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शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

गज़ल



सोचै छी हम एकबेर बनि जैतिहौं जँ फेर सँ नेनाभुटका बच्चा
टहैलि आबितिहौं बाड़ि-झाड़ि, खादि-खन्नर, पोखरि, डाबर, चभच्चा

खेलैबतिहौं नरकैटक बन्दुक, बजैबितौं केरापातक पिपही,
घसि-घसि बनैबतिहौ सीटी-बाजा, उखारि ओंकरल आमक बिच्चा

उछैलितौं, फाँनितौं, घुमितिहौं घुमरि, खेलैबितिहौं करियाझुम्मरि
करितौं हो-हो, बनितौं मरूआक ढ़ेरी, उरैबितौं थालक फुरकुच्चा

चढ़ितिहौं जँ आम, लताम, जामुनक गाछ, झुलितिहौ डारिक झुल्ला
कुतैरतिहौं टिकुला आ फुल्ली-बाति फर, मारितिहौं कच्चा पर कच्चा

घिचितिहौं झोटा-चोटी,, घोलैटितौं भुइयाँ, कनितिहौ हकपुत्तर
साँझ-बाति जँ घुरि अबितिहौं अँगना, मारिते माय, बौसतिहै चच्चा

मनक सेहन्ता मुदा घुमरि-घुमरि रहि जाइ ये मोनेक भीतर
सभटा भs गेल आब ई दुःसपना, जेँ चढ़ल ई यौवन अधखिच्चा

"शांतिलक्ष्मी" शहर-गाम मे देखय बस एक्के रंगक रंगल छिछ्छा
छेटगर होइते पाछु पड़ि जाइ छै टोलक बूरल लफुआ लुच्चा

........वर्ण २५........



गजल


कोबी, टमाटर, भट्टा, ये लय आर जाय जैइबै मिरचाय ये
लहसुन हरदि उहो छै, ये सुनय आर जाय छियै माय ये

ये गिरहतनी लय जैइबै त बाजु सुभिते मे दै देब आइ
चिजो भेटत एकलम्बर, एक्को चिज नै भेटत अधलाय ये

कोबी टमाटर धानक तीन खुटे, भट्टा मिरचाय फाँटि कय
अल्लु चलु बरोबरि, मुदा हरदीक लागत नकत पाय ये

हे गिरहतनी फाs लत तै लइये लेबय की करी दाम कम
आढ़त जेइबै पता चलत कोना आगि फेकय मँहगाय ये

हे माय कटहर नै किनलियै ओतहे चालीस के रहै किल्लो
अहाँसीन सेहो एक-दुइ किनै पुज्जी कोना दितिहै फँसाय ये

"शांतिलक्ष्मी" सोचय काल्हि चाहा-चिड़ै जकाँ भल्हों होइ अलोपित
कुजरनीक बोली आइ गामक छिये बड़ अनुप मिठाय ये

.......वर्ण २३.........


गज़ल



मैरचीवाली कोना टुकटुक ताकै मनमोहना आँखि ओझरायल छै
झाँऊं झाँऊं करै ई कुकुर केर टोली मधुमासे जेना उमतायल छै

पश्चिमक हवा गामे-गाम सिहकै, जेहने बिहौतिन तेहने कुमारि
फ़िदाहुसैनक मौगी उकरल सभमे, हरियर मोन बौरायल छै

सनम-बलम कौआ कुड़रै, कठबगुला मोनहा मुँह मकुयेनै छै
उमर धुमर के खियाल छै ककरा, वय सट्ठो पट्ठा गरमायल छै

देवता-पितर के डरभर ककरा, बरत-धरमक के छै पामौज
बन्हन ऊपर पुलिस-कचहरी, रंगरसिया मोन उधियायल छै

खुल्लम-खुल्ला देखै मधुरसलीला, नैनमैतियो आँखि करै मधुपान
आठिम एखन चढ़तै वाकि नै चढ़तै, काँचे वयस पकठायल छै

बेटी पुतोह आब नै घरो सुरक्षित, शहरी बात सदि करै चेतार
सतित्वक रक्षा कोना हेतै हौ विधाता ’शांतिलक्ष्मी’क मोन डेरायल छै

............वर्ण २६........

गज़ल


पेट मे भल खड़ नै हिनका मुदा सिंघ मे तेल छै
माय कहै बौआ हमर नुनुआगर, बुरलेल छै

जीटजाट फ़ीटफ़ाट, मारय सीटल बिछान सन
मारल कंघी लटुरिया जुल्फ़ मे गमकै फुलेल छै

जेहने चढ़ल पंथ बौआ तेहने होइन्ह संगति
तीन खेप मैटरिक फेल दोस, फेलो मे फलेल छै

लभ लिखल फ़ोनटेन लभे उकारल कुंजी-झावा
लभ घसल तरहैत तँ कामदेवक गुलेल छै

तीर तरकस सँ लैस बोआ चलला शिकार पर
कान्ह पर हाथ देनय संगबै भजारी टंडेल छै

अंगना घरक नुनुआ छथि सड़क पर उचक्का
भरल चालि ढ़ालि मे अवरपनीक अटखेल छै

"शांतिलक्ष्मी" देखय छत पर षोडषीक काकचेष्ट
बाट ठाढ़ बौआक आंखि मे बकोध्यानक झमेल छै

.........वर्ण १९........

गज़ल


अपने पुरखाक मानदानक जड़ि कोड़य मे सभ लागल छै
कियो ककरो कहै घताह कियो ककरो कहै निटट पागल छै

बाँसक बंश केँ उकनै बाँसे देखू कुढ़ैड़क पोन मे छै पैसल
फ़ाटैत मानक चद्दरि केँ सिबै सुईक पोन कियै नै तागल छै

अपने लोकक टाँग घिचैत बेंग केर बनल सभकियो खिस्सा
माय सुमैथिलीक करमे बुझाइत आइ भs गेल अभागल छै

बरदक कान्हक पालो जनु बुझाइत धीयापुता केँ बड़ भारी
छुट्टा खाइत बौआइत एनाहैत जेना अड़िया बछ्छा दागल छै

अपन लोकवेद केँ आगु करय आइ जखन दुनियाँ चेतल
हमसभ निभेर भेल तैयो सुतल, कहु के कतय जागल छै

अहंकारक धाह तापैत मैथिल जनगण छथि अगरमस्त
समाजक एहन विचित्र स्वभाव सेँ "शांतिलक्ष्मी"यो नै बागल छै

..........वर्ण २४........

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

गजल


छाति तानि ठाढ़ सैनिक दुश्मनक तोप बरसाबैत अंगोरा
लहास घिसियावैत कुत्ता पढ़ि कवैती शेर केँ कहै भगोरा

सात कोनटाक मरचट्टा बदलै कोन-कोन रंगक नै झन्डा
बलिदानीक सारा लागल पाथर केँ की बुझतै ओ लिकलोढा

सौ मुनसाक संग जे खेलकरी राति-दिन खेलावै रसलीला
सून बाट चलैत छौड़ी केँ कहलकै गे बज्जर खसतौ तोरा

जँ बातक नहि ठीक तँ बापोक नहि ठीक के छै सत्ते कहवी
उनटा-पुनटा गप्पक सतखेल करै ई कुर्सीक चटकोरा

नौ सौ मुस खाय केँ बिलाय साधु नाहैत चानन ठोप लगौने
सुसुम खुन चाटय सुंघसुंघ करै ई लाकर आदमखोरा

"शांतिलक्ष्मी" माथ धयनै बैसल देख रहलै हेँ सभटा छिछा
लोकतंत्रक अस्मिता लुटय बेकल कोना देसक कुलबोरा

............वर्ण २३...........

गजल



हम हारि जाइ छी जखन तखन इयाद करै छी तोरा
सुझै नै अछि जेँ अबलम्ब घुरि पुनर्याद करै छी तोरा

बाबा यौ अकाले अहाँ सुति रहलौ ऐना कियै चिरनिंद्रा
जँ उठल अहाँक पसरल छाया बेमियाद गुणै छी तोरा

ताजीवन सपलिवार केँ कुशोक कलेप नै देलौ आवै
सुख समृद्धि वैभवक आइ देल प्रसाद बुझै छी तोरा

जखन जखन देखै छी ई पीरही, खड़ाम आ फुलही लोटा
घुमैड़ घुमैड़ चुल्हातर हम अंतर्नाद कनै छी तोरा

भेटय अहाँक निर्मल आत्माकेँ मौक्ष, स्वर्ग आ चिरशांति
हे हमर ईश्वर बस एतबे फ़रियाद करै छी तोरा

दियौ कोढ़क सक्कत होइ केर आशीर्वाद "शांतिलक्ष्मी" केँ
लs बेकल मन नतमस्तक पंकजपाद पड़ै छी तोरा

.....................वर्ण २१.............

गजल


छुछ दुलार सैह कथीदन नाम
दुलरप्रेमक छै बड्ड तमझाम

बाप लगाय पी छुतैल गारि पढ़ै
सुनि हुलसै प्रियाक मनसधाम

मजा लैत प्राणप्री बस ठिठियावै
हँसि-हँसि घिचै पीया गालक चाम

जत्तै प्रेम गहिरावै गारि छुतावै
लोक कहै हिनका संस्कारेक बाम

स्नेहक जग मे रुप बहुरंग छै
सभ बनय राधा सभ घनश्याम

प्रेमक पसार पहाड़ सन लागै
"शांतिलक्ष्मी"केँ बुझै मे छुटय घाम

............वर्ण १३............
(हम अपन विदेह ग्रुप पर भेजल अपन पुर्वक पोस्ट केँ एहिठाम अद्यतन कs कs पठा रहल छी)

गजल



जे रुप अछि जे रंग अछि
कुँयै मे घोरल भंग अछि

सेक्स बेचय के छै फ़ैसन
उघरैत अंग अंग अछि

पार्क आफ़िस बाट चौबट्टी
ओहिना सेक्स चितंग अछि

अंग प्रदर्शनक धुम छै
निसाँ मे लोक मतंग अछि

हरैय रहलै हेँ मातृत्व
आधुनिक ओ जे नंग अछि

गोलाइक सभकेँ गुमान
रति-स्वप्नक उमंग अछि

झाँपल के होइ दुर-छीह
आहा ततै जे उतंग अछि

बदलैत संस्कृतिक रुप...
देखि "शांतिलक्ष्मी" दंग अछि

.......वर्ण १०........

रविवार, 18 दिसंबर 2011

गजल


हमर शब्द केँ नै बुझु जनु हलाली छुरी यौ
जे पटैक ककरो काटि रहल होइ मुरी यौ

हमर शब्द नै बान्हि कोनो प्रश्नकेँ बरेरी मे
दु पैसा बचबई लेल बेचय बट्टी-कुरी यौ

हमरा नै चाही लुल्हुआ-डुबौन क्षीर-भोजन
नै चाही तरल मुर्गा-टाँग, कि हलुआ पुरी यौ

लोभ नै हमरा मोफ़तक टका-टकसालक
बस नै चाही हमरा इनामक एक्को ठुरी यौ

कहकह आगि शब्द हमर तेँ अंगोरे तबै
डाहै चाहे स्त्रीक दुर्गत्तिक समाजिक रूढ़ि यौ

बस कोनो स्त्रीक अस्मिता आब नै जोक्सर चढ़ै
धी-बहिनक सपना मे सजै सिन्दुर-चुरी यौ

"शांतिलक्ष्मी"क शब्द सजबै एतबे सेहेनता
नारी सददि बनल रहै गृहस्तिक धुरी यौ

..........वर्ण १७.........






शनिवार, 10 दिसंबर 2011

गजल


दिन सुदिने बुझाइत ई कुहेस मे
देस फँसल अछि घोटाला आ केसमे

लोकतंत्रक राजा जनता-जनार्दन
जनते सुतय तँ तंत्र पेसो-पेस मे

पाप पराकाष्ठ होई जनमै श्रीकृष्ण
मीडीया छथि जागल ऐय्यार भेष मे

छुलाह पहिनौ पापक माल खेलकै
न्यायक आँखि आइ पड़ल उधेस मे

जनता छाती ठोकि आब लड़ै भीड़ल
लोकपालक अस्त्र देखि चोरो क्लेश मे

"शांतिलक्ष्मी"केँ सभकिछु शुभे बुझाबै
कृष्ण, चाणक्य, गाँधी, आ अन्नाक देस मे

..............वर्ण १४............

Ashish Anchinhar भैयाजी आ Om Prakash Jha भैयाजी केँ संयुक्त रुप सँ समर्पित




शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

गजल



शिशु सिया उपमा उपमान छियै हमर आयुष्मति बेटी
मैत्रेयी गार्गीक कोमल प्राण छियै हमर आयुष्मति बेटी

टिमकैत कमलनयन, धव-धव माखन सन कपोल
पुर्णमासीक चमकैत चान छियै हमर आयुष्मति बेटी

बिहुसैत ठोर मे अमृतधारा बिलखैत ठोर सोमरस
शिशु स्वरुपक श्रीभगवान छियै हमर आयुष्मति बेटी

नौनिहाल किहकारी सरस मिश्रीघोरल मनोहर पोथी
दा-दा-ना-ना-माँ सारेगामा गान छियै हमर आयुष्मति बेटी

सकल पलिवारक अलखतारा जन्मपत्रीक सरस्वती
अपन मैया-पिताश्रीक जान छियै हमर आयुष्मति बेटी

ज्ञानपीठक बेटी छियै सुभविष्णु मिथिलाक दीप्त नक्षत्र
मातृ पितृ कुलक अरमान छियै हमर आयुष्मति बेटी

"शांतिलक्ष्मी" विदेहक घर-घर देखय इयह शिशुलक्ष्मी
बेटीजातिक भविष्णु गुमान छियै हमर आयुष्मति बेटी

..................वर्ण २२................

ई गजल " मिथिला-दर्शन" केर अंक मइ-जून २०१२मे प्रकाशित भेल।

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

गजल


सोसल साइट पर करैत छै सेंसर के दाबी रे भाय
अभिव्यक्तिक स्वच्छंद साँढ़ मुँह बन्हबै की जाबी रे भाय

जखन चुट्टी केँ घरघरावै मौत निकैल आबै छै पाँखि
आकि नढ़ियाक पैइर जे शहर दिस पराबी रे भाय

राखै देने छियौ बंदुक तँ देखवै छै हवलदारी रौव
पदक निंशा मे एना भँगेरी जकाँ जुनि बौराबी रे भाय

नागरिक अधिकार मान केँ मरदें भs गेल छै हिंसक
हमरे पोसल बिलाय हमरे मिआँऊ सुनाबी रे भाय

देसक दहिण करूआरी धs तुँ हमरे प्रतापेँ बैसल
हमरे किचकिचावै की फ़ुरलौ जे मल्हार गाबी रे भाय

"शांतिलक्ष्मी" अहुँ नै करी अमोघ अस्त्रक अभद्र प्रयोग
पाकिस्तानक हाथ जेना अणुशक्ति शालाक चाबी रे भाय

................वर्ण २१...........

गजल


लोकपाल! लोकपाल! जनलोकपाल! जनलोकपाल!
देसधर्म रक्षा लेल घुरि आउ हे गोविन्द! हे गोपाल!

कुरुक्षेत्र मे ता बाकयुद्ध केर घमासान मचल छै
अधर्म कपटी-भूप जनताकेँ पटकवा मे बेहाल

गोंगियाइत राजाक बेलज्ज प्यादा फुच-फुच उछलै
राज-मोहक आन्हर धृष्टराष्ट्रक घिचपिच घौंचाल

दुर्योधन-दुसाशन राष्ट्रक चीरहरण लs आतुर
राजलक्ष्मी केँ नग्न नचेताह मातृभुमियेक भुपाल

भीष्म द्रोण कर्ण पदत्यागि केँ धर्मक संग ठाढ़ भेल
लs लोकतंत्रक अस्त्र, सत्य-अहिंसा उपासक सुढ़ाल

"शांतिलक्ष्मी" कलजोड़ि अनुनय सुविनय करै अछि
हौइयौ आबो प्रगट हे कृपाल! हे प्रभु दीन-दयाल!

.................वर्ण २०.............


गजल


पायर तर बगरा बाप रौ बाप
रक्तबीज सन भ्रष्टाचारक पाप

जनसेवाक आब भिन्ने परिभाषा
नेता-चरित्रक अलगे छवि-छाप


उज्जर वसन वचन गंगाजल
नैनक नोर नेनै नकार-विलाप

चारा खेलकै कोयला अलकतरा
आँकरो पचलकै बिना उपचाप

कामनवेल्थ-गेम की टु-जी स्पेक्ट्रम
भँवरी केँ दाहलकै दैहिक ताप

नेता भेलय चमचोर, चोरो नेता
चोर-चोर मसियौतक छहै श्राप

"शांतिलक्ष्मी" चिन्है जाति-धर्मक मोह
कुपात्र केँ वोटेक फल ई संताप

..........वर्ण १३..........

गजल


अंगने अंगने देखियौ कोना काँट बुनल छै
भाय भैयारी मे फटेदारीक फाँट उठल छै


समाजक नीक लोक पंचैती नहिये अयतै
छुटल मुँह छौरा के नंगरझाँट देखल छै


गामक लिच्चर धs मसलन घोटै चायपान
मन खाली शैतानी आ बनरबाँट भरल छै

मजगुतहा लठिधरवा करै कुकुरालुझि
तेलही लाठी संग बबुरक झाँट उठल छै

निरदुब्बर सभ छैहिये डर सँ मुह सीने
मोन मे लठियाक गैरिक कोराँट भरल छै


माय-बाप केँ हिस्सा दै मे सभ करै खबखब
बुढ़ारी मे तेरहो गंजन आ डाँट धरल छै

गैरिखोरवा सभ होसथलकै निकहरवा
चुप छै तेँ कि हुनका मुँहक बाँट भेटल छै

"शांतिलक्ष्मी" देखय जकरे लाठी तकरे भैंस
समाज मे आइयो उचितक टाँट पड़ल छै

..................वर्ण-१७................


रविवार, 20 नवंबर 2011

गजल

ताकु जुनि आदिक सुआद-भाव बानरक मुंह पर
मोती सनक नोर कियै खसैव कुकुरक गुंह पर

निवाहै नारी पतिव्रत छुतहर छुतहर वर लै
निर्लज्ज केँ कतो नोर खसय बिमारि-स्त्रीक ऊंह पर

कोयलीक बोल गाबि कवियित्री भेलीह स्वर-कोकील
बहीर-भुंच केँ कत्तौ आह उठै कोयलीक कुंह पर

ढ़ुंहै जवानी हुनकर उमड़ैत कोशीक ढ़ौंह सन
मोनक अपंग केँ तरंग कत्तs जवानीक ढ़ुंह पर

समाजक डंड सेहो भ गेलय निपट अपंग आब
अंतरात्माक लाज कहाँ अबंडक सुसुरमुंह पर

"शांतिलक्ष्मी"ये की सब चिन्है स्त्री केँ सतवैत सपौल केँ
छथि के आइ जे नाथ चढ़ौते एहि साँपक पुंह पर

....................वर्ण २०....................

मंगलवार, 15 नवंबर 2011

गजल


देस मे स्त्रीगणक घटैत जनसंख्याक होहल्लाक बीच बढ़ैत बहिनक सेहनताक टीस
मैथिल लोकनिक सभ्यतर समाज मे की छैक एखनो जिवैत बहिनक सेहनताक टीस

अँगनाक अनघोल सँ हराइत लालदाय फ़ुलदाय सोनदाय केर प्रियगर पिहु बोल
कनियापुतरा, करियाझुम्मरि, कीतकीत आ पचीसी खेलवैत बहिनक सेहनताक टीस

महाअष्टमी, एकादशी, काली-दुर्गा-लक्ष्मी पुजा छैके एखनहुँ मैथिलक पैघे पावनि-तिहार
खीर रोटक पातरि आ कुमारि-भोजन लेल पात पर घटैत बहिनक सेहनताक टीस

राखि, भरदुतिया, सामाक दिन सहोदरक अभाव मे गोहनावैत बहिन सँ भावक आस
भायक योगक्षेम, समृद्धि आ औरदाक लेल अरपैन रचैत बहिनक सेहनताक टीस

कान्यादान मैथिल जीवन महात्त्म मे कहवैत छै वंश आ पितर-उद्धारक लेल महादान
परिणय संस्कार काल मे पवित्र लज्जाहोम केर लावा छिटैत बहिनक सेहनताक टीस

जनम-जन्मांतरक प्रारब्ध बुझी पुरखे लग सँ पिता धरौलनि पर देशक पियाक पाणि
दुरागमन दिन दुलहिन भs दारुण नैन नोरे-झोरे कनैत बहिनक सेहनताक टीस

उपनैन, मुरन, वियाह, दुरागमन सन जरजाजन सँ अलोपित होइत धी-सुवासिन
कनफुल, कंगन, हार, सिथफुल, पायल पहिरकेँ छमकैत बहिनक सेहनताक टीस

सासुरक सारि आ बहिनयैरक ननदि वर्गक पिहकारी केर सुखाइत खट्टमिट्ठ भाव
मधुर संबंध जाल सँ बिलायत सारि आ ओझाजीक रहसैत बहिनक सेहनताक टीस

एकलघर आ एक्के धी पर लिंग परीक्षण संग दुई पुत पर बच्चा-बन्नक बढ़लै रीत
"शांतिलक्ष्मी" कत्तs पेती घरै दु-बहिनक स्नेह-सुख मध्य रमैत बहिनक सेहनताक टीस

..........................वर्ण ३५..........................




गुरुवार, 3 नवंबर 2011

गजल



विकासक आगु विचार देखियौ कोना खसल जाइत छै
लिअ’ लोगबाग आब प्रगतिक पथ चढ़ल जाइत छै

बुढ़-पुरान सँ सिनेह-भावक भs रहलै अभाव आब
स्थुल माय-बापक निमेराक तँ रीते उठल जाइत छै

बुढ़वा-बुढ़िया केँ भिन कs बेटा गप भँजे छथि सुभ्यस्त
आब कोवरे सँ गिरथैनि बहराति देखल जाइत छै

कोर पोसल स्वपुत जखन भs रहल छै कर्तव्य च्युत
भावक धर्मपुत पाबि बुढ़ाकेँ नोर ढ़रल जाइत छै

खड़ खड़ जोड़ि जे ठाढ़ केयलनि आश्रम घर गृहस्ती
वैह बुढ़ घरसँ निकैलि बृद्धाश्रम ढ़ुकल जाइत छै

बुढाक स्वर्ग सिधारैक पसरल छै भोरे सँ घुनसुन
मुदा कनना-आरोहैटक आइ लाजो उठल जाइत छै

"शांतिलक्ष्मी" हँसै सोचि सोचि चौथापनक अहाँक दुर्गति
इहो वयस बुढ़ापाकेँ तँ ओहिना गुड़कल जाइत छै

.....................वर्ण २१................


शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

गजल


गुनगुनाइत प्रेमक गीत लs कंठ भेल सधुन सितार पिया
सिनेह खेल काल कियैक ऐना देखबैत छी लटमझार पिया

काटु जुनि एहन जोर सँ बड्ड दुखाइत अछि ई लहरचुट्टी
देखु सम्हैर चलु सुकुमार आंगुर नै आबि जाय मोचार पिया

कचोर हरियर गभाइत धान सन गम्हरैत ई स्त्री-यौवन
एहन तन तरुण केर भुखायल छैक सगर संसार पिया

सुमधुर अहाँक प्रीत संग गमकैत अछि हमर सुबदन
प्रेम-पाशक बान्हु जुनि छान खसब हम धड़मबजार पिया

अनुराग-बिराग आतिपाति खेलि कतैक स्नेह-कलह करब
उढ़ैर रहल आब मोन मे उठल सभ मधुरस शृंगार पिया

"शांतिलक्ष्मी" कहैत छथि ऐना जुनि विचलित मोन हौउ हे सखि
भरि आँखि सुप्रीतरस लs मुस्कैत भावैं भs गेलाह देखार पिया


................वर्ण २४.............

अक्षय कुमार चौधरीजी केँ समर्पित
तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों