Monday, 29 December 2014

गजल

(मिथिला आन्दोलन विशेष)


बहराउ यौ मैथिल घरसँ मोनमे ई ठानि कऽ
लेबे करब मिथिलाराज्य आब छाती तानि कऽ

हे वीर मैथिल देखाक वीरता अभिमानसँ
आजाद मिथिलाकेँ लेल सब लडू समधानि कऽ

हो गाम या शहर छी कतहुँ मुदा सब ठामसँ
आबू करू आन्दोलन रहब जँ मिथिला आनि कऽ

मेटा रहल अछि पहचान देखिते भूगोलसँ
अस्तित्व ई धरतीकेँ बचाउ माए जानि कऽ

इतिहास मिथिलाकेँ दैत अछि गवाही कुन्दन
ई भूमि छी विद्वानक सदति चलल सब मानि कऽ


मात्राक्रम : 2212-2221-2122-211

© कुन्दन कुमार कर्ण

Friday, 26 December 2014

गजल

गजल
हरियर कचोर​
पटुआक झोर

छुटलइ कतेक​
पेटक ​मड़ोर​

रोपल जजात​
भेटल चिचोर

मनसा बिदेश
पहिरब पटोर​

प्रेमक सनेश​
चकबा चकोर​

लागल बकोर
पाकल परोर​

फ़ेकू निहूँछि
तामस अघोर​

बातक​  नछोर
जिनगी कठोर​

रामक भरोस​
भेटत इजोर

सभ पाँतिमे मात्राक्रम - 22121

©राम कुमार मिश्र

Thursday, 25 December 2014

गजल

गालपर तिलबा कते शान मारैए
निकलु नै बाहर सभक जान मारैए

जतअ देखलौं अहीँपर नजरि सबहक
सभ तरे तर नजरिकेँ वाण मारैए

तिर्थमे पंडित तँ मुल्ला मदीनामे
सभ अहीँकेँ राति दिन तान मारैए

अछि अहीँकेँ मोहमे बूढ़ नव डूबल
देखिते मुँह फारि मुस्कान मारैए

काज कोनो नै बनेए जँ जीवनमे
'मनु' अहीँ लग फूल आ पान मारैए

(बहरे कलीब, मात्रा क्रम : २१२२-२१२२-१२२२)

© जगदानन्द झा 'मनु'

Monday, 22 December 2014

गजल

बाल गजल


खेने रहियै आमक कुच्चा
चिनियो लागै खट्टे खट्टा

हमरा नामे कोड़ो बाती
हमरे नामे खुट्टा खुट्टा

हमरा सन के छै उकपाती
सभके मारी घुस्से घुस्सा

छै झिल्ली कचरी आलूचप
मुरही फाँकी फक्के फक्का

नै नीक लगैए मस्टरबा
नीक लगैए अट्टा पट्टा


सभ पाँतिमे 22+22+22+22 मात्राक्रम अछि।

अंतिम शेरक दूनू पाँतिमे अलग-अलग लगूकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि

सुझाव सादर आमंत्रित अछि।

Saturday, 20 December 2014

गजल

शिव केर महिमा के नै जनैत अछि
सबहक मनोरथ  पूरा करैत अछि

दिन राति भोला पीबैत भांग छथि
हुनकर चरणकेँ के नै गहैत अछि

पति ओ उमाकेँ सबहक पतित हरन
भोला हमर सबकेँ दुख हरैत अछि

बसहा सवारी बघछाल अंगपर
शमशानमे रहि दुनियाँ हँकैत अछि

नै मूँगबा खाजा चाहिएनि जल
मनुआक धथुरसँ हिनका पबैत अछि

(मात्रा क्रम : २२१२-२२२१-२१२)

© जगदानन्द झा 'मनु'

Friday, 19 December 2014

गजल

सपना हमर हम वीर बनी
करतब करी आ धीर बनी

जे देशकेँ अपमान करै
ओकर करेजक तीर बनी

सबहक सिनेहक मीत रही
ककरो मनक नै पीर बनी

आबी समाजक काज सदति
धरतीक नै हम भीर बनी

किछु काज ‘मनु’ एहन तँ करी
मरियो क आँखिक नीर बनी
(
मत्रा क्रम : २२१२-२२१-१२)
© जगदानन्द झा 'मनु'

नवगछुलीक प्रांजल सरस रसाल: नव अंशु

नवगछुलीक प्रांजल सरस रसाल : नव अंशु




भावक स्पष्ट प्रवाहक बहन्ने साहित्यमे पद्य विधा अतुकांत रूपेँ पसरि रहल अछि ।पद्य विधाक विकास हेतु एकर अनिवार्यता भने देखऽमे आबय मुदा वर्तमान पद्य चिरकालिक आ कतिपय लोकप्रिय रहत, ई भविष्यक गर्तमे, मुदा प्रश्न-चिन्ह धरि अवश्य अछि ।

एहि परिपेक्ष्यमे मैथिली साहित्यमे किछु काँच वयसक गीत-गजलकारक प्रवेश भेल छन्हि जे लय, राग, गतिक संग साहित्य आड़िमे बान्हल छथि, ओहिमे 21 वर्षक गजलकार अमित मिश्रक नाओं महत्वपूर्ण अछि । ओना तँ साहित्यक सब सरल विधा यथा- गीत, गजल, कथा, लघुकथा, नाटक, एकांकी, कविता, बाल-साहित्य आदिमे हिनक लेखनी गत किछु वर्खसँ प्रवाहमय अछि मुदा हिनक लोकप्रियताक पहिलुक प्रस्तुति गजल संकलन "नव अंशु"सँ भेल ।नव अंशु मने नव किरण, मने नव भोर, मने नीक दिनक पहिल आभास, मने नव ऊर्जाक संपूर्ण संसारमे पहिल संचरण ।एहि पोथीक नाओंक पाछु गजलकारक एहने सन भाव रहल हेतनि ।

अनचिन्हार आखरसँ प्रेरित भऽ कऽ लिखल गेल एहि गजल, हजल आ रुबाइ संकलनमे प्रेमी-प्रेयसीसँ आगाँ बढ़ि कऽ जीवन आयामक बहुत रास अवस्थाकेँ विविध रूपेँ प्रदर्शन कएल गेल जे निश्चय द्रव्यमूलकसँ बेसी विचारमूलक  अछि । गजल लेखनक मौलिक सीमा एकर व्याकरणक संग-संग सरल वार्णिक बहरसँ लऽ कऽ अरबी बहरमे लिखल गेल गजल मानक आ पूर्ण मानल जाए । सबटा गजलमे शेर, रदीफ, काफिया, मकता आ मतलाकेँ सरस बनयबासँ बेसी बीजगणितीय आ अंकगणितीय बनाओल गेल जे जनप्रियतासँ ऊपर उठि कऽ एहि विधाक मैथिलीमे विकासक लेल उचित आ अनुकरणीय प्रयोग मानल जाए ।

व्याकरण गजलक मौलिक मानकतासँ बान्हल अछि , कुश ठामक काससँ उखाड़ल अछि  मुदा शब्द-शब्दक प्रवाह तँ शायरक स्वत: स्फूर्त प्रतिभाक प्रदर्शन अछि -

" चान देखलौं तँ सितारा की देखब
अन्हारक रूपकेँ दोबारा की देखब "

पहिल गजल सरल वार्णिक बहरमे छन्हि, मुदा मकताक प्रयोग नहि, ओना मकता गजलक कोनो अनिवार्य अंश सेहो नहि अछि ।

कतहु-कतहु गजलकार अपन वयसे जकाँ काँच लगैत छथि तँ कतहु-कतहुँ परिपक्व प्रेमी सन झंकारयुक्त उदवोधन हिनक नैसर्गित नहि तँ आशुत्व भरल दैहिक गुणक अनुलोम जकाँ लगैत अछि-

" जे किछु कहब हँसि क ऽ कहू
प्रेमक जालमे फँसि कऽ कहू

खसा दिअ आइ बिजुरी अहाँ
रूपक चानन घसि कऽ कहू "

लयात्मक गजलमे ई भाव आ बान्ह मैथिलीमे बहुत अल्प ठाम भेटल अछि ।एहि रूपेँ शायर अभिवादन आ धन्यवादक पात्र छथि मुदा व्याकरणकेँ क्रमवद्ध आ अनुशासित करबाक क्रममे कतहु-कतहु भाव झुझुआन सेहो भऽ गेल छन्हि जेना-

" बना लेब दुलहिन अपन
अमित कने खखसि कऽ कहू"

ई तँ मात्र एकटा उदाहरण परञ्च जौं सम्पूर्ण संकलनक मनोवाचन कएल जाए तँ एतबा धरि कहल जा सकैछ जे शायर गजल विधाक भविष्यक अपन जनमाषामे एकटा अंश धरि अवश्य छथि ।एहि संकलनक पश्चात बहुत रास परिपक्व आ अरबी बहरयुक्त गजल मैथिलीमे लिखने छथि जे अप्रकाशित छन्हि ।

अरबी बहरमे लिखल एकटा गजल विविध रूपक जीवनान्दकेँ सिनेहक आवरणसँ संघोरि कऽ कऽ प्रदर्शित कएल गेल जे अनुखन आ रोचक मानल जाए-

" गजल नै, नै गीत लिखलौं
जँ लिखलौं तँ प्रीत लिखलौं

बरसबै नै मेघ बनबै
ढहल आँगन भीत लिखलौं"

एकटा रुबाइ जे समर्पण आ प्रेमक अद्भुद छटा देखबैत अछि-

"अहाँ सन मीतसँ एतबे प्रीत चाही
जे नै बिसरि सकी एहन अतीत चाही
हारब हम मजा हमर आएत मुदा
सदिखन अहाँक सब मोड़पर जीत चाही "

संपूर्ण संग्रहकेँ देखलाक बाद एकटा बात अनसोहाँत लगैत अछि जे गजलकारक पूर्ण परिचय कतौ नै देल अछि, पोथीसँ गजलकारक बारेमे नामक अलावे और कोनो जानकारी नै भेटैत अछि जे प्रकाशनक कमी/गलती वा मुद्रणक कमी लगैत अछि ।

बहरे तबील, बहरे मुतकारिब, बहरे जदीद, बहरे मुजास, बहरे काफिर आदि बहरमे संजोगल संकलन आकर्षक छन्हि ।पाठक प्रभावित हेताह ई विश्वास कएल जा सकैछ मुदा जाहि सरल पाठककेँ आनंदक अनुभूति कम ओ एकरा घृत मानि सुआद लऽ सकैत अछि, किएक तँ मंचक लेल लिखल गेल चालू पद्यसँ ई ईतर एकटा साहित्यिक कृति अछि ।
एहिमे भावक संग संग व्याकरणक बान्ह बहुत दृढ़ अछि मुदा सब गजल गेय तेँ मंचक लेल सेहो अनुगामिनी आ प्रयुक्तक संग-संग उपयुक्त मानल जाए ।व्याकरणक ज्ञान छन्हि, भावक आत्मस्फूर्त प्रतिभा छन्हि आवश्यकता छन्हि तँ मात्र परिपक्व संयोजनक जे भविष्य निर्धारण करतनि आ ओहिपर विशेष ध्यान दैत अगिला संकलनकेँ प्रदर्शित करताह, एहि विश्वासक संग युवा प्रतिभाकेँ साधुवाद ।

पोथी- नव अंशु
विधा- गजल, हजल, रुबाइ
गजलकार- अमित मिश्र
प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन,  दिल्ली
संस्करण- 2012
दाम- 200 टाका

समीक्षक- शिव कुमार झा"टिल्लू"





Monday, 15 December 2014

गजल

गजल-2.51

अहीँ कलम अहीँ कगज हमर गजल छी अहीँ
अहीँ मिजाज हमर भावमे बसल छी अहीँ

धसय धरा खसय गगन कतौ वा अन्हर उठय
हियाक घरक बीच लोह बनि गचल छी अहीँ

चलय बसात सगर गाममे गमक बोरि तेँ
कहय गुलाब सब परागमे रमल छी अहीँ

उठैत अछि हमर कलम मुदा लिखा नै रहल
सबसँ सुनर सबसँ अलग निशा चढ़ल छी अहीँ

जरैत तेल अछि मुदा जरा कऽ बाती "अमित"
उठय दरद तँ लगय चोट सहि चुकल छी अहीँ

1212-1212-1212-212

Saturday, 13 December 2014

गजल

हमरो मोन पियासले रहि गेलै
हुनको मोन पियासले रहि गेलै

चुप्पेचाप बहुत पिया देलक ओ
तैयो मोन पियासले रहि गेलै

तोरा देखि कऽ धन्य बुझलक जे जे
तकरो मोन पियासले रहि गेलै

अप्पन लोक तँ सहजें अगियासल छै
अनको मोन पियासले रहि गेलै

ठोपे ठोप चुबै छलै रस तैयो
सगरो मोन पियासले रहि गेलै

चारिम शेरमे एकटा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि।
सभ पाँतिमे 2221+12+12222 मात्राक्रम अछि
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

Friday, 12 December 2014

Thursday, 11 December 2014

गजल




उज्जर धरती पीयर रौद
हरियर गाछी सुन्दर रौद

नँहिए एलै खिड़की फानि
हुनके सन छै पाथर रौद

भुतला गेलै बाँटल घरमे
लागै बड़का भुच्चर रौद

जे देबै से लैए लेत
पसरल सौंसे आँचर रौद

अजगर गहुमन धामन संग
डँसने घूमै साँखर रौद

सभ पाँतिमे 22+22+22+21 मात्राक्रम अछि।
तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम दीर्घकेँ लघुमानबाक छूट लेल गेल अछि।
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

Sunday, 7 December 2014

गजल

दुख केर मारल छी ककरा कहू
केहन अभागल छी ककरा कहू

हम आन आ अप्पनकेँ बीचमे
सगरो उजारल छी ककरा कहू

नै जीत सकलहुँ आगू नियतिकेँ
जिनगीसँ हारल छी ककरा कहू

बनि पैघ किछु नव करऽकेँ चाहमे
दुनियाँसँ बारल छी ककरा कहू

कुन्दन पुछू संघर्षक बात नै
दिन राति जागल छी ककरा कहू

मात्राक्रम : 221-222-2212

© कुन्दन कुमार कर्ण

Wednesday, 3 December 2014

गजल



छोट्टे सनकेँ हम्मर बौआ
नमहर नमहर ता ता थैया

उज्जर बगुला हरियर सुग्गा
ललका मैना कारी कौआ

थारी बाटी भरले सनकेँ
खत्मे छै तिलकोरक तरुआ

दूधक पौडर तोरे लेल
चिन्नी खेतै पौआ पौआ

हम्मर बौआ बेली सनकेँ
सुंदर सुंदर गेंदा गेंदा

सभ पाँतिमे आठ टा दीर्घ मात्राक्रम अछि
चारिम शेरक पाहिल पाँतिक अंतिम लघुकेँ संस्कृत काव्यशास्त्रानुसार दीर्घ मानल गेल अछि।
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

Tuesday, 2 December 2014

अपने एना अपने मूँह-32


अनचिन्हार आखरपर http://anchinharakharkolkata.blogspot.in/ नवम्बरमे कुल १९ टा पोस्ट भेल जकर विवरण एना अछि--

कुंदन कुमार कर्णजीक ५टा पोस्टमे कुल ५टा गजल अछि।
जगदानंद झा मनुजीक १टा पोस्टमे १टा गजल अछि।
ओमप्रकाशजीक २टा पोस्टमे २टा गजल अछि।
अमित मिश्रजीक १टा पोस्टमे १टा गजल अछि।
आशीष अनचिन्हारक कुल १०टा पोस्टमे ७टा गजल, १टा दू गजला, १टा बाल गजल, १टा अपने एना अपने मूँह, अछि।

Monday, 1 December 2014

गजल

अहाँ बिनु नै सुतै नै जागैत छी हम
कही की राति कोना काटैत छी हम

अहाँक प्रेम नै बुझलहुँ संग रहितो
परोक्षमे कते छुपि कानैत छी हम

करेजा केर भीतर छबि दाबि रखने
अहीँकेँ प्राण अप्पन मानैत छी हम

बुझू नै हम खिलाड़ी एतेक कचिया
अहाँ जीती सखी तेँ हारैत  छी हम

अहाँ जगमे रही खुश जतए कतौ 'मनु'
दुआ ई मनसँ सदिखन मांगैत छी हम

(बहरे करीब, मात्रा क्रम : 1222- 1222- 2122)
जगदानन्द झा ‘मनु’

तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों