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गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

गजल

घरक सिमान जखन फानल हेतै
धिया हियासँ कते कानल हेतै

सुनर शरीर छलै गुदरी साटल
कुपात्र आँखि कतौ मानल हेतै

उदरसँ आगि उठल हेतै जहिया
टघार नोरक ओ सानल हेतै

शिकार लेल शिकारी चललै यदि
जरूर जाल कतौ तानल हेतै

वियाह होइ बला टूटल निश्चित
गरीब पाइ जँ नै गानल हेतै
1212 112 2222

रविवार, 14 अप्रैल 2019

गजल

उनमत्त नेता  प्रशासन बेहाल   छै
बाजै सगुनिया चुनाबी  ई साल छै

भाषणसँ राशन किना रहलै गाममे
जनताक चुल्हा  निरैठें  बदहाल  छै

ने भूख ने प्यास ने  गप उन्नतिक छै
मुद्दा धरम जाति   छेकने चौपाल छै

बिरथे जनम भेल अछि परजातंत्रमे
शासक त' हमहीं मुदा सुन्न भाल छै

धन्ना बनल एत' शासक छै  सेठ सन
निमुधन टुअर भेल जनता कंगाल छै

2212    2122     2212

गुरुवार, 5 मई 2016

गजल

जाहि घरमे भूखल दीन अहाँ देखने होयब
हाड़ मांसक बनल मशीन अहाँ देखने होयब

एक पाइक लेल पराण अपन बेच दै छै ओ
गाम घरमे एहन दीन अहाँ देखने होयब

खेतकेँ जे कोड़ि उगा रहलै सोन सन उपजा
ओकरो मन सदति मलीन अहाँ देखने होयब

आँखिमे जनमल सपना अचके तोड़ि दै विधना
डरसँ तेँ हेरायल नीन अहाँ देखने होयब

छूबि दै सोना जँ अमित तँ बनै माँटिकेँ टुकड़ा
खूब एहन भाग्यसँ हीन अहाँ देखने होयब


२१२२-२११२-११२२-१२२२
अमित मिश्र

बुधवार, 4 मई 2016

गजल

गजल

भगत छै एहि ठाँ डलवाह नै छै
सते ककरो कतौ परवाह नै छै

रहै खेतक हरियरी बिन मवेशी
दुइभ बड छै मुदा चरवाह नै छै

कहै मिथिलाक हम उद्धार करबै
मुदा भाषा अपनपर वाह नै छै

बनै छै खेत उस्सर आब मीता
पलायन कारणसँ हरवाह नै छै

कहै छै सब मुहेंपर गजल सुन्नर
मुदा पुनि पीठ पाछू वाह नै छै

१२२२-१२२२-१२२
अमित मिश्र

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

गजल

गजल

अहींकेँ लेल हे प्रियतम हिया अजबारि रखने छी
अहाँकेँ देल सब टा यादिकेँ सम्हारि रखने छी

चलू चलि जाइ दुनियाँ छोड़ि हम निर्जन सघन वनमे
रहब हम आ अहाँ केवल कथा विचारि रखने छी

कथी छै मोल ई देहक कतहुँ नै देहकेँ मोजर
अनेरे रूपकेँ प्रियतम सजा संवारि रखने छी

उठै छै मोनमे पीड़ा जखन दै मीत सब धोखा
हँसय नै लोक दोस्तीपर, मनहिमे गाड़ि रखने छी

कहाँ छै जोर ई मनपर पथिक ई मस्त मौला छै
भटकि नै जाइ बाटसँ 'अमित' तेँ पुचकारि रखने छी

१२२२-१२२२-१२२२-१२२२

अमित मिश्र

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

नवगछुलीक प्रांजल सरस रसाल: नव अंशु

नवगछुलीक प्रांजल सरस रसाल : नव अंशु




भावक स्पष्ट प्रवाहक बहन्ने साहित्यमे पद्य विधा अतुकांत रूपेँ पसरि रहल अछि ।पद्य विधाक विकास हेतु एकर अनिवार्यता भने देखऽमे आबय मुदा वर्तमान पद्य चिरकालिक आ कतिपय लोकप्रिय रहत, ई भविष्यक गर्तमे, मुदा प्रश्न-चिन्ह धरि अवश्य अछि ।

एहि परिपेक्ष्यमे मैथिली साहित्यमे किछु काँच वयसक गीत-गजलकारक प्रवेश भेल छन्हि जे लय, राग, गतिक संग साहित्य आड़िमे बान्हल छथि, ओहिमे 21 वर्षक गजलकार अमित मिश्रक नाओं महत्वपूर्ण अछि । ओना तँ साहित्यक सब सरल विधा यथा- गीत, गजल, कथा, लघुकथा, नाटक, एकांकी, कविता, बाल-साहित्य आदिमे हिनक लेखनी गत किछु वर्खसँ प्रवाहमय अछि मुदा हिनक लोकप्रियताक पहिलुक प्रस्तुति गजल संकलन "नव अंशु"सँ भेल ।नव अंशु मने नव किरण, मने नव भोर, मने नीक दिनक पहिल आभास, मने नव ऊर्जाक संपूर्ण संसारमे पहिल संचरण ।एहि पोथीक नाओंक पाछु गजलकारक एहने सन भाव रहल हेतनि ।

अनचिन्हार आखरसँ प्रेरित भऽ कऽ लिखल गेल एहि गजल, हजल आ रुबाइ संकलनमे प्रेमी-प्रेयसीसँ आगाँ बढ़ि कऽ जीवन आयामक बहुत रास अवस्थाकेँ विविध रूपेँ प्रदर्शन कएल गेल जे निश्चय द्रव्यमूलकसँ बेसी विचारमूलक  अछि । गजल लेखनक मौलिक सीमा एकर व्याकरणक संग-संग सरल वार्णिक बहरसँ लऽ कऽ अरबी बहरमे लिखल गेल गजल मानक आ पूर्ण मानल जाए । सबटा गजलमे शेर, रदीफ, काफिया, मकता आ मतलाकेँ सरस बनयबासँ बेसी बीजगणितीय आ अंकगणितीय बनाओल गेल जे जनप्रियतासँ ऊपर उठि कऽ एहि विधाक मैथिलीमे विकासक लेल उचित आ अनुकरणीय प्रयोग मानल जाए ।

व्याकरण गजलक मौलिक मानकतासँ बान्हल अछि , कुश ठामक काससँ उखाड़ल अछि  मुदा शब्द-शब्दक प्रवाह तँ शायरक स्वत: स्फूर्त प्रतिभाक प्रदर्शन अछि -

" चान देखलौं तँ सितारा की देखब
अन्हारक रूपकेँ दोबारा की देखब "

पहिल गजल सरल वार्णिक बहरमे छन्हि, मुदा मकताक प्रयोग नहि, ओना मकता गजलक कोनो अनिवार्य अंश सेहो नहि अछि ।

कतहु-कतहु गजलकार अपन वयसे जकाँ काँच लगैत छथि तँ कतहु-कतहुँ परिपक्व प्रेमी सन झंकारयुक्त उदवोधन हिनक नैसर्गित नहि तँ आशुत्व भरल दैहिक गुणक अनुलोम जकाँ लगैत अछि-

" जे किछु कहब हँसि क ऽ कहू
प्रेमक जालमे फँसि कऽ कहू

खसा दिअ आइ बिजुरी अहाँ
रूपक चानन घसि कऽ कहू "

लयात्मक गजलमे ई भाव आ बान्ह मैथिलीमे बहुत अल्प ठाम भेटल अछि ।एहि रूपेँ शायर अभिवादन आ धन्यवादक पात्र छथि मुदा व्याकरणकेँ क्रमवद्ध आ अनुशासित करबाक क्रममे कतहु-कतहु भाव झुझुआन सेहो भऽ गेल छन्हि जेना-

" बना लेब दुलहिन अपन
अमित कने खखसि कऽ कहू"

ई तँ मात्र एकटा उदाहरण परञ्च जौं सम्पूर्ण संकलनक मनोवाचन कएल जाए तँ एतबा धरि कहल जा सकैछ जे शायर गजल विधाक भविष्यक अपन जनमाषामे एकटा अंश धरि अवश्य छथि ।एहि संकलनक पश्चात बहुत रास परिपक्व आ अरबी बहरयुक्त गजल मैथिलीमे लिखने छथि जे अप्रकाशित छन्हि ।

अरबी बहरमे लिखल एकटा गजल विविध रूपक जीवनान्दकेँ सिनेहक आवरणसँ संघोरि कऽ कऽ प्रदर्शित कएल गेल जे अनुखन आ रोचक मानल जाए-

" गजल नै, नै गीत लिखलौं
जँ लिखलौं तँ प्रीत लिखलौं

बरसबै नै मेघ बनबै
ढहल आँगन भीत लिखलौं"

एकटा रुबाइ जे समर्पण आ प्रेमक अद्भुद छटा देखबैत अछि-

"अहाँ सन मीतसँ एतबे प्रीत चाही
जे नै बिसरि सकी एहन अतीत चाही
हारब हम मजा हमर आएत मुदा
सदिखन अहाँक सब मोड़पर जीत चाही "

संपूर्ण संग्रहकेँ देखलाक बाद एकटा बात अनसोहाँत लगैत अछि जे गजलकारक पूर्ण परिचय कतौ नै देल अछि, पोथीसँ गजलकारक बारेमे नामक अलावे और कोनो जानकारी नै भेटैत अछि जे प्रकाशनक कमी/गलती वा मुद्रणक कमी लगैत अछि ।

बहरे तबील, बहरे मुतकारिब, बहरे जदीद, बहरे मुजास, बहरे काफिर आदि बहरमे संजोगल संकलन आकर्षक छन्हि ।पाठक प्रभावित हेताह ई विश्वास कएल जा सकैछ मुदा जाहि सरल पाठककेँ आनंदक अनुभूति कम ओ एकरा घृत मानि सुआद लऽ सकैत अछि, किएक तँ मंचक लेल लिखल गेल चालू पद्यसँ ई ईतर एकटा साहित्यिक कृति अछि ।
एहिमे भावक संग संग व्याकरणक बान्ह बहुत दृढ़ अछि मुदा सब गजल गेय तेँ मंचक लेल सेहो अनुगामिनी आ प्रयुक्तक संग-संग उपयुक्त मानल जाए ।व्याकरणक ज्ञान छन्हि, भावक आत्मस्फूर्त प्रतिभा छन्हि आवश्यकता छन्हि तँ मात्र परिपक्व संयोजनक जे भविष्य निर्धारण करतनि आ ओहिपर विशेष ध्यान दैत अगिला संकलनकेँ प्रदर्शित करताह, एहि विश्वासक संग युवा प्रतिभाकेँ साधुवाद ।

पोथी- नव अंशु
विधा- गजल, हजल, रुबाइ
गजलकार- अमित मिश्र
प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन,  दिल्ली
संस्करण- 2012
दाम- 200 टाका

समीक्षक- शिव कुमार झा"टिल्लू"





सोमवार, 15 दिसंबर 2014

गजल

गजल-2.51

अहीँ कलम अहीँ कगज हमर गजल छी अहीँ
अहीँ मिजाज हमर भावमे बसल छी अहीँ

धसय धरा खसय गगन कतौ वा अन्हर उठय
हियाक घरक बीच लोह बनि गचल छी अहीँ

चलय बसात सगर गाममे गमक बोरि तेँ
कहय गुलाब सब परागमे रमल छी अहीँ

उठैत अछि हमर कलम मुदा लिखा नै रहल
सबसँ सुनर सबसँ अलग निशा चढ़ल छी अहीँ

जरैत तेल अछि मुदा जरा कऽ बाती "अमित"
उठय दरद तँ लगय चोट सहि चुकल छी अहीँ

1212-1212-1212-212

रविवार, 16 नवंबर 2014

गजल

गजल-2.50

हम रही अहाँ रही आर किछु नव बात हो
हम कही अहाँ सुनी आर किछु नब बात हो

जे कहब कहू मुदा तौल लिअ निज बोलकेँ
जे कहब, कहब सही आर किछु नव बात हो

भेद-भाव आइ तजि ठाढ़ एकहिँ मंचपर
प्रीतकेँ बहै नदी आर किछु नव बात हो

सफ हो सभक हिया साफ हो छवि लोककेँ
फड़य गाछ जनु कली आर किछु नव बात हो

बात बातपर हँसय सब हँसय धरती सगर
हो दरद सगर कमी आर किछु नव बात हो

2121-21-2212-2212

रविवार, 12 अक्टूबर 2014

गजल

गजल-2.40

हमरा घुटि घुटि कऽ मरनाइ सिखा दिअ
बस हमरा प्रेम करनाइ सिखा दिअ

काजक बोझसँ उदासी बढ़ि रहलै
हँसि हँसि जिनगी सुधरनाइ सिखा दिअ

मोनक अन्हार मेटायब कठिन नै
ज्ञानक बाती लऽ जरनाइ सिखा दिअ

ताकत लिअ अपन अधिकारक खातिर
सब विघ्नसँ आब लड़नाइ सिखा दिअ

जा धरि चलतै अपन अभिनय ता धरि
दुख तजि सुख सबसँ हरनाइ सिखा दिअ

2222-1221-122

रविवार, 5 अक्टूबर 2014

गजल

गजल-2.30

जतेक छल भाव हमरा लग आइ पसारि देने छी
अपन करेजासँ जनमल सब परत उघारि देने छी

गलत-सही केर झगड़ा सब ठाम पड़ल अधूरे अछि
जतेक छल फूसि लफड़ा सब आगि पजारि देने छी

खुशीक मैडल सिनेहक ओलम्पिकमे कमे भेटय
इएह कारण अपन नस-नस दुखसँ गछारि देने छी

हमर लिखल गीत हमरे काटैत रहैत अछि मीता
अपनहि घरमे अपन जीवनकेँ दुतकारि देने छी

अहाँक नैनक नशा बड बेहोश कऽ राखि देने अछि
अहाँ तँ पाथर हियाकेँ पलमे चुचकारि देने छी

1212-2122-2211-2122-2

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

गजल

गजल-2.28

अपनेक इतिहास लेल हम खतरनाक छी
अपनेक कथनसँ तँ हम अधसिझल सन पाक छी

कविता पढ़ू वा पढ़ू भजन गजल शायरी
आखरक मंथनसँ निकलि चुकल कटु वाक छी

निज चेतना जागले रहल चरम नीन धरि
जेतै कखन खेल पलटि बड खतरनाक छी

हमरा-अहाँमे प्रियतम फरक एतेक अछि
सुन्दर विदा छी अहाँ तँ हम हाक-डाक छी

ई जग दुखक सिन्धु अछि भरल अमित आगि धरि
चलि आउ सखि जीबि लिअ जँ नीक तैराक छी

2212-2121-212-212
अमित मिश्र

शनिवार, 30 अगस्त 2014

गजल

गजल- 2.26
हम बाढ़िक मारल-झमारल छी
परजातंत्रक सुखसँ बारल छी

जुनि कोड़ब सखि भावना कहियो
स्मृतिमे पुरना लाश गाड़ल छी

ई जग हारय आबि हमरा लऽग
अपने मोनक तर्कसँ हारल छी

किछु नै हमरा लऽग किओ बाजय
सत्यवादक अवगुणसँ छारल छी

हम नै छी कवि ने गजल वक्ता
बस शब्दक धधरा पजारल छी

2222-2122-2

अमित मिश्र

रविवार, 4 मई 2014

गजल

2.41
सुनहट फेर सगरो गाममे साँझ नै पड़ल
शाइत ताग नेहक टूटि कऽ स्वर्ग धरि चलल

मूरत माँटि सन बनि गेल माँउसक गरम तन
ने किछु फूटि रहल स्वर, ने स्वर सुनि रहल

चुप्पी लाधि बैसल अछि विपिनमे अवोध पशु
कोनो जालमे हिरणक सकल कुटुम अछि फसल

चमचम चीज जे बेसी पलटि दैछ किरणकेँ
कनिञे चमक कम राखू तँ जिनगी बनत सरल

ममता देब कतबो ढारि फइदा कहाँ "अमित"
डिबिया काल्हि ने परसू मिझा रहत, अछि बुझल

2221-2221-2212-12
अमित मिश्र

रविवार, 27 अप्रैल 2014

गजल

हमर रचना एखन धरि काँच अछि
मुदा जे अछि से सब टा साँच अछि

अहाँ उगलै छी ज्वाला बाटपर
हमर घर शब्दक लहरल आँच अछि

पिछरि रहलै रिश्ता मनुखक बहुत
लगै छै सगरो समतल खाँच अछि

रसे-रस रथ घुसकत मिथिलाक यौ
अहाँ सिखबू बरु पाठक पाँच अछि

हमर नामे सप्पत खा ले "अमित"
हमर सत हमरे झूठक जाँच अछि


*खाँच= खाधि ।चेनकेँ नचेबाक लेल पैडिलक जेहन बनाबट होइत अछि ।
1222-2222-12
अमित मिश्र

रविवार, 19 जनवरी 2014

गजल

प्रस्तुत अछि अमित मिश्र जीक ई गजल


जीतपर हारक कड़ी बनिते छै भाइ
प्रीतपर साढ़े सती लगले छै भाइ

मरि कऽ ओ चलि गेल सबकेँ देने नोर
गाममे ओकर हँसी बचले छै भाइ

सजल मधुशाला भरल डेगे डेगपर
भोज्य बिनु चुप पेट बड भुखले छै भाइ

भेल छै रौदी पियासल धरती सगर
आँखिमे सगरो नमी बनले छै भाइ

हँसि सकी हँसि लिअ जखन धरि कानै "अमित"
दाव ई सबकेँ उलट पड़िते छै भाइ

2122-2122-2221
फाइलातुन-फाइलातुन-मफऊलातु

रविवार, 12 जनवरी 2014

गजल

गजल- 1.78

हँसि हँसि कऽ दिअ वा कानि कऽ
ओ प्रीत दिअ बस आनि कऽ

अछि गीत अखरा लय बिनु
की करब मुखड़ा जानि कऽ

छथि इन्द्र मुट्ठी बान्हि कऽ
बरखा करत की तानि कऽ

बड करब आदर हम सब
देखू अपन बस मानि कऽ

अछि मरल लाखो प्रेमसँ
देखू तरेगण गानि कऽ

2212-2211
अमित मिश्र

गजल

गजल- 1.79

टूटि रहलै, की बरकि रहल अछि पाथर
वा दुखक मारिसँ चटकि रहल अछि पाथर

नोचि लेलक नरगिद्ध कते नारी तन
देख ई जगकेँ सिसकि रहल अछि पाथर

झूठ फूसिक गप आ सब फाँसी चढ़लै
जज बिकल छल तेँ भड़कि रहल अछि पाथर

मोल केवल पदवीक बरू मुँह कारी
अङगुरीमे सजि चमकि रहल अछि पाथर

बोल मिठका मन जीतत सब जानै छै
बनि कऽ दिल मोमक छलकि रहल अछि पाथर

2122-2211-2222
अमित मिश्र

गजल

गजल-1.80

मिझाएल आगिकेँ पजारि दियौ
कते जोश अछि चलू भियारि* दियौ

सुनू मरि रहल हियाक मारल सब
मुसकिया कऽ साँस धरि नमारि दियौ

मनुख छी तँ सगर नेह-फूल बनू
अपन मनक काँटकेँ बहारि दियौ

रहब कोन विधि अहाँ नरक जगमे
सही योजना चलू विचारि दियौ

सुनू हमर बाँहिमे बचल बल नै
"अमित" झँपल क्रांतिकेँ उघारि दियौ

1221-2121-2112
अमित मिश्र

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

गजल

गजल-1.77

हुनक आँखिक नोर हम देखने छी
भेल नै जे भोर हम देखने छी

साफ नभपर मेघ बनि बरसि गेलै
ठोप दू इन्होर हम देखने छी

प्रीत छै वा और किछु ओहि दिलमे
जहर पोरे-पोर हम देखने छी

आइ मुट्ठीमे बचल राख केवल
काल्हि छल अंगोर हम देखने छी

पत्र भेटल "अमित"केँ आइ धरि नै
पर मनक सब जोड़ हम देखने छी

2122-212-2122
*पर= परञ्च/मुदा, मिथिलाक विभिन्न क्षेत्रमे "पर"क उच्चारण "परञ्च"क बदले होइत अछि ।

अमित मिश्र

गुरुवार, 2 जनवरी 2014

गजल

गजल-1.76

आब किताबेमे लाज धाख देखू
चुप रहि केवल नबका सियाख देखू

घोर छुआछूतक पढ़ब पाठ मीता
छूबि कने अस्थिक आइ राख देखू

नै जँ दहलि गेल हृदय तखन बाजब
सर्कसमे जन सिसकैत लाख देखू

राति-दिनक अन्तर बूझि लेब तखने
हमर कुटिर, ओकर साफ ताख* देखू

छोड़ि कऽ भागब शिक्षा विभाग मीता
गामहि टा मे शिक्षकक साख* देखू

*ताख= छज्जी
*साख= प्रतिष्ठा
2112-2221-2122
अमित मिश्र
तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों