Thursday, 28 February 2013

गजल


तीतल हमर मोन हुनकर सिनेहसँ
भेलौं हम सदेह देखू विदेहसँ

के छै अपन, आन के, बूझलौं नै
लडिते रहल मोन मोनक उछेहसँ

नाचै छी सदिखन आनक इशारे
करतै आर की बडद बन्हिकऽ मेहसँ

छोडत संग एक दिन हमर काया
तखनो प्रेम बड्ड अछि अपन देहसँ

काजक बेर मोन सबकेँ पडै छी
"ओम"क भरल घर सभक एहि नेहसँ

मफऊलातु-फाइलातुन-फऊलुन (प्रत्येक पाँतिमे एक बेर)

Wednesday, 27 February 2013

अमित मिश्र जीक गजल, बाल-गजल हुनक अपने अवाजमे-14

गजल


अहाँ हमरासँ एना नै रूसल करू
कनी प्रेमक सनेसाकेँ बूझल करू

हमर जिनगीक बाटक छी संगी अहीं
करेजक बाट कखनो नै छोडल करू

बहन्ना फुरसतिक करिते रहलौं अहाँ
अहाँ कखनो तँ हमरो लग बैसल करू

बहुत मारूक अछि नैनक भाषा प्रिये
अपन नैनक कटारी नै भोंकल करू

करेजा हमर फुलवारी प्रेमक बनल
सिनेहक फूल ई सदिखन लोढल करू

अहीं जिनगी, अहीं साँसक डोरी हमर
करेजक आस नै "ओम"क तोडल करू

(मफाईलुन-मफाईलुन-मुस्तफइलुन)- प्रत्येक पाँतिमे एक बेर

गजलक लेल

श्री विजय नाथ झाजीक गीत-गजल संग्रहक पोथीक नाम अछि "अहींक लेल"। ऐ पोथीमे गीत आ गजलक फराक-फराक दूटा प्रभाग छै। हम ऐ पोथीक गजल प्रभागक संबंधमे ऐठाँ किछु चर्चा करऽ चाहब। ऐ पोथीमे गजलकार श्री विजय नाथ झाजीक अठहतरिटा गजल प्रकाशित भेल अछि। पोथीक गजल पढलासँ ई पता चलैत अछि जे किछु गजल केँ छोडिकऽ बेसी ठाँ काफिया आ रदीफक निअमक पालन कएल गेल अछि। पृष्ठ संख्या ४७, ५०, ५४, ५५, ५६, ६७, ७१, ७४, ७५, ८२, ९४, १०१, ११०, ११४ पर छपल गजलमे काफिया गडबडाएल अछि। ऐठाँ ई धेआनमे राखबाक चाही जे बिना दुरुस्त काफियाक रचना गजल नै भऽ सकैए। तखनो अधिकांश गजलक काफिया दुरुस्त अछि, जे गजलक विकास यात्राक हिसाबेँ एकटा नीक लक्षण अछि। काफिया, रदीफ आ गजलक व्याकरणक निअम पालन करबाक हिसाबेँ गजलकार ओहि गजलकार सभसँ फराक श्रेणीमे छथि जे गजलक व्याकरणकेँ नै मानबाक सप्पत खएने छथि।
ऐ गजल संग्रहक गजल सब कोन बहरमे लीखल गेल अछि, ऐ पर गजलकार मौन छथि। गजलक नीचाँमे बहरक नाम जरूर लीखल जएबाक चाही। बहरक ज्ञान नब पीढीक गजलकार सभमे बढेबामे ई महत्वपूर्ण डेग हएत। ओना तँ गजलकार कोनो गजलक नीचाँमे बहरक नाम नै लीखने छथि, मुदा गजल सभकेँ पढलासँ ई पता चलैत छै जे ऐ संग्रहक ढेरी गजल एहन अछि जाहिमे अरबी बहरक निअमक पालन करबाक नीक प्रयास कएल गेल अछि। ई स्वागत योग्य गप अछि। ऐसँ इहो पता चलैत अछि जे गजलकार अरबी बहरसँ नीक जकाँ परिचित छथि आ जँ ई बात अछि तँ हुनका बहरक नाम गजलक नीचाँमे फरिछाकेँ लीखबाक चाही। ऐ संदर्भमे हम पोथीक सबसँ पहिलुक गजलक (पृष्ठ संख्या ४५) मतलाकेँ उद्धृत करऽ चाहै छी-
हमर पूजा, हमर परिचय, हमर शृंगार छी अपने
सकल सौभाग्य, मन, काया, रुधिर-संचार छी अपने
आब एकर मात्रा संरचना पर धेआन दिऔ, तँ पता चलै छै जे ऐमे मूल ध्वनि मफाईलुन माने "ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ" सब पाँतिमे चारि बेर प्रयोग कएल गेल अछि। माने ई शेर बहरे-हजजमे कहल गेल छै। ऐ गजलक आनो शेरमे मोटामोटी किछु गलतीकेँ छोडि बहरे-हजजक प्रयोग अछि आ किछुठाँ वर्ण दुरुस्त कऽ देला पर ई गजल अरबी बहर बहरे-हजजमे अछि। ई एकटा उदाहरण अछि, एहन आरो गजल ऐ संग्रहमे छै जे वर्ण आ मात्रामे किछु परिवर्तन भेला पर अरबी बहरमे कहल मानल जाएत। हमरा ई आस अछि जे गजलकार अपन अगिला गजल संग्रहमे ऐ बातक धेआन राखताह आ अरबी बहर युक्त गजल कहिकऽ मैथिली गजलकेँ समृद्ध करताह। शेरक पाँतिक अंतमे पूर्ण विराम वा कोनो विराम चिन्ह नै लगेबाक निअम अछि, मुदा पोथीक गजलक शेर सभक पाँतिक अंतमे पूर्ण विराम लगाओल गेल अछि, जे निअमानुकूल नै अछि आ एकर धेआन राखल जएबाक चाही छल।
संवेदनाक स्तरपर ई गजल संग्रह बड्ड नीक अछि आ गजलकारक विद्वताकेँ प्रकट करैत अछि। मुदा कएकठाँ भारी भरकम तत्सम आ संस्कृतक शब्दक प्रयोग गजलकेँ बूझबामे भारी बनबैत छै, जाहिसँ बचल जा सकैत छल। गजलमे क्लासिकल भाषाक प्रयोग नहिए हेबाक चाही, अपितु आम प्रयोगक भाषाक प्रयोग गजलक लेल बेसी नीक होइत छै। शेरमे एहन शब्दक प्रयोग जे आम बेबहारमे नै छै, गजलकारक शब्द सामर्थ्यकेँ तँ जरूर देखाबैत छै, मुदा शेरकेँ आम जनसँ दूर सेहो करैत छै। तैं शेर कहबाक काल हमरा हिसाबेँ बेसी क्लिष्ट भाषाक प्रयोगसँ बचबाक चाही।
अंतमे ई कहल जा सकैए जे "अहींक लेल" पोथीक गजल प्रभाग मैथिली गजलक विकसित होइत रूपकेँ अस्पष्टे रूपेँ, मुदा देखबैत जरूर अछि। ई पोथी गजलक व्याकरणक हिसाबेँ किछु गलतीकेँ छोडिकऽ नीक प्रयास अछि। ऐ संग्रहक कएकटा शेरमे अरबी बहरक पालनक प्रयास महत्वपूर्ण आ नोटिस करबाक जोग अछि। कएकठाँ क्लिष्ट आ संस्कृतनिष्ठ शब्दक प्रयोगकेँ जँ कात कए कऽ देखल जाइ तँ संवेदनात्मक स्तरपर सेहो ई संग्रह नीक अछि। मैथिली गजलक विकास यात्रामे ई पोथी गजलक भविष्यक लेल नीक डेग अछि।

Tuesday, 26 February 2013

गजल

गजल-10

ग्रहण लागल अछि सूर्यसँ चान धरि
जिनगी सिमटल घरसँ बथान धरि

सीना तानि खड़ा सीमापर किछु जवान
लड़ै मातृभूमि लेल आनसँ शान धरि

पाथरपर घिस रंगीन भेल मेंहदी
ठोकर देने अछि अपनसँ आन धरि

एक झूठसँ टूटि बिखरि गेल करेज
लय हीन गीत हम सुरसँ तान धरि

करिया धुन्धमे गुम भऽ गेल सब किछु
माँगत अधिकार बच्चासँ सियान धरि

गरीबी केर चक्कीमे पिसा रहल लोक
चालि एक्के "सुमित" तीरसँ कमान धरि

वर्ण-15
सुमित मिश्र
करियन ,समस्तीपुर

गजल

गजल-9

जाऊ नहि सजनी नेह तोड़ि कऽ
देह रहत कोना प्राण छोड़ि कऽ

काटि अहुरिया यादि बचल छै
नोर बहल अछि पीड़ जोड़ि कऽ

पटा प्रेमसँ अपन फुलवाड़ी
छीनल सपना हाथ मरोड़ि कऽ

आब अहाँ छी अनकर जीवन
सुतब हम आब कब्र कोरि कऽ

उमड़ै सागर दुख करेजमेँ
सुखलै बादल रस निचोड़ि कऽ

पागल मजनू कहै छै दुनियाँ
"सुमित" सतायल प्रीत जोड़ि कऽ

वर्ण-12

सुमित मिश्र
करियन(समस्तीपुर)

बाल गजल

बाल गजल-1

चान आ तरेगण दोस हमर छै
जागि रहल किए राति सगर छै

बाबी सुनौलक परी रानीकेँ खिस्सा
उड़ैत हमर छतकेँ ऊपर छै

बाबू जी आनलनि एकटा मोबाईल
गप्प करबै कोना सब शहर छै

जाकऽ असगर हम घुमितौं मेला
कहलक माए ई छोट उमर छै

पढ़ौलक स्कूलमे धरती गोल छै
देखहीं बात ई झूठ ओकर छै

वर्ण-13
सुमित मिश्र
करियन ,समस्तीपुर

गजल

गजल-8

सबटा मोनक बात हुनक आँखि बता गेल
बहल एहन बसात हमर होश उड़ा गेल

नदीकेँ धारकेँ विपरीत चलबाक कोशिश
भासैत जा रहल स्वप्न सब किछु हेरा गेल

पाथरपर फूल उगायब जुनि छै कठिन
डेगहिँ-डेग मिलल निराशा आश जगा गेल

स्वार्थक बदरी मानवतापर मँडरायल
भाइ-भाइमे दुश्मनी गामक-गाम जरा गेल

संस्कृतिकेँ झकझोरैत नव जमानाकेँ दौड़
लोक-लाज गुम अपन उपस्थिति देखा गेल

गरीबी केर लत्ती चहुँ ओर लतरल अछि
गमकैत फुलबाड़ी "सुमित" पल भरिमे सुखा गेल

वर्ण-17
सुमित मिश्र
करियन ,समस्तीपुर

गजल

गजल-7

पहाड़ संग टकरेबाक लेल अटल विश्वास चाही
नै मिझा सकै एहन ज्वालामुखीके प्रकाश चाही

पिँजराक बंधन में बन्न पंछी कोना कऽ उड़ि सकत
कोनो सपना पूरा करबाक लेल मुक्त आकाश चाही

करेज पर चोट करैत भविष्य केर किछु सवाल
शीप वा मोती पाबऽ लेल सागर पिबाक पियास चाही

अन्हारेमे आयल दिनकर सँ संसार रोशन छै
अज्ञानता सँ जीतबाक लेल निरंतर प्रयास चाही

ई चलायमान दुनिया अनवरत चलैत रहत
मुदा अचल नाम लेल पहचान किछु खास चाही

माटि पर गिरल फूल सँ भी घर-आँगन गमकत
मुदा ओझरायल बाटमेँ सही राहके तलाश चाही

कृपा करब माँ शारदे आब नाव फँसल मँझधार
हरेक खेल जीत सकी "सुमित" के एतबे आश चाही

वर्ण-20
सुमित मिश्र

गजल

गजल-6

नाम जे हरेक साँसमे बसल छुपायब कोना
पूर्णिमाक चानकेँ कहू हम नुकायब कोना

सिहकल प्रेमक बसन्त करेजकेँ छूबि गेल
टूटैत सिनेहक डोरिकेँ हम गुथायब कोना

जामक नशा तँ पहर- दू-पहर साथ रहल
मुदा दौलत आ जुआनीकेँ नशा भगायब कोना

पंखुरीमे बन्न भौंरा तँ भोरे भोर मुक्त रहत
समाजक बन्हनमे अपन फर्ज निभायब कोना

समुद्रक लहरिमे पर्वत छूबैकेँ आश अछि
हुनक रूप तँ आँखिमे बसल देखायब कोना

अन्हार बाट इजोर करबाक सपना देखलौं
ढहैत जा रहल विश्वास हम उठायब कोना

दुख केर बदरी निरन्तर बरसि रहल छै
मिझाइत ममता-दीप "सुमित" जरायब कोना

वर्ण-18
सुमित मिश्र

रुबाइ

रुबाइ-162

ने नोर खसि रहल ने हँसी फूटि रहल
आँखिक सामने जखनसँ घर टूटि रहल
देखैत देखैत बताह भेल छै मोन
आतंकक छाह तऽर यदि बम फूटि रहल

रुबाइ

रुबाइ-161

खा चोकलेट इयादि तँ एहन एलै
सागरक लहरिमे भासल जीवन एलै
भगवान किछु एहन करू माया अपन
लागै असलमे घूरि नेनपन एलै

रुबाइ

रुबाइ-160

एगो गुलाब कतौसँ खसल माँथपर
बोतल शराबक नशा चढ़ल माँथपर
कहलक किओ प्रेमक छौ रोग लागल
दर्दक मुदा काँटो तँ गड़ल माँथपर

गजल

गजल-1.52

डरि डरि कऽ मरनाइ केहन
मरि मरि कऽ जीनाइ केहन

निज शोणितसँ पिच्छर जखन
सुखलपर खसनाइ केहन

बौका बनल माँग करबै
लूटिपर बजनाइ केहन

भीड़सँ पतनुकान धेने
असगर तँ नचनाइ केहन

प्रतियोगिता देत नै जे
हारिपर हँसनाइ केहन

मुँहपर तँ बाजल किओ नै
पीठपर कहनाइ केहन

रहि सकल नै मोनमे हम
भूपर तँ रहनाइ केहन

प्रेमो "अमित " नै कऽ सकलै
द्वेषे तँ करनाइ केहन

2212-2122
मुस्तफइलुन-फाइलातुन
बहरे-मुजास

अमित मिश्र

गजल

गजल-1.51

हँसि हँसि कऽ दिन कऽ जीबै छी
डरि डरि कऽ राति काटै छी

जहियासँ भेल हमला बम
घर शहर छोड़ि भागै छी

आगूसँ मोन राखब ई
फैसन कऽ भूत लागै छी

लड़लासँ समय बर्बादी
अपनेसँ घेंट काटै छी

सत्यक बनल तँ नै छै सब
कखनो कऽ झूठ बाजै छी

2212-1222
मुस्तफइलुन-मफाईलुन
अमित मिश्र

गजल

गजल-1.50

उनटा धार बहल जगमे
वर्फसँ धाह उठल जगमे

विधना बाम एहि युगमे
तेँ परमाणु बनल जगमे

अगिनपथक पथिक रहल छी
बड अवरोध रचल जगमे

टाका जान लैत रहलै
घेंटक घेघ बनल जगमे

हल्लुक वेवहार सबकें
नै छै मोन कहल जगमे

प्रीतम बनल कलम एखन
प्रीतक गजल लिखल जगमे

2221-2122
मफऊलातु-फाइलातुन
अमित मिश्र

गजल

गजल-1.49

खेल जानै छी सब प्रीतक मन्डीक
मोन खाली जरत छी नोरक मन्डीक

भटकि रहलै राति दिन टाका माँगैत
बनत शोभा थाकि ओ देहक मन्डीक

भीख नै अधिकार खातिर झगड़ा भेल
गरम छै एखन पवन देशक मन्डीक

खेतमे नै हाल छै घरपर नै माल
भेल देहाती कठिन शहरक मन्डीक

रामकेँ घरमे जनमि गेलै रावण तँ
तेँ घर प्रतिबिम्ब छै माछक मन्डीक

जहर छै पैसल समाजक सब टा अंग
"अमित" मीता बनल यम लाशक मन्डीक

फाइलातुन-फाइलातुन-मफऊलातु
2122-2122-2221
अमित मिश्र

गजल

गजल-1.48

फेर एलै मधुमास साल भरि बाद
प्रीतकेँ जागल आश साल भरि बाद

पीब मधुकर रस गीत विपिनमे गाबि
सहि रहल पुष्पक पाश साल भरि बाद

माँगिते भेटत नै समुचित अधिकार
छीन लिअ सब निज चास साल भरि बाद

वायु बहलै मातल सगर नगर गाम
भरल ऊर्जा नव साँस साल भरि बाद

आबि होली नव रंग संग पाहुनक
फेर हेतै परिहास साल भरि बाद

घैलमे सागर भरि तँ नै सकब "अमित"
मोनमे भरि लिअ भास साल भरि बाद

2122-2212-1221
अमित मिश्र

गजल

गजल-1.47

आब बचलै घोघटक नै मोल मीता
शर्ट अधकट्टी सनक छै खोल मीता

वोट नै देलौं नाम तेँ गेल छाँटल
मदति सरकारी भेल सब गोल मीता

राम नै भेटल जखन छल नोर जीवन
कुम्भमे तखनो ओकरे बोल मीता

खण्डहर लागै नजरिमे नीक बहुते
जखन निज घरमे खूब छल झोल मीता

दूध ढारब लिंगपर भूखसँ तड़प तूँ
पाथरक लऽग मनुखक कते मोल मीता

धार काते रहि "अमित" नै पानि भेटल
धारमे ज्वाला छल जरल लोल मीता

फाइलातुन-मुस्तफइलुन-फाइलातुन
2122-2212-2122

अमित मिश्र

गजल

गजल-1.46

जीवनक नै ठेकान छै 
खन अपन छै खन आन छै

मद भरल निलहा आँखि दू
ई ठोर छै की पान छै

झुकतै तँ नै टुटतै तँ नै
योद्धाक गुंजल तान छै

कमजोर डाँरक युवक सब
रहि ठाढ़ नव परणाम छै

माएक हाथक पाक कतऽ
होटलक बस पकवान छै

छिछिया रहल सब रातिकेँ
सूर्यपर बेधल वाण छै

नेहक नगर रहलै "अमित"
घर नोर धरि अभियान छै

मुस्तफइलुन
2212 दू बेर सब पाँतिमे
बहरे-रजज

अमित मिश्र

गजल

गजल-1.45

ने हम इम्हर छी आ ने उम्हर छी
बीच्चे सरितामे भासल असगर छी

भावक साँचामे आखर ढालै छी
हम कवि नै छी सुच्चा कारीगर छी

जीवन मानै बीड़ी सिगरेटेकेँ
मोनक हारल आ हृदयक पाथर छी

ने आस्तिक बनलौं ने नास्तिक बनलौं
मंदिरमे सीढ़ी चढ़ि भागल नर छी

हवणक कुण्डसँ बहराइत उष्मा हम
घी-तीलक संगे स्वाहा आखर छी

देशद्रोहक साटल चिप्पी तनपर
स्वर्गक केबारसँ सटि बैसल बाहर छी*

ढहलै "अमित"क घर बनलै अनको नै
दाहर पैसल जतऽ ओ चऽर चाँचर छी

दस टा दीर्घ सब पाँतिमे
*जकरा फाँसीक सजा भेटल होइ ओकर मोनक गप अछि

अमित मिश्र

गजल

गजल-1.44

जड़ि जड़ि कऽ तन घर भरि इजोत केने छै
मरि मरि कऽ अन्तो धरि इजोत केने छै

साधनक खगता हो तँ पैंच लै छै सब
चन्नो दिनकरसँ लड़ि इजोत केने छै

बोली नजरिकेँ बूझि सकल नै नैना
आखर करेजक हरि इजोत केने छै

परसैत रहियौ निज कला जँ भेटल अछि
गाछो धरापर फड़ि इजोत केने छै

ने खूनमे धधरा बचत नगर भरिमे
जँ प्रेम बाती जड़ि इजोत केने छै

पीड़ा प्रबल छै प्रसब लऽग जँ आयल छै
नेनाक कानब बरि इजोत केने छै

मुस्तफइलुन-मुस्तफइलुन-मफाईलुन
2212-2212-1222

अमित मिश्र

गजल

गजल-1.43

टाँगमे शक्ति नै मोन टाँगल पहाड़पर छै
साहसक धनिक तें ध्यान लागल हजारपर छै

पेटमे अन्न नै खूनमे पानि नै जोश बड
मोनकेँ बान्हि लेने नजरि बस शिकारपर छै

गगनमे उड़ि रहल छै धरा दूर आ काँटपर
ई चिड़ैयाँक नैना तँ पसरल पथारपर छै

ज्ञान एते बढ़ल हमर ताकत सगर देख लिअ
देश भरिकेँ नजरि अटकले बस बिहारपर छै

मैथिलक भाँग दिल्ली नगर धरि बिका रहल छै
बूझि लिअ "अमित" मिथिलाक मन नव सचारपर छै

फाइलुन
212 पाँच बेर
बहरे-मुतदारिक
अमित मिश्र

गजल

गजल-1.42

मैथिली मिथिला कानि रहल छै
दुख भितरिया सब जानि रहल छै

माँटि भरि पोखरिमे महल बनल
कागतेपर सब आनि रहल छै

सूखि गेलै दुषित नदी भरल
माँछ गर्दामे छानि रहल छै

राज नै भाषा मरि कऽ बचल छै
भोज खा मंचसँ फानि रहल छै

पैघ छै देहक साधने घटल
छोट चादर बड तानि रहल छै

2122-2212-12
अमित मिश्र

गजल

गजल-1.41

ने खसल ठनका ने हवा उठल बेसी
तैयो मरल निर्धन धनी बचल बेसी

बड़का गढ़ल छै घैल मस्तिस्क मनुखक
नेहक कमल कम छै अहं भरल बेसी

सोचल सपन हेतै जँ सत्ते तँ बढ़ियाँ
आनक विकासक लेल यदि गढ़ल बेसी

बैरिन बनल तकनीक मजदूर मानै
पढ़ले तँ काजक निरक्षर पड़ल बेसी

जे छलै नै आलेख नम्हरसँ संभव
मुँहपर हँसी बनि भाव छल लिखल बेसी

मुस्तफइलुन-मुस्तफइलुन-मफऊलात
2212-2212-2122
बहरे-सरीअ
अमित मिश्र

गजल

गजल-1.40

मरघट जरल लाश बनलौं
छाउर भेल आश बनलौं

खेलाड़ी तँ पैघ तैयो
फाटल सड़ल ताश बनलौं

बचलै नै जमीनदारी
बालुक खेत चास बनलौं

भुतियेबे करब बढ़ल जन
आमसँ नै जँ खास बनलौं

चम्पा झड़ल रात रानी
झड़कल सन पलास बनलौं

पूतक लेल धन अरजलौं
बड निर्धन खबास बनलौं

टाँगल मोन "अमित "घरपर
बंगक मोहपाश बनलौं

मफऊलात-फाइलातुन
2221-2122

अमित मिश्र

Monday, 25 February 2013

अमित मिश्र जीक गजल, बाल-गजल हुनक अपने अवाजमे-13

अमित मिश्र जीक गजल, बाल-गजल हुनक अपने अवाजमे-12

अमित मिश्र जीक गजल, बाल-गजल हुनक अपने अवाजमे-11

अमित मिश्र जीक गजल, बाल-गजल हुनक अपने अवाजमे-10

अमित मिश्र जीक गजल, बाल-गजल हुनक अपने अवाजमे-9

Thursday, 21 February 2013

गजल



फेर एलै दिवाली लेबै फटक्का
फोरबै मिल कए सभ मारत ठहक्का

बड़ रमनगर बुस’ट नव अनलन्हि मामा
देखते सभ भऽ गेलै कोना कऽ बक्का

घीक लड्डू दुनू हाथे दैत भरि भरि
अपन बेटाक कोजगरामे तँ कक्का

दौड़ चलबैत सासुरकेँ फटफटिया
हरसँ भरि थालमे सौंसे फसल चक्का

आइ कुसियारक ट्रककेँ परल पाँछा
संगमे ‘मनु’क गामक छौंड़ा उचक्का

(बहरे असम, मात्रा क्रम- २१२२-१२२२-२१२२)
जगदानन्द झा ‘मनु’                 

Monday, 18 February 2013

अमित मिश्र जीक गजल, बाल-गजल हुनक अपने अवाजमे-6

अमित मिश्र जीक गजल, बाल-गजल हुनक अपने अवाजमे-5

अमित मिश्र जीक गजल, बाल-गजल हुनक अपने अवाजमे-4

अमित मिश्र जीक गजल, बाल-गजल हुनक अपने अवाजमे-3

अमित मिश्र जीक गजल, बाल-गजल हुनक अपने अवाजमे-2

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अमित मिश्र जीक गजल, बाल-गजल हुनक अपने अवाजमे-1

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Tuesday, 12 February 2013

गजल


लिखबाक छल गरीबक लचारी गजल
देखू मुदा लिखल हम सुतारी गजल

हम आब बेचि लेलहुँ हँसी ओ खुशी
बाँचत कते समय धरि उधारी गजल

अन्हार आब भगबे करत घरसँ यौ
भगजोगनीक संगे दिबारी गजल

सभ चप उलारकेँ खेलमे मग्न अछि
जनताक टूटि रहलै दिहाड़ी गजल

फरि गेल छै कबइ कवि अपन देशमे
सौंसे सुना रहल बेभिचारी गजल

दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ + ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ + ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ + ह्रस्व-दीर्घ

Monday, 11 February 2013

गजल कमला-कोशी-बागमती-महानंदा" सम्मानक ( बाल गजलक लेल ) पहिल चरण बर्ख-2013 ( मास जनवरी लेल )



हमरा इ सूचित करैत बड्ड नीक लागि रहल अछि जे " अनचिन्हार आखर"द्वारा स्थापित " गजल कमला-कोशी-बागमती-महानंदा" सम्मानक ( बाल गजलक लेल ) पहिल चरण बर्ख-2013 ( मास जनवरी लेल ) पूरा भए गेल अछि। मास जनवरी लेल जगदानंद झा मनुजीक एहि गजलके चयन कएल गेलैन्हि अछि। हुनका बधाइ। 

तिला संक्रातिकेँ खिच्चैर खाले रौ हमर बौआ
ल’जेतौ नै तँ कनिए कालमे ओ आबिते कौआ

चलै बुच्ची सखी सभ लाइ मुरही किन क’ आनी
अपन माएसँ झटपट माँगि नेने आबि जो ढौआ

बलानक घाट मेलामे कते घुमि घुमि मजा केलक
किए घर अबिते मातर बुढ़ीया गेल भय थौआ

कियो खुश भेल गुर तिल पाबि मुरही खुब कियो फाँकेँ
ललन बाबा किए झूमैत एना पी कए पौआ

सगर कमलाक धारक बाटमे बड़ रमणगर मेला
सभ कियो ओतए गेलै कि भेलै ‘मनु’ कुनो हौआ

(बहरे रमल, मात्रा क्रम १२२२-१२२२-१२२२-१२२२)
जगदानन्द झा 'मनु'

मास जनवरी 2013क लेल गजल सम्मान योजनाक पहिल चरण


हमरा इ सूचित करैत बड्ड नीक लागि रहल अछि जे " अनचिन्हार आखर"द्वारा स्थापित " गजल कमला-कोशी-बागमती-महानंदा" सम्मानक पहिल चरण बर्ख-2013 ( मास जनवरी  लेल ) पूरा भए गेल अछि। मास  जनवरी  लेल सुमित मिश्र जीक एहि रचना के चयन कएल गेलैन्हि अछि। हुनका बधाइ।



बीतल समय नै घुरि कऽ आबै छै
सबटा लोक बैस एतबे गाबै छै

समय सँ बड़का नै कोनो खजाना
जिनगी मे जीतल जीत हराबै छै

मोल एकर जे बूझि नै सकलनि
तँ किए नहुँ-नहुँ नोर बहाबै छै

कपट द्वेष सँ मोन आन्हर अछि
आँखि मुनि भाग्य ठोकर पाबै छै

झुलसि दुपहरिया बाट चलै छै
थम्हि कऽ मीठगर राग सुनाबै छै

समय संगहि सब दौड़ लगाबै
"सुमित"कर्मक 
ल फरियाबै छै

वर्ण-13
सुमित मिश्र



नीक शुरुआत छन्हि हिनक आ हमरा सभकेँ हिनकासँ अरबी बहरक आशा अछि।

Friday, 8 February 2013

रुबाइ



कर्जा कए कऽ हम जीवन जीव रहल छी
फाटल अपनकेँ कहुना सीब रहल छी
सभ किछु गवा कए ‘मनु’अपन जीवनकेँ
निर्लज भए हम ताड़ी पीब रहल छी   

Thursday, 7 February 2013

अपने एना अपने मूँह-18


जनवरी २०१३मे अनचिन्हार आखरपर कुल ११७टा पोस्ट प्रकाशित भेल जकर विवरण एना अछि-----

१) अमित मिश्र जीक कुल ७९टा पोस्ट भेल जाहिमे १८ पोस्टमे १८टा गजल, २७टा पोस्टमे २७टा बाल गजल, २३टा पोस्टमे २३टा रुबाइ, ७टा पोस्टमे ७टा बाल रुबाइ, १टा पोस्टमे किछु माहिया आ ३टा पोस्टमे ३टा कता अछि।

२) सुमित मिश्रा जीक ३टा पोस्टमे ३टा गजल अछि।

३) बालमुकुन्द पाठक जीक ३टा पोस्टमे ३टा गजल अछि।

४) गजेन्द्र ठाकुर जीक ३टा पोस्टमे २टामे पुरस्कार समबन्धी सूची, आ १टा पोस्टमे विदेह पद्य देल गेल अछि।

५) जगदानन्द झा मनु जीक कुल ७टा पोस्टमेसँ ३टा पस्टमे ३टा गजल, १टा पोस्टमे १टा बाल रुबाइ, १टा पोस्टमे १टा भक्ति गजल, १टा पोस्टमे १टा बाल गजल, आ १टा पोस्टमे १टा रुबाइ अछि।

६) पंकज चौधरी ( नवल श्री) क ११टा पोस्टमे ६टा गजल आ ५टा बाल गजल अछि।

७) आशीष अनचिन्हारक कुल ११टा पोस्टमे २टा गजल, ७टा सम्मान सम्बन्धी घोषणा, १टा आलेख आ १टा अपने एना अपने मूँह अछि।



ऐ मासमे सुमित मिश्र जि नव गजलकारक रूपमे एलाह।

गजल

हमर मिथिलाक माटिसँ सोन उपजैए
कऽलसँ बनि पानि अमृत धार निकलैए

सगर पोखरिक छह छह पानिमे गामक
रुपैया बनि मखाने माछ गमकैए

घरे घर सभ छटैए बड्ड बुधियारी
दलानसँ राजनीतिक जैड़ जनमैए

युवाकेँ हाथ बल छै ओ बढ़त आँगा
जँ लेलै ठानि छनमे चान पकरैए

अपन माटिसँ भएलहुँ दूर मनुकोना
विरहमे हमर आँखिसँ नोर झहरैए

(बहरे हजज, मात्रा क्रम- १२२२-१२२२-१२२२)

@ जगदानन्द झा मनु’

गजल


शोणितसँ छै बनल नोर हम्मर
भेलै हँसी तँ अंगोर हम्मर

रहबै कते भरोसासँ हम सभ
नीलाम भेल छै भोर हम्मर

हम देखबै किए दोसरक दिस
तोंही तँ छहक चितचोर हम्मर

कोनो सुधार नै देशमे छै
लोके तँ बड्ड कमजोर हम्मर

बाटक हिसाब नै पूछ मीता
टुटि गेल आब संगोर हम्मर





दीर्घ-दीर्घ-लघु-दीर्घ+ लघु-दीर्घ-दीर्घ+ लघु-दीर्घ-दीर्घ हरेक पाँतिमे

Wednesday, 6 February 2013

2013 केर "गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा सम्मान"क लेल मुख्यचयनकर्ता ( बाल गजल लेल)

आधिकारिक रूपसँ बर्ख 2013 केर "गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा सम्मान"क ( बाल-गजल )  लेल मुख्यचयनकर्ताक रूपमे श्री परमेश्वर कापड़ि जीक  सहमति भेटि गेल अछि। एहि सम्मानक घोषणा हरेक सालक तिला-संक्रांति दिन कएल जाइत अछि।  श्री परमेश्वर कापड़ि संपूर्ण नेपाल आ भारतमे बाल साहित्यक मर्मज्ञ बूझल जाइत छथि। आ बाले साहित्यक केर उपर हुनक रिसर्च सेहो छन्हि।

Monday, 4 February 2013

गजल

गजल-5

सहारा जामक जे एखन धरि जीब रहल छी
हुनक मदिराएल नैनसँ पीब रहल छी

नव जमानाकेँ दोड़मे तरक्की तऽ बड भेटल
झाँकि देखू मोनमे करेजक गरीब रहल छी

परती खेत सन उस्सर भऽ गेल अछि जीवन
सुखाएल गाछक छाँवमे जिनगी जीब रहल छी

आब दबल जा रहल छी ममताक बोझ तऽर
उठाएब कोना भार सदिखन लीब रहल छी

गुमान छै हमरा अपन मैथिल संस्कृतिपर
आनक देखाउँस "सुमित" भाव निर्जीब रहल छी

वर्ण-18
सुमित मिश्र
करियन ,समस्तीपुर

गजल

गजल-4

अहाँक प्रेमक खातिर सजनी जग भरिसँ ठुकरायल छी
नजरि फेर अहाँ देखू एक बेर सूतल नीन्न जगायल छी

बन्न नयनसँ जगकेँ देखलौँ खोइल नैन हम सपनाकेँ
बाट हमर ओ ताकैत हेता झटपट भाइग परायल छी

पैरक पायल छम छम बाजै नैन कटार हम घायल छी
आइ अहाँ संग आँखि मिचौली खेली टीस करेज समायल छी

सबेर-सबेर सूरज प्रभातक किरण लऽ आबै नित दिन
हम पतंग बस उड़ि रहल मुदा डोरि हाथ नचायल छी

दोष सबटा हमरेपर जुनि सोचि रहल बस एतबे छी
बिना तेल दीपक केर टेमी सिहैक सिहैक कऽ बुतायल छी

प्रेम सरोवरमे डूबि रहल अछि मुदा किनारा नै भेटत
"सुमित" बैस बस ताकि रहल सबटा गप फरिछायल छी

वर्ण-23
सुमित मिश्र
करियन ,समस्तीपुर

गजल

गजल-1.39

हँसलेसँ सब गप बनै छै
कनलासँ बस जल खसै छै

केलक जुलुम जाड़ गर्मी
खन बर्फ खन तन जड़ै छै

ताड़ी बहुत पीब लेलक
मोनक दरद नै घटै छै

छै घून रइशीक लागल
नै फूल अरहुल फड़ै छै

धोती धुआ जींस खेलक
बहसीक नजरिसँ मरै छै

शौकिन रिमोटक सगर जग
तेँ धोधि लोकक बढ़ै छै

परसू कने हास्य चटनी
एहिसँ तँ सेहत बनै छै

मुस्तफइलुन-फाइलातुन
2212-2122
बहरे-मुजास

अमित मिश्र

गजल

गजल-1.38

ओ डिडिर जे अलग केलत पाक-भारत
ओतऽ टघरल शोणितक के दर्द बूझत

खेत घटलै लोक बढ़लै खेतिहर कम
गाम शहरी अन्न बिनु कोना कऽ जीयत

हे मनुख नै बाट सहयोगक निहारू
एतऽ डेगे डेगपर बड लाश भेटत

मरल मजनू एतऽ योगिन बनल मीरा
फिकिर परिणामक तँ नै बस नेह देखत

नारिकेँ जे सब बुझै छै बस्तु भोगक
ओ किए नै दूध मातक हाट बेचत

जड़ल मोनक टीस जे एलै गजल बनि
धार शब्दक भोथ तैयो भाव परसत

फाइलातुन
2122 तीन बेर सब पाँतिमे
बहरे-रमल
अमित मिश्र

रुबाइ

रुबाइ-159

पाथरक छाती फाड़ि दिअ जँ हिम्मत रहत
अम्बर एतऽ उतारि दिअ जँ हिम्मत रहत
बिनु हिम्मतक मनुख पशुओसँ बेकार छै
सबटा कुरीति झखारि दिअ जँ हिम्मत रहत

Saturday, 2 February 2013

गजल

गजल

पिया बिन ऐहि घर रहिये कऽ की करबै

विरह सन आगिमे जड़िये कऽ की करबै

अपन कनियाँ जखन कहि नै सकब हमरा
पिया करमे अपन धरिये कऽ की करबै

निवाला जखन नै भेटत तँ बुझबै दुख
गरीबक दुख अहाँ सुनिये कऽ की करबै

उड़ाबै देखि खिल्ली लोक हमरा यौ
समाजक बनि हँसी रहिये कऽ की करबै

जखन दर्दक इलाजेँ नै अहाँ लग यौ
तखन बेथा हमर सुनिये कऽ की करबै

बहरे हजज ,मात्रा क्रम १२२२ तीन बेर
© बाल मुकुन्द पाठक ।।

Friday, 1 February 2013

गजल



पढल पंडित मुदा रोटीक मारल छी
बजै छी सत्य हम थोंथीक हारल छी

बुझू कोना सबसँ काते रहै छी हम
उचितवक्ता बनै छी तें त टारल छी

दियादेकें घरक घटना मुदा धनि सन
कटेबै केश कियै हम जँ बारल छी

मधुर बनबाक छल भेलौं जँ अधखिज्जू
सत्ते नोनगर लाड़ैनेंसँ लाड़ल छी

लगै छल नीक नाथूरामकेँ पोथी
मुदा गाँधीक साड़ा संग गाड़ल छी

किओ ने पूजि रहलै कोन गलती यौ
बिना सेनूर अरिपन 'पुष्प' पाड़ल छी

1222 1222 1222 सब पाँतिमे
बहरे हजज
-प्रदीप पुष्प
तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों