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गुरुवार, 15 सितंबर 2011

गजल

लागल छै अगराही शहर मे चलि क' देखलिय.
इक्किसवीं सदिं मे घर सं निकलि क'देखलिय.

बात दोसरक करी ई कोनो निक गप्प नहीं,
दोसर सं पहिने अपने कांट प'चलि क'देखलिय.

नहि कियो दोस्त नहि दुश्मन एही दुनियां मे,
मनुष्य मात्र चेतन अछी मन के बदलि देखलिय.

ई कोनो खेल नहि बालू केर जिनगी जी लेव एहिना,
लगे शर्त प' शर्त तं सिक्का उछालि क' देखलिय .

एहि दुनियां के सम्हारी क' आहा की देखबैन ,
देखबाक हुए "दीपक"तं स्वयं के सम्हारी क'देखलिय.

गजल

निष्पलक हम जोही रहल छि अहिक' बाट प्रिये .
अबिक' हिय हल्लुक क'दिय फूल बनल काँट प्रिये .

कहने रही आहां प्रणयिनी आएब आई निजगुत्ते ,
सुधी मे अहीक' बताह भेल छि सत्य करू ने बात प्रिये .

गुज-गुज अन्हरिया हे प्राणप्रिये छारल छै मेघ करिया ,
निर्जन निशा मिलनक'उताहुल जान हमर अछी आट प्रिये.

कोन प्रारब्ध छल हमर जे संग अहाँक छुटि गेल ,
दुर्दिनक' फेर मे अपन फोरि रहल छि मात प्रिये .

इच्छा अछि अंतिम हमर वाहि पसारि क'औ प्रिये ,
"दीपक"सिनेह आतुर चित के करब नही उदास प्रिये.

बुधवार, 31 अगस्त 2011

गजल

आहां नहि येलौं हम ताहि सं तबाह छी.
जिबै छी मुदा जिनगी सं तबाह छी ।

आर किनको सं नहि हमरा उलहन-परतर,
हम तं एकगोट प्रिये अहिं सं तबाह छी.

दुश्मनी केर कोनो नहि चिंता-फिकिर,
सत्य कही तं दोस्ती सं तबाह छी .

नेहक सिवा आर की द सकैत छी हम,
हम तं गरीब आर गरीबी सं तबाह छी।

दू गोट"दीपक"कोना जराऊ सनेह केर प्रिये,
हम तं आपने ज्योति सं तबाह छी .

गजल

दुश्मनक लेल कफ़न दोस्तक लेल दुआ राखैत छी .
हम हिंदुस्तान छी पैर तर समूचा दुनियां राखैत छी.

नज़रि कें चोट सं पाथारक देबाल ढाहि देब ,
तुफानक रुख मोड़ी देब एहन हौसला राखैत छी ।

कियो की बुझायेत हमरा प्रेम केर पहेली प्रिये ,
जतनीक अपन सिरहाना मे प्यार के गीता राखैत छी.

फिकरी मृतुअक नहि चिंता जिनगीक राखैत छी ,
सदिखन जीबैत अपन हिरदय में लहराईत तिरंगा राखैत छी ।

हाय कियो माय के लाल त हिंद प आखी उठाक देखि लौ ,
हमहूँ अपन छाती मे "दीपक" शेर के करेजा राखैत छी .


सोमवार, 13 जून 2011

गजल

घुस जाल-फरेब तिलक-दहेज़ उत्पिरण अत्याचार नहि बदलल
समूचा संसार बद्लिगेल आखिन धरि बिहार नहि बदलल



जाती-पांतिक भेद नहि बदलल समाजक आधार नहि बदलल
कोषिक धार बदलिगेल मित! जिवन धार नहि बदलल


महाभारत भेल"यातोधर्मस्तातो जय:"कहल जैत छै मुदा
छल-प्रपंच आ भाई-भाई मे वैमनास्यक बिचार नहि बदलल


हजारो द्रोपदी"दुःख हरहूँ द्वारिकानाथ"के रट लगौने छथि
आखी फारीक'देखियौंन करोड़ो पांडवक सुख-संसार नहि बदलल


सूरज नहि हम अन्हारक बिरोधी छी तें मन मे कचोट शेष अछि
पुर्निमाक रति पर"दीपक"आमावासयाक अन्हार नहि बदलल

रविवार, 12 जून 2011

गजल

घरक' मोह ममता छोरिक'ओ बिहान चलि गेल
गरीबी सं तंग आबिक' ओ आसाम चलि गेल

हथियाक ' हाल बत्तर चित्राक' सेहो नहि बरसल,
एहि रौदिक मुह मे कित्तक'-कित्तक'धान चलि गेल
तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों