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गुरुवार, 31 अगस्त 2017

हजल

हम्मर तोहर हुनकर बाबा
सभहँक छै भकचोन्हर बाबा

कौआ कुक्कुर गदहा गदही
आनर बानर सूगर बाबा

ढ़नमन ढ़नमन पूरा दुनियाँ
अपने बनलथि सोंगर बाबा

इच्छाधारी लीलाधारी
अगबे ताकल लोफर बाबा

अनका ठकलथि बहुते बजलथि
भेलथि जेलक भीतर बाबा

सभ पाँतिमे 22222222 मात्राक्रम अछि

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014

गजल

दुदुसिया आ सूपक भाँटा सन लोकक लेल ई हजल अछि।--


हजल

हमरो कहने जे हम तोरे संग छियौ
हुनको कहने जे हम तोरे संग छियौ

हुनका दमपर जे केलक किछु से बुझलक
सगरो कहने जे हम तोरे संग छियौ

देखि रहल छी हुनक बदलब भोरे भोर
साँझो कहने जे हम तोरे संग छियौ

छथि एहन परतापी जे घर एलनि चोर
तकरो कहने जे हम तोरे संग छियौ

ठकलक अनका संगे अपनो अत्माकेँ
अपनो कहने जे हम तोरे संग छियौ

सभ पाँतिमे एगारह टा दीर्घ अछि।

तेसर आ चारिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु अतिरिक्त छूटक अधारपर अछि।

सुझाव सादर आमंत्रित अछि।

रविवार, 6 जुलाई 2014

हजल

एक दिन कनियांसँ भेलै झगडा
मारलनि ठुनका कहब हम ककरा

ओ पकडलनि कान आ हम झोंट्टा
युद्ध चललै कारगिल सन खतरा

मारि लागल बेलनाकेँ एहन
फेक देलक आइ आँखिसँ धधरा

बाघ छी हम एखनो बाहरमे
की कहू ? घरमे बनल छी मकरा

एसगर कुन्दन सकत कोना यौ
ओ हजलकेँ बुझि लए छै फकरा

मात्राक्रम: 2122-2122-22

© कुन्दन कुमार कर्ण

बुधवार, 3 अप्रैल 2013

हजल

हजल-7

झाड़ू उठा मारलनि बेलन चला मारलनि
कोना कहब अपने मुँहे, करछुल धिपा मारलनि

खगता तँ दूधक मुदा दोकानमे सठल छल
ओ देख पाउडर दूधक नऽह गड़ा मारलनि

बासी बचल खीर हमरे लेल राखल सदति
मिसियो जँ छूटल तँ ओ चेरा उठा मारलनि

साड़ी कते कीन फेकत माँझ आँगन नचा
हम सैंत नै सकल तें घेंटी दबा मारलनि

जे पीब लेलौं कने ओ झाड़ि देलनि नशा
हम रंग लगबौं तँ ओ दाँते धसा मारलनि

ने हम बचब ने बचत सड़ि गेल हमरे गजल
कनियाँ हमर कलमपर नैना चला मारलनि

मुस्तफइलुन-फाइलुन
2212-212 दू बेर
बहरे-बसीत

अमित मिश्र

मंगलवार, 26 मार्च 2013

हजल

हजल-7

झाड़ू उठा मारलनि बेलन चला मारलनि
कोना कहब अपने मुँहे, करछुल धिपा मारलनि

खगता तँ दूधक मुदा दोकानमे सठल छल
ओ देख पाउडर दूधक नऽह गड़ा मारलनि

बासी बचल खीर हमरे लेल राखल सदति
मिसियो जँ छूटल तँ ओ चेरा उठा मारलनि

साड़ी कते कीन फेकत माँझ आँगन नचा
हम सैंत नै सकल तें घेंटी दबा मारलनि

जे पीब लेलौं कने ओ झाड़ि देलनि नशा
हम रंग लगबौं तँ ओ दाँते धसा मारलनि

ने हम बचब ने बचत सड़ि गेल हमरे गजल
कनियाँ हमर कलमपर नैना चला मारलनि

मुस्तफइलुन-फाइलुन
2212-212 दू बेर
बहरे-बसीत

अमित मिश्र

शनिवार, 29 दिसंबर 2012

हजल


हजल

देखियौ देखियौ जुग केहन भऽ गेलै कक्का यौ
टोपी चश्मा पहिर कऽ चलै छै छौड़ा उचक्का यौ

छमकि कऽ चलैए संगे नटुआ सन केश छै
जीँस टीशर्ट पहिर कऽ अंग्रेज भेल पक्का यौ

चौक पर घूमैत छै बोतल चढ़ा कऽ भोरेसँ
सिगरेटक दिन भरि ई उड़ाबै छोहक्का यौ

अपनाकेँ बड़का ई बुझैत अछि हीरो छौड़ा
मुहँ नै लगाबूँ एकरासँ अछि ई लड़क्का यौ

स्त्री जकाँ श्रृंगार करै छै लगाबैये ठोररंगा
भोरेसँ कटाके दाढ़ी मोछ लागे जेना छक्का यौ

छौड़ी पाछाँ पागल भेल छै काज धाज छोड़िकेँ
हुलिया एकर देखि कऽ मुकुन्द हक्काबक्का यौ

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण17
©बाल मुकुन्द पाठक ।।

देखियौ देखियौ जुग केहन भऽ गेलै कक्का यौ
टोपी चश्मा पहिर कऽ चलै छै छौड़ा उचक्का यौ

छमकि कऽ चलैए संगे नटुआ सन केश छै
जीँस टीशर्ट पहिर कऽ अंग्रेज भेल पक्का यौ

चौक पर घूमैत छै बोतल चढ़ा कऽ भोरेसँ
सिगरेटक दिन भरि ई उड़ाबै छोहक्का यौ

अपनाकेँ बड़का ई बुझैत अछि हीरो छौड़ा
मुहँ नै लगाबूँ एकरासँ अछि ई लड़क्का यौ

स्त्री जकाँ श्रृंगार करै छै लगाबैये ठोररंगा
भोरेसँ कटाके दाढ़ी मोछ लागे जेना छक्का यौ

छौड़ी पाछाँ पागल भेल छै काज धाज छोड़िकेँ
हुलिया एकर देखि कऽ मुकुन्द हक्काबक्का यौ

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण17
©बाल मुकुन्द पाठक ।।

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

हजल

हजल-३

हौ दैव किएक विआह केलौं जिनगी अपन तबाह केलौं
भने छलहुं मस्तीमे मातल बूझि-सूझि कष्ट अथाह केलौं

कतेक अनोना कबूला पातरि कीर्तन आर नबाह केलौं
कनिआँ-कनिआँ रटि-रटिक' मोनके किएक बताह केलौं

आन्हर भेल छलौं नै सूझल की नीक कथी अधलाह केलौं
मधुघट पीबा केर चक्कर मे जिनगी खौलैत चाह केलौं

नरहोरि भेल बौआरहलौं करेजक कांच चोटाह केलौं
एहन हराहिसँ संग भेल जे अपनो के मरखाह केलौं

रहि-रहि मूँह फुलाबैथ ओ घुरि-घुरि हम सलाह केलौं
स'ख-श्रृंगार पुड़ाबय पाछू खटि-खटि देह अबाह केलौं

लेर खसल किए लड्डू लेल किएक मोन सनकाह केलौं
घर-घरारी लागल भरना जानिक' जिनगी बेसाह केलौं

खीर नञि ओ घोरजौर छलै मधुरिम मोन खटाह केलौं
देखि कतहु मउहक के थारी "नवल" अनेरे डाह केलौं

*आखर-२२ (तिथि-२७.०९.२०१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

रविवार, 16 सितंबर 2012

हजल

हजल-२

कनिया सुन्नर देशी चाही
ठाठ   मुदा  परदेसी चाही

बंगला - गाड़ी नोकर संगे
दरमाहो किछु  बेशी चाही 

कूलरसँ   नै   देह  शीतेतै
शौचालय तक एसी चाही

सिगारे टा नै हो अंग्रेजिया 
मदिरा  सेहो  विदेशी चाही

गाए-महीश पोसै में लाज
कुक्कुर-घोड़ा मवेशी चाही   

देशक  मर्यादा  नै  बिगड़ै    
छूट  मुदा  परदेसी  चाही

पश्चिम  पैर   पसारै  रोकू
"नवल"सोच स्वदेशी चाही 

*आखर-१० (तिथि-२५.०८.२०१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

हजल

हजल-१

ओ कहती चुपतऽ चुप रहू आ बाजूतऽ भूकैत रहू
काग स्वर सुनु हुनक आ कोयली बनि कूकैत रहू

कपडाक मोटरी माथ पर लेने जाऊ धोबाक लेल
भिनसरसँ लएकऽ राति धरि चूल्हाके धूकैत रहू

किछ पाय जे अनलहुं कमा अहाँ घामसँ नहा-नहा
हुनक श्रृंगारके ओरियान में पाय के बूकैत रहू

जूती पहिड़ने हीलके कने चलती थमि-थमिकऽ ओ
संग हुनक डेगके अहूँ चलैत रहू रूकैत रहू

"नवल" हुनक अनुरोध के आदेश बुझि लिय अहाँ
ओ चलती सीना तानिकऽ अहाँ दास बनि झूकैत रहू

*आखर-२० (तिथि-२४.०८.२०१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

सोमवार, 27 अगस्त 2012

हजल


लाल धोती केश राँगि समधि चुगला बनला ना 
बेटा बेचि आनि बरयाती ई पगला बनला ना 

सभ बिसरि आँखि मुनि ध्यानसँ ताकथि रुपैया 
भीतर कारी बाहर उज्जर बोगला बनला ना 

खेत खड़ीहान बेच बेच पीबथि बभना तारी 
आब लंगोटा खोलि खालि ई तँ हगला बनला ना 

तमाकुल चूनबैत पसारने  दिनभरि  तास
घर आँगनक चिंता नहि ई खगला बनला ना 

जेल छोरि बाहर आबि हाथ जोरि माँगथि भोट
जितैत देरी 'मनु'केँ बिसरि दोगला बनला ना 

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१८)  

शनिवार, 28 जुलाई 2012

हजल

गदहराज धन्य छी दियS  सदबुद्धि हमरो अहाँ
उपर लदने बोझ नै आँखि देखाबी ककरो अहाँ

धियान मग्न रहि मधुर तान ढेंचू-ढेंचू करै छी
मन्त्र  जनैत छी शास्त्रीय गायन कए सगरो अहाँ

मनुख पबैत सम्मान विशेष नाम अहीँक ल ' क '
बिन आपति बर्दास्त करी नहि करी झगरो अहाँ

स्वर्ग गेलौं लागले छान ई कथा जगजाहिर अछि
करु पैरबी कनी हमर बियाहक  जोगरो अहाँ

गृहस्थक जुआ कान पर 'मनु' खटब आब कोना
दिय ' गदहपन जँ बुझलौं अपन हमरो अहाँ

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१९)
जगदानन्द झा 'मनु'  

गुरुवार, 24 मई 2012

हजल


हजल

गुरूजी बैसलाह खोलि खटाल

चेलवा बनलनि गुरू घंटाल ।


घूर जरौलन्हि पोथी केर टाल

दूध बेचि कऽ देखू भेला नेहाल ।


ईसकुल जाऽकऽ भेलाह कंगाल

माल पोसिकऽ भेलाह मालामाल।


पशुगणना कऽ फुटलनि भाल

पशुपालन सँ रुपैयाक टाल ।


घी-दूध पीबि भेलनि देह लाल

आब अखाड़ा बिच ठोकथि ताल ।


गुरुआनिक गजबे रंगताल

ठोरक संग-संग रांगथि गाल ।


गुरुजी बैसलाह खोलि खटाल

ज्ञानक पूँजीओ गेलनि पताल ।-------वर्ण-१२-----------

सोमवार, 7 मई 2012

हजल




कनिया हम्मर बड़ गुणवन्ती बुझा गेल हमरा

किएक कुमारहि लोक मरैए जना गेल हमरा

शांती जहिए घर मे पैसली तहिए सँ छी अशांत

क्रांति घरमे मचल तेहन जे मिटा गेल हमरा 

सासु लगै छन्हि सौतिन ससुर लगैन्ह चरबाह

गारि अलौकिक हुनका मुँहक लजा गेल हमरा

संग गोतनी के लड़थि भैंसुर के नहि परबाह

आबतऽ देखू दुनू भाइयो बिच बझा गेल हमरा

रौ दैवा नहि जनलौ किछुओ फँसलौ ब्याहक फाँस

"चंदन" रूपक माया फँसरी लटका गेल हमरा

दृष्टव्य-ओना हम व्यक्तिगत रूप मे एहि सँ फराक विचार रखैत छी नारीक प्रति.तखन समाजक ईहो एकटा अंग अछिए तइँ 

कल्पनाक पाँखि चढ़ि लिखल...

रविवार, 6 मई 2012

हजल

भेल किछु बात एहन जे कना गेल हमरा
हरासंखनी कनियाँ माथ बथा गेल हमरा
ओना त छै अमावश्या सन कारी केश ओकर
मुदा ओहि मे फड़ल चोर पटा गेल हमरा
ओना नाम छै शांती मुदा घर छै माछक हाट
छ' टा बरदक पिलवान बना गेल हमरा
फोटूये देख परान उड़ि गेल छल हमर
से माँथ पर बंदूक राखि उड़ा गेल हमरा
सब दिन कहै यै जे प्यार नै करै छेँ हमरा
जँ भागौँ त' सौँसे देह दाँत गड़ा गेल हमरा
माइ के बजाबे भाइ के बजाबे सब दिन ओ
चाउर दालि आँटाक भाव बता गेल हमरा
भने फूलेसरा कुमारे रहि गेल भाइ सब
"अमित" ओ त' जीते जी श्राद्ध करा गेल हमरा
सरल वार्णिक बहर
वर्ण-17
अमित मिश्र

सोमवार, 30 अप्रैल 2012

हजल

लागि जाए जखन बुद्धिमे दिवार यौ
अहाँ ऐरावत जीसँ लिअ विचार यौ
चैढ़ हास्यक महल पर चिकरता
सोचबाक लेल छड़पता पहाड़ यौ
बान्हि क' लंगौटा पाकल मोछ राँगि क'
लड़ा दै छथि शेर गीदर बीमार यौ
नाक सँ पानि खसैए हाथ काँपि जाए
भोज मे आगू रूप बनल चुहार यौ
मारि पैना टाँग हाथ छौड़ा दै तर्कक
तर्क सँ "अमित" भेलौँ लरपुआर यौ
वर्ण-14
अमित मिश्र

रविवार, 1 अप्रैल 2012

हजल

‎ आगू नाथ नै पिछु पगहा ,
देखियौ कोना कूदै गदहा ,
होर लागल फल-फूल मे ,
के सब सँ बड़का बतहा ,
मुर्ख दिवस मुर्खक नामेँ ,
केरा बनि गेलै यै गदहा ,
बत्तीस मार्च के सम्मेलन ,
मुर्खीस्तान मे हेतै सबहा ,
पाइ कमाइ छै चारि लाख ,
मुदा सब्जी लेलनि दबहा ,
चुन्नू सुतल अपन घर ,
मुदा उठल जा क' भूतहा ,
मोनूआँ चढ़ल साइकिल .
उठेने माँथ पर बोझहा ,
बीस टका मे दर्जन केरा ,
मुन्नू लै छै बीस मे अदहा ,
माँथ उठेने छलै छै गोनू ,
खसलै खद्दा , भेलै पटहा ,
चुन्नू , मुन्नू , गोनू वा "अमित "
कहू के छथि पैघ बतहा . . . । ।
अमित मिश्र

हजल

फूल डे पर एकटा हजल
किनको सँ उधार लेल गेल हँसी ,
उलटा काज क बड़का देल हँसी ,
करिखा - चुना लगा अपने मुंह में ,
अपने सँ मुर्ख बनल भेल हँसी ,
गदहा क भैया बनेलनि आइ ओ ,
मुर्खता सँ मरखाह बकलेल हँसी ,
कोयला लगा मंदिर धरि दौड़ला,
करिया लग सभहक फेल हँसी ,
बजेलक जजमान पूजा के लोभ ,
दौड़ला खसला भेल अलेल हँसी ,
हाथ उठाऊ जे पैघ विद्वान छी से ,
"अमित ".लगायत आइ सेल हँसी ,
अमित मिश्र ,

मंगलवार, 6 मार्च 2012

हजल

"यदि बैसब कोठली मे लागत बेशी रंग यै
तोड़ी क केबार मोबिल लगा करब तंग यै
बनरी सन मुंह बना देब अहाँक भौजी यै
कारिका कादो लगा देब मोन हेएत चंग यै
बहिन कए कते देर नुका क रखबै यै अहाँ
बड़का शिकारी जेकाँ हमहूँ धेने छी ढंग यै
दौड़ा -दौड़ा क खत्ता में पटैक क राँगब हम
प्रेम सँ खा लिअ एकटा मिठका पड़ा भंग यै
लगबा लिअ दुनू गाल पर अबीर आ रंग
डूबि जाऊ भौजी अहाँ मस्ती में ''अमित'' संग यै ...||
अमित मिश्र

हजल

‎कनियाँ कए मारि सँ सब त्रस्त भेल छै ,
हकमि चलै जेना भेकम भेल रेल छै ,
चारि बजे भोरे पानि उझलि उठाबथि ,
भ' जाइ छी स्टार्ट बुझू पानि नहि तेल छै ,
चाहक जोगार एगो दोसर हाथ झाड़ू ,
किचेन कए काज सँ कहू कोन मेल छै ,
स्कुलक दौड़ा सँग सब्जी ,बैँक ,बजार ,जेबै ,
जीनगी लागै यै ओलंपिक कए खेल छै ,
होइ साफ झाड़ू सँ बेलनाक मारि खाइ ,
गर्दन पर छै कैँची घर बुझू जेल छै ,
नैहर कए धमकी आतंकी जेकाँ लागै ,
बम बलास्ट सन बाजब ,जान गेल छै ,
पिबै छी जहर मुदा बचा लै यै ब्रत क' ,
लोकल ट्रेन जेकाँ जीनगी ठेलम-ठेल छै ,
लिखै छी प्रेमक गजल ओकरे डर सँ ,
कंठ पर चढ़ि लिखेलक वैह देल छै ,
मर= चाहै छी भाई मदद करू बताबू ,
"अमित" कत= लागल मृत्यु कए सेल छै . . . । ।
अमित मिश्र
तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों