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सोमवार, 16 अप्रैल 2012

गजल

हम अहाँ सँ मधुर मिलन के, सपना देखैत रहलौं ||
जखन अहाँ सँ भेंट होयत, की कहब सोचैत रहलौं ||


नहिं बूझल छल प्रेमक भाषा, परिभाषा की करू अब.?
नेहक पाती पर ओहिना किछु लिखैत - कटैत रहलौं ||


प्रेमक चन्दन, मोनक भीतर, गमकल - भाँग बनल,
जकर नशा हम मोने - मोने, पीबैत - बह्कैत रहलौं ||


मोनक मधुबन में, शैफाली, लुधकल प्रेमक फूल सँ,
जेहि के तेज सुगंधी में हम, रचल - गमकैत रहलौं ||


दीपक बनिकय इन्तिज़ार जे केलौं , से अब कहू कोना ?
घायल बनिकय कोना प्रेम में, मरैत - जीवैत रहलौं ||


आबि गेलों जे अहाँ आइ अब नहिं कोनो संताप रहल,
बिसरि गेलौं ओ दुःख जे पहिने भोगैत - सहैत रहलौं ||

रचनाकार - अभय दीपराज

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

गजल


अभय कान्त झा दीपराज कृत -ग़ज़ल



सोचैत छथि किछु लोकनि अक्सर- हमर कप्पार जरल अछि |
उठावय में जे भारी अछि, एहन किछु भार परल अछि ||

जखन विश्वास अपना पर, अहाँ के नहिं रहत बाँचल,
ओहू शेरक नज़र सँ मोन घबरायत जे मरल अछि ||

कोना ओहि आदमी के जीत भेंटतै वा सफल होयत ....?
जे बस हरदम बनल कोढ़ियाठ, बिस्तर ध क परल अछि ||

पड़ोसी भाई के कनियाँ, अहाँ के साइर और भौजी,
लगैत अछि देह हुनकर माटि नहि, कुन्दन सँ गढ़ल अछि ||

बहुत किछु ज्ञान रहितो हम, बहुत गलती सँ नहिं बचलौं,
तेना लागल जेना दारु, एखन माथा में चढल अछि ||

परीक्षा के जखन हम नाम सुनैत छी त कँपैत छी,
लगैत अछि- सबटा बिसरल रहैत छी, जे की पढल अछि ||

जों राखब मोन में संतोष, थोरबो में खुशी भेंटत,
ओ गाछी काल्हि फेर फरत, जे कम एहि बेर फरल अछि ||

जे करक अछि अहाँके काज, करब जों, त भ जायत,
जों देहक दर्द के अनुभव करब, लागत जे बढल अछि ||

निराशा मोन में जों अछि, त रस्ता नहिं कटत कखनों,
बुझायत ई- जेना किछु काँट सन तरवा में गड़ल अछि ||

भेंटल जे हैसियत, ओहि सँ, करू उपकार दुर्बल के,
ओ पोखरि कोन काजक ? जे भरल अछि किन्तु सड़ल अछि ||

रचनाकार - अभय दीपराज

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

ग़ज़ल



मोन प्रपंच पाप सँ दूषित, भाषण जन - समुदाय के
कोना एहन नायक समाज में, परचम बनता न्याय के

कथनी में आदर्श, कलंकित करनी सँ नफरत के पात्र,
कोना समाज एहन व्यक्ति के, शत्रु कहय अन्याय के

किछु दिन संभव अछि चालाकी किन्तु अंत नहिं नीक एकर,
सदा अंत में हारव निश्चित, दानव के पर्याय के

धर्म, सत्य और न्याय-मनुजता, नैं हारल, नैं हारि सकत,
झूठ नैं कखनों बना सकत क्यों, अपन सबहक ऐहि राय के

धर्म अपन अछि - अपना कारण अपन वंश के मान बढय,
कहि नैं पावय क्यो कपूत के जननी अपना माय के

आदर्शक पथ पकडि
चलू और करैत रहू कर्त्तव्य अपन,
लक्ष्य इहय बस सर्वोत्तम अछि, बुझू हमर अभिप्राय के
रचनाकार - अभय दीपराज

बुधवार, 9 मार्च 2011

ग़ज़ल


ग़ज़ल

कहू कोना ? जे, आम आदमी
बनि कय की - की भोगलौं हम
खून - खुनामह भेल करेजा, कोना - कोना क ? जोगलौं हम


बड़ उल्लास भेल बचपन में, हम बड़ सुन्दर, काबिल छी,
गौरव छल जे - बाबू - बौआ
बनि, कोरा में झुललौं हम


भेलौं किशोर, मों
न बड़ हुलसल, मुट्ठी में संसार छलय,
धरती
सँ आकाश लोक धरि, लहरेलौं और बुललौं हम


जखन वयस्क भेलौं और आयल कंधा पर दुनिया के भार,

यौवन के गौरव में डूबल, अपन शक्ति के खोजलौं हम

देश - समाजक और कुटुम्बक, अनुभव के क
ड़वाहट में,
बेर - बेर बनि कय अभिमन्यु , चक्र - व्यूह में फँसलौं हम


जाहि घडी तक आन लोक सब दुश्मन छल, मदमस्त छलौं,
बज्र माथ पर बजरल लेकिन, ओकरो स
हि कय बचलौं हम


अपन खून सँ चोट जे लागल, सब बुद्धि - बल बिसरायल,
सुनल बात छल एक बेर के, लाख बेर पर मरलौं हम


जीवन सच में बड़ भारी छल, आदर्शक पथ और कठिन,
राम - नाम अवलंब रहल त, कुहरि -
कुहरि क कटलौं हम


रचनाकार - अभय दीपराज
तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों