गजल
जवानीके सहेजक किया बैसल छी सजनिया
चुनि लिअ एकटा हजारोमे अपन साँवरिया
ओकरे सौपि हृदय आहाँ बनि जाउ महारानी
तखन खन-खनाएत पाएरमे पैजनिया
देखब कही बित ने जाए एहु बेरक लगन
एखनेसँ जोडिलिअ प्रेमीसँ पि्रतक सिनेहिया
जवानीके सहेजक किया बैसल छी सजनियाँ
चुनि लिअ एकटा हजारोमे अपन साँवरिया । ।
वर्ण ....18
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गुरुवार, 11 अगस्त 2011
गजल
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prabin chaudhary 'pratik'
रविवार, 7 अगस्त 2011
गजल
भागब कोनाक दुर जीन्गी सँ
डरब किया मृत्यु केर चीन्गी सँ
जीबन जीब लेल हराण
तोडब त्रास हम जीन्गी सँ
मेटत बहुतो मित्र हित सब
चाहे करै घात कियो जीन्गी सँ
जीवन एकटा राजमार्ग छिऐक
बाचा तोडि चलब जीन्गी सँ
जँ कियो लेब चाहत हमर प्राण
दुर भऽ जायत ओ जीन्गी सँ
आओत फेर सुन्दर भोर
हिया हारी किया जीन्गी सँ
डरब किया मृत्यु केर चीन्गी सँ
जीबन जीब लेल हराण
तोडब त्रास हम जीन्गी सँ
मेटत बहुतो मित्र हित सब
चाहे करै घात कियो जीन्गी सँ
जीवन एकटा राजमार्ग छिऐक
बाचा तोडि चलब जीन्गी सँ
जँ कियो लेब चाहत हमर प्राण
दुर भऽ जायत ओ जीन्गी सँ
आओत फेर सुन्दर भोर
हिया हारी किया जीन्गी सँ
गजल/आलेखक लेखक/प्रस्तुतकर्ता छथि:
prabin chaudhary 'pratik'
पर
8/07/2011 03:44:00 pm
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शुक्रवार, 5 अगस्त 2011
गजल
बिन पिउनहिं निशा लागल
निर्दोषे छलहँु मूदा बात लागल
ग्रहदशा बढिएँ कहैत छल
अचानक फेर साढे साती लागल
पसिना त हमरो बहल छल
उपलब्धि कमे हाथ लागल
खुशिक फुल टुटि खसल
प्रतिष्ठामें अनादरक लात लागल
अन्धकार मिटाबी मुख्य लक्ष्य छल
मूढा उल्टे पाँछा राति लागल !!
निर्दोषे छलहँु मूदा बात लागल
ग्रहदशा बढिएँ कहैत छल
अचानक फेर साढे साती लागल
पसिना त हमरो बहल छल
उपलब्धि कमे हाथ लागल
खुशिक फुल टुटि खसल
प्रतिष्ठामें अनादरक लात लागल
अन्धकार मिटाबी मुख्य लक्ष्य छल
मूढा उल्टे पाँछा राति लागल !!
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गजल
अडकल छै खुशि सबहक साँसमें
समटल छै दर्द सबहक साँसमें !
चहुँ दिसँ छै तबाही के संजाल
छै भय आ डर हटबाक आसमें !
दुःख आ दर्द क बिच
जीब रहल छै सब त्रासमें !
समाजक लपेटमें लपटल
धुडिअएल छै अपन-अपन बासमें !
गुण्डागर्दी छै कर्तव्य केर नाम पर
मनक बात है लसकल गाँसमें !!
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