हँसि क तोरब मोन नहि हम सीखने छी
नहि करेजामे सभक घर छेकने छी
सोपलौं जकरा अपन तन मन जनम भरि
ओकरो हाथे जहर बड़ चीखने छी
आस छल अपनो समय रंगीन हेतै
दूर रंगक ओहि टोलसँ एखने छी
कीनबाकेँ लेल शहरक वास दू धुर
चास गामक तीन बीघा बेचने छी
करु शिकाइत एहि दुनियाकेँ कते ‘मनु’
लैत मीतक जान सगरो देखने छी
(बहरे रमल, मात्राक्रम 2122-2122-2122)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’