि जे गजलक परम्परा अरबी-फारसी सँ शुरू भेल अछि आ ओतहि सँ आन भारतीय भाषा मे पसरल अछि। हिन्दी-उर्दू मे गजल कहबाक परम्परा मैथिली सँ पहिने शुरू भेल, तैं बहुसंख्य लोक दिग्भ्रमित भऽ जाइत छथि जे मैथिलीक गजल हिन्दी गजलक नकल छी वा ओइ सँ प्रभावित भेल अछि। गजलकार सेहो एहि मिथ्या धारणा सँ प्रभावित छथि। आब गजलक व्याकरण थोड-बहुत समन्जनक संग सब भाषा मे तँ एक्के रहत। ऐ स्थिति केँ हमरा हिसाबेँ "प्रभावित भेनाई" कहबाक कोनो औचित्य नै अछि। गजलकारक दोसर कथन देखि हम निराश भेल छी। पता नै किया एखन धरि जे दुनू गजल संग्रह (सबसँ पहिलुक आ सबसँ अंतिम प्रकाशित) पढलहुँ, एहि दुनू मे गजलकार कथ्य-सामंजस्यक आगू व्याकरण केँ कोनो मोजर नै देबऽ चाहैत छथि। एकटा गप मोन रखबाक चाही जे साहित्यक निर्माण वैयाकरणिक अनुशासनक बादे सफल भेल अछि। इ फराक गप अछि जे समय-काल आ स्थानक हिसाबेँ सर्वमान्य परिवर्तन व्याकरण मे होइत रहल छैक। बिना वैयाकरणिक अनुशासनक भाषा पढबा, लिखबा आ बाजबा जोग रहत? जिनका मे साहित्य निर्माणक माद्दा छैन्हि, हुनका मे व्याकरण केँ पालनक साहस अबस्स हेबाक चाही।
आब हम एहि संग्रहक गजलक सम्बन्ध मे किछु गप कहऽ चाहब। इ गजल संग्रह ओहि समय मे लिखल गेल अछि जखन मैथिली गजलक व्याकरण आ बहरक सम्बन्ध मे बहुत बेसी जनतब सार्वजनिक नै छल। हम एकरा एना कहऽ चाहब जे इ गजल संग्रह "अनचिन्हार आखर" जुग सँ पूर्वक गजल अछि जखन बहर, रदीफ आ काफियाक नियमक पालनक विषय मे बहुत रास गप सर्वजन सुलभ नै छल। एहि हिसाबेँ जँ ऐ संग्रहक गजल सभ मे बहरक दोख छैक तँ इ स्वभाविक बुझाईत अछि। एहि संग्रहक कोनो टा गजल कोनो बहर मे नै अछि। तैं ऐ संग्रहक वैध गजल (जाहि मे काफियाक नियमक पालन भेल हुए) सभ केँ "आजाद-गजल"क श्रेणी मे राखल जा सकैए। आब गजलक काफिया आ रदीफक सम्बन्ध मे किछु गप। एहि संग्रहक बहुत रास गजल मे काफिया आ रदीफक नियमक पालन भेल अछि। मुदा कएक गजल मे रदीफ आ काफियाक गलती अछि। जेना पृष्ठ चौदह पर मतला देखला पर बुझाईत अछि जे "इ मौसम" रदीफ अछि आ "लागैए" आओर "उलाबैए" काफियायुक्त शब्द अछि। मुदा दोसर शेर आ आगूक आन शेर मे एकर पालन नै भेल अछि आओर शेर सभ बिना रदीफक "अ" काफियायुक्त अछि। पृष्ठ पन्द्रह पर सेहो यैह दोख अछि, जाहि मे मतला मे रदीफ "कहाँ रहल"क प्रयोग अछि आ आन शेर सभ बिना रदीफक "अल" काफियायुक्त अछि। एहने दोख पृष्ठ सोलह मे देखल जा सकैत अछि, जतय मतला मे "करै छह" रदीफ मानल जयबाक चाही। ओना ऐ गजलक आन शेर सभ मे दू टा काफियाक सुन्नर प्रयोग अछि, जे नीक लागैए। हमरा हिसाबेँ काफियाक दोख पृष्ठ बीस, बाईस, चौबीस, पचीस, अट्ठाईस, उनतीस(संयुक्ताक्षर काफियाक नियमक दोख), बत्तीस आ सैंतीस मे सेहो अछि। एकर सबहक विस्तृत वर्णन देब हम अपेक्षित नै बूझि रहल छी, कियाक तँ इ हमर उद्देश्य कथमपि नै अछि। गजल संग्रहक सब गजलक विषय-वस्तु नीक अछि आ गजलकार अपन भावना नीक जकाँ प्रकट केने छथि।
किछु गजलक काफिया आ रदीफक दोख जँ कात कऽ कऽ देखी, तँ इ गजल-संग्रह एकटा नीक गजल-संग्रह अछि। गजलकारक गजल कहबाक क्षमता सेहो नीक बुझाईत अछि। हमरा ई अचरज लागि रहल अछि जे ऐ संग्रहक बाद गजलकारक दोसर गजल-संग्रह किया नै आएल अछि। एकर कारण तँ गजलकारे केँ पता हेतैन्हि, मुदा अपन अनुभवक आधार पर हम कहऽ चाहै छी जे श्री विभूति आनन्द नीक गजल लिख सकैत छथि। जँ बहरक विचार नै करी, तँ २०१२ मे आएल श्री अरविन्द ठाकुरजीक गजल-संग्रह सँ करीब एकतीस बर्ख पहिने १९८१ मे लिखल गेल एहि संग्रहक गजल सब उम्दा कहल जा सकैत अछि। एकर कारण इ जे एहि संग्रहक गजल सब मे काफियाक नियम-पालनक प्रतिशत वर्तमान समयक संग्रह सब सँ बेसी अछि। कथ्यक मजबूती सेहो नीक कोटिक अछि। खाली कुहरल तुकमिलानी केने गजल नै कहल जा सकैत अछि, इ गप एहि संग्रह केँ पढलाक बाद एखुनका गजलकार सभ केँ सेहो बुझेतन्हि, इ आशा अछि। इहो एकटा अचरजक विषय अछि जे जखन मैथिली मे नीक गजल एतेक साल पहिनो कहल गेल छल, तखन एकर बाद गजलक विकास-यात्रा पचीस-तीस बर्ख धरि कतऽ आ किया ठमकि गेल। बीचक अवधि मे मैथिली गजलक विकासक धार मे बान्ह किया बनि गेल छल, इ विचारणीय गप अछि। ओना आब इ बान्ह टूटि रहल अछि आ आशाक नब जोति मे मैथिली गजलक घोघ उठि रहल अछि।

गजल

बाल गजल





झमझम बरखै बुन्नी रौ
टमटम चलबै मुन्नी रौ

आगू पाछू मलहा डोलय
खत्ता मे बड गडचुन्नी रौ

आम तोडय झाम गूडय
डोमा देलक चुनचुन्नी रौ

राजा के बेटा मारय ढेपा
कुकुर भुकै मधुबन्नी रौ

कसीदा

कसीदा - ए - विदेह



जग घूमल सर्वत्र मुदा त्राण पाएल विदेह पर
सब गाम स्वाद चीखि चीखि लोक आएल विदेह पर

गज़ल कता रुबाई हाइकू छन्द कविता वा हौ रोला
मातृभाषा मे लिखल देखि प्राण बाजल विदेह पर

सब जाति धर्म के मैथिल जे एकत्र भेला एक ठाम
अप्पन मोनक भाव कहै धूम जमल विदेह पर

रगडा झगड़ा आदर मान छैक अप्पन लोक जेका
शुभारंभ साहित्य विधा के सौंसे देखल विदेह पर

दुर्लभ छथि जे गुरुजन अन्यथा, ज्ञान भेटैक नहि
पाबि मार्गदर्शन कविगण नित्य बनल विदेह पर

देश विदेश गून्जल गान माय मिथिला भेली प्रसन्न
गूगल नतमस्तक भेल मिथिला सजल विदेह पर

छद्म साहित्य ख़सल पिछडि लोक केलक बहिस्कार
समानांतर अकॅडमी छे शान बनल विदेह पर

कसीदा


कसीदा - ए - वैदेही





मूल्य बुझि माटिक अहां जन्म खेते लेलहु वैदेही
नारी मान बढाबय लेल स्त्री रूप धेलहु वैदेही

धनुष उठा नीपैत पोछैत अहां पूजल भोले के
ओही धनुष ल के अहां स्वयंवर केलहु वैदेही

देश विदेशक राजा आयल देखबै अपन जोर
देखि राम के दूरे से ईश्वर अहां पेलहु वैदेही

कमला कोशी बागमती तजि नेह भेल सरजू सों
आय अयोध्या भेल धन्य एत' अहां एलहु वैदेही

ससुर महात्मा ईश्वर राम सासुर बनल धाम
तीन सासु दियर संग पूर्ण अहां भेलहु वैदेही

पिता वचन के राखि मान देश तजि चलला राम
संस्कार के पाठ गुनैत संगे अहां गेलहु वैदेही

निश्छलता के लाभ उठाय रावण ठकबा आयल
देखि जटायु पंखहीन छुछे नोर देलहु वैदेही

भोर सांझ ल प्रणय निवेदन रावण आबे रोज
पर पुरुख़ बाजू कोना, त्रिन ठोढ धेलहु वैदेही

अग्निपरीक्षा देल तखनो धोबिया भरलक कान
मिथ्या आरोप बुझितो पतिक मान केलहु वैदेही

जीवन छोडि कर्तव्य लेल गेहलौ जंगल कुटिया
सूर्य समान दुहु पूत के कोना पोसलहु वैदेही

कतेक बर्छा भोंकल करेज और कतेक छै बाकी
पुनर्परीक्षा देखि सोझा धरती पैसलहु वैदेही

Thursday, 29 March 2012

गजल

बाल गजल




बेंग बजय छै टर-टर-टर्र
बगरा उड़य फर-फर-फर्र ।

झरना झहरे झर-झर-झर्र,
बाँस बजय छै कर-कर-कर्र ।

मिल चलय छै धर-धर-धर्र,
साँप ससरलै सर-सर-सर्र ।

चुनमा छाती धक-धक-धक्क,
डरसँ कापय थर-थर-थर्र ।

पप्पा एलखिन भागि गेल डर,
बात पदाबय चर-चर-चर्र ।

-----वर्ण-१२-----

गजल

बाल गजल






कुकरुकू जखन मुरगा बाजल,
किरिण सुरूजक मूँह मेँ लागल ।

कौआ डकलक कोइली बाजल,
आँखि मिड़ैते चुनमुन जागल ।

नहा-सोना के कयलनि जलखै,
इसकुल गेलथि घंटी बाजल 

दीदीजी बड्ड नीक लगैत छन्हि,
मास्टर जी के छड़ी लय भागल ।

कान पकड़ि के उठक-बैठक,
तैयो खेले पर मोन छै टाँगल ।

"चंदन" टन-टन घंटी बजलै ,
छुट्टी भेलइ घर दिस भागल

-----वर्ण-१३-----

गजल

बाल गजल





चार पर छै कौआ बैसल,
माँझ अँगना बौआ बैसल ।

घुट-घुट खाथि दूध-भात,
मायक कोरा बौआ बैसल ।

राजा-रानी सुनथि पिहानी,
मइयाँ कोरा बौआ बैसल ।

ओ-ना-मा-सी सिखथि-पढ़थि,
बाबाक कोरा बौआ बैसल ।

सुग्गा-मेना संग खेलै छथि,
"चंदन" अँगना बौआ बैसल ।

-----वर्ण-१०-----

गजल




फुलक डाएरह सुखल सुखल फुल अछी मुर्झाएल
वितल वसंत आएल पतझर देख पंछी पड़ाएल


भोग विलासक अभिलाषी प्राणी तोहर नै कुनु ठेगाना
आई एतय काल्हि जएबे जतय फुल अछी रसाएल


अपने सुख में आन्हर प्राणी की जाने ओ आनक दुःख
दुःख सुख कें संगी प्रीतम दुःख में छोड़ी अछी पड़ाएल


कांटक गाछ पर खीलल अछी मनमोहक कुमुदिनी
कांट बिच रहितो कुमुदनी सदिखन अछी मुश्काएल


बुझल नहीं पियास जकर अछी स्वार्थी महत्वकांक्षा
होएत अछी तृप्त जे प्रेम में सदिखन अछी गुहाएल


अबिते रहैत छैक जीवन में अनेको उताड चढ़ाव
सुख में संग दुःख में प्रीतम किएक अछी पड़ाएल


...........वर्ण-२१...................
रचनाकार:-प्रभात राय भ

गजल



तड्पी तड्पी हम जीबैत छि
कहू धनी अहाँ कोना रहैत छि

एसगर निक नै लगैय धनी
अहींक सुरता हम करैत छि

हमरो विनु तडपैत छि अहाँ
से सोची सोची हम मरैत छि

मोन हमर कटैय अहुरिया
अहींक सपना हम देखैत छि

अहाँ हमरा सपना में आबी कें
हमरा पर प्रेम लुटबैत छि

मधुर बोली आर मादकता सँ
हम चरम उत्कर्ष पबैत छि

प्रभातक किरण आईख पर
परीते नीन सँ हम जागैत छि

सपना तं वस् सपना होईए
विछोड्क पीड़ा सँ तडपैत छि
.......वर्ण:-१२............
रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

गजल

बाल गजल





कुकुर उनटल पड़ल लार पर
बंदरो बैसलै चार पर
मूस दौगै गहुँम भरल घर
कोइली तन दै तार पर
नादि पर गाय दै दूध छै
नजर देने श्रवन ढार पर
स्वागत लेल बौआ कए
फूल मुस्कै गुथल हार पर
भोर भेलै उठल राजा यौ
"अमित " बौआ चढ़ल कार पर
*दीर्घ _हर्स्व _दीर्घ ३ बेर*
बहरे -मुतदारिक
अमित मिश्र

गजल

बाल गजल






भनसा धर दिश दौड़लनि बौआ ,
अपन जलखइ माँगलनि बौआ ,
बीच आँगन मे ऊँच पिढ़ी लगेला ,
छरपला , डोलल खसलनि बौआ ,
देखलनि माँ के ठाढ़ हाथ फैलेने ,
चोट बिसरि कोरा बैसलनि बौआ ,
दादी एलखिन लेने बाटी बौआ के .
दूध देख क' बाटी फेकलनि बौआ ,
बाबू खेलखिन मिरचाइ सोहारी ,
हुँनको चाही से जीद धेलनि बौआ ,
गेँद गुड्डा हाथी , देब मोटर कार ,
बहुते मनेलौँ नै मानलनि बौआ ,
संग मे जाएब घुमै लए सर्कस ,
"अमित" सँ चारि लड्डू लेलनि बौआ . . . । ।
बर्ण-13
अमित मिश्र

गजल

ओकर मूँह लागैए कते म्लान सन ,
कत' गेलै चमक ओ पुनम के चान सन ,
मौलाइल गुलाबक ठोर ओकर किए ,
नोराएल कारी नैन , जे वाण सन ,
केशो नै गुहल पसरल धरा पर किए ,
देने पेटकुनियाँ भेल अपमान सन ,
टोना कोन डाइन केलकै आइ यौ ,
मुस्की गेल हेरा कोयलक गाण सन ,
दिल मे आगि लागल छै विरह के "अमित" ,
परदेशी पिया भेला अपन जान सन . . . । ।
2221-2221-2212
बहरे -कबीर
अमित मिश्र

गजल

‎घोघ हुनकर उतरि गेलै .
पवन संगे ससरि गेलै ,
आँखि रहि गेलै खुजल यौ ,
रूप यौवन निखरि गेलै ,
टोह मे छल मोन बगुला ,
राशि सुन्नर उचरि गेलै ,
चउरचन मे चान पूजब ,
पावइन सब बिसरि गेलै ,
जेठ मे मधुमास एलै ,
गाछ नव दिल मजरि गेलै ,
मधुप केलक आक्रमण बड
काम मे सब लचरि गेलै ,
अंशु आशक झाँपि लेलनि ,
कुकुर पर जे नजरि गेलै ,
पाप भेलै ,घोघ ससरल ,
"अमित " के मन हहरि गेलै . . . । ।
फाइलातुन
{2 -1-2-2}
बहरे-रमल
अमित मिश्र

Wednesday, 28 March 2012

गजल

बाल-गजल

चम चम चम चम तारा चमके
बौआ कए हाथक तरुआ गमके

कारी बकरी,नब उज्जर महिष
लाल बाछी किए दौर-दौर बमके

बौआक घोरा सय-सय कए देखू
काका कें घोरा पिद्दी कतेक कमके

बाबी कें साडी मए कें लहंगा बहे
बौआ कें गघरी त कतेक झमके

बौआ हमर आब गुमशुम किए
किएक नै ठुमुक-ठुमुक ठुमके

(सरल वार्णिक, वर्ण-१३ )

***जगदानन्द झा 'मनु'

गजल

स्वर्गक नाम जपैत सगरे नर्क पसरल छै
साधुक भेष धरि सगरे रावण अभरल छै

सब छे घिचने लक्ष्मण रेखा अपन चारू कात
लंका दहन केर नाम पर सब ससरल छै

रूप गेलै बदलि जमाना संग बानरोक आब
हनुमानक स्थान पर आब मारीच भरल छै

नियमबद्ध होएब लगै आब करैला सों तीत
एहि बात पर सगरे आब आगि धधकल छै

रुबाइ

चीरैत चीरैत हुनकर करेज
देखियौ चीरायल हमर करेज
बन्न आँखिए छवि हमर देखथि
ई देखि फाटल करगर करेज

रुबाइ



करेजा चीरि राखि देलक हाथमे
हमरा अप्पन बनेलक बाते-बातमे
बंद आँखिए चेहरा देखै छी हम
समय सदिखन मर बितैए उचाटमे


ओकरा लेल.......समर्पित.....

Tuesday, 27 March 2012

गजल


मोनक आस सदिखन बनि कऽ टूटैत अछि।
किछु एना कऽ जिनगी हमर बीतैत अछि।

मेघक घेर मे भेलै सुरूजो मलिन,
ऐ पर खुश भऽ देखू मेघ गरजैत अछि।

हम कोना कऽ बिसरब मधुर मिलनक घडी,
रहि-रहि यादि आबै, मोन तडपैत अछि।

देखै छी कते प्रलाप बिन मतलबक,
चुप अछि ठोढ, बाजै लेल कुहरैत अछि।

मुट्ठी मे धरै छी आगि दिन-राति हम,
जिद मे अपन, "ओम"क हाथ झरकैत अछि।
(बहरे-कबीर)

Monday, 26 March 2012

गजल


ह्रदय सँ सटा तँ लिय
अहाँ प्रीत लगा तँ लिय 


हम जन्म सँ अहाँ केँ छी 
प्रियतम बना तँ लिय


सब केँ छोरने छी हम 
हृदय में बसा तँ लिय


नै हमरा बिसरल छी 
ई हमरो जता तँ लिय


आब दिन बीते नै राति 
मरब ' सँ बचा तँ लिय

जिनै सकी बिन अहाँ केँ
नै हमरा कना तँ लिय


ई नोर विरह केँ अछि 
मिलन केँ बना तँ लिय


सुगँधा अहाँ 'मनु' केँ छी  
ई सब केँ बता  तँ लिय  

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-९ )
जगदानन्द झा 'मनु'  : गजल संख्या-34

गजल

प्रस्तुत अछि कमलमोहन चुन्नू जीक गजल ( इ गजल बिना बहरक अछि) ---

पाछू जँ नहि अमक तँ एकसर सुन्ना की
कानक बेतरे सोना की झुनझुन्ना की

जीरा लए जोलहाल जानकीक नैहर केर
पोखरिए महुराह तँ रोहु की मुन्ना की

सिरिफ अमौट लए रटकल लुधकल भगिनमान
तकर जजातक उपजा की मरहन्ना की

भङघोटनासँ अकछि लोक बन्हलक मुट्ठी
तँ दरबारक कोट-कानूनक जुन्ना की

पथरौटी डिहवार छातियो पाथरकेँ
तकर गोहरिया गुम्हरल की अँखिमुन्ना की

धातुक बासन टुटलोपर बोमियाइत अछि
मैथिल बान साबुत की सकचुन्ना की

डंटी मारए जे बैसल सप्पत खा क'
तकरा लए छै गाँधी की आ अन्ना की

गजल


अप्पन आन सभ लेल अहाँ चिन्हार बनल छि
आS हमरा लेल किएक अनचिन्हार बनल छि

अहाँ एकौ घड़ी हमरा विनु नहीं रहैत छलौं
आई किएक हम अहाँ लेल बेकार बनल छि

कोना बिसरल गेल ओ प्रेमक पल प्रीतम
हमरा बिसारि आन केर गलहार बनल छि

हमर प्रीत में की खोट जे देलौं हृदय में चोट
अहाँक प्रीत में आईयो हम लाचार बनल छि

दिल में हमरा प्रेम जगा किया देलौं अहाँ दगा
दगा नै देब कही कs किएक गद्दार बनल छि

..................वर्ण:-१८............
रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

Sunday, 25 March 2012

गजल


गजल-१७

घोघ हुनकर उतरि गेलै,
जोत सगरो पसरि गेलै ।

बहल पुरबा जखन शीतल,
आँचर तखने ससरि गेलै ।

देखि हुनकहि ठोढ़ लाली,
आगि छाती पजरि गेलै ।

नैन लाजे हुनक झूकल,
अटकि हमरो नजरि गेलै ।

रूप यौवन निरखि "चंदन"
मोन मधुकर मलरि गेलै ।

I-U-I-I+I-U-I-I

गजल


अनचिन्हार सं जहिया चिन्ह्जान बढल
तहिया सं हमरा नव पहिचान भेटल

विनु भाऊ बिकैत छलहूँ हम बाजार में
आई अनमोल रत्न मान सम्मान भेटल

काल्हि तक हमरा लेल छल अनचिन्हार
आई हमरा लेल ओ हमर जान बनल

अन्हरिया राईत में चलैत छलहूँ हम
विनु ज्योति कहाँ कतौ प्रकाशमान भेटल

प्रभात केर अतृप्त तृष्णा ओतए मेटल
जतए अनचिन्हार सन विद्द्वान भेटल
.............वर्ण:-१६.................
रचनाकार :-प्रभात राय भट्ट

Saturday, 24 March 2012

गजल

धाख सबटा बिसरि गेलै
घोघ हुनकर उतरि गेलै

झूठ कोना कें नुकायत
जखन सोंझा बजरि गेलै

सय बचायब बचत कोना
लाज सबटा ससरि गेलै

ओ छलै फेसन सँ डूबल
काज सबटा पसरि गेलै

भेल नेता नींद में सब
देश सगरो रगरि गेलै

(बहरे-रमल,
SISS दु-दु बेर सभ पांति में )
***जगदानन्द झा 'मनु'

गजल


हाथीक दाँत देखाबैकेँ  आर नुकाबैकेँ छै आर 
नेताकेँ  कहैक गप्प छै आर बनाबैकेँ छै आर

केलक भोज नै दालि बड्ड सुडके इ बूझल
भोज करैक बात आरो छैक देखाबैकेँ छै आर

दोसरकेँ फटलमे टाँग सब कीयो अडाबै छै
फाटल अपन सार्बजनिक कराबैकेँ  छै आर

सासुरकेँ मजा बहुते होइ छै सभकेँ बुझल
कनियाँ सन्ग सासुरमे मजा सुनाबैकेँ छै आर

भाई धनक गौरब तँ गौरबे  आन्हर रहै छै 
मोट रुपैया जखन बाप जे पठाबैकेँ छै आर 

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१८)

Friday, 23 March 2012

गजल

अकुआएल छी आ भकुआएल छी,
प्रेमक माइरसँ मोउलाएल छी.

वर्तमानक चिंताछोइर-छाइर,
भविष्यक सोचमेंबऊआएल छी.

काज-राज कें भेलै अंगोर-छाउर,
सदिखन हुनके में भूतलाएल छी.

लोकक बात लागैया जहर-माहूर,
हम तअ प्रेमधुन में बउराएल छी.

जीवनक नाव करय तऽर-ऊपर,
प्रणय धार में भासियाएल छी.

आखर १३


गजल

टूटिए जेतै संबंध जँ दस लेल एक सँ , इहो स्वीकार अछि ,
भीड़ मे जीबै छी तेँ भीड़ के बचेनाइ हमर अछिकार अछि ,
हम बनियाँ छी सए कमा लेब , दस छुटि गेल कोनो दुख नै ,
सबल त' बढ़बे करतै ओकरा संग दिअ जे लचार अछि ,
माछक लोभ मे सड़ल माछ ल दुषित नै करब समाज के .
एक दाम मे बिकै बला ककरो जिनगी नै मीना बजार अछि ,
सब के सब सँ किछु-ने- किछु चाहत रहै छै छोट बाट पर ,
अहाँ एक बेर आबू हम दस बेर , इ हमर व्यबहार अछि ,
लड़ाइ क' देह जुनि तोड़ै जाउ , प्रेम क' दिल धरि पहुँचु यौ ,
"अमित" गिनती के फेरा मे नै पड़ू , सगरो अपने संसार अछि . . . । ।
वर्ण-23
अमित मिश्र

गजल

ओ बिसरि गेलै किए ,
प्रेम हेरेलै किए ,
बीच चौराहा जड़ल ,
राख दिल भेलै किए ,
आश अमृत के छलै ,
जहर बनि एलै किए ,
झुनझुना हमर समझि ,
आइ ओ खेलै किए ,
प्रेम देबी बनि क' ओ ,
नोर बोझेलै किए ,
नै जबाबो भेटलै ,
"अमित" दुख भेलै किए . . . । ।
फाइलातुन-फाइलुन
बहरे-मदीद

अमित मिश्र

बहुरूपिया रचनामे


गजलमे हम रूचि राखैत छी। संगहि मैथिली मे थोड बहुत गजल सेहो लिखै छी आ गजलक पोथी सब पढबाक इच्छा रहै ए। मैथिलीमे बहुत कम गजल संग्रह अछि आ ओहो सुलभ नै होइत रहै ए। एहन परिस्थितिमे हमरा श्री अरविन्द ठाकुरजीक सद्यः प्रकाशित मैथिली गजल संग्रह "बहुरूपिया प्रदेशमे" पढबाक अवसर भेंटल आ हम एहि पोथीकेँ आद्योपान्त पढलहुँ।

सबसे पहिने हम श्री अरविन्द ठाकुरजीकेँ मैथिली गजलक पोथी लिखबाक लेल बधाई दैत छियैन्हि। मैथिली गजलक उत्थान लेल प्रत्येक डेग हमरा महत्वपूर्ण लागै ए। पोथीक गेट अप बड्ड सुन्नर अछि। टाईप आ कागतक कोटि सेहो उत्तम अछि। पोथीक भूमिका गजलकार अपने लिखने छथि आ ओहि मे गजल आ एहि संग्रहक सम्बन्ध मे बहुत रास गप सब कहने छथि। जेना पृष्ठ संख्या सातक दोसर पारा मे गजलकार कहैत छथि जे "मैथिलीक मिजाजक सीमा (इ मैथिलीक नहि, हमर अपन सीमा भऽ सकैत अछि) केँ देखैत गजलक व्याकरण (रदीफ, काफिया, मिसरा, मतला, मकता आदि)क स्थापित मापदंडक कसबट्टी पर हमर सभ गजल खरा उतरत तकर दाबी तऽ नहिए टा अछि बल्कि हम तँ इ सकारय चाहै छी जे--------------------------------- हमर सीमाक कारणेँ प्रस्तुत गजल मे कएक जगह सुधि पाठक लोकनि केँ त्रुटि भेटि सकैत छनि।" एहि पाराक अन्त मे ओ कहै छथि जे बहरक दोख किछु शेर मे भेटि सकैत अछि। हम गजलकारक सराहना करैत छी जे ओ भूमिका मे अपने कएक ठाम बहरक आ आन दोख हएब स्वीकार कएने छथि। पोथी केँ आद्योपान्त पढला पर हमरा इ नै बुझाएल जे एहि संग्रहक गजल सब कोन-कोन बहर मे लिखल गेल अछि। अरबीक कोनो टा बहर मे कोनो गजल नहिए अछि, मैथिली मे आइ-काल्हि प्रयुक्त होइ बला सरल वार्णिक बहर मे सेहो कोनो गजल नै अछि। गजलकार केँ प्रत्येक गजल मे इ लिखबाक चाही छल जे कोन बहर मे गजल लिखल गेल अछि। जँ इ "आजाद-गजल"क संग्रह थीक, तँ हुनका एहि बातक उल्लेख करबाक चाही छल। भूमिकाक उपरोक्त पाराक शुरू मे गजलकार कहै छथि जे मैथिलीक मिजाज केँ देखैत एहि मे उर्दू-हिन्दी गजलक मिजाजक नकल करबाक प्रयास कएल जाइत तँ एकरा बुधियारी नहिए टा कहल जायत आओर सफलता सेहो नहि भेंटत। हम हुनकर गप सँ सहमत छी जे नकल करब उचित नहि। मुदा एकटा गप हम कहऽ चाहैत छी जे प्रत्येक विधाक एकटा नियम होइत छै आओर जाहि क्षेत्र मे ओहि विधाक उदय भेल रहैत छै ओहि क्षेत्र मे स्थापित भेल नियमक पालन केने बिना कोनो रचना मूल विधा मे कोना भऽ सकैत अछि। जेना मैथिली मे समदाउन आ सोहरक परम्परा छैक आ जँ पंजाबी मे वा गुजराती मे वा की कोनो आन भाषा मे समदाउन आ सोहर गाबऽ चाही तँ नियम कोना बदलि जेतैक। जँ नियम बदलतै तँ ओ दोसर चीज भऽ जेतैक। तहिना गजल अरब क्षेत्र मे जन्म लेलक आ इ स्वाभाविक छै जे एकर नियम (व्याकरण) ओहि क्षेत्रक स्थापित मानदण्डक आधार पर बनल। स्थापित मानदण्डक पालन करब नकल नहि कहल जा सकैत अछि। आ जे नकलक गप करी तँ 'गजल' कहब अरबी-हिन्दीक नकल थीक। एक दिस गजलकार 'गजल' कहबाक लोभ नै छोडि रहल छथि आ दोसर दिस गजलक व्याकरणक नियम पालन केँ नकल कहै छथि, इ उचित नै बुझाएल। गजल स्थापित मानदण्ड पर जँ नै कहल गेल तँ रचना केँ गजलक स्थान पर दोसर नाम देल जा सकैत अछि।

पृष्ठ संख्या दस पर दोसर पारा मे गजलकार कहै छथि जे ओ जीवन सँ सिदहा लैत छथि। इ स्वागत योग्य गप भेल। जीवनक सिदहा सँ तैयार व्यंजन सोअदगर हेबे करतै। मुदा भोजन बनबै काल चाउरक सिदहा पानि मे सोझे फुला कऽ परसि देला सँ भात नहि कहाइत अछि। चाउरक सिदहा केँ अदहन मे देल जाइ छै तखन भात तैयार होइ छै। तहिना जीवनक सिदहा जँ व्याकरण, नियम आ चिन्तन-मननक अदहन मे पकाओल जाइत अछि तँ सोअदगर रचना भेटैत अछि। विधा विशेषक मापदण्ड तोडबाक क्रांतिकारी घोषणा कएला टा सँ किछु विशेष फायदा वा उमेद तँ नहिए जगै ए। जँ कियो मापदण्ड तोडै छथि, तँ मापदण्ड पर चलै बला केँ नकलची आ बाजीगर कहब उचित नहि। गजल आ फकरा आ दोहा मे थोडेक अन्तर तँ छै जे रहबे करतै। अस्तु, इ गजलकारक अपन विचार छैन्हि आ आब प्रकाशित सेहो छैन्हि।

गजल संग्रहक सब गजल पढलौं। विषय वस्तु सब नीके लागल। गजलक व्याकरणक आधार पर कहि सकैत छी जे बहरक दोख तँ प्रत्येक गजल मे छैक आ जँ इ आजाद-गजलक संग्रह थीक तँ गजलकार इ गप कतौ नै कहने छथि। गजलकार केँ स्पष्ट करबाक चाही छल जे कोन कोन बहर मे गजल सब लिखल गेल अछि। हमरा बुझने गजलक कोनो शीर्षक नै होइत अछि, मुदा प्रत्येक गजल केँ एकटा शीर्षक देल गेल अछि। बहरक अतिरिक्त रदीफ आ काफियाक नियमक सेहो कएक ठाम पालन नै भेल अछि आ इ गप गजलकार भूमिका मे सेहो स्वीकार कएने छथि। जेना पृष्ठ बाईस मे मतलाक दुनू पाँति, दोसर शेर आ पाँचम शेर मे काफिया मे 'आयब' प्रयोग भेल अछि, तँ दोसर आ चारिम शेर मे 'अब' क प्रयोग अछि। पृष्ठ चौबीस मे मतलाक पहिल पाँति मे काफिया मे 'अ' आयल अछि आ दोसर पाँति आ अन्य शेर मे 'आत' आयल अछि। पृष्ठ पच्चीस मे काफिया की छै, से नै बुझाएल। पृष्ठ तिरपन मे प्रत्येक पाँति मे काफिया एकदम फराक फराक अछि। पृष्ठ अनठाबन मे मतला, दोसर शेर आ चारिम शेर मे काफिया मे 'अल' प्रयुक्त अछि आ आन सब शेर मे काफिया मे 'अ' प्रयुक्त अछि। पृष्ठ उनसठि मे सेहो रदीफ आ काफियाक स्पष्टता नै अछि। पृष्ठ छियासठि मे काफिया मे कतौ 'अल' आ कतौ 'आओल' प्रयुक्त अछि। पृष्ठ सडसठि आ तिहत्तरि मे सेहो काफियाक नियमक उल्लंघन भेल अछि। तहिना संयुक्ताक्षर बला काफियाक नियम सेहो एक दू ठाम हमरा हिसाबेँ ठीक नै अछि। एकर अतिरिक्त आओर कएक ठाम काफियाक नियमक पालन नै भेल अछि। हम उदाहरण स्वरूप किछु पृष्ठक उल्लेख कएलहुँ। हमर इ उद्देश्य नै अछि जे खाली दोख ताकल जाय, मुदा जँ गजल कहै छियै तँ गजलक नियमक पालन हेबाक चाही। सब गोटे केँ जानकारी लेल इ बता दी की बिना रदीफक गजल तँ भऽ सकैत अछि, मुदा बिना दुरूस्त काफिया भेने गजल नै भऽ सकैत अछि।

भूमिका सँ एकटा बात आर स्पष्ट होइ ए जे गजलकार मई २००८ सँ मैथिली मे गजल लिखब शुरू केलथि, ओना ओ हिन्दी मे पहिनहुँ गजल लिखैत छलाह। एकर मतलब इ भेल जे गजलकार "अनचिन्हार आखर" (मैथिली गजल केँ समर्पित ब्लाग) सँ बहुत बाद मे मैथिली गजल लिखब शुरू कएने छथि आ मैथिली गजलक वरीयता मे बहुत बाद मे आयल छथि। "अनचिन्हार आखर" ब्लाग देखला सँ पता चलै छै जे गजलकार एहि ब्लाग पर सेहो अपन कएक टा गजल २००९ सँ एखन धरि देने छथि। ओ "अनचिन्हार आखर" ब्लाग सँ चिन्हार छथि, तैँ इ उमेद अछि जे एहि ब्लाग पर प्रकाशित मैथिली गजलक विस्तृत व्याकरण केँ जरूर देखने हेताह। इ उमेद छल जे प्रस्तुत गजल संग्रह मैथिली गजलक नब पीढी लेल एकटा उदाहरण बनत। मुदा एहि संग्रह मे गजलक व्याकरणक जे उपेक्षा भेल अछि, जे गजलकार भूमिका मे स्वयं स्वीकार कएने छथि, निराशा उत्पन्न करैत अछि। मुदा इ संग्रह गजलकारक पहिलुक मैथिली गजल संग्रह अछि, तैँ गजलक व्याकरणक गलती भेनाई स्वभाविक अछि। आशा व्यक्त करै छी जे हुनकर आगामी गजल संग्रह मैथिली गजल मे अपन अलग स्थान राखत।

गजल

धक सं लागल चोट, करेजा हमर तोड़ि देलऊं
एहन भेलऊं अहां कठोर कि हमरा छोड़ि देलऊं ।

दिन हो चाहे राइत अहांके हम ईयाद छलऊं
एहन अहांके कि भ गेल कि हमरा छोड़ि देलऊं ।

सदिखन छलहुं हमर पास संग आब छोड़ि देलऊं
हम देखितॆ रहलऊं बाट अहां मुख मोड़ि लेललऊं ।

टूटल हमर पूर्ण विश्वास, दूख संग जोड़ि गेलऊं
हमरा सं कि गलती भेल कि हमरा छोड़ि गेलऊं ।
- भास्कर झा 22/03/2012

गजल


एकटा शेर लेल कतेक बेर पांति तारतार होइत छै,
गजल बनैत बनैत कतेक कागज बेकार होइत छै.

ओ काटैत आंगुर अपने दोख हमरा कपार होइत छै
लोकके लगायल बोली स दहेजक व्यापार होइत छै

कियो हथिया लै जोतल रोपल खेत बिनु घाम चुएने
जे घाम चुबाए ओकरहि मुह में छुच्छे लार होइत छै

रौद बसात स हुनका भय जे रहैथ छप्पर तअर
सड़क किनार रहै बलाके कतएक जार होइत छै

जोड़ तोड़ आ खरीद बिकिनमें जे होमय सबसा चालू
इ अभागल देशमें बुझू ओकरे सरकार होइत छै

रावणक करम कतौक पाप होए कलियुगमें, राम
बिभिखनक करम अहि जुगमें बेभिचार होइत छै

बाबूजी कहैत जे इमानक सोहारी पर जिबू "रौशन"
मुदा इमानक सोहारी पर जिनाई पहार होइत छै

गजल




नेहक सूत बान्हि रखलियै करेजक कोन ओकरा,
बिसरल नइ भेल जकरा, ओ' बिसरि गेल हमरा ।

जिनगीक बाट जकरे आञ्गुर ध' चलब सिखेलियै,
बिचहि बाट में ओ' छोड़ि पड़ायल खसितहि हमरा ।

कहाँ बचल छै कनियो मोल आब अनमोल-नेहक,
सौंसे छै खाली टाकाक पुछ, आब लोकक पुछ ककरा ?

"चंदन" टाका त' छियै हाथक मैल सत्-संबंधक आगाँ,
जे नैं बुझैछ ई बात , बनैछ तकरे जिनगी फकरा ।

-----वर्ण-२०----

Wednesday, 21 March 2012

गजल


जीनाइ भेलै महँग, एतय मरब सस्त छै।
महँगीक चाँगुर गडल, जेबी सभक पस्त छै।

जनता ढुकै भाँड मे, चिन्ता चुनावक बनल,
मुर्दा बनल लोक, नेता सब कते मस्त छै।

किछु नै कियो बाजि रहलै नंगटे नाच पर,
बेमार छै टोल, लागै पीलिया ग्रस्त छै।

खसि रहल देबाल नैतिकताक नित बाट मे,
आनक कहाँ, लोक अपने सोच मे मस्त छै।

चमकत कपारक सुरूजो, आस पूरत सभक,
चिन्तित किया "ओम" रहतै, भेल नै अस्त छै।
(बहरे-बसीत)

गजल

बेटी नहि होइ दुनिआ में, कहु बेटा लाएब कतए सँ
जँ दीप में बाती नहि तँ, कहु दीप जलाएब कतए सँ

आबै दियौ जग में बेटी के, के कहे ओ प्रतिभा,इन्द्रा होइ
भ्रूण-हत्या करब तँ कल्पना,सुनीता पाएब कतए सँ

मातृ-स्नेह, वात्सलके ममता, बेटी छोरि कें दोसर देत
बिन बेटी वर कें कनियाँ कहु कोना लाएब कतए सँ

धरती बिन उपजा कतए, घर बिनु कतए घरारी
बिन बेटी सपनो में, नव संसार बसाएब कतए सँ

हमर कनियाँ, माए बाबी हमर किनको बेटीए छथि
बिन बेटी एहि दुनिआ में, मनु हम आएब कतए सँ
***जगदानन्द झा 'मनु'

गजल


करेजक घर तँ खोलू कने

सिनेहक ताग जोरू कने ।

अहिँक हिय-बीच चाही बसै,


जगह बसबाक छोड़ू कने ।

बनल बेरस हमर जीवने,


अहिमेँ नेहरस घोरू कने ।

करय फरियाद "चंदन" सुनू,


सजल संबंध जोरू कने ।

(ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ+ ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ+ ह्रस्व-दीर्घ)

गजल


आन्हर बनल सरकार छै, लाचार भेल जनता,

व्यापार पोषित नीति से कोना केर एतइ समता ।

गाम भूखल-पेट देशक, खेत उसर भेल छइ,


बाढ़ि-रौदीक बीच उपजल छइ मात्र दरिद्रता ।

कल-करखाना शहर मे चलइछ दिन-राति जे,


प्रगति के अछि मापदण्ड आ' एकात भेल जनता ।

गाम जा' बसि रहल शहर, जीविका केर जोह मे,


महाजन केर ब्याज-तर, फुला रहल निर्धनता ।

ग्राम-वासिनी भारती, कियेक गेलीह बसै नगर,


कनैत छथि आइ तँइ, ई केहन कैलनि मूर्खता ।

"चंदन" करू आह्ववान, स्वराज के एकबेर फेर,


हँसतीह एही सँ देश , खुशहाल बनत जनता ।


-----वर्ण-१९-----

गजल





( चंदन जीक ई गजल " मिथिला दर्शन" क अंक जुलाइ-अगस्त २०१२मे प्रकाशित भेलन्हि अछि।)





एखन राति कटै छी हम कनिते-कनिते,

एखन दिन बीतै पहर गनिते-गनिते ।

लगै अछि ई जीवन अकारथ, अचानक,


बिसरलहु गामो शहर तकिते-तकिते ।

पहुँचलहु ने जानी कोना एहि चौबटिया,


बिसरलौ ठेकाना कखन चलिते-चलिते ।

कहाँ कऽ सकलियइ एकचारी हम ठाढ़ो,


बिकेलइ घरारी महल बन्हिते-बन्हिते ।

कही कोन कथा आओर सुनायब की पाँति,


शब्दहुँ हेराओल गजल पढ़िते - पढ़िते ।

नियति केर फेरा मे ओझरायल ''चंदन",


छिड़ियेलै सपना पलक मुनिते-मुनिते ।


-----वर्ण-१६-----

गजल

प्रस्तुत अछि कमल मोहन चुन्नू जीक बिना बहरक गजल..


कगनीए पर नाह लगैए बाजू नहि
आङ-समाङक धाह लगैए बाजू नहि

मोसि-कलम-कागत धेने परोपट्टामे
एक्कहु नहि पुरखाह लगैए बाजू नहि

भरल-पुरल दरबज्जा आँगन सजनियाँ
दोगे-दोग अबाह लगैए बाजू नहि

कोन बसात सिहकलै जनमारा पछबा
गामक-गाम रोगाह लगैए बाजू नहि

जाहि आँखिमे भरि जिनगी नहैतहुँ हम
पेनी तकर अथाह लगैए बाजू नहि

होइत रहत एहिना मरलहबा गुरमिन्टी
लोके नहि इरखाह लगैए बाजू नहि

ठीका-मनखपमे उलझल धर्मध्वजी
नेत ओकर मरखाह लगैए बाजू नहि

हड्डी-गुद्दा केर हबक्का सौजनमे
कुकुरो आइ घबाह लगैए बाजू नहि
तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों