लागल छै अगराही शहर मे चलि क' देखलिय.
इक्किसवीं सदिं मे घर सं निकलि क'देखलिय.
बात दोसरक करी ई कोनो निक गप्प नहीं,
दोसर सं पहिने अपने कांट प'चलि क'देखलिय.
नहि कियो दोस्त नहि दुश्मन एही दुनियां मे,
मनुष्य मात्र चेतन अछी मन के बदलि देखलिय.
ई कोनो खेल नहि बालू केर जिनगी जी लेव एहिना,
लगे शर्त प' शर्त तं सिक्का उछालि क' देखलिय .
एहि दुनियां के सम्हारी क' आहा की देखबैन ,
देखबाक हुए "दीपक"तं स्वयं के सम्हारी क'देखलिय.
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गुरुवार, 15 सितंबर 2011
गजल
गजल/आलेखक लेखक/प्रस्तुतकर्ता छथि:
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पर
9/15/2011 03:51:00 pm
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गजल
निष्पलक हम जोही रहल छि अहिक' बाट प्रिये .
अबिक' हिय हल्लुक क'दिय फूल बनल काँट प्रिये .
कहने रही आहां प्रणयिनी आएब आई निजगुत्ते ,
सुधी मे अहीक' बताह भेल छि सत्य करू ने बात प्रिये .
गुज-गुज अन्हरिया हे प्राणप्रिये छारल छै मेघ करिया ,
निर्जन निशा मिलनक'उताहुल जान हमर अछी आट प्रिये.
कोन प्रारब्ध छल हमर जे संग अहाँक छुटि गेल ,
दुर्दिनक' फेर मे अपन फोरि रहल छि मात प्रिये .
इच्छा अछि अंतिम हमर वाहि पसारि क'औ प्रिये ,
"दीपक"सिनेह आतुर चित के करब नही उदास प्रिये.
अबिक' हिय हल्लुक क'दिय फूल बनल काँट प्रिये .
कहने रही आहां प्रणयिनी आएब आई निजगुत्ते ,
सुधी मे अहीक' बताह भेल छि सत्य करू ने बात प्रिये .
गुज-गुज अन्हरिया हे प्राणप्रिये छारल छै मेघ करिया ,
निर्जन निशा मिलनक'उताहुल जान हमर अछी आट प्रिये.
कोन प्रारब्ध छल हमर जे संग अहाँक छुटि गेल ,
दुर्दिनक' फेर मे अपन फोरि रहल छि मात प्रिये .
इच्छा अछि अंतिम हमर वाहि पसारि क'औ प्रिये ,
"दीपक"सिनेह आतुर चित के करब नही उदास प्रिये.
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9/15/2011 03:06:00 pm
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बुधवार, 31 अगस्त 2011
गजल
आहां नहि येलौं हम ताहि सं तबाह छी.
जिबै छी मुदा जिनगी सं तबाह छी ।
आर किनको सं नहि हमरा उलहन-परतर,
हम तं एकगोट प्रिये अहिं सं तबाह छी.
दुश्मनी केर कोनो नहि चिंता-फिकिर,
सत्य कही तं दोस्ती सं तबाह छी .
नेहक सिवा आर की द सकैत छी हम,
हम तं गरीब आर गरीबी सं तबाह छी।
दू गोट"दीपक"कोना जराऊ सनेह केर प्रिये,
हम तं आपने ज्योति सं तबाह छी .
जिबै छी मुदा जिनगी सं तबाह छी ।
आर किनको सं नहि हमरा उलहन-परतर,
हम तं एकगोट प्रिये अहिं सं तबाह छी.
दुश्मनी केर कोनो नहि चिंता-फिकिर,
सत्य कही तं दोस्ती सं तबाह छी .
नेहक सिवा आर की द सकैत छी हम,
हम तं गरीब आर गरीबी सं तबाह छी।
दू गोट"दीपक"कोना जराऊ सनेह केर प्रिये,
हम तं आपने ज्योति सं तबाह छी .
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8/31/2011 11:23:00 am
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गजल
दुश्मनक लेल कफ़न दोस्तक लेल दुआ राखैत छी .
हम हिंदुस्तान छी पैर तर समूचा दुनियां राखैत छी.
नज़रि कें चोट सं पाथारक देबाल ढाहि देब ,
तुफानक रुख मोड़ी देब एहन हौसला राखैत छी ।
कियो की बुझायेत हमरा प्रेम केर पहेली प्रिये ,
जतनीक अपन सिरहाना मे प्यार के गीता राखैत छी.
फिकरी मृतुअक नहि चिंता जिनगीक राखैत छी ,
सदिखन जीबैत अपन हिरदय में लहराईत तिरंगा राखैत छी ।
हाय कियो माय के लाल त हिंद प आखी उठाक देखि लौ ,
हमहूँ अपन छाती मे "दीपक" शेर के करेजा राखैत छी .
हम हिंदुस्तान छी पैर तर समूचा दुनियां राखैत छी.
नज़रि कें चोट सं पाथारक देबाल ढाहि देब ,
तुफानक रुख मोड़ी देब एहन हौसला राखैत छी ।
कियो की बुझायेत हमरा प्रेम केर पहेली प्रिये ,
जतनीक अपन सिरहाना मे प्यार के गीता राखैत छी.
फिकरी मृतुअक नहि चिंता जिनगीक राखैत छी ,
सदिखन जीबैत अपन हिरदय में लहराईत तिरंगा राखैत छी ।
हाय कियो माय के लाल त हिंद प आखी उठाक देखि लौ ,
हमहूँ अपन छाती मे "दीपक" शेर के करेजा राखैत छी .
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8/31/2011 10:18:00 am
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सोमवार, 13 जून 2011
गजल
घुस जाल-फरेब तिलक-दहेज़ उत्पिरण अत्याचार नहि बदलल
समूचा संसार बद्लिगेल आखिन धरि बिहार नहि बदलल
जाती-पांतिक भेद नहि बदलल समाजक आधार नहि बदलल
कोषिक धार बदलिगेल मित! जिवन धार नहि बदलल
महाभारत भेल"यातोधर्मस्तातो जय:"कहल जैत छै मुदा
छल-प्रपंच आ भाई-भाई मे वैमनास्यक बिचार नहि बदलल
हजारो द्रोपदी"दुःख हरहूँ द्वारिकानाथ"के रट लगौने छथि
आखी फारीक'देखियौंन करोड़ो पांडवक सुख-संसार नहि बदलल
सूरज नहि हम अन्हारक बिरोधी छी तें मन मे कचोट शेष अछि
पुर्निमाक रति पर"दीपक"आमावासयाक अन्हार नहि बदलल
समूचा संसार बद्लिगेल आखिन धरि बिहार नहि बदलल
जाती-पांतिक भेद नहि बदलल समाजक आधार नहि बदलल
कोषिक धार बदलिगेल मित! जिवन धार नहि बदलल
महाभारत भेल"यातोधर्मस्तातो जय:"कहल जैत छै मुदा
छल-प्रपंच आ भाई-भाई मे वैमनास्यक बिचार नहि बदलल
हजारो द्रोपदी"दुःख हरहूँ द्वारिकानाथ"के रट लगौने छथि
आखी फारीक'देखियौंन करोड़ो पांडवक सुख-संसार नहि बदलल
सूरज नहि हम अन्हारक बिरोधी छी तें मन मे कचोट शेष अछि
पुर्निमाक रति पर"दीपक"आमावासयाक अन्हार नहि बदलल
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रविवार, 12 जून 2011
गजल
घरक' मोह ममता छोरिक'ओ बिहान चलि गेल
गरीबी सं तंग आबिक' ओ आसाम चलि गेल
हथियाक ' हाल बत्तर चित्राक' सेहो नहि बरसल,
एहि रौदिक मुह मे कित्तक'-कित्तक'धान चलि गेल
गरीबी सं तंग आबिक' ओ आसाम चलि गेल
हथियाक ' हाल बत्तर चित्राक' सेहो नहि बरसल,
एहि रौदिक मुह मे कित्तक'-कित्तक'धान चलि गेल
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6/12/2011 07:44:00 pm
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