बुधवार, 1 दिसंबर 2021

भूमिका एक : फाँक अनेक

1

लूरि किछुओ सीख ले

नहि सदति अंदाज कर


(शाइर-बाबा बैद्यनाथ, मात्राक्रम-2122-212)

रचनाकारक तौरपर हम ई मानै छी जे कोनो रचना नीक-खराप भऽ सकैए मुदा एकटा विचारक केर तौरपर हम ईहो मानै छी जे खराप रचनाकेँ येन-केन-प्रकारेण "नीक" साबित करबा उद्योग अंततः रचनाकारक पतनक पहिल सीढ़ी बनैए आ साहित्यक पतन केर सेहो।

2

कथित गजल संग्रह (जे बिना बहर-काफिया केर हो) आब हमरा प्राप्त नै होइए। बहुत रास प्रकाशकीय-लेखकीय निर्देश अनचिन्हारक नामपर देल गेल छै से हमरा बुझाइए (एकर अपवाद सेहो छै) आ तँइ कमल मोहन चुन्नू जीक कथित गजल संग्रह "आबि रहल एक हाहि" केर भूमिका फोटो रूपमे प्राप्त करबाक जोगाड़ हमरा करए पड़ल। एहि ठाम रचनाकार खुश भऽ सकै छथि जे हम एतेक प्रतापी जे हमरा `कियो "इग्नोर" नै कऽ सकल मुदा हुनका शायद ई पता हेतनि जे एहि पाँतिक लेखक केकरो इग्नोर करिते नै छै। कहियो-कहियो आलस आबि जाइए तँ वरिष्ठ सभ कहि दै छथि जे जाहि विधामे छी ताहि विधाक मामूलियो बातकेँ नोटिस लेबाक चाही आ तकर बाद फेर मोन बनि जाइत छै आ तकरे परिणाम अछि ई आलेख (सीधा बात जे ओ सभ हमरा इग्नोर करताह मुदा हम हुनका सभकेँ इग्नोर नै करबनि)। हमर प्रयास रहैए जे मामूलियो बातक मंथनसँ हम साहित्य केर हित कऽ सकी। आ अही कारणसँ मात्र 13 बर्खमे बिना कोनो मंच बिना कोनो फंडकेँ मैथिली गजलमे एकटा एहन विमर्श शुरू भेलै जकरासँ बचि निकलबाक कोनो साधन आब किनको लग नै छनि। अन्यथा मैथिली गजलमे कियो चालिस, कियो पचास बर्खसँ छथि मुदा गजलक लक्ष्य हुनका सभसँ दूर भऽ गेल छनि। 2008 ई.सँ पहिने जे सभ गजलमे सुखासनमे छलाह से सभ आब शीर्षासनमे लागल छथि। लोक केकरो नाम लीखथु वा कि नै नै लीखथु ,बाजथु वा कि नै बाजथु मुदा 2008 क बाद बला एहि विमर्शक पहिचान वाटरमार्क रूपमे हुनकर लीखल -बाजल हरेक पाँतिमे भेटत। कुल मिला कऽ बात ई जे आब हम चुन्नूजीक कथित गजल संग्रहक भूमिकापर बात करब। ई भूमिका पृष्ठ 9 सँ लऽ कऽ 18 धरि अछि। एहि भूमिकामे सेहो 2008 क बाद बला विमर्शक पहिचान वाटरमार्क रूपमे भेटत। 2008 मे मैथिली गजल के पहिल आ एखन धरिक अंतिम शोध ब्लाग "अनचिन्हार आखर" केर निर्माण भेल छल जे एखनो एक्टिभ अछि।

 राणा प्रताप नहि अकबर नहि

असगर चेतक सुल्तान बढल


(शाइर-राजीव रंजन मिश्र, मात्राक्रम-22-22-22-22)

 3

गजल लिखबासँ पहिने चुन्नूजी नाटक विधामे महारत (अइ महारत शब्दकेँ सर्टिफाइ नाटक विधाक लोक करताह) हासिल केने छथि आ ओहिमे बहुत रास आलोचना-समीक्षा लिखने छथि। संभवतः निनाद आ रंगमंच कहि हुनकर नाटक आलोचनापर दू टा पोथी आएलो छनि। आनो विधापर आलोचना लिखने हेता से हमरा विश्वास अछि। विश्वासक कारण ई जे मैथिलीमे सभा-संस्था वा कि विद्यालय-विश्वविद्यालय बला सभ बाइ-डिफाल्ट विद्वान होइ छथि। एहन अवस्थामे चुन्नूजी सेहो विद्वान हेबे करताह। मुदा हमर सौभाग्य देखू जे आन विद्वानसँ अलग चुन्नूजी साहसी लोक छथि। साहस केर संदर्भ ई जे चुन्नूजीमे शायद अपनाकेँ खारिज करबाक, अपन लिखलकेँ खारिज करबाक साहस छनि।

 पद पराक्रम मुखर के कहत की कहू

दंभ अछि बड़ सुघड़ मुग्ध दरबार सब


(शाइर-विजयनाथ झा, मात्राक्रम-212-212-212-212-212)

 4                                      

पृष्ठ-10 पर चुन्नू जी अपन रचनाक अप्रत्यक्ष रूपें स्वमूल्यांकन करैत लिखैत छथि जे "बड़दक दाम बड़दे कहत" आ से लीखि ओ अपन लीखल हरेक आलोचनाकेँ ओ खारिज कऽ देलाह। निनाद आ रंगमंच नामक हुनक पोथी नाटक आलोचनापर छनि आ जँ हुनकर वर्तमान मतकेँ (गजल बला) देखल जाए तँ साफे मतलब छै जे नाटक अपन बात अपने कहतै एहि लेल चुन्नूजी सहित आन कोनो लोकक जरूरति नै छै। चुन्नूजी जे लिखलाह तकर साफ-साफ मतलब छै जे ओ अपने (चुन्नूजी) जाहि-जाहि रचना-पोथीपर आलोचना लिखने हेता से रचना-पोथी सभ ततेक बौक रहल हेतै जे ओकरा बाजए लेल चुन्नूजीक सहारा लेबए पड़लै। से आब ओहन लेखक सभ जानथि जिनकर रचना-पोथीपर चुन्नूजी आलोचना लिखने छथिन। जिनकर रचनापर चुन्नूजी लिखने छथिन जँ हुनका बुझाइत छनि जे चुन्नूजीक उपरक देल विचार गलत छनि तँ आगू आबि चुन्नूजीक विचारकेँ गलत कहथि। समयक फेर छै आ तँइ रहीमक हीरा एखनो धरि अपन मोल नै कहि सकल अछि मुदा चुन्नूजीक बड़द अपन दाम कहि रहल छै। संगे-संग हम ईहो बात कहब जे चुन्नूजी द्वारा भविष्यमे लिखल गेल कोनो आलोचना-समीक्षा (भूमिका रूपमे सेहो), आलेखपर सेहो उपरक बात लागू हएत। भविष्यमे जाहि लेखक केर रचनाक उपर चुन्नूजी लिखता तिनका बारेमे ई मानि लेल जेतनि जे हुनकर रचना बौक छलनि तँइ आलोचकक जरूरति पड़लै। विरोधाभास एहन जे अही पृष्ठपर आगू चलि चुन्नूजी लीखि रहल छथि जे "..तें हम अपन गजलक मादे अपनहि किछु नहि कहब"। एकर मतलब साफ छै जे या तँ ओ अपने दाम कहताह वा हुनकर बड़द दाम कहतनि, तेसर कियो नै कहि सकैए। माने जँ हुनकर बड़द अपन दाम नै कहलकनि तैयो ओ कोनो बड़द विशेषज्ञकेँ नै बाजए देताह। जँ बड़द रचना भेल तँ बड़द विशेषज्ञ आलोचक भेलाह।

चुन्नूजी अपन लिखल आलोचनाकेँ खारिज कऽ सकै छथि मुदा ओ बहुत महीन रूपसँ नैरेटिभ बना कऽ मैथिलीमे आलोचना विधाकेँ मारबाक जे खडयंत्र केलाह अछि से आपत्तिजनक बात अछि। लेखके नै मैथिलीक आलोचको सभकेँ एहि बातक धेआन रखबाक चाही। सोचियौ खाली चुन्नुए जीक बड़द किए दाम कहतै, सभ लेखक केर बड़द दाम कहतै ने। जेना चुन्नूजी इशारामे विशेषज्ञ केर निषेध करै छथि तेनाहिते दोसरो करतै। एहन स्थितिमे आलोचना विधा रहतै कतए से सोचू। तँइ हम कहलहुँ जे चुन्नूजी बहुत महीन रूपसँ मैथिलीमे आलोचना विधाकेँ मारबाक खडयंत्र केलाह अछि। ई खडयंत्र हम किछु आलोचक जेना भीमनाथ झा, अरविन्द ठाकुर, अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास, कैलाश कुमार मिश्र, प्रदीप बिहारी, नारायणजी, केदार कानन, विद्यानंद झा, कुणाल, कमलानंद झा, किशोर केशव आदिक सामने स्पष्ट कऽ रहल छी। ओना ई बाध्यता नै छै जे एहि ठाम किनको टिप्पणी करहे पड़तनि। कारण हमर मानब अछि जे सभहक अपन सीमा ओ सुविधा छै। जहिया जिनका जेहन सुविधा बुझेतनि ताहि अनुरूपे ओ अपन विचार व्यक्त करताह। बहुत संभव जे किछु लोक भविष्येमे जा कऽ एहिपर टिप्पणी करथि। हमर काज छल एहि खडयंत्रकेँ सामने आनब आ एकर विरोधमे पहिल पाँति लीखब से हम केलहुँ। त्वरित टिप्पणी आ भविष्यमे जा कऽ लिखल टिप्पणी दूनूक अपन मेरिट-डिमेरिट छै। एहि प्रसंगमे जेना-जेना समय बीतैत चलि जेतै तेना-तेना आलोचक सभहक अपने लिखल आलोचना एहि घटनापर प्रश्न पुछतनि। आ तहिया बहुत बिखाह भऽ कऽ पुछतनि। तँइ सुविधा आ नैतिकता दूनूमेसँ जकर पलड़ा भारी हेतै ताहि अनुरूपे आलोचक सभ एहि घटनापर अपन विचार जरूर देताह से हमरा विश्वास अछि। जे आलोचक चुन्नूजीक बातसँ सहमत छथि से अपन लीखल आलोचनाकेँ अपनेसँ खारिज कऽ रहल छथि। आ से खारिज ओ चुन्नूजी जकाँ साहसक संग करथि तँ बेसी नीक।

 

लोक कतबो हुए जोरगर

अन्तमे सभ नचरि जाइए


(शाइर-जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल', मात्राक्रम-212-212-212)

5

पृष्ठ-11 पर चुन्नूजी लिखैत छथि जे एक संप्रदाय व्याकरण छंद अक्षुण्ण रखबाक समर्थक छथि चाहे कथ्य विचार आदि चोटलग्गू किएक ने भऽ जाए। मुदा चुन्नू जी अपन बातक पुष्टि लेल एकौटा उदाहरण चाहे गजल कि शेर रूपमे नै राखि सकल छथि। जखन कि बिना व्याकरण-छंद (बहर-काफिया-रदीफ)क गजल नै होइत छै ताहि लेल अनेक उदाहरण रचनाकारक नाम सहित छांदिक संप्रदाय द्वारा देल गेल छै। जँ चुन्नूजी आ हुनकर विचार सही छनि तखन उदाहरण देबामे डर कथिक? जँ कोनो गजल बहर-छंदमे छै मुदा ओ निरर्थक अक्षरक समूह छै तँ ओ उदाहरण सहित जनताक सामनेमे रखबाक चाही चुन्नूजीकेँ। चुन्नुएजी नै हरेक बेबहर कथित गजलकार सभ ई कहने फीरै छथि जे बहर-काफियासँ कथ्य कमजोर भऽ जाइत छै मुदा ओहो सभ कोनो उदाहरण एखन धरि नै दऽ सकल छथि। एकर साफ मतलब भेल जे बहर-काफिया माने असल गजल सभ मजगूत अछि आ बेबहर कथित गजलकार सभ मात्र ढेप फेकि अपनाकेँ ओ अपन गुटकेँ खुश कऽ लै छथि। लोक कहि सकै छथि जे चुन्नूजी अपन गजलक अग्रसारण लेल ई भूमिका लिखलाह तँइ उदाहरण देब उचित नै। मुदा जँ भूमिकामे विधापर बात हो (कोनो रूपमे) तँ ओ अग्रसारण नै रहि जाइत छै आ विधापर बात जँ संदर्भहीन हो तँ ओ उचित नै। कविवर सीताराम झाजीक वैचारिकता बहरक पालनसँ नै टूटै छनि, योगानंद हीरा, जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल' जीक नै टूटै छनि, दुष्यंत कुमार, अदम गोंडवी सहित आन केकरो वैचारिकता बहरसँ नै टूटै छै मुदा चुन्नूजीक टुटि जाइत छनि तँ एकर मतलब ई भेल जे चुन्नूजीमे गजल कहबाक / लिखबाक क्षमता नै छनि।  अरे भलेमानस बाबू, कमसँ कम औपचारिकतोवश कोनो गजल, कोनो शेर दऽ कहू जे एहिमे बहर छै आ बहरक कारण अर्थ नै छै। हम सभ मानि लेब। अथवा ईहो कहि दियौ जे ई गजल वा ई शेर हमरा बुझबामे नै आएल। हम सभ ईहो मानि लेब। चुन्नूजी हमर एहि आग्रहकेँ चैलेंज बूझथि।

असल बात ई जे मैथिलीक किछु लेखक अपन कमजोरीकेँ पूरा मैथिली साहित्य / पूरा विधाक कमजोरी बना देबाक सफल अभियान चला लेने अछि। केकरो पाँच सए पन्ना नै लीखल होइत छै तँइ ओ गोलौसी कऽ पचास पन्नाक उपन्यासक सरदार बनि जाइए। केकरो बहर नै सीखल होइत छै तँ वैचारिकताक नाम दऽ गजलमे बहरकेँ बेकार कहि दैए। मैथिली साहित्य केर असल बेमारी इएह आ एहने लेखक सभ अछि।

भाषण आमो पर दै छै

थुर्री लताम बला लोक


(शाइर-प्रदीप पुष्प, मात्राक्रम-22-22-22-2)

 6

पृष्ठ-11 पर चुन्नू जी फेर लिखैत छथि जे "मैथिली गजलक संदर्भमे दूटा तत्व सदित चर्चामे रहल अछि। हमरा बुझने ओ दूनू तत्व अछि गजलक वैधानिकता आ गजलक वैचारिकता।" आब कने एहि बातक तहमे जाइ। कुल मिला कऽ मैथिलीमे गजल विधा लगभग 115 बर्खसँ अछि मुदा एहिपर विमर्श???????? चुन्नूजी जाहि हिसाबें लीखि रहल छथि ताहि हिसाबें गजलक विमर्श सेहो 115 बर्खक वा तकर आपस-पासक हेबाक चाही। मुदा ई विमर्श कहियासँ छै से चुन्नूजी नै कहि रहल छथि। नै कहबाक कारण हुनकर कोनो गु्प्त एजेंडा बुझाइए।

जँ मैथिली गजलक विमर्शकेँ देखल जाए तँ 1981 मे तारानंद वियोगी जी द्वारा आलेख लीखि एकर शुरूआत भेलै। ओ आलेख केहन छलै से बादक बात मुदा शुरूआत ओहीठामसँ भेलै। पहिने तँ गजलक वैचारिकते केर विमर्श भेलै बादमे 1984मे डा. रामदेव झा जी वैधानिक आ वैचारिक दूनू रूपसँ गजलक विमर्शकेँ नव मोड़ देलाह। आब एहि ठाम अहाँ सभ लग प्रश्न उछाल मारैत हएत जे आखिर चुन्नूजी कोन एजेंडा छलनि?  हमरा बुझाइए जे ओ तारानंद वियोगीजीक काजकेँ खारिज करबाक लेल जानि-बूझि कऽ "सदति" शब्दक प्रयोग केलाह अछि। हमर अनुमान निराधार नै अछि आ एहि लेल हम गजल विमर्शक प्रगति कार्ड देखाएब। 1981 सँ शुरू भेल विमर्श कहाँ धरि पहुँचल अछि से देखेबाक लेल हम मैथिली गजल विमर्शकेँ दू खंडमे बाँटब पहिल 1981 सँ लऽ कऽ एखन धरिक विमर्श जे कि मुख्यधाराक कथित गजलकार द्वारा भेल आ दोसर 2008 सँ लऽ कऽ "अनचिन्हार आखर" द्वारा विमर्श। मैथिली गजलकेँ दू खंडमे बँटबाक मूल संकल्पना गजेन्द्र ठाकुरजीक छनि ( देखू हिनकर लिखल गजल शास्त्र)। उपरमे ई निश्चित भेल जे 1981 सँ शुरू भेल अछि तँ 2021 धरि मात्र 40 बर्खक भेलैए आ एहि 40 बर्खमे कथित गजलक उपर बेसीसँ बेसी 20-22 टा आलेख आएल सेहो अधिकांशतः पोथीक भूमिका रूपमे। सोचियौ 40 बर्खमे जाहि विमर्शक शुरूआत वियोगीजी केलाह आ ओ विमर्श अतबो नै छै जे लोक ओकरा बिसरि जाए। बेसी मात्रा रहै छै तखन कने हौच-पौच हेबाक संभावना रहैत छै मुदा 40 बर्खमे कथित गजलक उपर मात्र 20-22 टा आलेख आएल छै आ सेहो चुन्नूजीकेँ मोन नै छै ,ई कोना संभव हेतै। तँइ हमर मानब अछि जे चुन्नूजी "सदित" शब्दक प्रयोग तारानंदजीकेँ कात करबाक लेल केलाह। जँ "अनचिन्हार आखर" बला 13 बर्खक विमर्श देखब तँ लगभग 38-40 टा आलेख (ई आलेख सभ आन रचनाकारक पोथीपर आ गजलक विभिन्न पक्षपर आएल अछि जे कि दू टा स्वतंत्र पोथीमे सेहो संकलित भेल), गजल व्याकरणक मैथिलीकरण आ इतिहास आदि आएल। जँ एहि 13 बर्खमे आएल गजलक पोथीक भूमिकाकेँ जोड़ल जाए तँ आलेखक संख्या  50क पार पहुँचत।

विमर्शसँ अलग गजल लेखन केर बात करी तँ एकरो हम दू खंडमे बाँटब पहिल 1905 सँ लऽ कऽ एखन धरिक गजल लेखन जे कि प्रारंभिक गजलकार आ मुख्यधाराक कथित गजलकार द्वारा भेल आ दोसर "अनचिन्हार आखर" द्वारा 2008 सँ लऽ कऽ एखन धरिक। पहिल खंडमे 1905 सँ लऽ कऽ एखन धरि लगभग 3000 (अधिकतम) कथित गजल लिखाएल अछि (जाहिमे पं.जीवन झा, कविवर सीताराम झा, मधुपजी, योगानंद हीरा, विजयनाथ झा, जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल' आदिक गजल पूर्ण रूपेण बहर-काफिया युक्त अछि मने व्याकरण सम्मत आ बाँकी सभ अपन गीतक उपर गजलक शीर्षक लगेने छथि) जखन कि "अनचिन्हार आखर" बला 13 बर्खमे लगभग 32-33 टा नव गजलकार एलाह जाहिसँ लगभग 5000 गजल, 38-40 टा आलेख, गजल व्याकरणक मैथिलीकरण आ इतिहास, गजलक नव-नव उपविधा जेना बाल गजल, भक्ति गजल तकर परिभाषा, लगभग 200 बाल गजल, 100 भक्ति गजल सहित सैकड़ो मात्रामे रुबाइ, कता, नात, दू टा आलोचनाक स्वतंत्र पोथी आदिक रचना भेल। एहि 13 बर्खमे आएक अधिकांश गजल, बाल ओ भक्ति गजल सहित कता-रुबाइ विभिन्न पोथीमे सेहो संक्ति भेल अछि। एहिमे किछु पोथी प्रिंटमे अछि तँ किछु ई-भर्सन रूपमे। ओना साहित्यिक बेपारी सभ पोथीक डिजिटल रूपमे नै मानै छथि मुदा बेपारीकेँ ज्ञानसँ नै टकासँ मतलब होइत छै। जाहि समाजमे पाथरपर लीखि, ताड़पत्रपर लीखि, अथवा श्रुति परंपरोसँ ज्ञान बचेबाक प्रयास भेल हो ताही समाजमे मात्र पुरस्कार लेल प्रिंट बला चीजकेँ किताब मानब अधोगतिक लक्षण छै। अतबे नै "अनचिन्हार आखर" बला 13 बर्खमे मैथिली गजल आन भारतीय भाषाक गजलक समकक्ष आएल आ वर्तमानमे हिंदी-उर्दू सहित मराठी, हरियाणवी, ब्रजभाषा, नेपाली आदिक गजलकार सभ "अनचिन्हारे आखर" ब्लाग द्वारा मैथिली गजलसँ परिचित भेलाह। ओना ई विवरण एहिठाम उचित नै मुदा चुन्नूजीकेँ बुझाइ छनि जे विधान तोड़ि देलासँ विधाक विकास होइत छै। विकास माने की? 115 बर्खमे 3000 कथित रचना जाहिमे कोनो मेहनति नै छै वा कि 13 बर्खमे 5000 गजल जे कि पूरा विधानक संग अछि। 40 बर्खमे 22 टा आलेख वा कि 13 बर्खमे 50 टा आलेख। विकास माने की? 115 बर्खमे वएह 18-20  टा गजलकार वा कि 13 बर्खमे 30-32 टा नवगजलकार। वएह एकटा आजाद गजल कि 13 बर्खमे गजलक विभिन्न उपविधाक विकास, विकास की छै? विकास कोन खंडमे छै बिना विधान बलामे वा कि विधान बलामे से पाठक तय करताह। जेना भूतक पएर उल्टा होइत छै तेनाहिते चुन्नूजी विकासक परिभाषा उल्टा मानै छथि। किछु लोक ईहो कहि सकै छथि जे मैथिली गजल वा ओकर विमर्शकेँ दू खंडमे बँटबाक कोन जरूरति? तखन हमर कहब जे मैथिली साहित्यमे जे समय, वाद, प्रयोग आदिक नामपर वर्गीकरण भेल छै से किए बाँटल गेलै। जँ ओ वर्गीकरण सभ ध्वस्त भऽ जाए तँ ई गजल बला स्वतः ध्वस्त भऽ जेतै।

मैथिलीक कथित मुख्यधारामे गजलक विमर्श कोना होइत छै तकर दू टा उदाहरण दैत छी (उदाहरणकेँ उदाहरणे जकाँ देखबाक आग्रह रहत हमर)। पहिल उदाहरण- दरभंगामे एकटा स्थानीय कवि छथि ओ गीत लीखि ओकरा गजल घोषित करै छथि आ बहस करै छथि जे गजलमे बहर नै हेबाक चाही। बहर-काफियासँ भाव मरि जाइ छै आदि-आदि। ओही कविक एकटा बेटा हिंदीमे गजल लीखै छनि आ नियम मानि लीखै छनि। हिंदीमे बाप-बेटा दूनूक क्रांति घुसड़ि जाइत छनि। ओहि ठाम ओ सभ बहस नै कऽ पाबि रहल छथि। खाली मैथिलीमे ई सभ क्रांति करै छथि। दोसर उदाहरण- 2010मे एकटा युवा "अनचिन्हार आखर" ब्लाग केर माध्यमसँ गजल सिखलाह। तकर एक-दू सालक बाद हुनका पटनाक एकटा साहित्यकारक बेटा मार्फत नौकरी भेटलनि आ ओही साहित्यकारक कृपासँ बियाहो भेलनि। आब ओ युवा कहने घूरै छथि जे गजलमे बहर नै हेबाक चाही। ओना किछु युवा आर छथि जे कि पहिने अनचिन्हार आखरसँ गजल सिखलाह आ तकर बाद लोभ-लाभसँ ग्रस्त भऽ मुख्यधारामे जा कऽ बहरक विरोध कऽ रहल छै। खएर ई सभ चलिते रहै छै। सभकेँ अपन सुविधा-असुविधा चुनबाक हक छै।

हम उपरक दू उदाहरण एहि लेल देलहुँ जे कथित मुख्यधारामे विमर्श साहित्य वा विधा लेल नै होइत छै। विमर्श मात्र संबंध, पद आ लोभ-लाभ लेल होइत छै। हमरा विश्वास अछि जे विमर्शक ई फार्मेट गजलक अतिरिक्त मैथिली साहित्य केर आनो विधामे हएत। मुदा से बात आन विधासँ जुड़ल लोक कहताह। एकटा सत्य बात ईहो छै जे कथित गजलक मुख्यधारा ततेक अक्षम छै जे ओहिमे कोनो नव रचनाकार एबे नै केलै। चुन्नूजी जाहि युवा सभपर नाचि रहल छथि ताहिमेसँ अधिकांश "अनचिन्हार आखर"सँ निकलल छै आ एक-दू टा अनचिन्हार आखरक विरोधमे बिना बहरक रचना लीखै छै। कुल मिला कऽ देखबै तँ सभ युवा अनचिन्हारे आखरक देन छै।

 आब हीरा उगत खेतमे

आरि झगड़ाक तोड़ल अहाँ


(शाइर-योगानंद हीरा , मात्राक्रम-2122-122-12)

7

पृष्ठ-11 पर चुन्नू जीक अभिमत छनि जे हमरा लेल विधा बात-विचार करबाक साधन अछि तँइ हम ओकर नियम नै मानब। मुदा तखन विधेक कोन जरूरति? जकरा नाटक कहल जाइत छै तकरा उपन्यास कहल जाए आ कथाकेँ संस्मरण कारण सभमे लेखक बाते विचार करै छै। एहन तँ नै छै जे कथामे विचार छै आ कवितामे नै, गीतमे छै आ उपन्यासमे नै। विचार सभमे छै तँइ अनेक विधाक छोड़ि मात्र एकटा विधा हो। आ जँ चुन्नूजी एहिसँ सहमत नै होथि तँ तात्काल मानि लेबाक चाही जे गजलक वैचारिकतापर विचार करैत चुन्नूजी मात्र लफ्फाजी केने छथि।

एक तँ मैथिलीक मुख्यधारामे कियो गजलक जानकार नै छै आ ताहिपरसँ जखन ओ अपन संयोजनमे कोनो कार्यक्रम करबै छै तँ स्वाभाविक तौरपर अपनासँ कमजोर वक्ता सभकेँ आनै छै। ओ कमजोर वक्ता सभ उपकृत आ एहसानमंद रहैत छै। तँइ ओहन कार्यक्रममे कोनो वस्तु, कोनो विधाक अनिवार्य घटककेँ "दुराग्रह" मानल जाइत हो तँ से आश्चर्यक बात नै। उदाहरण लेल मानू जे जँ अहाँ चाउर केर खीर बनेबै तँ अहाँ दूध, चाउर आ चिन्नी मिलेबै। आब एतेक मिलेलाक बाद ओ खीर तँ हेतै मुदा जँ ओहिमे काजू-किशमिश आदि मेवा मिलेबै तँ खीर आरो स्वादिष्ट हेतै। मानि लिअ सभ चीज देलियै मुदा चिन्नी बिसरि गेलियै तँ ओ स्वादिष्ट नै हेतै मुदा ओकरा खीरे कहल जेतै। आब फेर सोचियौ जँ पानिमे चाउर, चिन्नी, काजू-किशमिश आदि दऽ बनेबै तँ कि ओ खीर हेतै? फेर सोचियौ जँ दूधमे चाउर छोड़ि आन सभ चीज देबै तैयो कि ओ खीर हेतै? जँ कोनो बुद्धिमान पाठक हेता तँ ओ बुझि जेता जे चाउरक खीर बनेबाक लेल दूध आ चाउर अनिवार्य घटक भेलै। आब जँ कोनो लोक ई कहए जे खीरमे दूध अथवा चाउर देबाक बाध्यता "दुराग्रह" छै तँ फेर मानि लिअ जे ओ एहि धरतीक प्राणी नै छै। तेनाहिते गजल लेल बहर आ काफिया अनिवार्य तत्व छै। जँ बहर-काफिया हेतै तखने ओ गजल बनतै आ तकर बादे ओ गजल नीक छै कि खराप ताहिपर बहस हेतै। जखन रचनामे बहर-काफिया छैहे नै तखन ओ गजल तँ भेबे नै केलै। कोनो एक गजलक हरेक शेर एक बहर ओ एक काफियाक नियमसँ संचालित होइत छै। रदीफ गजल लेल अनिवार्य नै मुदा जाहि गजलमे रदीफ देल जाइत छै सेहो एकै हेबाक चाही पूरा गजलमे।

पघिलह जुनि बेसी जियान भ' जेबह भाइ

पाथर बनबह त' भगवान भ' जेबह भाइ


(शाइर-राजीवरंजन झा, मात्राक्रम-22-22-22-22-22-2)

8

चुन्नूजी लग मैथिली गजलक संबंधमे कोनो ठोस जानकारी नै छनि कारण एक दिस ओ मानै छथि जे पं.जीवन झासँ गजल प्रारंभ भेल दोसर दिस ई मानै छथि जे "किछु पितामह रचनाकार लोकनि घोषणा केलनि जे मैथिलीमे गजल असंभव (पृष्ठ-13 पर)। जखन घोषणा केनिहार पितामह केर पितामहे सभ मैथिलीमे गजल संभव कऽ गेल छथि तखन फेर ओहि कथन सभहक औचित्य की? ईहो मोन राखन उचित जे जीवन झासँ लऽ कऽ कविवर सीताराम झा आ मधुपजी धरि बहरमे गजल लिखने छथि। अतबे आ इएह बात सभ साबित करैए जे मैथिलीमे गजलकेँ असंभव संबंधमे घोषणा केनिहार सभ लग जतेक गजलक ज्ञान छलनि ओतबे ज्ञान चुन्नूओजी लग छनि आ चुन्नूजी ओहिसँ आगू नै बढ़ि सकल छथि। 

फेर चुन्नूजी लीखै छथि जे "यद्यपि ई घोषणा कालांतरमे अमान्य भेल"। मुदा कोना अमान्य भेल से सूचना पाठककेँ नै दऽ रहल छथि। बहुत संभव जे 2021 मे हुनकर पोथी प्रकाशित भेलनि अछि आ ओ अही बर्खसँ अमान्य सिद्ध मानि रहल होथि।

टेमी जकाँ कखनो मिझा फेर जरैत गेलियै

हारैत कखनो खूब कखनो कऽ जितैत गेलियै


(शाइर-अभिलाष ठाकुर, मात्राक्रम-2212-2212-2112-1212)

9

पृष्ठ-14 पर चुन्नूजी वार्णिकता (छंद)केँ अंकगणीतीय रूपकेँ व्यक्त करबाकेँ कृत्रिम मानै छथि। हमरा एहन कथनपर आश्चर्य नै भेल कारण हमरा बूझल अछि जे चुन्नूजी समाजसँ कटल लोक छथि आ समाजसँ कटल लोक किछु लीखि-बाजि सकैए। वस्तुतः समाजक सभ विध कृत्रिमे छै। से लालन-पालनसँ लऽ कऽ शिक्षा-दीक्षा, ओढ़न-पहिरन-भोजन धरिमे। सुख-सुविधासँ लऽ कऽ राग-विराग धरि। समाजमे अनुशासन अनबाक लेल कृत्रिम बिध सभ बनाएल जाइत छै आ हरेक बिधक अंकगणीतीय रूपमे सेहो व्यक्त कएल जाइत छै। उदाहरण लेल घरक नक्शा ओकर अंकगणीतीय रूप छै तँ संगीतमे स्वरलिपि ओकर अंकगणीतीय रूप छै। आब चुन्नूजी मंचपर वा रेडियो-टीभीपर गीत-संगीत सुनि लैत हेता तँइ स्वरलिपि हुनका नै देखाइत हेतनि। अन्यथा बिना स्वरलिपिकेँ कोनो प्रोफेशनल आ विद्वान संगीतकार काज करिते नै छथि। ओतबे किए चुन्नूजीक पोथी सभ जे छपल छनि ओकरो अंकगणित होइत छै जे कते बाइ कतेक पोथी हेतै आ ओहीपर ओकर स्वरूप निर्भर करैत छै। ओना आने बात जकाँ हमरा विश्वास अछि जे चुन्नूजी ई बात सभ नै बुझि सकताह कारण बुझबाक लेल समाजिक होमए पड़ैत छै। समाजिके किए संन्यासियो हएब तँ इएह अंकगणित काज आएत। मंत्रो पढ़ब तँ मंत्रसँ पहिने छंदक नाम, ओकर देवता, ओकर ऋषि आदिक नाम भेटत। मुदा ई बात सभ चुन्नूजीकेँ पता नै छनि।

 ऋगवेद संहिता, अथ प्रथमं मण्डलम्, सूक्त-१, देवता-अग्निः ; छन्द-गायत्री; स्वर-षड्जः; ऋषि-मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः

ॐ अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्। होतारं रत्नधातमम् ॥1॥

जगत मे थाकि जगदम्बे अहिंक पथ आबि बैसल छी

हमर क्यौ ने सुनैये हम सभक गुन गाबि बैसल छी


(शाइर-कविवर सीताराम झा, मात्राक्रम-1222-1222-1222-1222)

आब जँ चुन्नूजीकेँ गायत्री छन्दक परिभाषा जनबाक छनि तँ ओ "अनचिन्हार आखर"पर जा कऽ पढ़ि सकैत छथि आ संपूर्ण वैदिक छन्द सीखि सकै छथि। हजारो वर्ष पहिने जाहि समाजक कवि साहस संग अपन रचनासँ पहिने ओकर विधान लीखि सकैत छलाह ओही कविक वशंज सभ ततेक कमजोर जे ओ सभ विधान देखिते छुल-छुल मूतए लागै छथि।

10

पृष्ठ 15 पर चुन्नूजी लिखैत छथि जे "हम छंद मे लयक आग्रही बेसी छी"। ई कथन आ चुन्नूजीक वास्तविकता दूनू अलग-अलग अछि। हुनका लय बेसी चाही सेहो छंदमे मुदा छंद कतए छनि? ओ तँ छंद-बहर मानिते नै छथि तखन छंदमे बेसी कि कम लय कोना भऽ सकतै? वास्तविकता तँ ई अछि जे चुन्नूजीकेँ ई पते नै छनि जे लय की होइत छै। साहित्ये नै दुनियाँक कोनो एहन चीज नै छै जाहिमे लय नै होइत हो। लय केर मतलब छै "गति"। चलैत हवाक लय छै तँ नदी संग नालाक सेहो। गुड़कैत पाथरक सेहो लय छै। आब अही लय सभमेसँ जखन कोनो एकटा लय बेर-बेर निश्चित अवधि-अंतरालक संग अबैत छै तखन ओ छंद बनि जाइत छै, ओकर नाम पड़ि जाइत छै। कथा अछि जे साँपकेँ भागैत देखि संस्कृतक "भुजंगप्रयात" छंद बनल अछि। एकर सोझ मतलब भेल जे छंद एकटा विशिष्ट लय केर नाम छै। आब जखन लय छैहे तखन चुन्नूजी कम-बेसी किए रहल छथि तकर हम अनुमान कऽ सकैत छी। हमर अनुमान अछि जे छंद बला रचना एक तँ लिखहेमे कठिन छै आ तकर बाद ओकर धुन बनाएब सेहो कठिन। मुदा बिना छंद-बहर बला रचना तँ केनाहुतो लीखू आ ओकर धुन बना गाबि लिअ। चुन्नूजी मूलतः मंचीय गायक छथि आ चुन्नूजीकेँ मंचपर प्रेशर रहैत छनि गेबाक आ तही प्रेशरक कारणे ओ लयक बेसी आग्रही हेता। मुदा फेर कहब छंद विशिष्ट लयक नाम छै ओहिमे जँ कियो कम-बेसी केर बात करै छथि तँ साफे बुझू जे हुनका लग कान्सेप्ट केर कमी छनि। एहिठाम कियो ई कहि सकै छथि जे गायककेँ मंचपर अनिवार्य रूपसँ जाए पड़तै तँइ मंचीय गायक नामक वर्गीकरण उचित नै। मुदा कवि-साहित्यकारकेँ तँ सेहो अनिवार्य रूपसँ मंचपर जाए पड़ै छै तखन अलगसँ मंचीय कवि-साहित्यकारक वर्गीकरण करबाक कोन जरूरति? जे गुण कोनो कवि-साहित्यकारकेँ मंचीय बना दैत छै ठीक ओहने गुण कोनो गायककेँ सेहो मंचीय बना दैत छै।

ओढल ओ शेरक खाल बरु छै तँ सिआरे

एहन परजीवीकेँ रगड़बाक समय छै


(शाइर-रामबाबू सिंह, मात्राक्रम-2222-2212-211-22)

 11

चुन्नूजी गजलक व्याकरण मानिते नै छथि तखन छोट बहर वा पैघ बहरक चर्चा करब संकेत दैए जे चुन्नूजी छोट पाँतिकेँ छोट बहर आ पैघ पाँतिकेँ पैघ बहर मानि लेने छथि से साफे अज्ञानता छै (पृष्ठ-17)। पाँतिसँ बहरक निर्धारण नै होइत छै बल्कि बहरसँ पाँतिक निर्धारण होइत छै से बूझब आवश्यक आ पहिल दू पाँतिक जे बहर-काफिया-रदीफ कायम हेतै सएह पूरा गजलमे अंत धरि निर्वाह हेबाक चाही।  ईहो देखि हँसी लागैए जे एक दिस चुन्नूजी गजलक छंद ओ छंदकार सभकेँ खारिज करै छथि मुदा ओही छंदकार, ओही "अनचिन्हार आखर" केर बनाएल परिभाषिक शब्दावली जेना बाल गजल, भक्ति गजल आदिकेँ हपसि कऽ रखबाक प्रयास कऽ रहल छथि (पृष्ठ-18)। बहुत संभव चुन्नूजी ई मानि बैसल होथि जे एहि पारिभाषिक शब्दावली आ सिद्धांतक जन्मदाता हुनकेसँ उपकृत कोनो युवा छै। मुदा हँसिए-हँसीमे एहि सभ बातकेँ कात करैत ईहो विश्वास भऽ जाइए जे मैथिलीमे असल गजलक बाट एनाहिते लक्ष्य धरि पहुँचतै।

काँटक ढेरीमे फूल खोजि रहल छी

संकटमे हर्षक मूल खोजि रहल छी


(शाइर-कुन्दन कुमार कर्ण, मात्राक्रम-222-22-2121-122)

12

चुन्नूजीक भूमिका एकै छनि मुदा ओहिमे फाँक बहुत अछि। अतेक जे एकटा फाँकमे हाथ देब तँ दस टा फाँक केर अनुभव हएत मुदा सभ फाँक किछु मुख्य फाँकमे जा कऽ मीलि जाइत छै। आ तँइ हमर प्रयास रहल अछि जे हम ओही मुख्य फाँक सभकेँ अपन आलोचनाक विषय बना सकी। रहलै बात एहि कथित संग्रह रचना सभकेँ तँ ओ हमरा लग नै अछि मुदा चुन्नूजीक अध्य्यन, क्षमता एवं पूर्वाग्रहकेँ देखैत रचना सभकेँ बिना पढ़ने कहल सकैए जे पोथीमे देल गेल रचना सभ गजल नै हएत। ओ रचना सभ आन जे किछु (गीत-कविता) हुअए मुदा गजल तँ नहिए हएत। आब जँ ओ गीत कि कविता अछि तँ ओ केहन अछि से गीत-कविताक मर्मज्ञ सभ कहता। मैथिलीमे पुरस्कारक जे हाल छै ताहिमे ई बहुत संभव जे हुनकर एहि पोथीकेँ पुरस्कार भेटि जाइक। मुदा मोन राखू पुरस्कार कोनो विधाक मानक नै होइत छै। एकटा बात ईहो जे चुन्नूजी "नाटक" करएमे महारथी छथि आ तँइ ई गजल विधाक संग "नाटक" केने छथि। 

हीरो नै ऐ नाटकमे

बिपटा छै भरमार सजल


(शाइर-ओमप्रकाश, मात्राक्रम-22-22-22-2)


परिशिष्ट-चुन्नूजीक पोथीक भूमिका निच्चा पढ़ल जा सकैए-















रविवार, 28 नवंबर 2021

दू भ्रमित साहित्यकारक बातचीत

 ई आलेख मूलतः हम फेसबुकपर देने रही जकर लिंक अछि- https://www.facebook.com/anchinhar/posts/6172033809488548 एहि आलेखमे जे किछु वर्तनीजन्य गलती छलै आ किछु आन तथ्य छूटल छलै तकरा सभकेँ सुधारि हम एहि ब्लागपर दऽ रहल छी।


10 जुलाई  2021 केँ एकटा फेसबुक लाइभ Dhirendra Premarshi धीरेन्द्र प्रेमर्षि एवं Siyaram Saras सियाराम झा सरसजीक बीच भेल जाहिमे बहुत मुद्दाक संग गजलोपर बात भेल आ ओ दूनू गोटे गजल विधापर बहुत रास भ्रमपूर्ण बयान सभ दैत रहलाह। ओना तँ हम सीधे कहि सकैत छलहुँ जे सियाराम झा सरसजीकेँ जे भ्रम छै तकर उत्तर हम अपन पोथी "मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास"मे लीखि देने छियै तँइ ओकरा पढ़ि लिअ। मुदा हमरा बूझल अछि जे सरसजी पूरा जीवनमे अध्ययन कम आ विद्यापति समारोह एवं अन्य मंचपर भाग बेसी लेलाह अछि। तेनाहिते प्रेमर्षिजीक पूरा समय नवयुवाकेँ भ्रमित करएमे आ मंचपर माइक पकड़एमे जाइत छनि तँइ हुनको वशमे अध्ययन नै छनि। तँइ ओइ बातचीतक किछु भ्रम आ ओकर उत्तर (जे कि हम अपन पोथीमे दऽ देने छी) एहि ठाम दऽ रहल छी।  उम्मेद अछि जे धीरेन्द्रजी हमर एहि लिखलकेँ सरसजी धरि पहुँचेता जाहिसँ हुनकर भ्रमक निराकरण भऽ सकनि। ओना ई अध्य्यन नहिए करै छथि तँइ विश्वास जे ई आलेख ओ सभ नहि पढ़ताह। ई साक्षात्कार एहि लिंकपर देखि सकैत छी- https://www.facebook.com/groups/164622824980853/posts/398317104944756/


1) सरसजी 2014 मे प्रकाशित हमर एकटा आलेख केर संदर्भ दैत कहै छथि जे ओहिमे लिखल छै जे गजल लेल मात्रा जरूरी नै छै।


हमर कथन---cell केर जे परिभाषा भौतिकी शास्त्रमे छै से परिभाषा जीवविज्ञानमे नै छै। तँ एकर की मतलब जे भौतिकी बला कहि देतै जे भौतिकी केर परिभाषा जीवविज्ञानमे लगबाक चाही? भानस लेल जे मात्राक मतलब हेतै वएह मतलब राजमिस्त्री लेल नै भऽ सकैए। तँइ छंदशास्त्रमे जे मात्रा केर मतलब छै वएह मतलब संगीतशास्त्रक मात्रा लेल नै भऽ सकैए। ई जे बेसिक चीज छै तकरा सरसजी बुझबामे असफल रहि गेलाह। गजल काव्य केर विधा छै संगीत केर नै तँइ गजलमे छंदक मात्रा हेतै संगीतक नै। आ ओहि आलेखमे इएह बात लिखने छियै जकर मूल एना अछि--"गायक सभ गजलमे मात्रा क्रम सप्तक ( सा,रे,गा,मा,पा,धा,नि,सा ) केर हिसाबसँ बैसाबए लागै छथि जे की अवैज्ञानिक तँ अछिए सङ्गे-सङ्ग अनर्थकारी सेहो अछि। काव्यमे रागक हिसाबसँ छन्द नै बनै छै। तँए कोनो एकटा छन्दमे बनल रचनाकेँ बहुतों गायक बहुतों रागमे गाबै छथि गाबि सकै छथि। राग-रागिनीक मात्राक्रम सङ्गीत लेल छै साहित्य लेल नै। तेनाहिते छन्दक मात्राक्रम काव्य लेल छै सङ्गीत लेल नै"

निश्चित तौरपर सरसजी बुझबामे असफल रहि गेल छथि तँइ ओ छंदशास्त्रक मात्रा ओ संगीतशास्त्रक मात्रामे ओझरा गेलाह। आ ई साबित होइए जे सरसजी छंदक ज्ञाता तँ नहिए छलाह संगीतशास्त्रक ज्ञाता सेहो नै छथि। जखन कियो बहरे रमलमे गजल लिखै छथि तँ एकर मतलब जे मूल ध्वनि फाइलातुन हेतै मने 2122 मुदा गजलमे फाइलातुन केर बदला राग दरबारी वा राग यमन केर मात्रासँ नै लीखल जाइत छै। गायन लिखलाक बादक प्रक्रिया छै से बूझए पड़तनि सरसजीकेँ।


2) चूँकि सरसजी मात्राक परिभाषा नै बुझने छथि तँइ ओ उपरका संदर्भमे कहै छथि जे जखन ओ खास आदमी (मने आशीष अनचिन्हार) मात्रा नै मानै छथि तखन ओ अपन गजलक निच्चा मात्रा किएक लिखै छथि।


हमर कथन-- उपरमे हमरा लोकनि देखलहुँ जे सरसजी कोना मात्रा नै बुझि रहल छथि। गजल सदिखन छंदक मात्रामे लिखल जाइत छै आ हम वा आन सेहो गजलक निच्चा ओहि गजल छंदक मात्रा दैत छियै। संगीतक मात्रासँ गजल लिखेतै नै। गाबए लेल पहिने गजल लीखए पड़ैत छै आ जे लिखब मात्र छंदक मात्रामे हेतै।


3)  सरसजी प्रश्न उठबैत छथि जे हमर गजल जे गाएल गेल अछि ताहिपर ओ खास आदमी मने हम किएक ने बाजि रहल छियै?


हमर कथन-- दोहा, रोला समेत सभ छंद गाएल जाइत छै तँ की हम ओकरा गजल मानि लियै? गायन गजलक कसौटी नै छै। जखन कोनो रचना गजल भऽ जेतै तकर बाद ओ गाएल जाए कि नै जाए से बात हेतै।


4) बातचीतमे प्रेमर्षिजी कहै छथिन जे आब ओ सभ सचेत ढ़ंगसँ कोनो गजल लिखल रचनाकेँ मात्रा गानि कऽ सर्टिफिकेट दऽ रहल छथि।


हमर कथन-- हम सभ अपन पहिले दिनसँ ई काज कऽ रहल छी। ई एखन तुरंतेक बात नै छै। सरसजी समेत बहुते कथित गजलकारक रचना एनाहिते सचेत ढ़ंगसँ कसौटीपर कसि कऽ बेकार कहि देल गेलै। हम तँ ई कहबनि जे उम्रक एहि ढलानपर आबि सरसजी एवं आनो लोक सभ सचेत भऽ रहल छथि। हम सभ पहिले दिनसँ सचेत छी।


5) बातचीतमे प्रेमर्षिजी सरसजीसँ पुछैत छथिन जे अहाँ बहरसँ इन्कार नै करै छियै ने। सरसजीक जवाब छलनि नै।


हमर कथन-- मात्र मूँहेसँ कहि देलासँ नै होइत छै। सरसजीक एकौटा कथित रचनामे बहर नै छनि तँइ ओ सभ गजल अछियो नै।


6) बातचीतक क्रममे प्रेमर्षिजी कहलाह जे बहरमे नहियो रहैत सरसजी वा विमलजीक शेर लोकप्रिय छनि जखन कि बहर बला शेर सभ नै।


हमर कथन- हिनकर सभहक शेर साहित्यिक नै आन कारण सभसँ प्रसिद्ध छनि। हिनका गुटक दू टा युवा आ दू टा पुरान शेर मोन पाड़ि लैत छनि तँ ई सभ ओकरा लोकप्रियता मानि बैसै छथि। मुदा ई मोन पाड़ब आन कारणसँ रहैत छै। लोभ-लाभसँ संचालित रहैत छै। आ फल्लाँ बाबूक छनि तँ हुनका खुश करबाक लेल कोट कऽ देल जाइत छनि। ई लोकप्रियता नै भेलै।


7) बातचीतक क्रममे सरसजी कहै छथि जे "बुद्धि बपजेठ़ होइत छै"।


हमर कथन-- सरसजीक ई बात कुंठाक परिचायक छनि। ने अपने अध्य्यन करताह आ ने युवाकेँ करए देथिन आ जे युवा अध्य्यन करत तकरा लेल ओ कुंठित भऽ विषवमन करताह। तँ एहिपर कहबाक लेल हमरा लग समय नै अछि।


8 ) सरसजी प्रश्न उठेलखनि जे कोन कारणसँ जीवन झाक गजलक प्रशंसा भेलै आ हमर गजलकेँ खारिज कएल गेल।


हमर कथन-- आधुनिक मैथिलीक पहिल आरंभिक गजल सभ रहितो पं.जीवन झाक गजल सभ बहर ओ भाव दूनूसँ परिपूर्ण अछि। जीवन जीक एकटा गजलक एकटा पाँति देखू-- "निसास लै नोर जौं बहाबी समुद्र पर्यन्त तौं थहाबी" एकर मात्राक्रम अछि 12+122+12+122+12+122+12+122 आ अही मात्राक्रमक पालन पूरा गजलमे भेल छै। इएह बहर भेलै। बहर ओ नै भेलै जे पहिल पाँतिमे कोनो मात्राक्रम भेल दोसरमे किछु आ तेसरमे किछु। पं.जीवन झाजीक आनो गजलक इएह हाल अछि। आब कहू १९०५ मे जे कवि बहर ओ भावकेँ पूरा पालन केलथि तिनकर प्रशंसा नै हेतै तँ किनकर हेतै। कायदासँ तँ ई हेबाक चाही जे पं.जीवन झाजीक गजलमे गलती छै तकरा ठीक करैत सरसजी गजलकेँ मजगूत करतथि मुदा भेल उल्टा। जतबो तत्व पं. जीवन झाजीक गजलमे छनि तकर एकौ प्रतिशत सरसजीक गजलमे नै छनि। तखन सरसजीक प्रशंसा किएक। हम तँ ईहो कहब जे मात्र तीन-चारि टा गजल रहितो कविवर सीताराम झा अस्सी-नब्बेक दशकमे आएल सभ गजलकारसँ बेसी प्रशंसनीय छथि।


9) बातचीतमे धीरेन्द्रजी एकटा विशेषण केर चर्च केलथि जे हम हुनका लेल प्रयोग केने रही।


हमर कथन-- ओ प्रयोग लिखित रूपमे एखनो छै मुदा प्रेमर्षिजी ओकरा गलत ढंगसँ लेलथि। हम अपन ब्लागपर ओहन सभ रचनाकारक परिचय प्रस्तुत केलहुँ जे कि अपन रचनाक शीर्षक गजल देलथि चाहे ओहि गजलमे बहर होइक वा नै होइक। एक तरहें ई परिचय केर बात छलै। हम एखनो मानै छी जे बिना बहर बलामे प्रेमर्षिएजी एकमात्र वीर छथि जे ओहि समयक गजलक विशेषांक निकालएमे सफल भेलाह। मुदा ओहि शृंखलाक उद्येश्य ओ व्याप्ति जनने बिना जँ ओहि कथनक मतलब निकालल जाए तँ हम की कऽ सकैत छी। दोसर ईहो बात हमरा समझमे नै आएल जे जँ आशीष अनचिन्हार खरापे छै तखन ओकर सर्टिफिकेट नुमा कथनपर किएक खुश छलाह प्रेमर्षिजी।


10) बातचीतक अंतमे गजलक रचनाप्रक्रियापर बात भेल। जाहिमे कहल गेल जे नवयुवा गजल देखिए कऽ ओहिमे लीखि रहल छथि तँइ ओकर स्वागत हेबाक चाही।


हमर कथन-- स्वागत तँ हेबाक चाही मुदा जे ओ पहिल दिन लिखै छलाह तेनाहिते की जीवन भरि बेबहरे लिखता। जँ लिखता तँ फेर ओ गजलकार कथिक? हुनकर प्रगति कथिक? सभ जाँचए पड़त आ सभकेँ चीड़-फाड़ करए पड़त।

मंगलवार, 16 नवंबर 2021

गजलक रखबार सूतल अछि

1

मैथिलक बड़ हितैषी बनल

मैथिलीक सोधनिहार छथि

2

उपरक दू पाँति बैकुंठ झा रचित छनि। बैकुंठ झा मूलतः लघुकथाकार छथि। मुदा हुनका लघुकथा लिखबाक जरूरते किए पड़लनि जखन कि मैथिलीमे कथा नामक विधा छलैहे। आब बैकुंठजी हमरा बहुत रास बात कहता (मने कथा ओ लघुकथाक संदर्भमे), बहुत रास अंतर देखेताह। मुदा बैकुंठजी ई बात ई अंतर तखन बिसरि जाइत छथि जखन कि ओ गजल विधामे प्रवेश करै छथि आ गीत-ओ कविताक उपर गजलक लेबल लगा लै छथि। जतबे अंतर कथा आ लघुकथामे भऽ सकैए ततबे अंतर गीत-कविता ओ गजलमे छै। जँ लघुकथाक नियम छै तँ गजलक नियम सेहो छै मुदा बैकुंठजी लघुकथा बेरमे तर्क देता मुदा गजल बेरमे कुतर्क से हमरा विश्वास अछि।

3

"रखबार" नामसँ एकटा कथित गजल संग्रहक आएल अछि जकर लेखक बैकुंठ झा छथि। एहि पोथीक समर्पण एवं भूमिका दूनू पद्येमे अछि जे की नीक लगैत अछि। समपर्णसँ ई पता लगैए जे मैथिलीपुत्र प्रदीपजी पहिल संसर्ग बैकुंठजीकेँ भेटलनि आ भूमिकासँ ई पता चलैए जे बैकुंठजी भ्रम आ पूर्वाग्रह दूनूमे फँसल छथि आ हुनकर रचना सभमे व्याकरणिक स्थिति छनि से हुनको नै पता छनि। चारि पाँति देखल जाए--

"..मात्राक खाँच-साँचमे कसल-फँसल नहि होय गजल

अछि से संभव शिरोधार्य सब समालोचना करब ग्रहण

अथवा बुझना जाय गजल यदि छंद वितानमे खुटेसल

ओहो नहि सायास भेल अछि सहजहिं भेलय शब्दांकन.."

एहि केर बाद आरो-आरो तर्क (??) सभ पद्येमे देल गेल अछि।

4

अतेक तँ निश्चित जे बैकुंठजीकेँ गजलक व्याकरण पता नै छनि (अथवा ओ पूर्वाग्रहक कारणे जानए नै चाहै छथि अथवा डर छनि जे सही चीज मानि लेलासँ हुनकर पचासो बर्खक तपस्या खंडित भऽ जेतनि) मुदा जे लोक मात्रिक छंदक अभ्यास केने छथि हुनकर रचना गजलमे बहरे मीरक नजदीक जा सकैए। हम मात्र नजदीक कहि रहल छी पूरा नै। आ हम बैकुंठजीकेँ जतेक जानै छियनि ताहिमे ओ मात्रिक छंदक नीक अभ्यासी छथि। तँइ हुनकर रचना सभमे मात्राक अंतर कम्मे छनि मुदा तैयो मूल अंतर संयुक्ताक्षर एवं चंद्रबिंदु बला अक्षर सभ छै। जाहि कारणसँ प्राचीन मैथिलीमे संयुक्ताक्षर बला नियम हटाएल गेल रहै तकरा सभ बिसरि गेल छथि आ धड़ल्लेसँ संस्कृतक शब्द प्रयोग कऽ रहल छथि। एहन स्थितिमे अहाँ कि हम लाठी हाथे संयुक्ताक्षर बला नियम मानू वा कि नै मानु मुदा उच्चारणमे, आवृतमे ओ नियम अपने आबि जाइत छै। ओहिपर केकरो वश नै छनि। तँइ हम सभ संयुक्ताक्षर बला नियम मानि रहल छी आ जे भाषाक जानकार हेता आ जिनका रचना संग भाषोक संरक्षण करबाक हेतनि से एहि नियमकेँ मानताह। चंद्रबिंदु बला प्रसंगमे मैथिलीमे अराजकता पसरल अछि। पं.दीनबंधु झाजी (मिथिला भाषा विद्योतनमे) चंद्रबिंदुयुक्त अक्षरकेँ दीर्घ मानै छथि जे कि चलि पड़ल मुदा पं. गोविन्द झा “मैथिली परिचायिकाकेर पृष्ठ 20पर लिखै छथि जे “अनुस्वार भारी होइत अछि आ चंद्रबिंदु भारहीनतकरा जनबाक बेगरता मैथिलीक विद्वान सभकेँ नै बुझेलनि। चंद्रबिंदु भारहीन मने लघु होइत छै। ई तथ्य जानब उचित हेतनि बैकुंठ जी लेल। तँइ हम ई कहि सकैत छी जे बैकुंठजीक रचना सभ बहरे मीरक संरचनामे होइत-होइत रहि गेल अछि आ स्पष्ट ओ गजल नै अछि। एहन स्थितिमे आब हम रचनामे भाव ओ वैचारिकत देखब। रचनापर बात करैत काल हम बेसी उदाहरण नै देब। पाठक पोथी कीनथि आ ओहि उदाहरण सभकेँ पढ़थि आ जानथि से हमर उद्येश्य अछि।

5

एहि पोथीक पहिल रचना भक्तिपरक अछि आ ई कोनो खराप बात नै छै। प्रगतिशीलता केर माने बहुत किछु होइत छै। मात्र परंपराकेँ छोड़ए बलाकेँ प्रगतिशील नै मानल जा सकैए। आ ठीक इएह बात बैकुंठजी अपन तेसर रचनामे देने छथि। अहिंसक बंसी विरल प्रतीक अछि एकर स्वागत हेबाक चाही। तेनाहिते साँपक जासूस मूस ईहो विरल प्रतीक अछि। हिनकर वैचारिकतामे विरोधाभास सेहो छनि। उदाहरण लेल दू रचनाक दू-दू पाँति देखू--

अगर उठौलक कियो सवाल

भौं-भौं-खौं जवाबमे भेल

फेर आन दोसर रचनामे कहै छथि-

ढेप फेकि गाड़ल झंडापर तों नहि नमहर भ जएबें

मान तहन बढ़तौ ओहू सँ झंडा ऊँच गाड़ पहिने

स्पष्ट भऽ गेल हएत जे हमर इशारा किम्हर अछि।

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मैथिलीमे जे गजलक व्याकरणकेँ नै मानै छथि ताहि लिस्टमेसँ किछु एहन नाम छथि जिनका गजलपर एबामे बेसी मेहनति नै करए पड़तनि। जेना सुधांशु शेखर चौधरी, नरेन्द्र, बाबा बैद्यनाथ, अरविन्द ठाकुर आब एहि लिस्टमे बैकुंठ झा सेहो छथि। सुधांशु शेखर चौधरी बहुत पहिने एहि संसारसँ चलि गेलाह तँइ ओहिपर बात नै हो। नरेन्द्रजी पूर्वाग्रहमे छथि तँइ ओ आगू नै जा सकताह। बाबा बैद्यनाथजीक गजल संग्रह आलोचना हम 2013 मे केने रही। ओ आहत भेल रहथि आ हमर बातक पुष्टि लेल ओ हिंदी गजलकार सभ लग गेल रहथि। जखन ओत्तहु पता लगलनि जे बिना बहर-काफियाक गजल नै होइत छै तखन ओ बहरक अभ्यास केलाह आ हिंदीमे लगभग सात-आठ टा गजल संग्रह प्रकाशितो भेलनि। मुदा दुर्भाग्य मैथिलीक जे ओ ओतेक मात्रामे मैथिली गजल सिखलाक बाद नै लिखलाह। अरविन्द ठाकुर साफे कहै छथि जे अइ उम्रमे सीखब पार नै लागत।

कुल मिला कऽ भाव केर हिसाबसँ देखल जाए तँ निश्चिते ई पोथी पाठककेँ पढ़बाक चाही।


(३३४ म अंक १५ नवम्बर २०२१ मे प्रकाशित) 

रविवार, 7 नवंबर 2021

गजल

भेल कुपित हजारपर इजोरिया
ललकै छै लचारपर इजोरिया

सहायता केने रहियै कहियो
बैसल छै कपारपर इजोरिया

घुप्प घाप अन्हारक दुनियाँमे
रहिते छै रडारपर इजोरिया

ध्वंसक राग भास बहुत तालमे
गाबैए गिटारपर इजोरिया

छै हुनकर हाथक साँठल थारी
उगि गेलै सचारपर इजोरिया

सभ पाँतिमे 222-222-222 मात्राक्रम अछि। दू अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि।  

बुधवार, 27 अक्तूबर 2021

गजल

अमीरक निशानी डबलपर डबल छै
गरीबक निशानी घटलमे घटल छै

कते बात बाजब सियारक शहरमे
हमर जीह अत्तहि अहीपर रुकल छै

बहुत छूटि गेलै तकर बाद तैयो
गमक एक कनमा रचल ओ बसल छै

हवामे हियाकेँ मिला लेत दुनियाँ
जते ई कठिन छै तते ई सरल छै

हमर पाँति पढ़िते सभा पूछि बैसल
ककर नोर अत्ते गजलमे लिखल छै

सभ पाँतिमे 122-122-122-122 मात्राक्रम अछि आ ई बहरे मुतकारिब मुस्समन सालिम अछि। सुझाव सादर आमंत्रित अछि। 

बुधवार, 8 सितंबर 2021

गजल

शुभ सुमंगल जोग जौबन
आइ लीखल जोग जौबन

बेरपर के काज एतै
पूछि बैसल जोग जौबन

राजनीतिक मंच माध्यम
फेर भेटल जोग जौबन

मर्म बुझियौ किछु पियासक
छै अछिंजल जोग जौबन

देह अलगे घाम एकै
थाकि सूतल जोग जौबन

सत्य अतबे छै जगतमे
भ्रम पसारल जोग जौबन

सभ पाँतिमे 2122-2122 मात्राक्रम अछि। ई बहरे रमल मोरब्बा सालिम वा बहरे रमल सालिम चारि रुक्नी अछि। सुझाव सादर आमंत्रित अछि।

शुक्रवार, 20 अगस्त 2021

गजल

जहर डुबल छै बान सुपारी लइए लेलक जान सुपारी सूनब कठिन अवाज सुदीनक पथने रहलै कान सुपारी की देबै उपदेश सिनेहक चीन्है अप्पन आन सुपारी खिस्सा खतम आ पैसा हजम सद्धम बद्धम पान सुपारी

महँगा महँगा बाँचल रहलै सदिखन भेलै दान सुपारी

सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। ई बहरे मीर अछि। सुझाव सादर आमंत्रित अछि।  "सद्धम बद्धम पान सुपारी" ई पाँति बच्चामे सूनल पाँति अछि। 

सोमवार, 9 अगस्त 2021

गजल

सरस शब्द कमला बिला गेल छै
मधुर बोल कोसी खिया गेल छै

हवा पानि तेहन लगा गेल छै
बहुत तीर अपने बिझा गेल छै

हितैषी बनैए प्रजा केर ओ
चितापर चिता जे सजा गेल छै

किए जोड़ि देलक पता से करू
बहुत बेर अहिना घटा गेल छै

लिखा गेल हेतै पतापर पता
पता नै ककर की घुरा गेल छै

खसल बुन्द अत्ते हुनक दर्द के
हमर टीस कहुना मिझा गेल छै


सभ पाँतिमे 122-122-122-12 मात्राक्रम अछि। ई बहरे मुतकारिब केर मुजाइफ रूप अछि।
तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों