चान सन शीतल रूप केहन अहाँकेँ
अप्सरा स्वर्गक होइ तेहन अहाँकेँ
अछि हृदयमे मूरत अहाँ केर सोभित
मोहि लेलक ई रूप एहन अहाँकेँ
देखिते आनंदसँ हिया भेल हर्षित
मंद शीतल मुस्कान जेहन अहाँकेँ
अपन आँखिक काजर बना राखि लिअ ने
प्राण हम्मर अछि आब रेहन अहाँकेँ
मोटरी दिअ माथक अपन आब सगरो
‘मनु’ तँ सबटा लय लेत गेहन अहाँकेँ
(बहरे खफीक, मात्राक्रम : 2122-2212-2122)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’