Saturday, 29 September 2012

गजल


प्रस्तुत अछि जगदीश प्रसाद मंडल जीक  गजल



ठोरक रूप देखैत चलल छै घुरत कोना
मुँहक हँसी सेहो बिसरल छै घुरत कोना

सूर-तान भजैत चलल ककरा की कहतै
छाती केना दलकि‍ रहल छै घुरत कोना
मुँहक कननी केहेन अबै छै कूही भए कऽ
ठोरक रूप जेना बदलल छै घुरत कोना

जि‍नगी जेकर जेहेन रहै छै घुरछी लेने
छाती तेहने तेकर बनल छै घुरत कोना

हलसि‍---कलशि‍ कहैत रहै बीच सड़कपर
एेना पारदर्शी बनि बेकल छै घुरत कोना

एक्कभग्गू शीशा रहतै हँसी केहेन एतै यौ
देखि‍-सूनि ‍‍हँसि डेग उठल छै घुरत कोना

पालि‍स लगिते शीशा झल अन्हा र जे बनतै
अन्हा्रेमे जगदीश बढ़ल छै‍ घुरत कोना

गजल

प्रस्तुत अछि जगदीश प्रसाद मंडल जीक  गजल




गाछक रंग बदलि‍ बहल छै
मौसम संग सुधरि‍ रहल छै

थल-कमल जकाँ कहि‍यो छल
गाढ़ लाल-उज्ज‍र जे बनल छै

तहि‍ना फूल-फल कोढ़ी‍ जकाँ जे
झरि-झरि‍ कोनो फड़ो फड़ल छै‍

आशा आश लगा-लगा कऽ रहतै
जीत अपराजि‍त ओ हँसल छै

सुधरि‍ रूप बदलि‍ चालि सेहो
कारी काजर चमकि‍ उठल छै

लत्ती पानि‍ रूप बदलि‍ बदलै
थल-कमल बनैत बढ़ल छै

तहि‍ना लत्ती अपराजि‍त भए कऽ
जगदीशकेँ गछाड़ि‍ धड़ल छै

गजल

प्रस्तुत अछि मुन्नी कामत जीक  आजाद गजल



मुदत्ते बाद महफिलसँ मुँह झाम निकलल
बेकार छल निकलल जेना काम‍ निकलल

हरा गेल भीड़मे आबि कऽ ताकी निङ्गहारि
नतीजा जे छलै निकलबाक सरे-आम निकलल

छिन गेल सरताज हमर खाली माथ हँसोथी
बेबस बनि लाचार शर्मसार अवाम निकलल

फेर सत्तामे अबैक उम्मीद नै एक्को रती
घुरब नै फेर आइ ओ देने पैगाम निकलल

सच तँ ई अछि राजनीतिमे दाग लागल
मुन्नी अपनेे करमसँ कत्लेआम निकलल

गजल

प्रस्तुत अछि मुन्नी कामत जीक  आजाद गजल




मनमे आस सफर लम्बा अनहार बहुत
पनपि रहल अछि मनमे सुविचार बहुत

नै डर अछि मिटै कऽ हमरा एको रती
बढ़ैत ने रहए चाहे ई अत्याचार बहुत

सर उठा कऽ चलैत रहब हम सदिखन
दिलमे अछि घुरमि रहल धुरझार बहुत

बेदाग रहत चुनरी सीताक बुझल अछि से
देहमे अछि अखनो प्राण आ इनकार बहुत

चिड़ैत रहब अनहारक कलेजा छी ठनने
मुन्नीकेँ मिलत अइसँ आगू प्रकार बहुत

गजल


चार पर सँ खसैत पानि ओरिआनी मे सँ बहैत रहै
ओहि मे जे बच्चा सभहक कागजक नाओ चलैत रहै

माँ खिसिआए कनि जलखै खा ले केओ कहाँ सुनैत छलै
गडै गैंची आ कबै माछ लेल पैनी मे बँसी पथैत रहै

समय नेनपन के एक्को बेर ओह घुमि फेरो अबितै
सँगी बिनु ने दिन कटै बिन बातो केखनो लडैत रहै

आम तोडै सभ नजरि बचा  कखनो मकै के बालि तोडै
पकडि लै त' कान पकडि क' बाबु के आगाँ लबैत रहै

जिनगी के खाता बही मे यादि के हिसाब लिखैत सभ छै
तहिआ ने छलै कोनो चिन्ता निफिकिर सभ घुमैत रहै

बितल बरख दशमी मे गेल छलौं  हम गाम अपन
पोखरि पर  ई बात चलल सपना सन लगैत रहै

(सरल वर्ण २१)

गजल



हे राम पुछैत छी अहाँ सँ कहू किए दोष हमरा पर लादल गेल
जमीन मे समयलौं हम अपने की जीवीतेमे हमरा गाडल गेल

अहील्या सुखी छलौं पाथर बनी s ने बेदना ने कोनो संबेदना छल
उद्धार केलौं किए की अपमान सही कहाँ ओहि दुष्ट के मारल भेल 

हे श्याम सुन्दर हे मुरलीधर कहू प्रीत मे हमर कोन खोट छलै
बिरह अग्नी मे जरैत रहलौं हम किए प्रीत चिता मे जारल गेल

हे कृष्ण कहैत छलौं सखी हमरा बहीनक हमरा सम्मान भेटल
नोर बनी बहल दर्द हमर जखन पाँच पती सँ बिआहल गेल

हे बालकृष्ण अहि यशोदा के मातृत्वक बदला अहाँ किए अश्रु देलौं 
गोकुल छोडि मथुरा गेलौं कहियो हाल पुछब से कहाँ आयल भेल

नारी पर अत्याचारक क्रम सुरुआत तहिए सँ भेल स्वीकार करु
नाक जे काटल सु्र्पणखा के कहू कोन न्याय सीद्धान्तक पालन भेल

इतिहास के अपन ईक्षा सँ सभ अपने तरह सँ लिखैत रहल
निधोक घुमैत अछि अन्यायी कहाँ समाज मे एहन के बारल गेल

गजल

:::::::::::::::::गजल::::::::::::::::::

मूँह जावि देलक आब हरियरी देतै ,
इ तानाशाही हमरा स' नै सहल जेतै ,

बेसी तंग केलक आब करब विरोध,
हमर धक्का में पात्त जेना उड़िया जेतै ,

बदला लेव एहन जे राखत ओ मोन,
दोबारा निकट एवाक हिम्मत नै हेतै ,

बेर-बेर पश्चाताप करत नोर बहा-बहा ,
आब तहियो ओकरा पर दया नै हेतै ,

घुमत नव जोगाड़ मे इम्हर -उम्हर,
आब कोनो मूँह जावि लगाव नै देतै .....

वर्ण -१५
अविनाश झा अंशु ......

गजल


:::::::::::::::हमर श्रद्धांजलि::::::::::::::

जतेक मिझैब आगि आउर भड़कबे करतै ,
खूनसँ भिजलै धरती मिथिला बनबे करतै ,

लेत प्रेरणा बलिदान सँ  युवा जगबे करतै ,
बाँधि माथ पर कफन आबओ लड़बे करतै ,

सीताक धरती पर अग्नि परिक्षा हेबे करतै ,
धधैक आगिसँ स्वर्ण  मिथिला बहरेबे करतै ,

आँधी जे उठि चुकल अछि आब बढबे करतै ,
क्रान्ति ध्वज सबहक हाथ में फहरेवे करतै ,

देखब तूफानी वेग में विरोधी बहबे करतै ,
विश्वक मानचित्र पर मिथिला सजबे करतै ॥

वर्ण :- १८
अविनाश झा अंशु

Friday, 28 September 2012

रुबाइ



बाल रुबाई-९
बारी दिस चलै बहिना बकरी ताकी
खुट्टा लेल मजगुतगर लकड़ी ताकी   
बकरी बान्हि कऽ चलै खेल खेलै लए
तू ताकै गऽ लूडो हम छकरी ताकी 
©पंकज चौधरी (नवलश्री)
(तिथि-२७.०९.१२)

रुबाइ

बाल रुबाई-८
भूखे सटकल सबहक पेटक अंतरी
छुक-छुक चललै रेल आबि गेल सकरी
झट-पट उतरू संगमे लेने बटुआ
टीशन पर छना रहल छै बऽरी कचरी
©पंकज चौधरी (नवलश्री)
(तिथि-२७.०९.२०१२)

Thursday, 27 September 2012

गजल


अपन छाहरिक डरसँ सदिखन पडाईत रहलौं
पता नै किया खूब हम छटपटाईत रहलौं

कियो नै सुनै गप करेजक हमर आब एतय
करेजक कहै लेल गप हडबडाईत रहलौं

अपस्याँत छी जे चिन्हा जाइ नै भीडमे हम
मनुक्खक डरे दोगमे हम नुकाईत रहलौं

अपन पीठ अपने थपथपा मजा लैत छी हम
बजा अपन थपडी सगर ओंघराईत रहलौं

कतौ भेंटलै नै सुखक बाट "ओम"क नगरमे
सुखक खोजमे बाटमे ढनमनाईत रहलौं

बहरे-मुतकारिब

गजल

गजल-३१

विकारसँ छै भरल दुनिया
लगै झखड़ल झड़ल दुनिया

कतेक निचेन सन पलरल
धनक मदमे पड़ल दुनिया

घृणा सगतरि तते पसरल
धधकि उठलै जड़ल दुनिया

करेजक हाल के पुछतय
सिनेहक बिनु मरल दुनिया

कियो कतबो कहै बुझबै
अपन जिद पर अड़ल दुनिया    
      
कते  इनहोर  हम  करबै
लहास जकाँ ठरल दुनिया

"नवल" रहबै कतौ अनतह
गन्हा रहलै सड़ल दुनिया

बहरे वाफिर (१२११२+१२११२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)
(तिथि-१९.०९.२०१२)     

गजल

गजल-३०

जँ  निकलै  करेजासँ  आखर  चलू गजल कहि दी
कने  मोन  लागै   छमसगर  चलू गजल कहि दी

कतउ  सेंतने  आंखिमे  मधुर सपना  मिलन के
कियो पाड़ि  रखने छै  काजर चलू गजल कहि दी
 
अपन  ह्रदय  जे  गछय  से गप्प मानब उचित छै
मुदा लिय सलाहों जँ  अनकर चलू गजल कहि दी

अहाँ   भीड़मे  छी  मगन  तंइ  अखरत  भने  नै   
जँ बैसल रही  कतउ असगर चलू गजल कहि दी

घृणा  द्वेष  के   छोड़ि  हम   करब  श्रृंगार  नेहसँ 
कियो  हाथमे  लै  जँ  पाथर  चलू गजल कह दी 

सुखे  के सखा  नञि  गजल  छै  सरोवर  दुखो के
"नवल" भेल घातों जँ कसगर चलू गजल कहि दी

बहरे-मुतकारिब (१२२-१२२-१२२-१२२-१२२)   
(तिथि-३०.०८.२०१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-२८

पथिया लऽ बाधे-बाध गोबर बिछै छै ओ
अन्नक खगल छै तैं चिपड़ी पथै छै ओ

जिनगी के बोझ तर दाबल छै तैसँ की
भट्ठा पर राति-दिन पजेबा उघै छै ओ

एलैयै बाधसँ तऽ थाकल आ चूर भेल
जा तइयो घरे-घर बर्तन मँजै छै ओ

भरि दिन मजूरी कऽ आनै जे चारि सेर
सभके पेट भरि कऽ भुखले सुतै छै ओ

की नै कहै छै लोक बह्सल समाजमे
सभटा सहै छै चुप्पे किछु नै कहै छै ओ

बन्ह्की पड़ल भाव सऽख छै बोनि पर
निर्धनताके कैंचीसँ जिनगी कटै छै ओ

रीनसँ उरीन कहिया हेतै नञि जानि
कएक बरखसँ तऽ सुइदे बुकै छै ओ

अपन सभ सेहनता चूल्हामे धऽ देने
संतति के सुख लै सदिखन मरै छै ओ

सुखाकऽ देह टांट-टांट भेल छै "नवल"
संतति के पोसै लेल तइयो खटै छै ओ

*आखर १५ (तिथि-२८.०८.२०१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-२७

बरक  बाप  के  झोड़ा देखू ठूइस कऽ तिलकक पाय धेने छै
फटफटियो  ऊपरसँ  चाही  शर्त  ई  अलगे  जमाय  धेने छै

एक  हाथमे  शीतल  शरबत  दोसर  हाथमे चाहक प्याली
बरियाती  सभ राकस बनलै खैऽत-खैऽत सुलबाय धेने छै  

रुकय  नै  आमद  बादो  वियाहक  एकमुश्त  भेटल  से छोडू
किश्तमें जँ किछ त्रुटि भेलय तऽ मटिया-तेल सलाय धेने छै  

मध्यस्त मस्त छइ  पाबि  दलाली धिया बापके डीह बिकेलय
टाका  गीनियो धिये  बिकेलय घरक कोन्टा तंइ माय धेने छै

गौरव  नञि  गप्प कलंकक  ई मिथिला के माथ झुकल लाजे
एलै  एकैसम सदी  ई  तैयो  "नवल"  समाजमे  काय धेने छै

*आखर-२३ (तिथि-२७.०८.२०१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-२६

यादि  ककरो  मेघ  बनि जँ ढनकि जाय छै
सुन्न  मोन  परमे  ठनका  ठनकि जाय छै 

ओकरा  बिसरै  के  गप्प  मोन  पड़िते देरी
ई  बताह  मोन किए आर  सनकि जाय छै

एक्के बेरमे  जँ  चूर भऽ जाएत तऽ निचेन
रहि - रहि  कऽ करेज  किए चनकि जाय छै

नेह  मेघोसँ  खसल  तैयो  बुझलक नै क्यों
जँ सिक्का हाथोसँ छूटय तऽ खनकि जाय छै

उपरागसँ  "नवल" आब  अकछ  भेल छी
अबैत - जाइत  बाट सभ  फनकि जाय छै

*आखर-१६ (तिथि-२७.०८.२०१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-२५

उठय भाव जँ कोनो  करेजा के कोन सँ
ई मोन मिलिए जाय छै ककरो मोन सँ 

टाका तऽ छै जरुरी जिनगी के लेल मुदा
कीनल नञि जाय नेह चानीसँ सोन सँ 

तरलासँ घीमे आ मसल्ला देलासँ नञि
तीमनमे  सुआद तऽ होएत छै नॉन सँ

शहरी  सनक  चढ़ल  एना  गामे - गाम
सम्बन्ध टूटि रहल आब बाध - बोन सँ

प्रगति के गति  तऽ  पराधीन छै "नवल"
सभ  टहल - टिकोड़ा  कराबै छै जोन सँ    

*आखर-१५ (तिथि-२५.०८.२०१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-२४

अन्न लए कियो हकन्न कनै छै
कियो कोठिए-कोठी नुका धरै छै

कपड़ा  बिनु  कियो  घूमै नांगट
ककरो  कुकूरो  दुशाला  ओढै छै

लोकसँ बेसी  महल  छै  ककरो
कियो जिनगी बाटे-घाट कटै छै

छै दिनो कऽ कियो डिबिया लेशने
कियो स्वप्नो डाहि इजोत तकै छै

"नवल" कियो टाका बिनु मरलै
आ ककरो स्वीसमे टाका सड़ै छै

*आखर-१२ (तिथि-२५.०८.२०१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)
 

गजल

गजल-२३

सगरो सह - सह एतेक दुःख भेल छै
घरक कोनटा धेने अऽढ सुख भेल छै

संतोष गिल भऽ गेलय लोभकें लेरसँ
रौदी भावक  एलै  करेज रुख भेल छै

कर्म करय -नै- करय लक्ष्य चाही मुदा
कर्म-पथसँ कियै सभ विमुख भेल छै 

घऽरमे घोघ तर छै स्त्रीगन के नुकौने  
छाती चाकर केने  सभ पुरुख भेल छै    

पोसुआ  कुकूरसँ  छै  अपनैती "नवल"
धरि मनुक्खे के दुश्मन मनुख भेल छै

*आखर-१५ (तिथि-२४.०८.२०१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-२२

कतबो सुख - सुविधा बाहर भेटत
अपनैती  धरि  अपने  घर  भेटत

भगवान  रहै  छथि मोनक भीतर
मंदिर - मसजिद बस पाथर भेटत

निज मोन कराबै भावक अनुभव
कागत  पर  अगबे  आखर भेटत

अनका आदर देबय नञि जा धरि
अपनो  नै  कतउसँ  आदर भेटत

"नवल"सम्हारि धरु डेग अहाँ निज
सभ  बाट  कलंकक काजर भेटत

*आखर-१४ (तिथि-२४.०८.२०१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल-२१

ई  के  प्रियतम बनि सपना के
बनि  गेल  छै पाहुन अंगना के

प्रात  भेलय  तऽ प्रीतक धुनमे
सुमरय  छी  रातुक  घटना  के

कियो  तऽ हेतै  कतहु तऽ भेटतै
रहि - रहि फुसलाबी  अपना  के

श्रृंगार  केलक  जे  प्रेम  सुधासँ
हमर   रचल  सभ   रचना   के

"नवल"
एही  नगरी ओ भेटती
छी ओगरि कऽ बैसल पटना के

*आखर-१२ (तिथि-२४.०८.२०१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

हजल

हजल-३

हौ दैव किएक विआह केलौं जिनगी अपन तबाह केलौं
भने छलहुं मस्तीमे मातल बूझि-सूझि कष्ट अथाह केलौं

कतेक अनोना कबूला पातरि कीर्तन आर नबाह केलौं
कनिआँ-कनिआँ रटि-रटिक' मोनके किएक बताह केलौं

आन्हर भेल छलौं नै सूझल की नीक कथी अधलाह केलौं
मधुघट पीबा केर चक्कर मे जिनगी खौलैत चाह केलौं

नरहोरि भेल बौआरहलौं करेजक कांच चोटाह केलौं
एहन हराहिसँ संग भेल जे अपनो के मरखाह केलौं

रहि-रहि मूँह फुलाबैथ ओ घुरि-घुरि हम सलाह केलौं
स'ख-श्रृंगार पुड़ाबय पाछू खटि-खटि देह अबाह केलौं

लेर खसल किए लड्डू लेल किएक मोन सनकाह केलौं
घर-घरारी लागल भरना जानिक' जिनगी बेसाह केलौं

खीर नञि ओ घोरजौर छलै मधुरिम मोन खटाह केलौं
देखि कतहु मउहक के थारी "नवल" अनेरे डाह केलौं

*आखर-२२ (तिथि-२७.०९.२०१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-37



बाबा बैद्यनाथ
पिताक नाम---- स्व. सूर्यमणि झा
माताक नाम----स्व. गौरी देवी
जन्म----३ अगस्त १९५५ ( श्रावण धवल त्रयोदशी )
शिक्षा---- एम.ए ( हिन्दी एवं दर्शन शास्त्र)
पता-- कचहरी बलुआ, भाया बनैली, जिला पूर्णिया
प्रकाशित कृति---पहरा इमानपर ( गजल संग्रह)



मैथिली आ हिन्दी साहित्यिक विभिन्न विधामे समान रूपें लेखन। अखिल भारतीय त्रिभाषा ( हिन्दी, मैथिली, उर्दू) साहित्य एवं कला परिषदक संस्थापक आ महासचिव। मिथिला सौरभ ( मैथिली त्रैमासिकी) आ त्रिवेणी ( हिन्दी, मैथिली, उर्दूक काव्य संकलन)क संपादन। सुपौलसँ प्रकाशित भारती-मंडन नामक पत्रिकाक प्रधान संपादक। हिन्दी आ मैथिलीमे लिखल कैकटा नाटक, उपन्यास, कथा संग्रह, कविता संग्रह अप्रकाशित।

केन्द्रीय सचिवालय, हिन्दी परिषद् नई दिल्ली द्वारा आयोजित " हिन्दी प्ररूप एवं टिप्पणी-लेखन प्रतियोगिता "मे अखिल भारतीय स्तरपर प्रथम स्थान प्राप्त, फलतः स्वर्ण पदक, वैजयन्ती ( ट्राफी), प्रशस्ति पत्र एवं नगद राशिसँ सम्मानित।

जिला साहित्य परिषद्, खगड़िया द्वारा मैथिली साहित्यमे योगदान हेतु " विद्यापति स्मृति सम्मान "सँ सम्मानित।


वर्तमानमे यूको बैंक, मुख्य शाखा, बेगूसरायमे सीनीयर मैनेजर

गजल

गजल-२०

सावन  सुधा  बरसतै  कहियो
प्रेमक  पुष्प  गमकतै कहियो

टांग अड़ाबय जे बनि बाधक
अपने पेंचमे फँसतै कहियो      

अनका लेल जे खाइध खुनै छै
स्वयं अनचोके खसतै कहियो

जकरा बूझि चाली छोड़ि देलहुँ
भऽ गहुमन ओ डसतै कहियो

सभके  हाथमे द्वेशक पाथर
मोनक-कांच चनकतै कहियो

मनुख-मनुखसँ डाह जँ छोड़ै
डीह  उजड़लो बसतै कहियो

अति के अंत"नवल" निश्चित छै
माँ मिथिला फेर हँसतै कहियो

*आखर-१२ (तिथि-११.०८.२०१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

रुबाइ



बाल रुबाई-७
खीरा केर लत्ती लतरल चलि गेल
सभ लत्तीसँ बेशी चतरल चलि गेल
मूड़ी लटकल काते-कात मचानक
काकी अंगना तक नमरल चलि गेल 
©पंकज चौधरी (नवलश्री)
(तिथि-२१.०९.२०१२)

रुबाइ



बाल रुबाई-६
हुरिया कि जानि कोन राखल दलान पर
सदिखन रहैछ मोन टांगल दलान पर
कनिए जँ अऽढ़ भेल अंगनामे मायसँ
फुद्दी जकाँ उड़लै भागल दलान पर        
©पंकज चौधरी (नवलश्री)
(तिथि-२१.०९.२०१२)

रुबाइ

बाल रुबाई-५

पोथी पढैत जहन उबिया गेल मोन
लागै कतौ जेना भुतिया गेल मोन
छै देह घरमे मुदा मोन कतौ आर
चढ़लै सनक खेलक उड़िया गेल मोन
©पंकज चौधरी (नवलश्री)
(तिथि-२१.०९.१२)

रुबाइ



बाल रुबाई-४
थारीकेँ रोटी लऽ कौआ उड़ि गेलै
कनिए दूर उड़िकऽ ओ फेर घुरि गेलै
भनसा चार पर मरल मूस देखलकै        
रोटी छोड़िकऽ मुसरी लए मुड़ि गेलै   
©पंकज चौधरी (नवलश्री)
(तिथि-२१.०९.२०१२)

Tuesday, 25 September 2012

चंदन कुमार झा जीक गजल हुनक अपनहि स्वरमे

गजल

गजल @ कुन्दन कुमार कर्ण
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करब कोना हम अहाँक बयान ये
अहाँ छी खुवासँ बनल पकवान ये

निखरल चेहरापर ठोरक लाली
जेना लागय दिनमें उगल चान ये

तुलना गुलाबसँ करी हम कोनाक
लागय छी नील गगन के समान ये

कोमल कायापर गोर गुलाबी गाल
जाही में अटकिगेल हमर प्राण ये

सिनेहक नजरिसँ अहाँ जे देखलौं
'कुन्दन' भगेल बहुते हरान ये
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सरल वार्णिक बहर
© गजलकार

Saturday, 22 September 2012

गजल

बाल गजल-१७

बारिए दिस चलि आबै भैया
खिलौनों सभ-संग लाबै भैया


करिया बऽरद देतौ लथार
कने कात दने तों आबै भैया


कनिया-पुतरा दऽ दे हमरा
तू गुड्डी अपन उड़ाबै भैया


झटहा फेंकिकऽ तोड़ै जिलेबी
संगहिं लतामो झखाबै भैया


अरनेबा केर पात तोड़ै तूं
फोंफी केर शंख बनाबै भैया


ले पात तोड़ि अनलौं नेबो के
तूं पिपही बना बजाबै भैया


पकड़ै तितली पीयर-कारी
फेरसँ ओकरा उड़ाबै भैया


नारक टाल के दोग नुकाकऽ
मोन नै हमर ओनाबै भैया


"नवल" कहै छै नीक गजल
गाबिकऽ हमरो सुनाबै भैया


*आखर-११ (तिथि-२७.०८.२०१२)
पंकज चौधरी (नवलश्री)

रुबाई

रुबाई-२
सभ गिरहत बनि बैसलै हर धरतै के
चाही सभके फऽर मेहनत करतै के
पड़ि गेल सुन्न गामक अंगना-दलान
सभ शहर जा बसलै घर ओगरतै के

©पंकज चौधरी (नवलश्री)
*२२१/२१ (तिथि-१९.०९.१२)

रुबाई

रुबाई-१
रूसल धेने छी कोन के किएक यै
माहुर केने छी मोन के किएक यै 
गहना नै कोनो प्रेमसँ बढ़िकऽ हेतै
रटनी धेने छी सोन के किएक यै

©पंकज चौधरी (नवलश्री)
*२२२/२१ (तिथि-१५.०९.२०१२)

भक्ति रुबाई

भक्ति रुबाई-१
हे भगवती माँ अम्बिके ताकू कने
अपना शरण हमरो अहाँ राखू कने
आँजुर पसारि ठाढ़ छी आशा लेने
सूतल रहू नै आब माँ जागू कने

©पंकज चौधरी (नवलश्री)
*२२१/२१ (तिथि-१९.०९.२०१२)

रुबाइ

बाल रुबाई-३
चाही चान हमरा अहाँ आनि तऽ दिय
मेघक सभ तरेगन कने गानि तऽ दिय
कहबै नै जँ खिस्सा तऽ रुसि रहब हम
खेबै दूध रोटी अहाँ सानि तऽ दिय

©पंकज चौधरी (नवलश्री)
*२२२/२० (तिथि-२१.०९.२०१२)

रुबाइ


बाल रुबाई-२
कौआ बैसल चार पर कुचरै छै माँ
भोरे-भोर सभके ओ जगबै छै माँ
ऐ चारसँ ओए चार तक फुदकि-फुदकि
छै पाहुनक अबैया से कहै छै माँ
       
©पंकज चौधरी (नवलश्री)
*२२२/२१ (तिथि-१५.०९.२०१२)






गजल


अनकोसँ सम्बन्ध जोड़ाबै छै पाइ
छोटकाकेँ बड्डका बनाबै छै पाइ 

फूसियो बिकाइ छै मोलेमे आइ तँ  
सतकेँ सभतरि नुकाबै छै पाइ

ज्ञानक कनिको मोले नहि रहल  
प्रवचन सभटा सुनाबै छै पाइ 

नहि माए बाबू नहि भाइ बहिन
दुनियाँमे सभकेँ कनाबै छै पाइ 

चिन्हार नै अनचिन्हार एहिठाम 
'मनु' आइ सभकेँ हँसाबै छै पाइ 

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१३)  
जगदानन्द झा 'मनु' 


गजल-२

संग द' क' नें करू कात प्रिये तरसै छी
दूर भ' क' नें करू बात प्रिये तरसै छी

प्रेमक ई घड़ी एक दोसरा संग बाँटी
बूझू ई हमर ज़ज़्बात प्रिये तरसै छी

बाट जोहैत ह्रदय मिलनक बेकल  
चुप भ' क' नें करू प्रात प्रिये तरसै छी

एना नहुं-नहुं क' क' जुनि पाँछाँ ससरू
उफ़ क' क' नें करू घात प्रिये तरसै छी

रूप देखैते देरी सुधि बुधि बिसरल  
मदहोश हमर हालात प्रिये तरसै छी 


Friday, 21 September 2012

गजल

बाल गजल-55

खीर पूरी खाइ बौआ
सेब लेने जाइ बौआ

छोट सन छै पेट कसमस
नाप लै गोलाइ बौआ

गेन लेने चारि नेना
संग खेलै दाइ बौआ


देख कारी कुकुर घरमे
डरसँ बड चिचियाइ बौआ

बेँग कूदै माँझ आँगन
दाबि मुँह ठिठियाइ बौआ

हँसि नुकेलै दोगमे ओ
खाट तऽर देखाइ बौआ

काज सबटा करत झटपट
आब नै अलसाइ बौआ

फाइलातुन
2122 दू बेर सब पाँतिमे
बहरे-रमल

अमित मिश्र

गजल

बाल गजल-54

बंसी लऽ चल तँ बुचिया माछ मारब ना
केराक थम्हसँ खेलब खूब हेलब ना

हर संग बरद आनब खेतमे जोतब
पोथी पढ़ैक संगे धान रोपब ना

कोआक देह कारी कोइली कारी
अंतर दुनूक देखू मीठ बाजब ना

शेरपर बैसलनि दुर्गा हँसै तैयो
काटै किएक नै ई बात खोजब ना*

वर्षासँ माटि कादो भेल लस लस तेँ
लूडो कने कने कैरम लऽ खेलब ना

मुस्तफइलुन-मफाईलुन-मफाईलुन
SSUS-USSS-USSS

अमित मिश्र
* बाल मनक प्रश्न जे शेर तँ मांसाहारी होइत अछि तखन दुर्गाक अपन पीठ पर बैसलाक बादो ओ शेर हँसि किए रहल अछि ।ओकरा तँ एखन धरि काटबाक चाही ।

गजल

बाल गजल-53

पकड़ि आंङुर चलियौ दलानपर बाबा
टहलि एबै गामक सिमानपर बाबा

खेत देखब खरिहानकेँ भरल देखब
लोल कौआ मारैत धानपर बाबा


गाछपर नाचै पात हरियर नुआमे
हमहुँ नाचब कोयलक तानपर बाबा


बेँग कूदै आ घास गैया चरै छै
चोट लागल बकरीक कानपर बाबा


देह चलिते चलिते जखन थाकि जेतै
बाधमे बैसब नव मचानपर बाबा


फाइलातुन-मुस्तफइलुन-फाइलातुन
2122-2212-2122
बहरे-खफीफ

अमित मिश्र

गजल


सभकियो दुनियाँमे किएक आँखि चोराबै छैक  
माँगि नहि लिए कियो तेँ सभकिछु नुकाबै छैक  

गरीबी भेलैक बहुते केहन ई व्यबस्था छैक 
गरीबी नहि सरकार गरीबेकेँ मेटाबै छैक 

साउस भेली सरदार गलती नहि हुनकर 
जतए ततए किएक पुतोहुकेँ जड़ाबै छैक 

जतेक दर्द बेटामे  बेटीयोमे ओतबे सभकेँ 
बेटा बिकाइ किएक बेटीकेँ सभ हटाबै छैक 

दुनियाँक रीत  एहन 'मनु'केँ नै सोहाइ छैक 
रहए जे खोपड़ीमे सभक घर बनाबै  छैक  

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१८)  
 जगदानन्द झा 'मनु' 

गजल


रहब आब नै दास बनि हम 
अपन नीक इतिहास जनि हम 

जखन ठानलहुँ हम अपनपर 
समुद्रो लएलहुँ तँ सनि हम 

उठा मांथ जतएसँ तकलहुँ 
दएलहुँ  तँ नक्षत्र गनि हम 

हलाहल दुनीयाँक पीने
चलै छी अपन मोन तनि हम 

जमल खून मारलक धधरा 
लएलहुँ विजय विश्व ठनि  हम

(बहरे मुतकारिब) 

गजल

गजल
बाट जोगैत सँ आंखि पथरायल नै कहियो
प्रेम बिनाक जिनगी सरयायल नै कहियो

अहाँक सुनि के नाम किछु फुरैत नै हमरा
लिखै-पढौक लेल किछु फुरायल नै कहियो

अहाँक आवाज सुनि थरथराबैत छी हम
एहन मीठ बोल कियो सुनायल नै कहियो

देखि के अहाँक ओ मुखड़ा आ ओ सुनर नूर
चोन्हराबैत छै आंखि, बिसुरायल नै कहियो

कहैत अछि उत्पल भाव लs कs ओ प्रेम संग
प्रेम करू वा नै करू, इ नुकायल नै कहियो
(सरल वार्णिक बहर वर्ण -१७)

Tuesday, 18 September 2012

अपने एना अपने मूँह भाग--13

मास अगस्त 2012मे अनचिन्हार आखरपर कुल 101टा पोस्ट भेल जकर विवरण एना अछि---------


१) जगदानंद झा मनु जीक कुल 14टा पोस्टमे 9टा गजल, 4टा रुबाइ आ 1टा हजल अछि।
२) श्रीमती रूबी झा जीक कुल 15टा पोस्टमे 13टा गजल, 1टा बाल गजल आ 1टा हजल अछि।
३) गुंजन श्री आ ओमप्रकाश जीक 1-1टा पोस्टमे 1-1टा गजल अछि।
४) कुंदन कुमार कर्ण जीक 3टा पोस्टमे 2टा शेर आ 1टा गजल अछि।
५) गजेन्द्र ठाकुर जीक 1टा पोस्टमे आन-लाइन मोशायरा भाग-2 प्रस्तुत कएल गेल।
६) पंकज चौधरी ( नवल श्री ) जीक 4टा पोस्टमे 4टा बाल गजल अछि।
७) राजीव रंजन मिश्र जीक कुल 18टा पोस्टमे 15टा गजल आ 3टा बाल गजल अछि।
८) अमित मिश्र जीक 27टा पोस्टमे 4टा गजल, 9टा बाल गजल, 13टा रुबाइ आ 1टा आलोचना अछि ( मुन्ना जीक गजल संग्रह--- माँझ आंगनमे कतिआएल छी)
९) आशीष अनचिन्हारक कुल 17टा पोस्टमे 2टा गजल, 3टा सम्मानक घोषणा, 6टा गजलक इस्कूल, 1टा रुबाइ, 2टा अपने एना अपने मूँह आ संगे-संग मुन्ना जीक 3टा बाल गजल सेहो प्रस्तुत कएल गेल अछि।




(श्रीमती रुबी झा जीक सभ पोस्ट हटा देल गेल अछि। हुनक रचना अ-मौलिक सिद्ध भेल अछि। हमर ई कहब नै जे हुनक सभ रचना एहने सन हेतन्हि मुदा ई हुनक अधिकांश रचना लेल अछि।

सादर
सम्पादक
 22/1/2013)

Sunday, 16 September 2012

गजल

बाल गजल-१६

एना नै तू मुँह दूश गै बहिना
हमरासँ जुनि रूस गै बहिना

देख अनलियौ कीन तोरा लए
भरि जेबी लवंचूस गै बहिना


हबड़ - हबड़ खा सठा ले जल्दी
नैतऽ लऽ भगतौ मूस गै बहिना

कम-कमकऽ कने खो ओरियाकऽ
एक्कहिं बेर नै ठूस गै बहिना


भाय "नवल" बड्ड मानउ तोरा
कह नञि तों कंजूस गै बहिना

*आखर-१२ (तिथि-१२.०९.२०१२)
पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

बाल गजल-१५

जनमदिन
छै आइ हमर माँ
हबड़ - हबड़ तैयारी कर माँ


पूरी छाइन दे तस्मय रान्हय
तीमन कऽ दे कम करुगर माँ


लवंचूस भरि - भरिकऽ फूलेबै
फुकना अनिहैन्ह नमहर माँ


यौंहटा केक तू कीनकऽ आनय
चक्कुओ रखिहैन्ह धरगर माँ


केक काइटकऽ सभके देबय
"नवल" नञि खेतै असगर माँ


*आखर-१२ (तिथि-११.०९.२०१२)
पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

बाल गजल-१४

इसकुल पर जे गेलियै लेट
बन्न छलय इसकुल के गेट

बिक्खसँ हम बस्ता पटकलियै
फटलय बस्ता फूटल सिलेट

बाबू देलन्हि कान - कनएठी
पड़ल गाल पर चारि चमेट

ने जलखय ने भेटल खेनाय
भरि दिन रहलौं भुखले पेट

"नवल" राइतमें माय नुकाकऽ
देलक खीरसँ भरल पिलेट

*आखर-१२ (२५.०८.२०१२)
पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

बाल गजल-१३

भूखल जे एक राइत सुतै छै
एक बगराके माउस घटै छै

नीक-निकुत नै परसन भेटय
तैं आंगुरलऽ सभ पात चटै छै

दै फऽर-फूल-छाहरि-आँक्सीजन
किएक लोक फेर गाछ कटै छै

गांड़ि घसोरि नञि बैसब निच्चा
कपड़ा पोनहिं परसँ फटै छै

"नवल" बाँहि बाबूके पुड़तय
छै छोट मुदा ओ खूब खटै छै

*आखर-१२ (तिथि-१६.०८.२०१२)
पंकज चौधरी (नवलश्री)

हजल

हजल-२

कनिया सुन्नर देशी चाही
ठाठ   मुदा  परदेसी चाही

बंगला - गाड़ी नोकर संगे
दरमाहो किछु  बेशी चाही 

कूलरसँ   नै   देह  शीतेतै
शौचालय तक एसी चाही

सिगारे टा नै हो अंग्रेजिया 
मदिरा  सेहो  विदेशी चाही

गाए-महीश पोसै में लाज
कुक्कुर-घोड़ा मवेशी चाही   

देशक  मर्यादा  नै  बिगड़ै    
छूट  मुदा  परदेसी  चाही

पश्चिम  पैर   पसारै  रोकू
"नवल"सोच स्वदेशी चाही 

*आखर-१० (तिथि-२५.०८.२०१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

हजल

हजल-१

ओ कहती चुपतऽ चुप रहू आ बाजूतऽ भूकैत रहू
काग स्वर सुनु हुनक आ कोयली बनि कूकैत रहू

कपडाक मोटरी माथ पर लेने जाऊ धोबाक लेल
भिनसरसँ लएकऽ राति धरि चूल्हाके धूकैत रहू

किछ पाय जे अनलहुं कमा अहाँ घामसँ नहा-नहा
हुनक श्रृंगारके ओरियान में पाय के बूकैत रहू

जूती पहिड़ने हीलके कने चलती थमि-थमिकऽ ओ
संग हुनक डेगके अहूँ चलैत रहू रूकैत रहू

"नवल" हुनक अनुरोध के आदेश बुझि लिय अहाँ
ओ चलती सीना तानिकऽ अहाँ दास बनि झूकैत रहू

*आखर-२० (तिथि-२४.०८.२०१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

रुबाइ

बाल रुबाई-१
पढ़बै - लिखबै हमहूँ नमहर बनबै
करबै नाम समाजक अफसर बनबै
सभके देबय हाथ अपन सहयोगक
काबिल नै अपने टा असगर बनबै
©पंकज चौधरी (नवलश्री)
*२२२/२० (तिथि-१५.०९.२०१२)

गजल


हकन नोर माए कनै छै 
तकर पुत्र मुखिया बनै छै 

कते आब बैमान बढ़लै
गरीबक टका के गनै छै 

पतित बनल नेता तँ देशक 
दुनू हाथ ओ मल सनै छै 

पएलक कियो जतय मोका 
अपन बनि कs ओहे टनै छै 

बनल  भोकना जेठरैअति
मुदा 'मनु' तँ सभटा जनै छै 

(बहरे मुतकारिब, मात्राक्रम-१२२)

Saturday, 15 September 2012

गजल कमला-कोशी-बागमती-महानंदा" सम्मानक ( बाल गजलक लेल ) पहिल चरण बर्ख-2012 ( मास अगस्त लेल )

हमरा इ सूचित करैत बड्ड नीक लागि रहल अछि जे " अनचिन्हार आखर"द्वारा स्थापित " गजल कमला-कोशी-बागमती-महानंदा" सम्मानक ( बाल गजलक लेल ) पहिल चरण बर्ख-2012 ( मास अगस्त लेल ) पूरा भए गेल अछि। मास अगस्त लेल मुन्ना जीक एहि रचना के चयन कएल गेलैन्हि अछि। हुनका बधाइ।






बाल गजल


शुन्य भेल स्वप्न नुका क' राखू

अपन संस्कार जोगा क' राखू



अछि सूट-बूट शिक्षोमे लागू

मोनकेँ मैथिल बना क' राखू



कंप्यूटर गेम अछि सुन्नर

मगज टटका बना क' राखू



नेना लक्ष्यहीन नहि हुअए

तकर जोगार धरा क' राखू



केकरो बानि रहए केहनो

हृदेसँ अपन बना क' राखू


वर्ण----11

तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों