Wednesday, 20 June 2018

गजल

आब अप्पन आसन लेल
टाट चाही आँगन लेल

सत्य ईहो छै रे भाइ
मृत्यु चाही जीवन लेल

नेह चाही अपने हमरा
टीस चाही साजन लेल

राज्य नै चलतै हुनकासँ
नेत चाही शासन लेल

भोग चाहथि साधू संत
जोग चाही राजन लेल

सभ पाँतिमे 2122 2221 मात्राक्रम अछि। तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम दीर्घकेँ लघु मानि लेबाक छूट लेल गेल अछि।

Tuesday, 19 June 2018

गजल

जुआनीके पहिल उत्सव मनेलौं हम
हियामे ओकरा जहिया बसेलौं हम

सुरुआते गजब छल सोलहम बरिसक
अचानक डेग यौवन दिस बढेलौं हम

उचंगाके कमी नै टोलमे कोनो
नजरि मिलिते इशारामे बजेलौं हम

गवाही चान तारा छै पहिल मिलनक
कलीके संग भमरा बनि फुलेलौं हम

असानी छै कहाँ टिकनाइ नेही बनि
समाजक रीतमे शोणित बहेलौं हम

कलम कापी किताबक कोन बेगरता
जखन इतिहासमे प्रेमी लिखेलौं हम

चिरै सन मोन ई उड़िते रहल कुन्दन
असम्भवपर किए असरा लगेलौं हम

बहरे-हजज (1222×3)

© कुन्दन कुमार कर्ण

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Tuesday, 12 June 2018

गजल

किछु काज भगवान भरोसे
किछु काज शैतान भरोसे

किछु लोक नोरेसँ भरल अछि
किछु लोक मुस्कान भरोसे

किछु आँखि सोनासँ सजल छै
किछु आँखि दुभिधान भरोसे

बहुते मजा आबि रहल छै
किछु बात अनुमान भरोसे

लाभक कथा के क' रहल अछि
किछु लाभ नुकसान भरोसे

सभ पाँतिमे 2212-21122 मत्राक्रम अछि। सुझाव सादर आमंत्रित अछि।

Friday, 1 June 2018

गजल

किछु बात भेलै किछु किछु
शुरुआत भेलै किछु किछु

जे देखलहुँ सपनामे
सच बात भेलै किछु किछु

अइ मोनपर सुंदर सन
आघात भेलै किछु किछु

किछु शांति रहलै फेरो
उत्पात भेलै किछु किछु

हुनकर कृपा दुनियाँमे
खैरात भेलै किछु किछु

सभ पाँतिमे 2212-222  मत्राक्रम अछि। सुझाव सादर आमंत्रित अछि।


Wednesday, 30 May 2018

गजल-

की कहू मोनमे किछु फूराइत नै अछि आइ काइल
ओकरा छोड़ि केओ सोहाइत नै अछि आइ काइल

मोहिनी रूप ओकर केलक नैना पर कोन जादू
चेहरा आब दोसर देखाइत नै अछि आइ काइल

नेह जहियासँ भेलै हेरा रहलै सुधि बुधि दिनोदिन
बात दुनियाक कोनो सोचाइत नै अछि आइ काइल

शब्द जे छल हमर लग पातीमे लिखि सब खर्च केलौं
भाव मोनक गजलमे बहराइत नै अछि आइ काइल

संग जिनगीक कुन्दन चाही ओकर सातो जनम धरि
निन्नमे आँखि आरो सपनाइत नै अछि आइ काइल

2122-1222-2222-2122

© कुन्दन कुमार कर्ण

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Wednesday, 23 May 2018

अपने एना अपने मूँह-40

जनवरी 2018मे अनचिन्हार आखरपर कुल १३ टा पोस्ट भेल जकर विवरण एना अछि
कुंदन कुमार कर्णजीक २ टा पोस्टमे २ टा गजल अछि। आशीष अनचिन्हारक ११ टा पोस्टमे पाँच टा हिंदी "फिल्मी गीतमे बहर ओ व्याकरण" संबंधी विवेचन, १टा अपने एना अपने मूँह, २ टा आलोचना, १ टा बाल गजल आ २ टा गजल अछि।

फरवरी २०१८मे अनचिन्हार आखरपर ८ टा पोस्ट भेल जकर विवरण एना अछि---
कुंदन कुमार कर्णजीक २ टा पोस्टमे २ टा बाल गजल अछि। आशीष अनचिन्हारक ६ टा पोस्टमे ३ टा गजल आ ३ टा "हिंदी फिल्मी गीतमे बहर" नामक पोस्ट अछि।

मार्च २०१८मे अनचिन्हार आखरपर ९ टा पोस्ट भेल जकर विवरण एना अछि---
कुंदन कुमार कर्णजीक १ टा पोस्टमे १ टा गजल अछि। आशीष अनचिन्हारक ८ टा पोस्टमे ३ टा गजल आ ५ टा "हिंदी फिल्मी गीतमे बहर" नामक पोस्ट अछि।

अप्रैल २०१८मे अनचिन्हार आखरपर ७ टा पोस्ट भेल जकर विवरण एना अछि---
कुंदन कुमार कर्णजीक २ टा पोस्टमे २ टा गजल अछि। आशीष अनचिन्हारक ५ टा पोस्टमे ३ टा गजल, १ टा आलोचना आ १ टा "हिंदी फिल्मी गीतमे बहर" नामक पोस्ट अछि।

Tuesday, 22 May 2018

भजनपर गजलक प्रभाव-2

भारतीय भजन (सभ भाषा)मे गजलक बहुत बड़का प्रभाव छै। एकर कारण छै बहरमे भेनाइ(वार्णिक छंद)। मैथिलीक पहिल अरूजी अपन गजलशास्त्रमे लिखै छथि जे "सरल वार्णिक छंद (वर्ण गानि) गेबामे सभसँ कठिन छै ताहिसँ कम कठिन मात्रिक छंद छै आ सभसँ सरल गेबामे वार्णिक छंद छै। गजलमे वार्णिक छंद, काफिया होइत छै मुदा ताहि संग रदीफ सेहो होइत छै जाहि कारणसँ गजल गेबा लेल आर बेसी उपयुक्त भ' जाइत छै। रदीफ गजल लेल अनिवार्य नै होइत छै मुदा तेहन भ' ने सटल रहै छै जे ओ गजलक मौलिकताक पहिचान सेहो बनि जाइत छै। रदीफेसँ कियो गुणी पाठक पहिचान जाइ छथि जे ई किनकर गजल अछि। गजलमे कोनो एकटा रदीफक प्रयोग भ' गेल छै तकरे फेरसँ दोसर शाइर द्वारा प्रयोग करब ओइ पहिल आ मूल गजलक लोकप्रियताकेँ देखबै छै। आइसँ हम किछु एहन भारतीय भाषाक भजन (सभ भाषा) देखा रहल छी जे कि स्पष्टतः गजलसँ प्रभावित भेल अछि। एहि कड़ीक दोसर खंडमे हम मोमिन ख़ाँ मोमिन जीक गजल आ गोस्वामी बिंदुजी महराज जीक भजन ल' रहल छी। उर्दूक महान शाइर मोमिनजीक जन्म 1800 मे भेल छलनि। हुनकर एकटा गजलक शेर अछि...........

वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो
वही या'नी वा'दा निबाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो

पूरा गजल रेख्ता केर एहि लिंकपर पढ़ि सकैत छी https://www.rekhta.org/ghazals/vo-jo-ham-men-tum-men-qaraar-thaa-tumhen-yaad-ho-ki-na-yaad-ho-momin-khan-momin-ghazals?lang=hi

एहि गजलकेँ बेगम अख्तरजीक अवाजमे निच्चा सुनि सकैत छी...
(वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो)

मोमिनजीक एहि गजलक रदीफ "तुम्हें याद हो कि न याद हो " केर प्रयोग गोस्वामी बिंदुजी महराज (जन्म 1893) अपन भजनमे केलथि। ई भजन एना अछि.......

अधमों को नाथ उबारना तुम्हें याद हो कि न याद हो।
मद खल जनों का उतारना तुम्हें याद हो कि न याद हो॥
प्रह्लाद जब मरने लगा, खंजर पै सिर धरने लगा।
उस दिन का खंम्भ बिदारना तुम्हें याद हो कि न याद हो॥
धृतराष्ट्र के दरबार में दुखी द्रौपदी की पुकार में।
साड़ी के थान संवारना तुम्हें याद हो कि न याद हो।
सुरराज ने जो किया प्रलय, ब्रजधाम बसने के समय।
गिरवर नखों पर धारना तुम्हें याद हो कि न याद हो॥
हम ‘बिन्दु’ जिनके निराश हो, केवल तुम्हारी आस हो।
उनकी दशाएँ सुधारना तुम्हें याद हो कि न याद हो॥

बिंदुजीक पोथीमे ई भजन हुनक पोथी "मोहन मोहिनी"सँ लेल गेल अछि। ई गीत एहिठाम सुनू.......
(अधमों के नाथ उबारना तुम्हें याद हो कि न याद हो)

बिंदुजीक एहि भजनपर मोमिनजीक गजलक प्रभाव अछि। स्पष्ट अछि मोमिनजीक गजल भजनपर बहुत बेसी प्रभाव छोड़लक। बिंदुजीक एकटा आर आन प्रसिद्ध भजन अछि "यदि नाथ का नाम दयानिधि है तो दया भी करेगें कभी न कभी"। मोहन मोहिनीक बहुत भजन गजलसँ प्रभावित अछि। ओना "कभी न कभी" प्रसिद्ध शाइर दाग देहलवी (1831) केर एकटा गजलक अंश अछि https://www.rekhta.org/ghazals/naa-ravaa-kahiye-naa-sazaa-kahiye-dagh-dehlvi-ghazals?lang=hi जकरा बिंदुजी रदीफ जकाँ प्रयोग केलथि संगहि ईहो जानब रोचक जे बहुत बादमे सय्यद अमीन अशरफ़जी एही रदीफसँ एकटा गजल सेहो लिखलाह https://www.rekhta.org/ghazals/malaal-e-guncha-e-tar-jaaegaa-kabhii-na-kabhii-syed-amin-ashraf-ghazals?lang=hi


(यदि नाथ का नाम दयानिधि है तो दया भी करेगें कभी न कभी)


Friday, 18 May 2018

गजल

अपना अपनी काबिल लोक
बाँकी सभ छै जाहिल लोक

असगर असगर अपने आप
चुप्पे पीबै आमिल लोक

छाँटल जेतै कहिए कहि क'
बेकारक ई फाजिल लोक

कहियो सार्थक सुंदर चीज
करबे करतै हासिल लोक

बाँचल रहलै काँचे फोंक
चीड़ल गेलै सारिल लोक

रखने सभ किछु के उम्मेद
जीवन जीबै हारिल लोक

सभ पाँतिमे 22-22-22-21 मात्राक्रम अछि। सुझाव सादर आमंत्रित अछि।

गजल

ओकर संग ई जिनगीक असान बना देलक
सुख दुखमे हृदयके एक समान बना देलक

बुढ़हा गेल छल यौ बुद्धि विचार निराशामे
ज्ञानक रस पिआ ओ फेर जुआन बना देलक

अध्यात्मिक जगतके बोध कराक सरलतासँ
हमरा सन अभागल केर महान बना देलक

चाहक ओझरीमे मोन हजार दिशा भटकल
अध्ययनेसँ तृष्णा मुक्त परान बना देलक

अष्टावक्र गीता लेल विशेष गजल कुन्दन
कहितेमे हमर मजगूत इमान बना देलक

2221-2221-121-1222

(तेसर शेरक पहिल मिसराक अन्तिम
लघुके दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि)

© कुन्दन कुमार कर्ण

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Thursday, 17 May 2018

हिंदी फिल्मी गीतमे बहर-15

गजलक मतलामे जे रदीफ-काफिया-बहर लेल गेल छै तकर पालन पूरा गजलमे हेबाक चाही मुदा नज्ममे ई कोनो जरूरी नै छै। एकै नज्ममे अनेको काफिया लेल जा सकैए। अलग-अलग बंद वा अंतराक बहर सेहो अलग भ' सकैए संगे-संग नज्मक शेरमे बिनु काफियाक रदीफ सेहो भेटत। मुदा बहुत नज्ममे गजले जकाँ एकै बहरक निर्वाह कएल गेल अछि। ओना उर्दू केर पुरान नज्ममे निश्चित रूपे बहर भेटत मुदा अंग्रेजी प्रभावसँ सेहो उर्दू प्रभावित भेल आ बिना बहरक नज्म सेहो लिखाए लागल। मैथिलीमे बहुत लोक गजलक नियम तँ नहिए जानै छथि आ ताहिपरसँ कुतर्क करै छथि जे फिल्मी गीत बिना कोनो नियमक सुनबामे सुंदर लगैत छै। मुदा पहिल जे नज्म लेल बहर अनिवार्य नै छै आ जाहिमे छै तकर विवरण हम एहि ठाम द' रहल छी-----------------

आइ देखू "शक्ति" फिल्म केर ई नज्म जे कि लता मंगेशकरजी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि आनंद बख्शी। संगीतकार छथि आर.डी.बर्मन। ई फिल्म Sept 22, 1982 मे रिलीज भेलै। एहिमे अमिताभ बच्चन, स्मिता पाटिल, दिलीप कुमार, राखी आदि कलाकार छलथि।


हमें बस ये पता है वो बहुत ही खूबसूरत है 
लिफ़ाफ़े के लिये लेकिन पते की भी ज़रूरत है

( एहि दू पाँतिक मात्राक्रम अछि 1222 1222 1222 1222)

हम ने सनम को ख़त लिखा, ख़त में लिखा
ऐ दिलरुबा, दिल की गली शहरे वफा

(एहि स्थायीक मात्राक्रम अछि 2212 2212 2212)

पीपल का ये पत्ता नहीं, काग़ज़ का ये टुकड़ा नहीं
इस दिल के ये अरमान हैं, इस में हमारी जान है
ऐसा ग़ज़ब हो जाये ना रस्ते में ये खो जाये ना
हम ने बड़ी ताक़ीद की, डाला इसे जब डाक में
ये डाक बाबू से कहा हम ने सनम को  खत लिखा

बरसों जबाबे यार का, देखा किये हम रास्ता
एक दिन वो ख़त वापस मिला और डाकिये ने ये कहा
इस डाकखाने में नहीं, सारे ज़माने में नहीं
कोई सनम इस नाम का कोई गली इस नाम की
कोई शहर इस नाम का हम ने सनम को खत लिखा

(उपरक दूनू अंतराक मात्राक्रम 2212 2212 2212 2212 अछि) एहि नज्मक ई विशेषता जे एहिमे "शहर" शब्दक गिनती हिंदी जकाँ कएल गेल छै अन्यथा उर्दूमे शहर केर मात्रा दीर्घ लघु होइत छै। एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। ई गीत एहिठाम सुनि सकैत छी.........




Saturday, 12 May 2018

गजल

मोन टुटलै बाते बातमे
गाँठ पड़लै बाते बातमे

महँगी एलै धीरे धीरे
हाथ खगलै बाते बातमे

ने हरनी ने मरनी लेकिन
खेत बिकलै बाते बातमे

हम ईहो लेब ओहो लेब
मोन बदलै बाते बातमे

बड़ी दूर अरिआइत देलक
संग छुटलै बाते बातमे

सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। सुझाव सादर आमंत्रित अछि।


Friday, 11 May 2018

भजनपर गजलक प्रभाव-1

भारतीय भजन (सभ भाषा)मे गजलक बहुत बड़का प्रभाव छै। एकर कारण छै बहरमे भेनाइ(वार्णिक छंद)। मैथिलीक पहिल अरूजी अपन गजलशास्त्रमे लिखै छथि जे "सरल वार्णिक छंद (वर्ण गानि) गेबामे सभसँ कठिन छै ताहिसँ कम कठिन मात्रिक छंद छै आ सभसँ सरल गेबामे वार्णिक छंद छै। गजलमे वार्णिक छंद, काफिया होइत छै मुदा ताहि संग रदीफ सेहो होइत छै जाहि कारणसँ गजल गेबा लेल आर बेसी उपयुक्त भ' जाइत छै। रदीफ गजल लेल अनिवार्य नै होइत छै मुदा तेहन भ' ने सटल रहै छै जे ओ गजलक मौलिकताक पहिचान सेहो बनि जाइत छै। रदीफेसँ कियो गुणी पाठक पहिचान जाइ छथि जे ई किनकर गजल अछि। गजलमे कोनो एकटा रदीफक प्रयोग भ' गेल छै तकरे फेरसँ दोसर शाइर द्वारा प्रयोग करब ओइ पहिल आ मूल गजलक लोकप्रियताकेँ देखबै छै। आइसँ हम किछु एहन भारतीय भाषाक भजन (सभ भाषा) देखा रहल छी जे कि स्पष्टतः गजलसँ प्रभावित भेल अछि। एहि कड़ीक पहिल खंडमे हम स्वामी ब्रह्मानंद जीक भजन आ इब्न ए इंशाजीक गजल लेलहुँ अछि। उर्दूक महान शाइर इंशाजीक जन्म 1927 मे भेल छलनि। हुनकर एकटा गजलक शेर अछि...........

दिल इश्क़ में बे-पायाँ सौदा हो तो ऐसा हो
दरिया हो तो ऐसा हो सहरा हो तो ऐसा हो

पूरा गजल रेख्ता केर एहि लिंकपर पढ़ि सकैत छी https://www.rekhta.org/ghazals/dil-ishq-men-be-paayaan-saudaa-ho-to-aisaa-ho-ibn-e-insha-ghazals?lang=hi  एहि गजलकेँ आबिदा परवीनजीक अवाजमे निच्चा सुनि सकैत छी

(दिल इश्क़ में बे-पायाँ सौदा हो तो ऐसा हो)

इंशाजीक एहि गजलक रदीफ "हो तो ऐसा हो" केर प्रयोग स्वामी ब्रह्मानंद (जन्म 14 July 1944) अपन भजनमे केलथि। ई भजन एना अछि.......

राम दशरथ के घर के जन्मे घराना हो तो ऐसा हो
लोग दर्शन को चले आये सुहाना हो तो ऐसा हो 

बहुत गायक सुहाना केर बदला "लुभाना" केर प्रयोग केने छथि। ई स्वाभाविक छै जे लोककंठमे बसल गीतक शब्द कालखंडमे बदलि जाइत छै आ असल स्रोत धरि पहुँचबामे बहुत कष्ट होइत छै। ई गीत एहिठाम सुनू....... 


(राम दशरथ के घर के जन्मे घराना हो तो ऐसा हो)

बहुत ठाम ब्रह्मेनंदजीक नामसँ एहनो गीत चलैए.....

कृष्ण घर नंद के घर जन्मे दुलारा हो तो ऐसा हो
लोग दर्शन को चले आये सुहाना हो तो ऐसा हो

बहुत ठाम एहनो सुनबा लेल भेटल..........

सदा शिव शंभु वरदाता दिगंबर हो तो ऐसा हो
हर सब दुख भक्तन के दयाकर हो तो ऐसा हो

ई गीत निच्चा सूनि सकैत छी.......



(सदा शिव शंभु वरदाता दिगंबर हो तो ऐसा हो)

एहि रदीफसँ युक्त आर भर्सन सभ सुनबा लेल भेटि सकैए आ ई इब्नेजीक गजलक प्रभाव अछि। स्पष्ट अछि इंशाजीक गजल भजनपर बहुत बेसी प्रभाव छोड़लक।


Wednesday, 2 May 2018

गजल

दुइए दिनक मनमानी रे भाइ
जल्दिये जेतौ सुलतानी रे भाइ

दुख कि दर्दक रंग धरती सन के
नोरक रंग असमानी रे भाइ

बिला गेल सुख चैन भूख पियास
बड़ लेलही कुर्बानी रे भाइ

संबंधक बदला अतबे भेटल
सोना रे भाइ चानी रे भाइ

पुजा लेलही जकरा तों झटपट
हमरे रहै जजमानी रे भाइ

सभ पाँतिमे 222-222-222 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग अलग लघुकेँ दीर्घ मानबा छूट लेल अछि। सुझाव सादर आमंत्रित अछि।

Tuesday, 24 April 2018

गजल

एहनो डोर निकलैए
छोरपर छोर निकलैए

बेरपर मोन पड़िते  छै
एखनो नोर निकलैए

पहिने प्रेम रहै मजगूत
आब कमजोर निकलैए

देहपर देह रूकल छै
ठोरपर ठोर निकलैए

बात हुनकर जखन भेलै
साँझमे भोर निकलैए

सभ पाँतिमे 2122-1222 मात्राक्रम अछि। तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूट लेल गेल अछि। सुझाव सादर आमंत्रित अछि।

Monday, 23 April 2018

गजल

तोरा बिना चान ताराक की मोल
रंगीन संसार साराक की मोल

अन्हारमे जे हमर संग नै भेल
दिन दूपहरिया सहाराक की मोल

चुप्पीक गम्भीरता बुझि चलल खेल
लग ओकरा छै इशाराक की मोल

संवेदना सोचमे छै जकर शुन्य
नोरक बहल कोन धाराक की मोल

अपने बना गेल हमरा जखन आन
कुन्दन कहू ई विचाराक की मोल

221-221-221-221

© कुन्दन कुमार कर्ण

www.kundanghazal.com

Monday, 16 April 2018

गजल

पुरबा शासक पछबा शासक
नहिये रहलै कोनो काजक

बम बारूदक अइ ढ़ेरीपर

हत्या भेलै अपने आसक

निश्चित डुबतै बीचक कोठा

पहिने डूबै धारे कातक

सभहँक चिंता अतबे खाली

सस्ता दामक महँगा दामक

भाषण संभाषण सिंहासन

आगू पाछू अतबे टाटक

सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। सुझाव सादर आमंत्रित अछि।


Saturday, 14 April 2018

आधुनिक मैथिली गजलक संक्षिप्त आलोचनात्मक परिचय

प्रस्तुत आलेख धीरेन्द्र प्रेमर्षिजी द्वारा छह मास पहिने नेपालसँ प्रकाशित पत्रिका लेल आग्रह केलापर लीखल गेल छल मुदा एखन धरि प्रकाशित नै हेबाक कारणे हम सार्वजनिक क' रहल छी...........

(आशीष अनचिन्हार)

आधुनिक मैथिली गजलक संक्षिप्त आलोचनात्मक परिचय

प्रस्तुत आलेख हम मैथिली गजलपर लिखने छी। वर्तमान शोधकेँ मानी तँ आब मैथिली गजल लगभग112 बर्खक भऽ गेल अछि। एहि 112 बर्खमे मैथिली गजलमे बहुत रास प्रयोग आ स्थापना भेलै तकरे निरूपण करब एहि लेखक उद्येश्य अछि। एहि लेखकेँ पढ़बासँ पहिने किछु तथ्य सामने राखि दी जाहिसँ मैथिली गजलक सभ प्रयोग आ स्थापनाकेँ अहाँ सभ नीक जकाँ परखि सकब--
1) गजल लेल बहर ओ काफिया अनिवार्य छै (बहरक पालनमे किछु छूट सेहो भेटै छै गजलकारकेँ मुदा धेआन राखू जे बहरमे लिखते नै छथि हुनका लेल ई छूट कोन काजक)। पं.जीवन झासँ आधुनिक मैथिलीक गजलक जन्म मानल जाइत अछि आ स्वाभाविक छै जे पहिल चीजमे सही आ गलत दूनू तत्व रहै छै तँइ पं.जीक किछु गजलमे बहर ओ काफियाक नीक प्रयोग भेटत तँ किछु गजल गीत जकाँ भेटत। मुदा तकर बाद कविवर सीताराम झा आ काशीकांत मिश्र मधुपजी मैथिलीक गजलक भार उठेला आ मैथिली गजलकेँ विस्तार देला। कविवर आ मधुपजीक गजल सभ पूर्णरूपेण बहर ओ काफियासँ सजल अछि। हिनक दूनूक गजल यथार्थमे मैथिली गजल अछि (भाषा मैथिलीक आ गजल व्याकरणकेँ मैथिलीक अनुरूप देल गेल अछि)। कविवरजी आ मधुपजी दूनू कम्मे गजल लिखलाह मुदा हमरा जनैत ई गजल सभ व्याकरणयुक्त आधुनिक मैथिली गजलक पृष्ठभूमि अछि।
2) लगभग 1970-75सँ मैथिली गजल ओहन धाराक लोक सभहँक हाथमे आबि गेल जे कि गजल बारेमे किछु नै जनैत छलाह। ओ मात्र दू पाँतिक बहर-काफियाहीन पाँति सभसँ बनल कविताकेँ गजल कहए लगलाह। कोनो विधामे प्रयोग खराप नै छै मुदा पाठककेँ भ्रमित कए कऽ कएल प्रयोग हानिकारक होइत छै। एहि धाराक लोक सभ कहैत छलाह गजलमे कोनो नियम नै होइत छै। किछु गोटे कहैत छलखनि जे मैथिलीमे गजल भैए ने सकैए। जखन कि हुनका सभसँ पहिनेहें कविवर आ मधुपजी व्याकरणयुक्त गजल लीखि चुकल छलाह। उपरेमे कहने छी जे एहि धाराक लोक सभकेँ गजलक ज्ञान नै छलनि संगे-संग हिनका सभकेँ मैथिली गजलक इतिहासक बारेमे सेहो पता नै छलनि अन्यथा "गजलमे कोनो नियम नै होइ छै" वा " मैथिलीमे गजल लिखले नै जा सकैए" एहन-एहन बयान देबासँ पहिने ओ सभ जरूर पं.जीवन झा, कविवर सीताराम झा, काशीकांत मिश्र मधुपजीक गजलमे प्रयोग भेल नियम सभकेँ जरूर देखितथि।
3) एहि आलेखमे हम दूनू धाराक उल्लेख करब। दूनू धाराक गजलमे की-की अंतर अछि, दूनू धाराक गजलमे कोन-कोन काज भेल अछि। दूनू धाराक की कमजोरी अछि। दूनू धाराक प्रतिनिधि गजलकार सभहँक किछु शेर सभ सेहो हम देब। मैथिलीमे व्याकरणयुक्त धारा पहिनेसँ अछि तँ पहिने ओकरे वर्णन हएत बादमे बिना व्याकरण बला धाराक। जे गजलक नियम पालन नै करै छथि हुनकर कहब छनि जे व्याकरणसँ विचार ओ भाव बन्हा जाइ छै (ई मोन राखू जे एहन कहए बला लोक सभ मात्र साम्यवादी वा कथित प्रगतिशील भावक बात करै छथि)। हम एहि लेखमे व्याकरणयुक्त गजल सभहँक उदाहरण दैत साबित करब जे कोना व्याकरणसँ भाव कि विचार आदि पुष्ट होइत छै।
4) मैथिली गजल मने ओ गजल जे कि मैथिलीमे लिखल गेल चाहे ओकर देश कोनो किएक ने हो।
5)  एहि आलेखक सभ तथ्य हमर पोथी "मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास"मे आबि चुकल अछि जकरा हम एहिठाम प्रसंगक हिसाबें पुनर्लेखन केलहुँ अछि।
आधुनिक मैथिली गजलक इतिहास
मैथिलीमे गजल उर्दू भाषाक माध्यमें आएल। उर्दूमे फारसीसँ आ फारसीमे अरबीसँ। पं.जीवन झा (जन्म आ मृत्युः 1848-1912) अपन नाटक "सुन्दर संयोग" आ "सामवती पुनर्जन्म"मे पहिल बेर गजल लिखलाह। सुन्दर संयोग 1905 इ.मे प्रकाशित भेल छल। तकर बाद कविवर सीताराम झा (जन्म 1891 ई.मे तथा निधन 1975 ई) गजल लिखलाह। कविवरजीक "जगत मे थाकि जगदम्बे अहिंक पथ आबि बैसल छी" ई गजल 1928मे प्रकाशित कविवर सीताराम झा जीक " सूक्ति सुधा ( प्रथम बिंदु )मे संग्रहीत अछि। काशीकांत मिश्र मधुप (जन्म-मृत्युः 1906-1987) "मिथिलाक पूर्व गौरव नहि ध्यान टा धरै छी" नामक गजल लिखलाह जे कि 1932मे मैथिली साहित्य समिति, द्वारा काशीसँ "मैथिली-संदेश" नामक पत्रिकामे प्रकाशित भेल।
व्याकरणयुक्त आधुनिक मैथिली गजलक इतिहास
पं.जीवन झाजीसँ एहि धाराक शुरुआत भेल आ तकर बाद कविवर सीताराम झा, काशीकांत मिश्र मधुप, योगानंद हीरा, जगदीश चन्द्र ठाकुर "अनिल", विजय नाथ झा, गजेन्द्र ठाकुर, मुन्नाजी, शान्तिलक्ष्मी चौधरी, ओमप्रकाश झा, अमित मिश्र, जगदानन्द झा मनु,, कुन्दन कुमार कर्ण, श्रीमती इरा मल्लिक, राम कुमार मिश्र, नीरज कुमार कर्ण, प्रदीप पुष्प, राजीव रंजन मिश्रा, चंदन कुमार झा आदि भेलथि। एहि धाराक अंतर्गत सरल वार्णिक बहरमे लीखए बला किछु गजलकार एना छथि-- इरा मल्लिक, सुनील कुमार झा, पंकज चौधरी नवल श्री, मिहिर झा, अनिल मल्लिक, दीप नारायण विद्यार्थी,प्रवीन नारायण चौधरी प्रतीक, भावना नवीन, रवि मिश्रा भारद्वाज, अजय ठाकुर मोहन, प्रभात राय भट्ट, सुमित मिश्रा "गुंजन" आदि। एहि ठाम स्पष्ट करब बेसी जरूरी जे सरल वार्णिक बहर मात्र आरंभिक अनुशासन लेल अछि। एकर उद्येश्य ई अछि जे पहिने गजलकार हल्लुकसँ सीखथि आ तकर बाद गजलक मूल बहरपर जाथि। ओना ई कहबामे हमरा कोनो संकोच नै जे बहुतो बिना व्याकरण बला गजलकार सभसँ नीक ई सरल वार्णिक बला गजलकार सभ लीखै छथि। सरल वार्णिक बहर मूल वैदिक छंद अछि जाहिमे गजलक हरेक पाँतिमे अक्षरक संख्या एक समान देल जाइ छै जखन कि गजलक मूल बहर वर्णवृत अछि जाहिमे गजलक हरेक पाँतिक मात्राक्रम एक समान रहै छै मने हरेक पाँतिक लघुकेँ निच्चा लघु आ दीर्घक निच्चा दीर्घ।
उपरक नाम सभहँक अलावे हम अपने व्याकरणयुक्त गजलक समर्थक छी आ किछु गजल सेहो लीखि/कहि लै छी।
व्याकरणयुक्त आधुनिक मैथिली गजलमे भेल काज
1905सँ लगातार व्याकरणयुक्त लिखाइत रहल आ 11/4/2008केँ “अनचिन्हार आखर” नामक ब्लाग इंटरनेटपर आएल। एकरा एहि लिंकपर देखल जा सकैए https://anchinharakharkolkata.blogspot.in/। अनचिन्हार आखर केर छोटका नाम " अ-आ " राखल गेल अछि। ई ब्लाग हमरा द्वारा शुरू कएल गेल छल आ समय-समयपर आन-आन गजलकार सभकेँ जोड़ल गेल। वर्तमानमे ई ब्लाग हमरा आ गजेन्द्र ठाकुर द्वारा संपादित भऽ रहल अछि तँ देखी व्याकरणयुक्त आधुनिक मैथिली गजल लेल भेल किछु एहन काज जे अ.आ द्वारा भेल ---
1) अ-आ प्रिंट वा इंटरनेटपर पहिल उपस्थिति अछि जे की मात्र आ मात्र गजल एवं गजल अधारित विधापर केन्द्रित अछि।
2) अ-आ केर आग्रहपर श्री गजेन्द्र ठाकुर जी गजलशास्त्र लिखला जे की मैथिलीक पहिल गजलशास्त्र भेल। एही गजलशास्त्रमे ठाकुरजी सरल वार्णिक बहरक जन्म देलाह।
3) अ-आ द्वारा "गजल कमला-कोसी-बागमती-महानन्दा सम्मान" केर शुरूआत भेल। जे की स्वतन्त्र रूपें गजल विधा लेल पहिल सम्मान अछि।
4) अ-आ केर ई सौभाग्य छै जे ओ मैथिली बाल गजल नामक नव विधाकेँ जन्म देलक आ ओकर पोषण केलक। मैथिली भक्ति गजल सेहो अ-आ केर देन अछि। विदेहक अङ्क 111 पूर्ण रूपेण बाल-गजल विशेषांक अछि आ अङ्क 126 भक्ति गजल विशेषांक।
5) बर्ख 2008 आ 2015 माँझ करीब 30टासँ बेसी गजलकार मैथिली गजलमे एलाह। ई गजलकार सभ पहिनेसँ गजल नै लिखै छलाह। संगे-संग करीब 6-7टा गजल समीक्षक-आलोचक सेहो एलाह।
6) पहिल बेर मैथिली गजलक क्षेत्रमे एकै बेर करीब 16-17 टा आलोचना लिखाएल।
7) अ-आ मैथिली गजलकेँ विश्वविद्यालय ओ यू.पी.एस. सी एवं बी.पी.एस. सीमे स्थान दिएबाक अभियान चलौने अछि आ एकटा माडल सिलेबस सेहो बना कऽ प्रस्तुत केने अछि।
8) अ-आ प. जीवन झा जीक मृत्यु केर अंग्रेजी तारीख पता लगा ओकरा गजल दिवस मनेबाक अभियान चलौने अछि।
9) अ-आ 1905सँ लऽ कऽ 2013 धरिक गजल सङ्ग्रहक सूची एकट्ठा ओ प्रकाशित केलक (व्याकरणयुक्त एवं व्याकरणहीन दूनू)।
10) अ-आ अधिकांश गजलकारक (व्याकरण युक्त एवं व्याकरणहीन दूनू) संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत केलक।
11) अ-आ 62 खण्डमे गजलक इस्कूल नामक श्रृखंला चलौलक जे की समान्य पाठकसँ लऽ कऽ गजलकार धरि लेल समान रूपसँ उपयोगी अछि।
12)  अ-आ मैथिलीमे पहिल बेर आन-लाइन मोशयाराक आरम्भ केलक आ ई बेस लोकप्रिय भेल।
13) मैथिली गजल आ अन्य भारतीय भाषाक गजल बीच संबंध बनेबाक लेल "विश्व गजलकार परिचय शृखंला" शुरू कएल गेल।
14) एखन धरि अ.आ केर माध्यमें मैथिली गजलमे गजल-1386, रुबाइ-417, बाल गजल 207, बाल रुबाइ-47, भक्ति गजल-47, हजल-21, आलोचना-28, कसीदा-3, नात-2, बंद-4,भक्ति रुबाइ-1, माहिया-2, देल जा चुकल अछि। जतेक गजलकार अ.आ केर माध्यमें आएल छथि हुनका सभ द्वारा रचित गजलक संख्या जोड़ल जाए तँ लगभग 3000 गजलक संख्या पहुँचत।
अनचिन्हार आखरक एही काज सभकेँ देखैत मैथिली गजलक पहिल अरूजी गजेन्द्र ठाकुर 2008क बाद सँ लऽ कऽ वर्तमान कालखंडकेँ "अनचिन्हार युग" केर नाम देलाह (1905सँ लऽ कऽ 2007 धरिक कालखंडकेँ गजेन्द्रजी आधुनिक मैथिलीक पहिल गजलकार जीवन झाजीक नामपर "जीवन युग" नाम देलाह)।

मैथिली गजलमे विदेह केर योगदान
विदेह इंटरनेटक प्रसिद्ध मैथिली पत्रिका अछि जे कि गजेन्द्र ठाकुरजी द्वारा संचालित अछि आ हरेक मासक 1 आ 15 तारीखकेँ प्रकाशित होइत अछि। एकरा एहि लिंकपर देखल जा सकैए http://videha.co.in/ विदेहक किछु एहन काज जै बिना आधुनिक व्याकरणयुक्त मैथिली गजलक उत्थान सम्भव नै छल--
1) विदेहक 21म अंक (1 नवम्बर 2008)मे राजेन्द्र विमल जीक 2 टा गजल अछि। राम भरोस कापड़ि भ्रमर आ रोशन जनकपुरी जीक 11 टा गजल अछि। संगे-संग धीरेन्द्र प्रेमर्षि जीक 1 टा आलेख मैथिलीमे गजल आ एकर संरचना। अछि संगे-संग ऐ आलेखक संग 1 टा गजल सेहो अछि प्रेमर्षि जीक। विदेहक ऐ अंकमे कतहुँ ई नै फड़िछाएल अछि जे ई गजल विशेषांक थिक मुदा विदेहक ऐसँ पहिनुक अंक सभमे गजलक मादें हम कोनो तेहन विस्तार नै पबै छी तँए हम एही अंककेँ विदेहक गजल विशेषांक मानलहुँ अछि।
2) विदेहक अंक 96 (15 दिसम्बर 2011)मे मुन्नाजी द्वारा गजल पर पहिल परिचर्चा भेल। ऐ परिचर्चाक शीर्षक छल मैथिली गजल: उत्पत्ति आ विकास (स्वरूप आ सम्भावना)। ऐमे भाग लेलथि सियाराम झा सरस, गंगेश गुंजन, प्रेमचंद पंकज, शेफालिका वर्मा, मिहिर झा ओमप्रकाश झा, आशीष अनचिन्हार आ गजेन्द्र ठाकुर भाग लेलथि। ऐकेँ अतिरिक्त राजेन्द्र विमल, मंजर सुलेमान ऐ दूनू गोटाक पूर्वप्रकाशित लेखक भाग, धीरेन्द्र प्रेमर्षिजीक पूर्व प्रकाशित लेख) सेहो अछि।
3) विदेहक अंक 111 (1/8/2012) जे की बाल गजल विशेषांक अछि जाहिमे कुल 16 टा गजलकारक कुल 93 टा बाल गजल आएल।
4) विदेहक 15 मार्च 2013 बला 126म अंक भक्ति गजल विशेषांक छै।
5) 15 नवम्बर 2013केँ विदेहक 142म अंक "गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा" विशेषांक छल।
एहि सभहँक अलावे विदेह समय-समयपर विभिन्न विधाक गोष्ठी करबैत रहल अछि जाहिमसँ एकटा गजल सेहो अछि।
आधुनिक व्याकरणयुक्त मैथिली गजलक आलोचना
आधुनिक व्याकरणयुक्त गजल आलोचनाक बात करी तँ सभसँ पहिने रामदेव झा जी द्वारा लिखल ओ रचना पत्रिकाक जून 1984मे प्रकाशित ओहि लेख केर चर्चा करए पड़त जकर शीर्षक "मैथिलीमे गजल" छल। हमरा जनैत ई लेख ओहि समयक हिसाबें मैथिली गजल आलोचनाक सभ मापडंद पूरा करैत अछि (वर्तमान समयमे रामदेव झाक जीक पुत्र सभ एही आलेखसँ वर्तमान गजलकेँ मापै छथि आ ई हुनकर सीमा छनि। ईहो कहब उचित जे वर्तमान समयक हिसाबें ओ आलेख औसत स्तरक अछि मुदा एही कारणसँ एकर महत्व कम नै भऽ जेतै)। ओना ई उल्लेखनीय जे ईहो आलेख गजलक विधानकेँ ओझरा कऽ राखि देने अछि कारण एहि लेखमे गजलक बहरकेँ मात्रिक जकाँ मानल गेल छै जे कि वस्तुतः लेखक महोदय केर सीमा छनि। वर्णवृत छंदमे हरेक पाँतिक मात्राक जोड़ एकै अबै छै आ मात्रिक छंदमे सहो। हमरा जनैत रामदेव झा जी एहीठाम भ्रममे फँसि गेलाह। वर्णवृतमे लघु-गुरू केर नियत स्थान होइत छै मुदा मात्रिक छंदमे लघुक स्थानपर दीर्घ सेहो आबि सकैए आ दीर्घक स्थानपर लघु सेहो। मुदा गजलक बहर वर्णवृत छै। तथापि कमसँ कम ओहि समयमे ई कहए बला कियो सेहो भेलै जे गजलमे विधान होइत छै आ सएह एहि आलेखक पहिल विशेषता अछि। एहि आलेखक दोसर विशेषता ई जे रामदेव झाजी प्राचीन मैथिली गजलकार सभहँक नाम देने छथि जे कि सभ गजलक इतिहासकार ओ पाठक लेल उपयोगी अछि। एहि आलेखक तेसर विशेषता अछि जे रामदेव झाजी स्पष्ट स्वरमे ओहि समयक बहुत रास कथित क्रांतिकारी गजलकार सभहँक गजलकेँ खारिज करै छथि जे कि ओहि समयक हिसाबसँ बड़का विस्फोट छल। ई आलेख ततेक प्रभावकारी भेल जे ओ समयक बिना व्याकरण बला गजलकार सभ छिलमिला गेलाह आ एहि आलेखक विरोधमे विभिन्न वक्तव्य सभ देबए लगलाह। उदाहरण लेल सियाराम झा सरस, तारानंद वियोगी, रमेश ओ देवशंकर नवीनजीक संपादनमे प्रकाशित साझी गजल संकलन "लोकवेद आ लालकिला" (वर्ष 1990) केर कतिपय लेख सभ देखल जा सकैए जाहिमे रामदेव झाजी ओ हुनक स्थापनाकेँ जमि कऽ आरोपित कएल गेल अछि। ओही संकलनमे देवशंकर नवीन अपन आलेख "मैथिली गजलःस्वरूप आ संभावना"मे लिखै छथि जे "............पुनः डा. रामदेव झाक आलेख आएल। एहि निबन्ध मे दू टा बात अनर्गल ई भेल जे गजलक पंक्ति लेल छंद जकाँ मात्रा निर्धारित करए लगलाह आ किछु एहेन व्यक्तिक नाम मैथिली गजल मे जोड़ि देलनि जे कहियो गजल नै लिखलनि"
आन लेख सभमे एहने बात सभ आन आन तरीकासँ कहल गेल अछि। रामदेव झाजीक आलेखक बाद एहन आलेख नै आएल जाहिमे गजलकेँ व्याकरण दृष्टिसँ देखल गेल हो कारण ताहि समयक गजलपर कथित क्रांतिकारी गजलकार सभहँक कब्जा भऽ गेल छल। कोनो विधा लेल आलोचना प्राण होइत छै तँइ "अनचिन्हार आखर" अपन शुरूआतेसँ आन काजक अतिरिक्त गजल आलोचनापर सेहो ध्यान केंद्रित केलक आ मैथिली गजलक अपन आलोचक सभकेँ चिह्नित कऽ बेसी आलोचना लिखबेलक। आ एही कारणसँ मैथिली गजल आब ओहन आलोचक सभसँ मुक्त अछि जे कि मूलतः साहित्य केर आन विधाक आलोचक छथि आ कहियो काल गजलक आलोचना कऽ गजलपर एहसान करै छथि। ई पाँति लिखैत हमरा गर्व अछि जे मैथिली गजलकेँ आब छह-सात टासँ बेसी अपन आलोचक छै। अनचिन्हार आखर जे-जे गजल आलोचना लिखबा कऽ प्रकाशित करबेलक तकर विवरण एना अछि----
1) गजलक साक्ष्य (तारानंद वियोगी जीक गजल संग्रह केर आशीष अनचिन्हार द्वारा कएल गेल आलोचना)
2) बहुरुपिया रचनामे (अरविन्द ठकुर जीक गजल संग्रह केर ओमप्रकाश जी द्वारा कएल गेल आलोचना)
3) घोघ उठबैत गजल (विभूति आनंद जीक गजल संग्रह केर ओम प्रकाश जी द्वारा कएल गेल आलोचना)
4) विदेहक 103म अंकमे प्रकाशित प्रेमचंद पंकजक दूटा गजलक समीक्षा जे की ओमप्रकाश जी केने छथि
5) मुन्नाजीक गजल संग्रह "माँझ आंगनमे कतिआएल छी"- समीक्षक गजेन्द्र ठाकुर
6) मैथिली गजल आ अभट्ठाकारी
7) अज्ञानी संपादकक फेरमे मरैत गजल (घर-बाहर पत्रिकाक अप्रैल-जून 2012 अंकमे प्रकाशित गजलक समीक्षा)
8) मैथिली बाल गजलक अवधारणा
9) कतिआएल आखर (मुन्ना जीक गजल संग्रह केर अमित मिश्र जी द्वारा कएल गेल आलोचना)
10) गजलक लेल (विजयनाथ झा जीक गजल ओ गीत संग्रह- अहीँक लेल के ओमप्रकाश जी द्वारा कएल समीक्षा)
11) भोथ हथियार (श्री सुरेन्द्र नाथ जीक गजल संग्रह केर ओमप्रकाश जी द्वारा कएल गेल आलोचना)
12) पहरा अधपहरा (बाबा बैद्यानथ जीक गजल संग्रह केर आशीष अनचिन्हार द्वारा कएल गेल आलोचना)
13) गजलक लहास (स्व. कलानन्द भट्टजीक गजलसंग्रह केरजगदानन्द झा मनु द्वारा कएल गेल आलोचना)
14) सूर्योदयसँ पहिने सूर्यास्त (राजेन्द्र विमल जीक गजल संग्रहक आशीष अनचिन्हार कएल गेल आलोचना)
15) बहुत किछु बुझबैएः कियो बूझि ने सकल हमरा (ओमप्रकाशजीक गजल संग्रहपर चंदन कुमार झाजीक आलोचना)
16) प्रतिबद्ध साहित्यकारक अप्रतिबद्ध गजल (सियाराम झा सरसजीक गजल संग्रहपर जगदीश चंद्र ठाकुर अनिलजीक आलोचना)
17) अरविन्दजीक आजाद गजल (अरविन्द ठाकुरजीक गजल संग्रहपर जगदीश चंद्र ठाकुर अनिलजीक आलोचना)
18) छद्म गजल (गंगेश गुंजनजीक गजल सन किछुपर आशीष अनचिन्हार द्वारा कएल आलोचना)
19) कलंकित चान (राम भरोस कापड़ि भ्रमरजीक गजल संग्रहक आशीष अनचिन्हार द्वारा कएल आलोचना)
20) मैथिली गजल व्याकरणक शुरूआती प्रयोग (गजेन्द्र ठाकुरजीक गजल संग्रह "धांगि बाट बनेबाक दाम अगूबार पेने छँ" केर आशीष अनचिन्हार द्वारा कएल आलोचना)
21) चिकनी माटिमे उपजल नागफेनी (रमेशजीक गजल संग्रह "नागफेनी" केर आशीष अनचिन्हार द्वारा कएल आलोचना)
22) नवगछुलीक प्रांजल सरस रसाल: नव अंशु (अमित मिश्र केर गजल संग्रह "नव-अंशु" केर शिव कुमार झा"टिल्लू" द्वारा कएल गेल समीक्षा)
23) सियाराम जा सरस जीक गजल संग्रह "शोणिताएल पैरक निशान"पर कुंदन कुमार कर्णजीक टिप्पणी
24) श्री जगदीश चन्द ठाकुर ऽअनिलऽ जीक लिखल गजल संग्रह "गजल गंगा" केर जगदानंद झा"मनु" द्वारा कएल समीक्षा
25) मैथिली गजलक संसारमे अनचिन्हार आखर (आशीष अनचिन्हारक गजल संग्रहक जगदीश चंद्र ठाकुर अनिलजी द्वारा कएल आलोचना)
26) थोड़े माटि बेसी पानि (सियाराम झा सरसजीक गजल संग्रहपर कुंदन कुमार कर्णजीक आलोचना)
आधुनिक व्याकरणयुक्त मैथिली गजलक किछु उदाहरण
एहि ठाम आब हम किछु शेरक उादहरण देब आ एहिमे हम अरबी बहर जे कि गजलक मूल बहर अछि आ सरल वार्णिक बहर दूनूमे लिखल शेर सभ प्रस्तुत करब। हम उदहारणमे सभ विचार बला शेर राखब जाहिसँ पाठक सहजहिं बुझता जे बहर-व्याकरण गजलक विचारमे बाधक नै होइत छै। गजलक पहिल पाँतिमे जे मात्राक्रम रहै छै तकर ओ पूरा गजलमे पालन करब छंद वा बहरक निर्वाह केनाइ भेलै। ऐठाम हम स्पष्ट करी जे मैथिलीक आधुनिक व्याकरणयुक्त गजलकारक संख्या बहुत बेसी अछि मुदा हम एहिठाम मात्र ओतबे गजलकारक शेर लेलहुँ अछि जाहि हमर उद्येश्य पूरा भऽ जाए (उदाहरणमे आएल शेर सभ एकौ गजलक भऽ सकैए आ अलग अलग गजलक सेहो। संपादक महोदयसँ आग्रह जे उदाहरणमे देलग गेल शेर सभहँक वर्तनीकेँ यथावत् राखथि)।--
पं जीवन झाजीक एकटा गजलमे वर्णित विरहक नीक चित्रण देखू—

अनंङ्ग सन्ताप सौं जरै छी अहाँक चिन्ता जतै करै छी
सखीक लाजे ततै मरै छी जतै कही वा जतै कहाबी
एहि शेरक मात्रक्रम 12+122+12+122+12+122+12+122 अछि आ पूरा गजलमे एकर प्रयोग भेल अछि। झाजीक दोसर गजलक एकटा आर विरहपरक शेर देखू—

अहाँ सों भेंट जहिआ भेल तेखन सों विकल हम छी
उठैत अन्धार होइए काज सब करबामे अक्षम छी 
एहि शेरक मात्राक्रम 1222+1222+1222+1222 अछि आ पूरा गजलमे एकर प्रयोग भेल अछि। उपरक एहि तीन टा उदाहरणसँ स्पष्ट अछि जे पं. जीवन झाजी मैथिली गजल आ गजलक व्याकरणक बीच नीक ताल-मेल रखने छलाह। फेर हुनक तेसर शेरक एकटा आरो शेर देखू जे कि प्रेममे पड़ल नायक-नायिका मनोभाव अछि--
पड़ैए बूझि किछु ने ध्यानमे हम भेल पागल छी
चलै छी ठाढ़ छी बैसल छी सूतल छी कि जागल छी
एहि शेरक मात्राक्रम 1222+1222+1222+1222 अछि आ पूरा गजलमे एकर प्रयोग भेल अछि। कविवर सीताराम झाजीक किछु शेरक उदाहरण देखू—

हम की मनाउ चैती सतुआनि जूड़शीतल
भै गेल माघ मासहि धधकैत घूड़तीतल`
मतलाक छंद अछि 2212+ 122+2212+ 122 आब एही गजलक दोसर शेर मिला लिअ-

अछि देशमे दुपाटी कङरेस ओ किसानक
हम माँझमे पड़ल छी बनि कै बिलाड़ि तीतल
पहिल शेर आइयो ओतबे प्रासंगिक अछि जते पहिले छल। आइयो नव साल गरीबक लेल नै होइ छै। दोसर शेरकेँ नीक जकाँ पढ़ू आइसँ साठि-सत्तर साल पहिलुक राजनीतिक चित्र आँखि लग आबि जाएत। स्पष्ट अछि जे बिना व्याकरण तोड़ने कविवरजी प्रगतिशील भावक गजल लिखला जे अजुको समयमे ओतबे प्रासंगिक अछि जतेक की पहिने छल। जे ई कहै छथि जे बिना व्याकरण तोड़ने प्रगतिशील गजल नै लिखल जा सकैए हुनका सभकेँ ई उदाहरण देखबाक चाही। काशीकान्त मिश्र "मधुप" जीक दूटा शेर देखल जाए—

मिथिलाक पूर्व गौरव नहि ध्यान टा धरै छी
सुनि मैथिली सुभाषा बिनु आगियें जड़ै छी

सूगो जहाँक दर्शन-सुनबैत छल तहीँ ठाँ
हा आइ "आइ गो" टा पढ़ि उच्चता करै छी

एहि गजलमे 2212-122-2212-122 मात्राक्रम अछि जे कि गजलक हरेक शेरमे पालन कएल गेल अछि। देखू मधुपजी भिन्न स्वर लऽ कऽ आएल छथि मुदा बिना व्याकरण तोड़ने। योगानंद हीराजीक गजलक दू टा शेर—

मोनमे अछि सवाल बाजू की
छल कपट केर हाल बाजू की
मतलाक दूनू पाँतिमे 2122-12-1222 अछि आ दोसर शेर देखू-

छोट सन चीज कीनि ने पाबी
बाल बोधक सवाल बाजू की
हीराजी दोसर गजलक दू टा आर शेर देखू—

शूल सन बात ई
संसदे जेल अछि

आब हीरा कहै
जौहरी खेल अछि
एहि गजलक हरेक शेरमे सभ पाँतिमे 2122+12 मात्राक्रम अछि। आब अहीं सभ कहू जे हीराजीक गजलमे समकालीनता, प्रगतिशीलता आदि छै कि नै। पहिल शेरमे शाइर वर्तमान जीवनमे पसरल अजरकताकेँ देखा रहल छथि तँ दोसर शेरमे अभावक कारण बच्चा धरिकेँ कोनो चीज नै दऽ पेबाक विवशता छै। तेसर शेर आजुक विडंबना अछि। संसद वएह छै जे पहिने छलै मुदा सांसद सभ आब अपराधी वर्गक अछि तँइ शाइरकेँ ओ जेल बुझा रहल छनि। चारिम शेरमे शाइर प्रायोजित प्रसंशाक खेलकेँ उजागर केने छथि। ई खेल साहित्य कि आन कोनो क्षेत्रमे भऽ सकैए। जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल" जीक गजलक दू टा शेर—

टूटल छी तँइ गजल कहै छी
भूखल छी तँइ गजल कहै छी
मतलाक दूनू पाँतिमे 2222 +12 + 122 छंद अछि आ एकर दोसर शेर देखू—

ऑफिस सबहक कथा कहू की
लूटल छी तँइ गजल कहै छी
भूख केर कथा सेहो व्याकरणयुक्त गजलमे। सरकारी आफिसक कथा सभ जनैत छी। अनिलजी एहू कथाकेँ व्याकरणक संग उपस्थित केने छथि। समकालीन स्वरे नै कालातीत स्वरक संग विजयनाथ झा जीक ऐ गजलक दूटा शेर देखू—

चिदाकाश मधुमास मधुमक्त मति मन
विभव अछि विविधता उदय ह्रास अपने                                           
मतलाक छंद अछि 122-122-122-122 आब दोसर शेरक दूनू पाँतिकेँ जाँच कऽ लिअ संगे संग भाव केर सेहो-

खसल नीर निर्माल्य निधि नोर जानल
सकल स्रोत श्रुति विन्दु विन्यास अपने
जँ आदि शंकराचर्य केर मातृभाषा मैथिली रहितनि तँ शायद विजयनाथेजी सन लिखने रहितथि ओ। राजीव रंजन मिश्रजीक ई गजल देखू—

जिनगी खेल तमाशा टा
आसक संग निराशा टा

के जानल गऽ कखन केहन
दैबक हाथ तऽ पासा टा

उपरक दूटा शेरक मात्राक्रम 2221 1222 अछि आ एहि गजल सभ शेरमे एकरे पालन कएल गेल अछि। जीवनक गूढ़ बातकेँ सरल शब्दमे कहल गेल अछि सेहो व्याकरणक संग। आस आ निराश दूनू जिवनक भाग छै। दोसर शेरमे भग्य केखन पलटत तकर वर्ण अछि। अहीं कहूँ विचार कतए बन्हा गेल छै व्याकरणसँ। ओमप्रकाशजीक ई दूटा शेर देखू—

कखनो सुखक भोर लिखै छी
कखनो खसल नोर लिखै छी


मिठगर रसक बात कहै छी
संगे करू झोर लिखै छी
2-2-1-2, 2-1, 1-2-2 मात्राक्रम प्रत्येक पाँतिमे अछि। शाइर अपन निजी जीवनक बातकेँ बहर-व्याकरणमे कहलथि आ नीक जकाँ कहलथि अछि। कोनो शाइरकेँ जीवनमे भऽ रहल सभ बातकेँ लिखबाक चाही मुदा अफसोच जे लोक किछु क्षणिक लाभ लेल ने सच बाजए वाहैए आ ने सूनए चाहैए। मुदा शाइर अपन मीठ-तीत सभ बात व्याकरणमे कहि रहल छथि। कहाँ कोनो दिक्कत छै। अमित मिश्रक दूटा शेर देखल जाए—

जाहि घरमे भूखल दीन अहाँ देखने होयब
हाड़ मांसक बनल मशीन अहाँ देखने होयब

एक पाइक लेल परान अपन बेच दै छै ओ
गाम घरमे एहन दीन अहाँ देखने होयब
एकर मात्राक्रम 2122-2112-1122-1222 अछि। एहि गजलमे प्रगतिशीलता सेहो अछि आ बहर-व्याकरण सेहो। एखनो कतहुँ-कतहुँसँ समाद आबि जाइए से फल्लाँ किछु पाइ लेल अपन बच्चा बेचि लेलक वा अपन बच्चा संग जान दऽ देलक। ई सभ बात गजलमे अमितजी व्याकरणक संग रखने छथि। प्रदीप पुष्प केर एकटा गजल देखल जाए आ समकालीनता, व्यंग्य आ व्याकरण तीनू एकै संग देखू---

गमकैत घाम बला लोक
चमकैत चाम बला लोक

भाषण आमो पर दै छै
थुर्री लताम बला लोक

बाँटै दरद सगरो खूब
ई झंडु बाम बला लोक

करतै उद्धार मिथिलाक
दिल्ली असाम बला लोक

मौंसो केर हाट लगबै
गाँधीक गाम बला लोक
222-222-2 सब पाँतिमे मात्राक्रम अछि। प्रदीपजीक ई गजल समग्र रूपें ओहन गजलकार सब लेल अछि जे कि अनेरे गजलक व्याकरणकेँ खराप मानै छथि। प्रदीपजी जखन दोसर शेरमे "थुर्री लताम बला लोक" कहै छथि तँ व्यंग्यक पराकाष्ठा भऽ जाइत अछि। अंतिम शेरमे प्रयोग भेल "गाँधीक गाम बला लोक" पाँति ओहन लोकक नकाब उतारैत अछि जिनकर जीवनमे भीतर किछु छनि आ बाहर किछु। राम कुमार मिश्रजीक टूटा शेर देखू—

जाति- धर्मक जुन्नामें अँटियाइते रहलहुँ       
छूत-अछुतक अदहनमें उधियाइते रहलहुँ

पेट कोना जड़लै पतियौलक कियो कहिया
झूठ-साँचक भाषण धरि पतियाइते रहलहुँ

सभ पाँतिमे मात्राक्रम 2122+222+2212+22 । जाति-धर्म एखनो अपना समाज लेल भयावह सपना अछि। आ शाइर रामकुमार मिश्रजी व्याकरणक संग एकर वर्णन केने छथि। दोसर शेरमे ओ झूठ भाषणसँ जनता कोना तृप्त होइ छै से कहने छथि। अहीं सभ कहू की व्याकरणसँ भाव बन्हा गेलै? दू टा शेर कुंदन कुमार कर्णजीक देखू जाहिमेसँ पहिल शेर निश्चिते रूपें उपनिषद् केर मोन पाड़ि दैए --
भाव शुद्ध हो त मोनमे भय कथीके
छोड़ि मृत्यु जीव लेल निश्चय कथीके

जाति धर्मके बढल अहंकार कुन्दन
रहि विभेद ई समाज सुखमय कथीके
एकर मात्राक्रम 212-1212-122-122 अछि। भय कि डर ओकर होइ छै जे गलत काज करै छै। कुंदनजीक पहिल शेर एकरे उद्घाटित करैए। दोसर शेरमे शाइरक विश्वास छनि जे जा धरि जाति भेद ने हटत ता धरि समाज सुखमय नै भऽ सकैए। प्रसंगवश कही जे कुंदन कुमार कर्ण नेपालमे मैथिली ओहन पहिल गजलकार छथि जे कि अरबी बहरमे गजल लिखै छथि। आगू बढ़बासँ पहिने सरल वार्णिक बहर बला गजलक किछु उदाहरण देखि ली। मुन्नाजीक दूटा शेर देखू-

केखन धोखा देत ई समान बजरुआ गारंटी नै
ई केखनो हँसाएत केखनो देत कना गारंटी नै

सरकार बनाबै एहन योजना गरीबक लेल
केखन जेतैक गरीबक अस्तित्व मेटा गारंटी नै
(19 वर्ण हरेक पाँतिमे।) मुन्नाजी आजुक बजारवादसँ उपजल कमगुणवत्ता बला समानक हाल अपन पहिल शेरमे कहलथि। दोसर शेरमे ओ सरकारी योजनका मूल उद्येश्यपर व्यंग्य कऽ रहल छथि। आब देखू सुमित मिश्र गुंजनजीक दूटा शेर—

नै कहू कखनो पहाड़ छै जिनगी
दैबक देलहा उधार छै जिनगी

भारी छै लोकक मनोरथक भार
कनहा लगौने कहार छै जिनगी
(वर्ण-13) गुंजनजीक पहिल सेर आसासँ भरल अछि। ओ जीवनकेँ भारत मानबाक ओकालति नै करै छथि। दोसर शेरमे ओ लोकक अनेरेक सेहंताक संकेत देने छथि।
सरल वार्णिक बहरक उपरका उदाहरणक अतिरिक्त विजय कुमार ठाकुर, नारायण मधुशाला, रामसोगारथ यादव , विद्यानंद बेदर्दी आदि सभ सेहो सरल वार्णिक बहरमे गजल लिखबाक प्रयास कऽ रहल छथि। एही क्रममे मैथिल प्रशांतजीक नाम सेहो जोड़ जा सकैए। मुदा चिंता ई जे ई सभ विभिन्न विधामे सेहो लिखैत छथि तँइ हिनकर सभहँक गजलक प्रभाव केर आकलन एखन तात्काल नै भऽ सकैए। दोसर चिंता ईहो जे व्याकरणक मूल भाव रचना सुंदर करब छै केकरो आलोचनामे स्थान भेटबाक कि पुरस्कार प्राप्ति कि आन कोनो प्रयोजन नै। तँइ बहुत रास गजलकार एहनो भऽ सकै छथि जे कोनो अभीष्ट पूरा नै भेलापर व्याकरणक पालन छोड़ि सकै छथि। मुदा फेर दोहरा दी जे "व्याकरणक मूल भाव रचना सुंदर करब छै आन कोनो प्रयोजन सिद्ध करब नै"।


मैथिली बाल गजल
मैथिली बाल गजल शब्दक निरूपण हमरा द्वारा भेल छल मुदा एहि विषय-वस्तुक गजल कविवर सीताराम झा पहिने लीखि गेल छथि। तँइ ई मानब उचित जे बाल गजलक अस्तित्व मैथिलीमे पहिनेसँ छल मुदा ओकर नामाकरण अनचिन्हार आखर कालखंडमे भेलै। उपर जतेक गजलकार सभहँक उदाहरण देने छी वएह सभ बाल गजल सेहो लिखने छथि तँइ बेसी नै तँ दू-चारि टा बाल गजलक शेर राखि रहल छी। पहिने कविवर सीताराम झाजीक ई बाल गजल देखू—

बाउजी जागू ठारर भरै छी कियै
व्यर्थ सूतल कि बैसल सड़ै छी कियै
2122+ 122+ 122+ 12 मात्राक्रम अछि। आब कुंदन कुमार कर्णजीक बाल गजल देखू—

गामक बूढ हमर नानी
छै ममतासँ भरल खानी
2221-1222 मात्राक्रम अछि। आब अमित मिश्रजीक देखू—

हाट चल हाथकेँ पकड़ि भैया हमर
भीड़मे जाउँ नै बिछड़ि भैया हमर
212-212-212-212 मात्राक्रम अछि। आब पंकज चौधरी नवलश्रीजीक देखू—

देख भेलै भोर भैया
आब आलस छोड़ भैया

दाय-बाबा माय-बाबू
लाग सभके गोर भैया
2122+2122 मात्राक्रम अछि।
मैथिली भक्ति गजल
मैथिली भक्ति गजल शब्दक निरूपण अमित मिश्र द्वारा भेल छल मुदा एहि विषय-वस्तुक गजल कविवर सीताराम झा पहिने लीखि गेल छथि। तँइ ई मानब उचित जे बाल गजलक अस्तित्व मैथिलीमे पहिनेसँ छल मुदा ओकर नामाकरण अनचिन्हार आखरक बाद भेलै। उपर जतेक गजलकार सभहँक उदाहरण देने छी वएह सभ बाल गजल सेहो लिखने छथि तँइ बेसी नै तँ दू-चारि टा भक्ति गजल क शेर राखि रहल छी, पहिने कविवर सीताराम झाजीक—

जगत मे थाकि जगदम्बे अहिंक पथ आबि बैसल छी
हमर क्यौ ने सुनैये हम सभक गुन गाबि बैसल छी
1222+1222+1222+1222 मात्राक्रम मने बहरे हजज। आब जगदानंद झा मनुजीक भक्ति गजल देखू—

हम्मर अँगना मैया एली
गमकै चहुँदिस अड़हुल बेली

धन हम छी धन हम्मर अँगना
मैया जतए दर्शन देली
22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। आब कुंदन कुमार कर्णजीक भक्ति गजल देखू—

हे शारदे दिअ एहन वरदान
हो जैसँ जिनगी हमरो कल्याण
2212-222-221 मात्राक्रम अछि। आब अमित मिश्रजीक देखू—

सजल दरबार छै जननी
भगत भरमार छै जननी

किओ नै हमर छै संगी
खसल आधार छै जननी
1222-1222 मात्राक्रम अछि।
उपरक एहि उदाहरण सभसँ ई स्पष्ट भऽ गेल हएत जे व्याकरण केखनो भाव वा विचार लेल बाधक नै होइ छै। हँ, हजारक हजार रचनामे किछु एहन रचना बुझाइ छै जाहिमे व्याकरणक कारण भाव बाधित भेलैए मुदा ई तँ रचनाकारक सीमा सेहो भऽ सकै छै। गजल, भक्ति गजल ओ बाल गजलक अतिरिक्ति मैथिलीमे व्याकरणयुक्त रुबाइ, बाल रुबाइ, भक्ति रुबाइ, कता, हजल, नात आदि विधा सेहो लिखल गेल अछि आ ओकर उदाहरण प्रचुर मात्रामे अछि आ अहाँ सभ एकरा अनचिन्हार आखरपर नीक जकाँ देखि सकै छी।
बिना व्याकरण बला मैथिली गजलक इतिहास
लगभग 1970-75सँ एखन धरि बहुतो गजलकार ओहन गजल लिखलथि जाहिमे गजलक नियमक पालन नै भेल अछि। ई कहब बेसी उचित जे ओहि धाराक गजलकार सभ नियम पालन करहे नै चाहैत छथि। ओ हुनकर अवधारणा हेतनि। एहिठाम ओहि धाराक किछु प्रतिनिधि गजलकार सभहँक नाम देल जा रहल अछि --      
1) रवीन्द्र नाथ ठाकुर, 2) मायानंद मिश्र, 3) कलानंद भट्ट, 4) सियाराम झा "सरस", 5) अरविन्द ठाकुर, 6) सुधांशु शेखर चौधरी, 7) धीरेन्द्र प्रेमर्षि, 8) बाबा बैद्यनाथ, 9) विभूति आनन्द, 10) तारानन्द वियोगी, 11) रमेश, 12) राजेन्द्र विमल…आदि।
उपरमे देल प्रतिनिधि गजलकारक अतिरिक्त बहुतों एहन शाइर सभ छथि जे की छिटपुट आजाद गजल लिखला आ अन्य विधामे महारत हासिल केलाह। एहि सूचीमे बाबू भुवनेश्वर सिंह भुवन, रमानंद रेणु, फूल चंद्र झा प्रवीण, वैकुण्ठ विदेह, शीतल झा, प्रेमचंद्र पंकज, प.नित्यानंद मिश्र, शारदानंद दास परिमल, केदारनाथ लाभ, तारानंद झा तरुण, रमाकांत राय रमा, महेन्द्र कुमार मिश्र, विनोदानंद, दिलीप कुमार झा दिवाना, वैद्यनाथ मिश्र बैजू, विलट पासवान विहंगम, सारस्वत, कर्ण संजय, अनिल चंद्र ठाकुर, श्याम सुन्दर शशि, अशोक दत्त, कमल मोहन चुन्नू, रोशन जनकपुरी, जियाउर रहमान जाफरी, धर्मेन्द्र विहवल्, सुरेन्द्र प्रभात, अतुल कुमार मिश्र, रमेश रंजन, कन्हैया लाल मिश्र, गोविन्द दहाल, चंद्रेश, चंद्रमणि झा, फजलुर रहमान हाशमी, रामलोचन ठाकुर, विनयविश्व बंधु, रामदेव भावुक, सोमदेव, रामचैतन्य धीरज, महेन्द्र, केदारनाथ लाभ, गोपाल जी झा गोपेश, नंद कुमार मिश्र, देवशंकर नवीन,मार्कण्डेय प्रवासी,अमरेन्द्र यादव, नरेन्द्र आदि। बहुत रास नाम धीरेन्द्र प्रेमर्षि जी द्वारा संपादित गजल विशेषांक पर आधारित अछि। किछु दिन धरि गीतल नामसँ सेहो प्रयोग भेल मुदा हम एकरा अजादे गजल मानै छी आ वस्तुतः ओ अजादे गजल छै। आ तँइ निच्चा हम ओकरो समेटने छी एहिठाम।
बिना व्याकरण बला मैथिली गजलमे भेल काज
बिना व्याकरण बला मैथिली गजलमे एखन धरि कोनो एहन काज नै भेल अछि तँइ एहि आधारपर एकर मूल्याकंन करब असंभव तँ नै मुदा बहुत कठिन अछि। एहि धाराक शाइर सभ बस अपन-अपन गजलक पोथीकेँ प्रकाशित करबा लेबाकेँ काज मानि लेने छथि। आगूसँ हम "बिना व्याकरण बला मैथिली गजल" लेल “अजाद गजल” शब्दक प्रयोग करब। अजाद गजलक इतिहासमे जे पहिल जगजियार काज देखाइए ओ अछि एहि1990मे सियाराम झा सरस, तारानंद वियोगी, रमेश आ देवशंकर नवीनजी द्वारा संकलित ओ संपादित साझी गजल संग्रह "लोकवेद आ लालकिला" केर प्रकाशन। एहि संकलनमे कुल 12 टा गजलकारक 84 टा गजल अछि। भूमिका सभहँक अनुसारे ई संकलन प्रगतिशील गजलक संकलन अछि आ जाहिर अछि जे एहिमे सहभागी गजलकार सभ सेहो प्रगतिशील हेबे करता। बारहो गजलकारक नाम एना अछि कलानंद भट्ट, तारानंद वियोगी, डा.देवशंकर नवीन, नरेनद्र, डा. महेन्द्र, रमेश, रामचैतन्य धीरज, रामभरोस कापड़ि भ्रमर, रवीन्द्र नाथ ठाकुर, विभूति आनंद, सियाराम झा सरस, प्रो. सोमदेव। एहि संकलनक अलावे धीरेन्द्र प्रेमर्षिजी द्वारा संपादित पल्लव केर "गजल अंक" जे कि 2051 चैतमे मैथिली विकास मंच, माठमांडूक मासिक साहित्यिक प्रकाशन अंतर्गत प्रकाशित भेल (वर्ष-2, अंक-6, पूर्णांक-15) सेहो अजाद गजलक धारामे नीक काज अछि। जँ अंग्रेजी तारीखसँ बूझी तँ मार्च,1995 केर लगभगमे पल्लवक "गजल अंक" प्रकाशित भेल अछि ( नेपालक तारीख बदलबामे जँ हमरासँ गलती भेल हो तँ ओकरा सुधारल जाए)। आगू बढ़बासँ पहिने पल्लवक गजलक अंकक किछु बानगी देखि लिअ--एहि गजल विशेषांकमे कलानंद भट्ट, फूलचंद्र झा प्रवीण, रमानंद रेणु, सियाराम झा सरस, राजेन्द्र विमल, रामदेव झा, बैकुंठ विदेह, रामभरोस कापड़ि भ्रमर, रमेश, शेफालिका वर्मा, शीतल झा, गोपाल झाजी गोपेश, प्रेमचंद्र पंकज, पं.नित्यानंद मिश्र, शारदानंद परिमल, रमाकांत राय रमा, महेन्द्रकुमार मिश्र, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, चंद्रेश, विनोदानंद, दिलिप कुमार झा दीवाना, वैद्यनाथ मिश्र बैजू, रोशन जनकपुरी, सारस्वत, कर्ण संजय, श्यामसुंदर शशि, अजित कुमार आजाद, ललन दास, धर्मेन्द्र विह्वल, सुरेन्द्र प्रभात, अतुल कुमार मिश्र, रमेश रंजन, कन्हैयालाल मिश्र, गोविन्द दहाल आदि 34 टा गजलकारक एक एकटा गजल अछि मने 34 टा गजलकारक 34 टा गजल अछि। एहि विशेषांकक संपादकीय अजादक गजलक हिसाबे अछि। ई पत्रिका कुल चारि पन्नाक छपैत छल आ ओहि हिसाबें चौंतीस टा गजल कोनो खराप संख्या नै छै।
नेपालसँ प्रकाशित पल्लवक "गजल अंक" आ भारतसँ प्रकाशित "लोकवेद आ लालकिला" दूनूक समयमे करीब 6-7 बर्खक अंतराल अछि (प्रकाशनसँ पहिनेक तैयारीकेँ सेहो देखैत)। दूनूक संपादको अलग छथि। दूनू काजक स्थान ओ परिस्थितियो अलग अछि मुदा ओहि के अछैत एकटा दुर्योग दूनूमे एक समान रूपसँ विद्यमान अछि। ई दुर्योग अछि ओहि अंक कि संकलनमे पुरान गजलकारकेँ स्थान नै देब। जँ दूनू संपादक चाहतथि तँ ओहि अंक कि संकलनमे पुरान गजलकारकेँ समेटि कऽ एकटा संपूर्ण चित्र आनि सकै छलाह मुदा पता नै कोन परिस्थिति कि तत्व छलै जे दूनू ठाम एहि काजमे बाधक बनल रहल। प्राचीन गजल बेसी अछिए नै तँइ ने बेसी पाइ लगबाक संभवाना छलै आ ने बेसी मेहनतिक जरूरति छलै। भऽ सकैए जे हिनका सभ लेल ई प्रश्न महत्वपूर्ण नै हो मुदा एकटा गजल अध्येताक रूपमे हमरा सभसँ बेसी इएह बात खटकल अछि। किछु एहन तत्व तँ जरूर रहल हेतै जाहिसँ प्रभावित भऽ कऽ दूनू संपादकक एकै रंगक सोच रखने छलाह। खएर सूचना दी जे वर्तमान समयमे हमरा ओ गजेन्द्र ठाकुरजी द्वारा संपादित पोथी "मैथिलीक प्रतिनिधि गजलः1905सँ 2016 धरि" जे कि ई-भर्सन रूपमे प्रकाशित अछि ताहिमे उपरक दुर्योगकेँ दूर कऽ देल गेल अछि। एहि संकलनमे सभ प्राचीन गजलकारकेँ स्थान देल गेल अछि जाहिसँ मैथिली गजलक संपूर्ण छवि पाठक लग आबि जाइत छनि।
उपरक काजक अलावे एक-दू बर्ख पहिने मधुबनीमे सेहो अजाद गजलकार सभ द्वारा गजल कार्यशाला आयोजित भेल रहए मुदा ओकर समुचित तथ्य हमरा लग नै अछि तँइ ओहिपर हम किछु बजबासँ बाँचि रहल छी।
अजाद गजलक शाइर सभ काजमे नै “प्रयोग”मे बेसी विश्वास राखै छथि आ तकर बानगी थिक "गीतल"। गीतल (जे कि वस्तुतः अजादे गजल अछि) केर जन्मदाता छथि मायानंद मिश्र। ओ अपन गीतल विधा केर पोथी "अवातंतर" केर भूमिकामे(पृष्ठ 6 पर) लिखै छथि-- "अवान्तरक आरम्भ अछि गीतलसँ। गीतं लातीति गीतलम्ऽ अर्थात गीत केँ आनऽ बला भेल गीतल। किन्तु गीतल परम्परागत गीत नहि थिक, एहिमे एकटा सुर गजल केर सेहो लगैत अछि। गीतल गजल केर सब बंधन ( सर्त ) केँ स्वीकार नहि करैत अछि। कइयो नहि सकैत अछि। भाषाक अपन-अपन विशेषता होइत अछि जे ओकर संस्कृतिक अनुरूपें निर्मित होइत अछि। हमर उद्येश्य अछि मिश्रणसँ एकटा नवीन प्रयोग। तैं गीतल ने गीते थिक, ने गजले थिक, गीतो थिक आ गजलो थिक। किन्तु गीति तत्वक प्रधानता अभीष्ट, तैं गीतल।" ई पोथी 1988मे मैथिली चेतना परिषद्, सहरसा द्वारा प्रकाशित भेल। उपरका उद्घोषणामे अहाँ सभ देखि सकै छिऐ जे कतेक दोखाह स्थापना अछि। प्रयोग हएब नीक गप्प मुदा अपन कमजोरीकेँ भाषाक कमजोरी बना देब कतहुँसँ उचित नै आ हमरा जनैत मायानंद जीक ई बड़का अपराध छनि। जँ ओ अपन कमजोरीकेँ आँकैत गीतल केर आरम्भ करतथि तँ कोनो बेजाए गप्प नै मुदा मायाजी पाठककेँ भ्रमित करबाक प्रयास केलाह जे कि तात्काल सफल सेहो भेल। ई मोन राखब बेसी जरूरी जे 2011मे प्रकाशित कथित गजल संग्रह " बहुरुपिया प्रदेश मे " जे की अरविन्द ठाकुर द्वारा लिखित अछि ताहूमे ठीक इएह गप्पकेँ दोहराओल गेलैए। गीतल विधाक उद्घोषणापर सभसँ बेसी आपत्ति सियाराम झा सरसजीकेँ छनि जकरा ओ अपन पोथी "शोणिताएल पएरक निशान" केर भूमिकामे लिखलनि अछि आ एहीठाम अजाद गजल दू ठाम बँटि गेल। पहिल सियाराम झा सरस एवं अन्य जे कि गजलकेँ गजल मानै छलाह जाहिमे तारानंद वियोगी, रमेश, देवशंकर नवीन आदि छथि। दोसर गीतल जाहिमे मायानन्द, तारानन्द झा तरुण, विलट पासवान विहंगम, आदि एला वा छथि। ऐठाँ हम ई स्पष्ट करऽ चाहब जे नाम भने जे होइ मायानन्द जी बला गुट वा सरसजी बला गुट दूनू गुटमेसँ कोनो गोटा गजल नै लिखै छलाह कारण ओ व्याकरणहीन छल। आ व्याकरणहीन कथित गजलकेँ गजल नै गीतले टा कहल जा सकैए।
मैथिलीक अजाद गजलमे नै भेल काज
1) गजलक संख्या वृद्धि दिस धेआन नै देब-- गजलक संख्या वृद्धिसँ हमर मतलब अपनो लिखल गजल आ अनको लिखल गजल अछि। कथित क्रांतिकारी सभहँक विचार अछि जे कम्मे लिखू मुदा नीक लिखू। मुदा सवाल ओतत्हि रहि जाइ छै जे नीक रचना निर्धारण केना हो जखन कि लोक लग सीमित संख्यामे रचना रहै। हमरा हिसाबें ई भ्रांति अछि जे कम रचलासँ नीके होइत छै। हमर स्पष्ट विचार अछि जे रचना संख्या बढ़लासँ अपना भीतर प्रतियोगिता बढ़ै छै आ भविष्यमे नीक रचना लिखबाक संभावना बढ़ि जाइत छै। जाहि विधामे बेसी लिखाइत छै ओकर प्रचार-प्रसार ओ लोकप्रियता बेसी जल्दी होइत छै। मुदा अजाद गजलकार सभ एहि मर्मकेँ नै बुझि सकलाह। हमरा बुझाइए जे मैथिलीक अजाद गजलकार सभ प्रतियोगितासँ डेराइत छथि। हुनका बुझाइ छनि जे जँ कादचित् प्रतियोगितामे हारि गेलहुँ तँ हमर की हएत। मुदा हुनका सभकेँ बुझबाक चाही जे साहित्यमे जीत-हारि सन कोनो बात नै होइ छै।
2) गजलकारक संख्या वृद्धि दिस धेआन नै देब--- कोनो विधाक नियम टुटलासँ ओ विधा सरल बनि जाइत छै आ ओहि विधामे बहुत रास रचनाकार आबै छथि जेना कि कविता विधामे भेलै। तखन मैथिलीमे बिना नियम केर गजल रहितों ऐमे शाइरक कमी किएक रहल? मैथिलीक अजाद गजलकार सभ कते नव शाइरकेँ प्रोत्साहित केलथि। जबाब सुन्ना भेटत। मैथिलीक अजाद गजलकार सभ अपने लीखै छथि आ अपनेसँ शुरू आ अपनेपर खत्म। आखिर गजल विधामे नव शाइर अनबाक जिम्मा केकर छलै? ईहो कहल जा सकैए जे मैथिलीक अजाद गजलकार सभ जानि बूझि कऽ अपन वर्चस्व सुरक्षित रखबाक लेल नव शाइरकेँ प्रोत्साहित नै केलथि। हुनका सभ डर छनि जे कहीं हमरासँ बेसी ओकरे सभहँक नाम नै भऽ जाइ।
3) मैथिली गजलक आलोचना दिस धेआन नै देब-- जेना कि सभ जानै छी जे आलोचना कोनो विधा लेल प्राण होइत छै मुदा आश्चर्य जे मैथिलीक अजाद गजलकार सभ गजल-आलोचनाकेँ हेय दृष्टिसँ देखला। मैथिलीमे अजाद गजलक प्रतिनिधि गजलकार सियाराम झा सरस, तारानंद वियोगी, रमेश, देवशंकर नवीनजीक संपादनमे बर्ख 1990मे " लालकिfला आ लोकवेद " नामक एकटा साझी गजल संग्रह आएल। एहि संग्रहमे गजलसँ पहिने तीनटा भाष्यकारक आमुख अछि। पहिल आमुख सरसजीक छन्हि आ ओ तकर शुरुआत एना करै छथि -- " समालोचना आ साहित्यिक इतिहास लेखनक क्षेत्रमे तकरे कलम भँजबाक चाही जकरा ओहि साहित्यिक प्रत्येक सूक्ष्तम स्पंदनक अनुभूति होइ......."। अर्थात सरसजीकेँ हिसाबें कोनो साहित्यिक विधाक आलोचना, समीक्षा, वा ओकर इतिहास लेखन वएह कए सकैए जे की ओहि विधामे रचनारत छथि। जँ हम एकर व्याख्या करी तँ ई नतीजा निकलैए जे गजल विधाक आलोचना वा समीक्षा वा ओकर इतिहास वएह लीखि सकै छथि जे की गजलकार होथि। मुदा हमरा आश्चर्य लगैए जे ने 1990सँ पहिले सरसजी ई काज केलाह आ ने 1990सँ 2008 धरि ई काज कऽ सकलाह (सरसेजी किए आनो सभ एहन काज नै कऽ सकलाह)। 2008केँ एहि दुआरे हम मानक बर्ख लेलहुँ जे कारण 2008मे हिनकर मने सरसजीक एखन धरिक अंतिम कथित गजल संग्रह "थोड़े आगि थोड़े पानि" एलन्हि मुदा ओहूमे ओ एहन काज नै कऽ सकलाह। ई हमरा हिसाबें कोनो गजलकारक सीमा भए सकैत छलै मुदा सरसजी फेर ओही आमुख के तेसर आ चारिम पृष्ठपर लिखै छथि" मैथिली साहित्यमे तँ बंगला जकाँ गीति-साहित्यिक एकटा सुदीर्घ परंपरा रहलैक अछि। गजल अही परंपराक नव्यतम विकास थिक, कोनो प्रतिबद्ध आलोचककेँ से बुझऽ पड़तैक। हँ ई एकटा दीगर आ महत्वपूर्ण बात भए सकैछ जे मैथिलीक समकालीन आलोचकक पास एहि नव्यतम विधाक आलोचना हेतु कोनो मापदंडिके नहि छन्हि। नहि छन्हि तँ तकर जोगार करथु........" आब ई देखल जाए जे एकै आलेखमे कोना दू अलग अलग बात कहि रहल छथि सरसजी । आलेखक शुरुआतमे हुनक भावना छन्हि जे " जे आदमी गजल नै लीखै छथि से एकर समीक्षा वा इतिहास लेखन लेल अयोग्य छथि मुदा फेर ओही आलेखमे ओहन आलोचकसँ गजल लेल मापदंड चाहै छथि जे कहियो गजल नहि लिखला। भए सकैए जे सरसजी ई आरोप सरसजी अपन पूर्ववर्ती विवादास्पद गजलकार मायानंद मिश्र पर लगबथि होथि। जे की सरसजीक हरेक आलेखसँ स्पष्ट होइत अछि। मुदा ऐठाम हमरा सरसजीसँ एकटा प्रश्न जे जँ कोनो कारणवश माया जी ओ काज नै कए सकलाह वा जँ मायानंद जी ई कहिए देलखिन्ह मैथिलीमे गजल नै लिखल जा सकैए तँ ओकरा गलत करबा लेल ओ अपने (सरसजी) की केलखिन्ह। 2008 धरि मैथिलीमे 10-12 टा कथित गजल संग्रह आबि चुकल छल। मुदा अपने सरसजी कहाँ एकौटा कथित गजल संग्रह समीक्षा वा आलोचना केलखिन्ह। गजलक व्याकरण वा इतिहास लेखन तँ बहुत दूरक बात भए गेल। ऐ आलेखसँ दोसर बात इहो स्पष्ट अछि जे सरसजी कोनो समकालीन आलोचककेँ गजलक समीक्षा लेल मापदंड देबा लेल तैयार नै छथि। जँ कदाचित् कनेकबो सरसजी आलोचक सभकेँ मापदंड दितथिन तँ संभवतः 2008 धरि गजल क्षेत्रमे एहन अकाल नै रहितै।
आब हम आबी विदेहक अंक 96 पर जाहिमे श्री मुन्ना जी द्वारा गजल पर परिचर्चा करबाओल गेल छल। आन-आन प्रतिभागीक संग-संग प्रेमचंद पंकज नामक एकटा प्रतिभागी सेहो छथि। पंकजजी अपन आलेखमे आन बातक संग इहो लिखैत छथि -“ कतिपय व्यक्ति एकटा राग अलापि रहल छथि जे मैथिलीमे गजलक सुदीर्घ परम्परा रहितहु एकरा मान्यता नै भेटि रहल छैक। एहन बात प्रायः एहि कारणे उठैत अछि जे मैथिली गजलकेँ कोनो मान्य समीक्षक-समालोचक एखन धरि अछूत मानिकऽ एम्हर ताकब सेहो अपन मर्यादाक प्रतिकूल बूझैत छथि। एहि सम्बन्धमे हमर व्यक्तिगत विचार ई अछि, जे एकरा ओहने समालोचक-समीक्षक अछूत बुझैत छथि जिनकामे गजलक सूक्ष्मताकेँ बुझबाक अवगतिक सर्वथा अभाव छनि। गजलक संरचना, मिजाज आदिकेँ बुझबाक लेल हुनका लोकनिकेँ स्वयं प्रयास करऽ पड़तनि, कोनो गजलकार बैसि कऽ भट्ठा नहि धरओतनि। हँ, एतबा निश्चय जे गजल धुड़झाड़ लिखल जा रहल अछि आ पसरि रहल अछि आ अपन सामर्थयक बल पर समीक्षक-समालोचक लोकनिकेँ अपना दिस आकर्षित कइए कऽ छोड़त “ अर्थात प्रेमचंद जी सरसे जी जकाँ भट्ठा नै धरेबाक पक्षमे छथि। सरसजी 1990मे कहै छथि मुदा पंकजजी 2011केर अंतमे मतलब 22साल बाद। मतलब बर्ख बदलैत गेलै मुदा मानसिकता नै बदललै।  ऐठाम हम ई जरुर कहए चाहब जे भट्ठा धराबए लेल जे ज्ञान आ इच्छा शक्ति होइ छै से बजारमे नै बिकाइत छै। संगे-संग ईहो कहए चाहब जे मायानंद मिश्रजीक बयान आ अज्ञानतासँ मैथिली गजलकेँ जतेक अहित भेलै ताहिसँ बेसी अहित सरसजी वा पंकजजीक सन गजलकारसँ भेलै। ऐठाम ई स्पष्ट करब बेसी जरूरी जे हम ऐ बातसँ बेसी दुखी नै छी जे ई सभ बिना व्याकरणक गजल किए लिखला मुदा ऐ बातसँ बेसी दुखी छी जे ई गजलकार सभ पाठकक संग विश्वासघात केला। जँ ई सभ सोंझ रूपें कहि देने रहितथिन जे गजलक व्याकरण होइ छै आ हम सभ ओकर पालन नै कऽ सकै छी तखन बाते खत्म छलै मुदा अपन कमजोरीकेँ नुकेबाक लेल ई सभ नाना प्रकारक प्रपंच रचला जकर दुष्परिणाम गजल भोगलक। हमरा जहाँ धरि अध्य्यन अछि तहाँ धरि लगभग मात्र 4-5 टा गजल आलोचना स्वतंत्र लेखक रूपमे अजाद गजलकार सभ द्वारा लिखल गेल अछि (जँ पोथीक भूमिका सभकेँ सेहो जोड़ी तँ एकर संख्या 8-9 टा भऽ सकैए)। एहि कड़ीमे तारानंद वियोगीजीक "मैथिली गजलः मूल्याकंनक दिशा", देवशंकर नवीनजीक "मैथिली गजलःस्वरूप आ संभावना", धीरेन्द्र प्रेमर्षिजीक "मैथिलीमे गजल आ एकर संरचना" आदि प्रमुख अछि।
मैथिलीक अजाद गजलक किछु उदाहरण
जेना कि पहिने कहने छी अजाद गजलमे व्याकरण नै अछि तँइ हम एकर उदाहरणमे शेर सभहँक खाली भाव संबंधी विवेचना करब (उदाहरणमे आएल शेर सभ एकौ गजलक भऽ सकैए आ अलग अलग गजलक सेहो। संपादक महोदयसँ आग्रह जे उदाहरणमे देलग गेल शेर सभहँक वर्तनीकेँ यथावत् राखथि)--
सुधांशु शेखर चौधरी जीक दू टा शेर--

अपने बेसाहल बाटसँ पेरा रहल छी हम
अपने लगाओल काँटसँ घेरा रहल छी हम
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हम पल ओछौने बाट छी निराश नै करबै
नितुआन सन अधार छी हताश नै करबै
पहिल शेरमे शाइर सुधांशुजी अपनेसँ जन्मल समस्या कोना परैशान करै छै तकर नीक संकेत देलाह अछि। दोसर शेर हिनक गजलक मूल भाव (खुदा-बंदा बला, एकरा संसारिक रूपमे सेहो लऽ सकै छियै) समेटने अछि।

अरविन्द ठाकुर जीक दू टा शेर—

संसद केर फोटो मे किछुओ नहि हेर फेर
सांपनाथ नागनाथ इएह दुनू बेर बेर
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लीक छोड़ि जे चलल सियार
बनि गेल एक दिन चौकीदार
पहिल शेरमे शाइर अरविन्द ठाकुरजी देशक जनताक विडंवनाक चित्रण केने छथि। जनता बरू कोनो पार्टीकेँ भोट किए ने दै सभ पार्टीक चरित्र एकै रंगक भऽ जाइ छै। दोसर शेरक हिनक व्यंग्य अछि जाहिमे नकली क्रांतिकारिताकेँ उजागर कएल गेल अछि।

विभूति आनंद जीक दू टा शेर—

एकेटा धारणा अछि एकेटा उदेस
क्यो ने होए रंक आ ने क्यो नरेश
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फूलो मे फूल, अड़हूल केर रंग जकाँ
चारूभर तेजी सँ पसरि रहल जनता
पहिल शेरमे शाइर विभूति आनंदजी सभहँक मोनक बात रखने छथि। आ दोसर शेरमे ओ कम्यूनिष्ट पार्टीक प्रतीक लाल रंगक तुलना हड़हूल फूलसँ केने छथि।

कलानंद भट्ट जीक दू टा शेर—

शंकामे विध्वंसक आइ जीबि रहल लोक
अविवेकी अधिकारमे अणुबम भेल छै
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अछि बटोही सशंकित बनल बाट पर
दिन मे आभास रातुक अभरि गेल अछि
पहिल शेरमे शाइर कलानंद भट्टजी वर्तमान समस्याक वर्णन केने छथि। कोन देश कोन बहन्नासँ कतए कहिया आक्रमण कऽ देत तकर कोनो ठिकान नै। दोसर शेरमे सेहो एहने सन भाव अछि।

बाबा बैद्यनाथ जीक दू टा शेर—

कोन एहन हम काज करू जे लागय कोनो पाप नहि
भूखक आगिसँ बेसी भैया अछि कोनो संताप नहि
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कहियो जँ मोन पड़ए अपन अतीतक जीवन
बस आँखि मूनि दूनू कनियें लजा लिअ
अरब देशक एकटा कहबी छै जे पाथर वएह मारए जे कोनो पाप नै केने हो। एही भावकेँ शाइर वैद्यनाथजी अंकित केने छथि पहिल शेरमे। दोसर शेर हिनक कमालोसँ कमाल अछि। कोनो कुकर्मीकेँ एहिसँ बेसी धुतकारल नै जा सकैए।

रवीन्द्र नाथ ठाकुर जीक दू टा शेर—

हँसैत भोर सजल साँझ लोक सदा चाहैए
उदास भोर मरल साँझ तकर की होयत
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जे पानि पीबि बैसल हो घाट घटा केर
पता तकरहिंसँ जाय पूछी बजार हाट केर
शाइर रवीन्द्रजी पहिल शेरमे घटल लोकक संकेत देने छथि प्रतीकक रूपमे। पाइ घटिते समांग सेहो घटि जाइ छै अइ दुनियाँमे। दोसर शेरमे कमालक प्रतीकक प्रयोग भेल अछि। हाट-बजारमे वएह ठठि सकैए जे कि घाट-घाट केर पानि पीने हो। ई बात प्राचीन हाटसँ लऽ कऽ एखनुक आधुनिक स्टोरपर सेहो लागू अछि।

मायानंद मिश्र जीक दू टा शेर—

एखन तँ राति अछि आ राति केर बातो अछि
कतेक राति धरि कतेक राति केर चलतै
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देखक बाद नहि देखैक बड़ बहाना अछि
चलैत भीड़ मे एकसगर जेना हेरायल छी
शाइर मायानंदजी पहिल शेरमे समयचक्रसँ संदर्भित बात कहने छथि। दोसर शेरमे हुनकर ओहन दुख सामने आएल अछि जाहिमे पहिचानल लोक सेहो अनचिन्हार बनि जाइ छै।

सियाराम झा सरस जीक दू टा शेर—

पूर्णिमा केर दूध बोड़ल ओलड़ि गेल इजोर हो
श्वेत वसनक घोघ तर धरतीक पोरे पोर हो
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माथ उठबए सवाल सोनित के
काल लीखैछ हाल सोनित के
सियारामजीक पहिल शेर शाश्वत सौंदर्यक वर्णनमे अछि तँ दोसर शेर प्रगतिशील।

रमेश जीक दू टा शेर—

सींथ जए टा चाही तए टा छूबि लिय
टीस मुदा ताजिन्दगी रहैत छै
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जामु आ गम्हारि केर छाह तर मे
बाँस केर कोपर सुखैल जा रहल
शाइर रमेश जीक पहिल शेर असफल प्रेम आ ओकर टीसक नीक वर्णन अछि। दोसर शेर उन्टा अछि। व्यावहारिक रूपसँ बाँसक छाहमे कोनो आर गाछ नै नमहर होइत छै मुदा शाइर अपन शेरमे जामु आ गम्हारि केर छाहसँ बाँसक भयक वर्णन केने छथि। दोसर शेरक विविध व्याख्या भऽ सकैए।

राजेन्द्र विमल जीक दू टा शेर—

डारिसँ जे चूकत तँ बानर बङौर लेत
बेरपर हूसत से केराके घौर लेत
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चानीक बट्टा सन नभमे संचित नक्षत्रक मोती
अहीं लेल बस अहीं लेल सृष्टिक सतरंगी जोती
शाइर राजेन्द्रजीक पहिल शेर हमरा जनैत जनतापर व्यंग्य अछि। जनते एहन अछि जे सभ समय हो-हो करैए मुदा बेरपर हुसि जाइए। हिनक दोसर शर प्रेमक सौंदर्य वर्णन अछि।

धीरेन्द्र प्रेमर्षि जीक दू टा शेर—

जिनगी अछि बड़ घिनाह नाक चुबैत पोटासन
सुड़कि–सुड़कि तैयो छी ढोबि रहल मोटासन!
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कोन विजय लए खेल ई खुनियाँ
जइमे सभक सिकस्त भेल छै
जीवनकेँ निमाहिए कऽ कियो महान बनै छै। आ जीवन निमाहए लेल नीक-बेजाए सभ करए पड़ैत छै धीरेन्द्रजीक पहिल शेरक मूल भाव इएह अछि। दोसर शेरमे धीरेन्द्रजी ओहि अज्ञात मजबूरी दिस संकेत केने छथि जाहि कारणसँ लोक एक दोसरक दुश्मन बनि गेल अछि। आ मात्र अपन जय लेल सभहँक पराजय केर जोगाड़ करैए मुदा अंतमे सभहँक संग ओहो हारि जाइए अनेक कारणसँ।

तारानंद वियोगी जीक दू टा शेर—

घिचने घिचाइछ नहि जिनगी के गाड़ी
एक खंड मुस्की आ बहुते लचारी
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ओहिना के ओहिना जिनगी मरैत गेलै
एक्के सन फोटो सँ एलबम भरैत गेलै
पहिल शेरमे शाइर तारानंद वियोगी जीवन ओहि सीमापर पहुँचि गेल छथि जतए आदमी हताश भऽ बैसि जाइए। किछु लोक एहि सेरकेँ निराशावादी कहि सकै छथि मुदा हमरा जनैत निराशा सेहो जीवनेक अंग छै। दोसर शेरमे शाइर जीवनक एकरसतासँ उबिआएल बुझाइत छथि।

रोशन जनकपुरी जीक दू टा शेर—


आङनमे अछि गुम्हरि रहल कागजके बाघ
घर घरमे अछि रोहटि-कन्ना, डर लगैए
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जानि ने कहिया धरि बूझत ई लोक जे
वधशालामे आत्माक जोर नहि होइत छै
पहिल शेरमे शाइर जनकपुरीजी लोकक भीतरक अज्ञात अदंकक वर्णन केने छथि। सभकेँ बूझल छै जे बाघ कागज केर छै मुदा एखनुक लोक असगर भऽ चुकल अछि आ ओही कारणसँ ओकरा कागजक बाघसँ सेहो डर लागि रहल छै। कोनो हत्या करए बला आदमिए होइत छै से दोसर शेरसँ बुझा जाइत अछि जखन कि शाइर हत्याराक पैरवी करै छथि। आब ई हत्यारा कोनो रूपमे कोनो कारणसँ कियो भऽ सकैए। मात्र आदमिएकेँ मारए बला हत्यारा होइत छै से मानब एकभगाह अछि।

उपरमे देल गेल अजाद गजलक उदाहरणसँ ई बात स्पष्ट अछि जे सभ अजाद गजलकार सभहँक भाव नीक छनि। भावमे बसल बिंब खाँटी मैथिल छनि। प्रतीक सेहो नव छनि मुदा बस गजलक व्याकरण नै छनि। जखन कि शुरुआतेमे कहने छी बिना काफिया बहरक गजल नै होइत छै। आश्चर्य ईहो जे अजाद गजलकार सभ दुष्यंत कुमार कि अदम गोंडवी की फैज अहमद फैज केर उदाहरण दै छथि मुदा दुष्यंत कुमार कि अदम गोंडवी की फैज अहमद फैज केर गजलमे प्रयोग भेल व्याकरणकेँ नै देखि पाबै छथि। अजाद गजलकार सभहँक तर्क छनि जे जखन रचनामे भाव, बिंब, विचार सभ किछु छै तखन ओकरा गजल मानबामे की दिक्कत। मुदा हम उन्टा पूछब जे ओकरा कविते मानबामे की दिक्कत? अंततः कोनो कवितामे भाव, बिंब, विचार होइते छै ने। तँइ ओकरा कविते मानू। मुदा दुखद जे अजाद गजलकार सभ कहता जे ई कविता नै गजल अछि मुदा कोना तइ लेल हुनका तर्क नै छनि। किछु तँ तत्व हेतै जे कविता, गीत आ गजलकेँ अलग-अलग करैत हेतै। हमरा हिसाबें बहर-काफिया, व्याकरण ओ तत्व छै जाहिसँ कविता, गीत आ गजलमे अंतर कएल जा सकैए।
उपरमे हम कहने छी जे अजाद गजलकार सभ दुष्यंत कुमार, अदम गोंडवी आदिकेँ बहुत मानै छथि तँ एक बेर कने ईहो देखि ली जे दुष्यंत कुमार, अदम गोंडवी सभ गजल व्याकरणक पालन केने छथि की नै---
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जीक ई शेर देखू-

भेद कुल खुल जाए वह सूरत हमारे दिल में है
देश को मिल जाए जो पूँजी तुम्हारी मिल में है
मतला (मने पहिल शेर)क मात्राक्रम अछि-- 2122+2122+2122+212 आब सभ शेरक मात्राक्रम इएह अछि। निरालाजीक ई गजल ताकि कऽ पढ़ू आ मिलाउ जे पूरा गजलमे व्याकरणक पालन भेल छै कि नै। दुष्यंत कुमारक ऐ गजलक तक्ती देखू---

हो गई है / पीर पर्वत /सी पिघलनी / चाहिए,
इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए।
अइ शेरक मात्राक्रम 2122 / 2122 / 2122 / 212 अछि। दुष्यंतजीक ई गजल ताकि कऽ पढ़ू आ मिलाउ जे पूरा गजलमे व्याकरणक पालन भेल छै कि नै। आब कने अदम गोंडवी जीक दू टा गजलक तक्ती देखू—

ग़ज़ल को ले / चलो अब गाँ / व के दिलकश /नज़ारों में
मुसल्‍सल फ़न / का दम घुटता / है इन अदबी / इदारों में
अइ शेरक मात्राक्रम 1222 / 1222 / 1222 / 1222 अछि।

भूख के एह / सास को शे / रोसुख़न तक /ले चलो
या अदब को / मुफ़लिसों की / अंजुमन तक /ले चलो
अइ शेरक मात्राक्रम 2122 / 2122 / 2122 / 212 अछि। अहाँ सभ अदमजीक दूनू गजल ताकि पढ़ू आ मिलाउ जे पूरा गजलमे व्याकरणक पालन भेल छै कि नै। एकटा ओहन गजलकारक गजल केत तक्ती देखा रहल छी जिनक नाम लऽ सभ अजाद गजलकार सभ बहर ओ छंदक विरोध करै छथि। तँ चलू फैज अहमद फैज जीक ई गजल देखू—

शैख साहब से रस्मो-राह न की
शुक्र है ज़िन्दगी तबाह न की
अइ शेरक मात्राक्रम 2122-1212-112 अछि। अहाँ सभ पूरा गजल ताकि पढ़ू आ मिलाउ जे पूरा गजलमे व्याकरणक पालन भेल छै कि नै। तेनाहिते आजुक प्रसिद्ध शाइर मुनव्वर राना केर ऐ गजलक तक्ती देखू—

बहुत पानी बरसता है तो मिट्टी बैठ जाती है
न रोया कर बहुत रोने से छाती बैठ जाती है
अइ शेरक मात्राक्रम 1222 / 1222 / 1222 / 1222 अछि। अहाँ सभ पूरा गजल ताकि पढ़ू आ मिलाउ जे पूरा गजलमे व्याकरणक पालन भेल छै कि नै। हसरत मोहानीक ई प्रसिद्ध गजल देखू---

चुपकेचुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है
अइ शेरक मात्राक्रम 2122+2122+2122+212 अछि। अहाँ सभ पूरा गजल ताकि पढ़ू आ मिलाउ जे पूरा गजलमे व्याकरणक पालन भेल छै कि नै। अंतमे राहत इन्दौरी जीक एकटा गजलक दू टा शेरकेँ देखू देखू—
चरागों को उछाला जा रहा है
हवा पर रौब डाला जा रहा है

न हार अपनी न अपनी जीत होगी
मगर सिक्का उछाला जा रहा है
अइ दूनू शेरक मात्राक्रम गजल (1222 / 1222 / 122) (बहर-ए-हजज केर मुजाइफ) अछि। अहाँ सभ पूरा गजल ताकि पढ़ू आ मिलाउ जे पूरा गजलमे व्याकरणक पालन भेल छै कि नै।
उपरमे देल गेल हिंदी-उर्दू गजलकार सभहँक शेर सभकेँ देखलासँ पता चलत जे निराला जी गजलक विषय नव कऽ देलखिन प्रेमिकाक बदला विषय मिल आ पूँजी बनि गेलै मुदा व्याकरण वएह रहलै। अदमजी भखूक एहसासकेँ शेरो-सुखन धरि लऽ गेलाह मुदा ओही व्याकरणक संग। दुष्यंतजी अपन गजलक माध्यमे हिमालयसँ गंगा निकालि देलाह मुदा व्याकरण ने तोड़लाह। फैज अहमद फैज अपन गजलमे धार्मिक कट्टरताक विरोध केलाह मुदा ओहो व्याकरण नै तोड़लाह। तेनाहिते आनो शाइर सभ नव भाव-भंगिमाक गजल लिखने छथि सेहो व्याकरणक पालन करैत। तखन ई मैथिलीक अजाद गजलकार सभ कहै छथि जे व्याकरणसँ भाव-विचार बन्हा जाइ छै या गजलमे व्याकरण नै होइ छै से कते उचित? एहिठाम आबि हमरा ई कहबा  / स्वीकार करबामे कोनो संकोच नै जे जँ ई अजाद गजलकार सभ अपन जिद छोड़ि एखनो गजलक व्याकरण स्वीकार कऽ लेता तँ मैथिली गजलक सुदिन शुरू भऽ जाएत कारण हिनका सभ लग भाव-बोध, विचार ओ अनुभव बहुत बेसी छनि मुदा विधागत व्याकरण ने पालन करबाक कारणे हिनकर सभहँक लिखलपर विधाक रूपमे प्रश्नचिह्न लागि जाइत अछि। सियाराम झा सरसजीकेँ दुख छनि जे गीत विधा वर्तमानमे मैथिलीक केंद्रीय विधा किए नै अछि (देखू हुनकर पोथी आखर-आखर गीत केर भूमिका)। ई दुख हमरो अछि गजलक संदर्भमे, गीतक संदर्भमे आ सभ छंदयुक्त काव्यक संदर्भमे। हमरो ई इच्छा अछि जे गजल-गीत-अन्य छंदयुक्त काव्य मैथिली साहित्य केर केंद्रीय विधा बनए। बनियो सकैए। जँ अनचिन्हार आखर-विदेह मात्र दस बर्खमे किछुए गजल कार्यकर्ताक संग अपन गजल संबंधी लक्ष्य पूरा कऽ सकैए तँ फेर अनुमान करू जे जँ सभ अजाद गजलकार सभ अपन जिद छोड़ि व्याकरण बला गजल लिखनाइ शुरू कऽ देथि तँ कतेक कम समयमे ई लक्ष्य पूरा हएत? मुदा ताहि लेल जरूरी छै विधागत छंद ओ व्याकरणकेँ माननाइ। एकटा गजल कार्यकर्ताक तौरपर हमरा विश्वास अछि जे जँ सभ नै तँ अधिकांश अजाद गजलकार जिद छोड़ि विधागत छंद के मानता तँ मात्र 15-20 बर्खमे गजल-गीत-अन्य छंदयुक्त काव्य मैथिली साहित्य केर केंद्रीय विधा बनि जाएत। ई विश्वास हमरा एनाहिते नै अछि एकर पाछू अनचिन्हार आखर ओ विदेहक विश्वास सेहो अछि। गजलक एकटा कार्यकर्ताक तौरपर हम प्रतीक्षा कऽ रहल छी जे कहिया मैथिली गजलकेँ ई सौभाग्य भेटतै जे ओ मैथिली साहित्यक केंद्रीय विधा बनत आ ताहूसँ पहिने हमरा अइ बातक प्रतीक्षा अछि जे कोन-कोन अजाद गजलकार सभ हमर एहि सपनाकेँ यथार्थमे बदलबाक लेल सहयोग देता। प्रतीक्षारत.....................






तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों