Wednesday, 17 January 2018

हिंदी फिल्मी गीतमे बहर ओ व्याकरण-5

गजलक मतलामे जे रदीफ-काफिया-बहर लेल गेल छै तकर पालन पूरा गजलमे हेबाक चाही मुदा नज्ममे ई कोनो जरूरी नै छै। एकै नज्ममे अनेको काफिया लेल जा सकैए। अलग-अलग बंद वा अंतराक बहर सेहो अलग भ' सकैए संगे-संग नज्मक शेरमे बिनु काफियाक रदीफ सेहो भेटत। मुदा बहुत नज्ममे गजले जकाँ एकै बहरक निर्वाह कएल गेल अछि। मैथिलीमे बहुत लोक गजलक नियम तँ नहिए जानै छथि आ ताहिपरसँ कुतर्क करै छथि जे फिल्मी गीत बिना कोनो नियमक सुनबामे सुंदर लगैत छै। मुदा पहिल जे नज्म लेल बहर अनिवार्य नै छै आ जाहिमे छै तकर विवरण हम एहि ठाम द' रहल छी-----------------

आइ देखू प्रसिद्ध गीतकार राजेन्द्र कृष्णजीक लिखल आ "खानदान" फिल्म केर ई नज्म जकर बहर 2122 2122 212 अछि। मात्रा निर्धारणमे उर्दू ओ हिंदीक नियम लागल छै।

कल चमन था आज इक सहरा हुआ
देखते ही देखते ये क्या हुआ

मुझको बरबादी का कोई ग़म नहीं
ग़म है बरबादी का क्यों चर्चा हुआ

एक छोटा सा था मेरा आशियाँ
आज तिनके से अलग तिनका हुआ

सोचता हूँ अपने घर को देखकर
हो न हो ये है मिरा देखा हुआ

देखने वालों ने देखा है धुआँ
किसने देखा दिल मिरा जलता हुआ

(कल चमन था 2122 आज इक सह 2122 रा हुआ 212
देखते ही 2122 देखते ये 2122 क्या हुआ 2122)

सुनू ई नज्म



हिंदी फिल्मी गीतमे बहर ओ व्याकरण-4

गजलक मतलामे जे रदीफ-काफिया-बहर लेल गेल छै तकर पालन पूरा गजलमे हेबाक चाही मुदा नज्ममे ई कोनो जरूरी नै छै। एकै नज्ममे अनेको काफिया लेल जा सकैए। अलग-अलग बंद वा अंतराक बहर सेहो अलग भ' सकैए संगे-संग नज्मक शेरमे बिनु काफियाक रदीफ सेहो भेटत। मुदा बहुत नज्ममे गजले जकाँ एकै बहरक निर्वाह कएल गेल अछि। मैथिलीमे बहुत लोक गजलक नियम तँ नहिए जानै छथि आ ताहिपरसँ कुतर्क करै छथि जे फिल्मी गीत बिना कोनो नियमक सुनबामे सुंदर लगैत छै। मुदा पहिल जे नज्म लेल बहर अनिवार्य नै छै आ जाहिमे छै तकर विवरण हम एहि ठाम द' रहल छी-----------------

आइ देखू प्रसिद्ध गीतकार हसन कमालजीक लिखल आ "निकाह" फिल्म केर ई नज्म जकर बहर 2122 2122 212 अछि। मात्रा निर्धारणमे उर्दू ओ हिंदीक नियम लागल छै। (ओना तेसर शेरक दोसर पाँतिक शब्द "शायद" केर मात्राक्रम 21 करबाक लेल एकरा शाय्द मानल गेल छै) आन नज्मक अपेक्षा एकर शेर सभमे विविधता अछि तँइ हम एकरा गजल कहब बेसी उचित बुझैत छी।


दिल के अरमां आँसुओं में बह गए
हम वफ़ा करके भी तनहा रह गए

ज़िंदगी एक प्यास बनकर रह गयी
प्यार के क़िस्से अधूरे रह गए

शायद उनका आख़री हो यह सितम
हर सितम यह सोचकर हम सह गए

ख़ुद को भी हमने मिटा डाला मगर
फ़ास्ले जो दरमियाँ थे रह गए

एहि नज्मक तेसे शेर बहुत मारुक अछि। शेरमे वर्णित "सितम" शब्द किछु भ' सकैत छै। ई प्रेमक सितम सेहो हेतै तँ व्यवस्थाक कि दैवक सितम सेहो भ' सकैए। फिल्म देखि क' एकरा मात्र प्रेमी प्रेमिका लेल बूझए बला लोक अबोध छथि से हम साफ साफ कहब।

सुनू ई नज्म

हिंदी फिल्मी गीतमे बहर ओ व्याकरण-3

गजलक मतलामे जे रदीफ-काफिया-बहर लेल गेल छै तकर पालन पूरा गजलमे हेबाक चाही मुदा नज्ममे ई कोनो जरूरी नै छै। एकै नज्ममे अनेको काफिया लेल जा सकैए। अलग-अलग बंद वा अंतराक बहर सेहो अलग भ' सकैए संगे-संग नज्मक शेरमे बिनु काफियाक रदीफ सेहो भेटत। मुदा बहुत नज्ममे गजले जकाँ एकै बहरक निर्वाह कएल गेल अछि। मैथिलीमे बहुत लोक गजलक नियम तँ नहिए जानै छथि आ ताहिपरसँ कुतर्क करै छथि जे फिल्मी गीत बिना कोनो नियमक सुनबामे सुंदर लगैत छै। मुदा पहिल जे नज्म लेल बहर अनिवार्य नै छै आ जाहिमे छै तकर विवरण हम एहि ठाम द' रहल छी-----------------

"तेरी याद दिल से भुलाने चला हूँ"

साहिर लुधियानवी द्वारा लिखल नज्म "तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ" केर बहर 122 122 122 122 छै से पछिला पोस्टमे तक्ती द्वारा देखने रही। आइ अही बहरमे शैलेंद्रजीक लिखल नज्म देखा रहल छी। "हरियाली और रास्ता" नामक फिल्ममे मनोज कुमार माला सिन्हापर फिल्माएल गेल छै। मात्रा निर्धारणमे उर्दू हिंदीक नियम लागल छै।

तेरी याद दिल से भुलाने चला हूँ
के खुद अपनी हस्ती मिटाने चला हूँ

घटाओं तुम्हें साथ देना पड़ेगा
मैं फिर आज आंसू बहाने चला हूँ

कभी जिस जगह ख्वाब देखे थे मैंने
वहीँ खाक़ अपनी उड़ाने चला हूँ

गम--इश्क ले, फूंक दे मेरा दामन
मैं अपनी लगी यूं, बुझाने चला हूँ

(तेरी या 122 दिल से 122 भुलाने 122 चला हूँ 122
के खुद अप 122 नी हस्ती 122 मिटाने 122 चला हूँ 122)

सुनू ई नज्म




हिंदी फिल्मी गीतमे बहर ओ व्याकरण-2

गजलक मतलामे जे रदीफ-काफिया-बहर लेल गेल छै तकर पालन पूरा गजलमे हेबाक चाही मुदा नज्ममे ई कोनो जरूरी नै छै। एकै नज्ममे अनेको काफिया लेल जा सकैए। अलग-अलग बंद वा अंतराक बहर सेहो अलग भ' सकैए संगे-संग नज्मक शेरमे बिनु काफियाक रदीफ सेहो भेटत। मुदा बहुत नज्ममे गजले जकाँ एकै बहरक निर्वाह कएल गेल अछि। मैथिलीमे बहुत लोक गजलक नियम तँ नहिए जानै छथि आ ताहिपरसँ कुतर्क करै छथि जे फिल्मी गीत बिना कोनो नियमक सुनबामे सुंदर लगैत छै। मुदा पहिल जे नज्म लेल बहर अनिवार्य नै छै आ जाहिमे छै तकर विवरण हम एहि ठाम द' रहल छी-----------------

"सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है"

आइ शैलेंद्रजी द्वारा लिखल फिल्म "तीसरी कसम"मे राज कपूरजीक उपर फिल्माएल नज्म देखू। नज्म निर्गुण अछि। एहि नज्मक बहर 1222 अछि। एहि नज्ममे महल शब्दक बहर उर्दू शब्द "शहर" केर हिसाबसँ अछि। शैलेंद्रजी फिल्मी गीतक अतिरिक्त अपन मार्क्सवादी गीत लेल सेहो प्रसिद्ध छथि हुनक मार्क्सवादी गीत आधुनिक गीत सेहो अछि बहरमे सेहो। तँ देखू शैलेंद्रजीक नज्म ओकर बहर। मैथिलीक जे गजलकार सोचै छथि जे बहरसँ गेयता खत्म ' जाइत छै तिनका लेल विशेष रूपसँ अछि।

सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है
हाथी है ना घोड़ा है, वहाँ पैदल ही जाना है

तुम्हारे महल चौबारे, यहीं रह जाएंगे सारे
अकड़ किस बात की प्यारे ये सर फिर भी झुकाना है

भला कीजै भला होगा, बुरा कीजै बुरा होगा
बही लिख लिख के क्या होगा, यहीं सब कुछ चुकाना है

लड़कपन खेल में खोया, जवानी नींद भर सोया
बुढ़ापा देख कर रोया, वही किस्सा पुराना है

(सजन रे झू 1222 मत बोलो, 1222 खुदा के पा 1222 जाना है 1222
हाथी है 1222 ना घोड़ा है, 1222 वहाँ पैदल 1222 ही जाना है 1222)

सुनू ई नज्म




हिंदी फिल्मी गीतमे बहर ओ व्याकरण-1

गजलक मतलामे जे रदीफ-काफिया-बहर लेल गेल छै तकर पालन पूरा गजलमे हेबाक चाही मुदा नज्ममे ई कोनो जरूरी नै छै। एकै नज्ममे अनेको काफिया लेल जा सकैए। अलग-अलग बंद वा अंतराक बहर सेहो अलग भ' सकैए संगे-संग नज्मक शेरमे बिनु काफियाक रदीफ सेहो भेटत। मुदा बहुत नज्ममे गजले जकाँ एकै बहरक निर्वाह कएल गेल अछि। मैथिलीमे बहुत लोक गजलक नियम तँ नहिए जानै छथि आ ताहिपरसँ कुतर्क करै छथि जे फिल्मी गीत बिना कोनो नियमक सुनबामे सुंदर लगैत छै। मुदा पहिल जे नज्म लेल बहर अनिवार्य नै छै आ जाहिमे छै तकर विवरण हम एहि ठाम द' रहल छी-----------------


"तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ"

ओना अंग्रेजी कवितासँ प्रभावित उर्दूक कविताकेँ सेहो नज्मे कहल जाइत छै मुदा उर्दूक प्राचीन नज्म सभमे सेहो बहरक पालन कएल जाइत छलै। उदाहरण लेल साहिर लुधियानवीजीक नज्म देखू जे कि "धूल का फूल" नामक फिल्ममे फिल्माएल गेल छै जाहिमे राजेन्द्र कुमार माला सिन्हाजी नायक नायिकाक रूपमे छथि। एहि नज्म केर बहर 122 122 122 122 अछि हरेक पाँतिमे निमाहल गेल अछि। साहिर जते फिल्म लेल प्रसिद्ध छथि ताहिसँ बेसी उर्दू शाइरी लेल सेहो। वस्तुतः उर्दू शाइरी फिल्मी गीतमे अंतर नै कएल जाइत छै तँइ प्रसिद्ध फिल्मी पटकथा लेखक गीतकार जावेद अख्तर फिल्मक अतिरिक्त उर्दूक साहित्य अकादेमी लेल सेहो हकदार मानल जाइत छथि (2013 मे "लावा" नामक पोथी लेल) मैथिलीमे तँ सभ कामरेड क्रांतिकारी छथि की कहि सकै छी। तँ पढ़ू नज्म देखू एकर बहर

तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ
वफ़ा कर रहा हूँ वफ़ा चाहता हूँ

हसीनो से अहद--वफ़ा चाहते हो
बड़े नासमझ हो ये क्या चाहते हो

तेरे नर्म बालों में तारे सजा के
तेरे शोख कदमों में कलियां बिछा के
मुहब्बत का छोटा सा मन्दिर बना के
तुझे रात दिन पूजना चाहता हूँ,

ज़रा सोच लो दिल लगाने से पहले
कि खोना भी पड़ता है पाने के पहले
इजाज़त तो ले लो ज़माने से पहले
कि तुम हुस्न को पूजना चाहते हो,

कहाँ तक जियें तेरी उल्फ़त के मारे
गुज़रती नहीं ज़िन्दगी बिन सहारे
बहुत हो चुके दूर रहकर इशारे
तुझे पास से देखना चाहता हूँ,

मुहब्बत की दुश्मन है सारी खुदाई
मुहब्बत की तक़दीर में है जुदाई
जो सुनते नहीं हैं दिलों की दुहाई
उन्हीं से मुझे माँगना चाहते हो,

दुपट्टे के कोने को मुँह में दबा के
ज़रा देख लो इस तरफ़ मुस्कुरा के
मुझे लूट लो मेरे नज़दीक के
कि मैं मौत से खेलना चाहता हूँ,

गलत सारे दावें गलत सारी कसमें
निभेंगी यहाँ कैसे उल्फ़त कि रस्में
यहाँ ज़िन्दगी है रिवाज़ों के बस में
रिवाज़ों को तुम तोड़ना चाहते हो,

रिवाज़ों की परवाह ना रस्मों का डर है
तेरी आँख के फ़ैसले पे नज़र है
बला से अगर रास्ता पुर्खतर है
मैं इस हाथ को थामना चाहता हूँ,

सुनू ई नज्म..............................


Friday, 12 January 2018

गजल

कतौ भेटल नै
कतौ रूचल नै

जते लुटलहुँ हम

तते भोगल नै

हुनक गोष्ठीमे

सही बाजल नै

महंथक तागति

बहुत लागल नै

बताहे कहलक

कियो पागल नै

सभ पाँतिमे 122-22 मात्राक्रम अछि
। सुझाव सादर आमंत्रित अछि

Tuesday, 9 January 2018

गजल

नै उलहन कोनो नै उपराग तोरासँ
भरिसक बनतै दोसरके भाग तोरासँ

जियबै जिनगी हम माली बनिक' भमरासँ
सजतै ककरो मोनक जे बाग तोरासँ

पूरा हेतै से की सपनाक ठेकान
अभिलाषा छल जे सजितै पाग तोरासँ

तोंही छलही सरगम शुर ताल संगीत
छुछ्छे आखर रहने की राग तोरासँ

मेटा लेबै कुन्दन दुनियासँ अपनाक
रहतै जिनगीमे नै किछु दाग तोरासँ

222-222-221-221

© कुन्दन कुमार कर्ण

www.kundanghazal.com

गजल

घूसक संगे गबन करू
टिक्का चानन हवन करू

पीठक पाछू गारि बात
आगू अबिते नमन करू

हुनकर आँखि कोना उठल
जेन्ना तेन्ना दमन करू

किछु नै बँचतै दुनियाँमे
रमन चमन के जतन करू

छोट छोट या नमहर हो
जिम्मेदारी वहन करू

सभ पाँतिमे 22-22-22-2 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। सुझाव सादर आमंत्रित अछि।

Monday, 8 January 2018

अपने एना अपने मूँह-39

जुलाई २०१७मे कुल ७टा पोस्ट भेल जाहिमे कुंदन कुमार कर्णजीक ३ टा गजल, आशीष अनचिन्हारक १ टा बाल गजल, १टा गजल, १टा अपने एना अपने मूँह, १टा पोस्टमे भक्ति गजलक परिकल्पना अछि।

अगस्त २०१७मे कुल ७टा पोस्ट भेल जाहिमे जगदानंद झा मनुजीक १टा भक्ति गजल, कुंदन कुमार कर्णजीक १टा गजल, आशीष अनचिन्हारक ४टा गजल आ १टा हजल अछि।

सितम्बर २०१७मे कुल ९टा पोस्ट भेल जाहिमे कुंदन कुमार कर्णजीक ३टा गजल, आशीष अनचिन्हारक 6 टा गजल अछि।

अक्टूबर २०१७मे कुल ७टा पोस्ट भेल जाहिमे आशीष अनचिन्हारक ७टा गजल अछि।

नवम्बर २०१७मे कुल ३टा पोस्ट भेल जाहिमे आशीष अनचिन्हार ३टा गजल अछि।

दिसम्बर २०१७मे कुल १२टा पोस्ट भेल जाहिमे कुंदन कुमार कर्णजीक १टा गजल, आशीष अनचिन्हारक ९टा गजल, १टा विश्व गजलकार परिचय शृंखला आ १टा आलोचना अछि।

Friday, 5 January 2018

नरेन्द्रजीक मैथिली आ हिंदी गजलक तुलनात्मक विवेचना

एहिठाम समीक्षा लेल हम नरेन्द्रजीक मैथिली आ हिंदी गजलकेँ चुनलहुँ अछि। ई समीक्षा एकै गजलकारक दू भाषामे लिखल गजलक तुलना अछि। पहिने हम दूनू भाषाक गजल आ ओकर बहरक तक्ती ओ रदीफ-काफियाक समीक्षा करब तकर बाद भाव, कथ्य ओ भाषाक हिसाबसँ।

नरेन्द्रजीक चारि टा मैथिली गजल जे कि मिथिला दर्शनक Nov-Dec-16 अंकमे प्रकाशित अछि---

1

राज काज भगवान भरोसे
अछि सुराज भगवान भरोसे

मूलधनक तँ बाते छोड़ू
सूदि ब्याज भगवान भरोसे

खूब सभ्यता आयल अछि ई
लोक लाज भगवान भरोसे

देह ठठा कऽ करू किसानी
आ अनाज भगवान भरोसे

अपना भरि सब ब्योंत भिराऊ
किंतु भाँज भगवान भरोसे

एहि गजलक पहिल शेरक पहिल पाँतिमे आठ टा दीर्घ अछि। दोसर पाँतिमे आठ टा दीर्घ अछि। दोसर शेरक पहिल पाँतिमे सात टा दीर्घ आ एकटा लघु (तँ) अछि। हमरा लगैए शाइर तँ शब्दकेँ दीर्घ मानि लेने छथि जे कि गलत अछि। पं. गोविन्द झाजी अपन व्याकरणक पोथीमे एहन शब्दकेँ लघुए मानने छथि जे कि सर्वथा उचित तँइ एहि गजलमे सेहो ई लघु हएत। कोनो लघुकेँ दीर्घ मानि लेबाक परंपरा गजलमे तँ नै छै मुदा मैथिली गजलमे हमरा लोकनि संस्कृतक नियमक अनुसार अंतिम लघुकेँ दीर्घ मानै छी मुदा एहि गजलमे तँ बीचक लघुकेँ दीर्घ मानल गेल अछि जे दूनू परंपरा (गजल आ संस्कृत) हिसाबें गलत अछि। दोसर पाँतिमे आठ टा दीर्घ अछि। तेसर शेरक दूनू पाँतिमे आठ-ठ दीर्घ अछि। चारिम शेरक पहिल पाँतिमे सात टा दीर्घ आ एकटा लघु अछि (कऽ) एहिठाम हम दोसर शेरक पहिल पाँति लेल जे हम बात कहने छी तकरे बुझू। दोसर शेरमे आठ टा दीर्घ अछि। पाँचम शेरक दूनू पाँतिमे आठ-आठ टा दीर्घ अछि। एहि गजलक रदीफ "भगवान भरोसे" अछि आ काफिया "आ" ध्वनि संग "ज" वर्ण अछि जेना काज-सुराज, ब्याज, लाज, अनाज मुदा पाँचम शेरक काफिया अछि "भाँज" जे कि गलत अछि। "भाँज" केर ध्वनि "आँ" केर ज छै मुदा मतलामे "आ" ध्वनिक संग ज छै। तँइ पाँचम शेरक काफिया गलत अछि। ई गजल बहरे मीरपर आधारित अछि जाहिमे जकर नियम अछि जे "जँ कोनो गजलमे हरेक मात्रा दीर्घ हो तँ ओकर अलग-अलग लघुकेँ सेहो दीर्घ मानल जा सकैए। मुदा बहरे मीरक हिसाबसँ सेहो एहि गजलमे कमी अछि।

2

फोड़त आँखि दिवाली आनत
कान काटि कनबाली आनत

अहींक हाथ पयर कटबा लय
टाका टानि भुजाली आनत

देश प्रेम केर डंका पीटत
केस मोकदमा जाली आनत

पेट बान्हि कऽ करू चाकरी
एहने आब बहाली आनत

पूरा पूरी दान चुका कऽ
सबटा डिब्बा खाली आनत

एहि गजलक पहिल आ दोसर शेरक हरेक पाँतिमे आठ-आठ टा दीर्घ अछि। तेसर शेरक पहिल पाँतिमे एकटा लघु फाजिल अछि तेनाहिते दोसर पाँतिमे सेहो एकटा लघु फाजिल अछि। चारिम शेरक पहिल पाँतिमे छह टा दीर्घ आ दू टा लघु अछि। कऽ शब्दक विवेचना उपर जकाँ रहत। दोसर पाँतिमे "ए" शब्दकेँ लघु मानि लेल गेल अछि जे कि हमरा हिसाबें उचित नै। पाँचम सेरक पहिल पाँतिमे सात टा दीर्घ आ एकटा लघु अछि। कऽ लेल उपरके विवेचना देखू। दोसर पाँतिमे आठ टा दीर्घ अछि। एहि गजलक काफिया ठीक अछि। ई गजल बहरे मीरपर आधारित अछि जाहिमे जकर नियम अछि जे "जँ कोनो गजलमे हरेक मात्रा दीर्घ हो तँ ओकर अलग-अलग लघुकेँ सेहो दीर्घ मानल जा सकैए। मुदा बहरे मीरक हिसाबसँ सेहो एहि गजलमे कमी अछि।

3

लाख उपलब्धिसँ ओ घेरा गेल अछि
बस हृदय आदमी के हेरा गेल अछि

सब समाजक चलन औपचारिक बनल
लोक संबंधसँ आन डेरा गेल अछि

सबटा चेहरा बनौआ अपरिचित जकाँ
मूल चेहरा ससरि कऽ पड़ा गेल अछि

भोरसँ साँझ धरि फूसि पर फूसि थिक
लोक अपने नजरिसँ धरा गेल अछि

देशक सोना पाँखि बनत एक दिन
फेर अनचोके मे ई फुरा गेल अछि

एहि गजलक पहिल शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 2122-1122-2212 अछि आ दोसर पाँतिक मात्राक्रम 2122-1222-2212 अछि। दोसर शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 2122-1221-2212 अछि आ दोसर पाँतिक मात्राक्रम 2122-1121-22212 अछि। तेसर शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 2121-2122-12212 अछि आ दोसर पाँतिक मात्राक्रम 2121-2122-12212 अछि। चारिम शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 211212212212 अछि आ दोसर पाँतिक 212212112212 अछि। पाँचम शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 22222112212 अछि आ दोसर पाँतिक 212222212212 अछि। एहि गजलक तेसर, चारिम आ पाँचम शेरक काफिया गलत अछि। एहि गजलकेँ हमरा बहरेमीरपर मानबासँ आपत्ति अछि आ से किए ई पाटक लोकनि मात्राक्रम जोड़ि देखि सकै छथि जे अलग-अलग लघु जोड़लाब बादो लघु बचि जाइत छै। तँइ हमरा आपत्ति अछि संगे-संग ई गजल आर कोनो बहरपर आधारित नै अछि सेहो स्पष्ट अछि।

4

डिब्बा सन सन शहरक घर अछि
पानि हवा मे मिलल जहर अछि

गाम जेना बेदखल भऽ रहल
बाध बोन धरि घुसल शहर अछि

आजुक युगमे कोना पकड़बै
चोर साधु मे की अंतर अछि

देश बनल शो केश बजारक
जनतंत्रक बेजोड़ असर अछि

अजब दौर अछि लक्ष्य निपत्ता
दिशा हीन ई भेड़ सफर अछि

मतलाक दूनू पाँतिमे आठ टा दीर्घ अछि। दोसर शेरक पहिल पाँतिमे आठ टा दीर्घ आ एकटा लघु अछि। दोसर पाँतिमे आठ टा दीर्घ अछि। तेसर शेरक पहिल पाँतिमे आठ टा दीर्घ आ एकटा लघु अछि। दोसर पाँतिमे आठ टा दीर्घ अछि। चारिम आ पाँचम शेरक दूनू पाँतिमे आठ आठ टा दीर्घ अछि। एहि गजलमे आएल "भेड़ सफर" शब्द युग्मपर आगू चलि भाषा खंडमे चर्चा हएत। ई गजल बहरे मीरपर आधारित अछि जाहिमे जकर नियम अछि जे "जँ कोनो गजलमे हरेक मात्रा दीर्घ हो तँ ओकर अलग-अलग लघुकेँ सेहो दीर्घ मानल जा सकैए। एहि गजलक मतलाक पहिल पाँतिक काफिया "घर" केर उच्चारण हिंदी सन कएल जाए तखने सही हएत अन्यथा मैथिली उच्चारण हिसाबें गलत हएत। बाद बाँकी शेरक काफिया मतलाक काफियापर निर्भर करत तँइ ओकर विवेचना हम नै क' रहल छी।

नरेन्द्रजीक चारि टा हिंदी गजल जे कि हुनक फेसबुकक वालसँ लेल गेल अछि----

1

यह जो चौपट यहां का राजा है
कुछ नहीं वक़्त का ताकाजा है

हम लड़ाई से बहुत डरते हैं
क्यूं कि कुछ घाव अभी ताजा है.

देश उनके लिए खिलौना है
हमको इस बात का अन्दाजा है

जैसे चाहे इसे बाजाते हैं
गोकि जनतंत्र एक बाजा है

अब उठा है तो धूम से निकले
यारो आशिक का ये जनाजा है

एहि गजलक पहिल पहिल आ दोसर दूनू शेरक  शेरक मात्राक्रम 2122-12-1222 अछि। एहि शेरक दोसर पाँतिमे शायद टाइपिंग गलती छै तँइ सही शब्द "तकाजा" हम मानलहुँ अछि। दोसेर शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 2122-12-1222 आ दोसर पाँतिक मात्राक्रम 2122-112222 अछि।  तेसर शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 2122-12-1222 अछि आ दोसर पाँतिक मात्राक्रम 2122-12-2222 अछि। चारिम शेरक पहिल आ दोसर दूनू शेरक मात्राक्रम 2122-12-1222 अछि। एहि शेरक दोसर पाँतिमे शायद टाइपिंग गलती छै तँइ सही शब्द "बजाते" हम मानलहुँ अछि। पाँचम शेरक दूनू पाँतिक मात्राक्रम 2122-12-1222 अछि। बहरमे जतेक मान्य छूट छै से लेल गेल अछि। कुल मिला देखी तँ एहि गजलक दूटा शेर बहरसँ खारिज अछि (दोसर आ तेसर)। एहि गजलमे काफिया ठीकसँ पालन भेल अछि।

2

क़यामत ऐन अब दालान पर है
नज़र दुनिया की रौशनदान पर है.

न जाने रौशनी आयेगी कब तक
अभी तो तीरगी परवान पर है.

पिघल जाता है उनके आँसुओं पर
मेरा गुस्सा दिले नादान पर है.

शगल उनके लिए है शायरी भी
मगर मेरे लिए तो जान परहै.

मुहब्बत की वकालत करने वाला
अभी नफ़रत की इक दूकान पर है.

एहि गजलक हरेक शेरक हरेक पाँतिमे 1222-1222-122 मात्राक्रम अछि। बहरमे जतेक मान्य छूट छै से लेल गेल अछि। एहि गजलक काफिया सेहो ठीक अछि।

3

बाढ़ में लोग बिलबिलाते हैं
रहनुमा बाढ़ को भुनाते हैं

घोषणाओं पे घोषणाएं हैं
नाव वह काग़ज़ी चलाते हैं

इस तरफ़ भुखमरी का आलम है
और वह आँकड़े गिनाते हैं

फंड जो भी जहां से आता है
ख़ुद ही वो बाँट करके खाते हैं

साल दर साल बाढ़ आ जाये
दरअसल ये ही वो मनाते हैं

एहि गजलक हरेक शेरक हरेक पाँतिमे 2122-12-1222 मात्राक्रम अछि। बहरमे जतेक मान्य छूट छै से लेल गेल अछि। एहि गजलक काफिया सेहो ठीक अछि।

4

आकाश से टपके हुए किरदार नहीं हैं
हम भी मक़ीन हैं किरायेदार नहीं हैं |

उनके इरादों की भी मालूमात है हमें
ऐसा नहीं कि हम भी ख़बरदार नहीं हैं

वह नाम हमारा मिटायेंगे कहाँ कहाँ
बुनियाद की हम ईंट हैं दीवार नहीं हैं |

इंसान हैं अपनी हदों का इल्म है हमें
हम आपके जैसा कोई अवतार नहीं हैं |

हम अपनी मुहब्बत की नुमाइश नहीं करते
रिश्ते निभाते हैं दुकानदार नहीं हैं |

पढ़ना ही अगर हो तो पढ़ो इत्मीनान से
अदबी किताब हैं कोई अख़बार नहीं हैं |

एहि गजलक पहिल शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 2212-2212-221122 अछि। दोसर पाँतिक मात्राक्रम 2212-1212-221122 अछि। दोसर शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 2212-2212-221212 अछि। दोसर पाँतिक मात्राक्रम 2212-122-122-1122 अछि। बहरमे जतेक मान्य छूट छै से लेल गेल अछि मुदा तइ बादो ई गजल बहरमे नै अछि। मतलाक दूनू शेरेमे एकरूपता नै अछि। तँइ हम मात्र दू शेरक तक्ती केलहुँ अछि बाद-बाँकी शेरक विवेचना पाठक बुझिये गेल हेता। काफिया सेहो गलते अछि।


बहरक हिसाबसँ नरेन्द्रजीक गजल-- 

चारू मैथिली गजलकेँ देखल जाए तँ ई स्पष्ट अछि जे नरेन्द्रजी अधिकांशतः बहरे मीरपर आश्रित छथि आ ताहूमे कतेको ठाम हूसल छथि। जखन कि बहरे मीर बहुत आसान बहर छै आ एहि बहरमे छूट बहुत छै। तेनाहिते जँ चारू हिंदी गजलक बहरकेँ देखल जाए ई स्पष्ट होइए जे नरेन्द्रजी बहरे मीरक अतिरिक्त आन बहर सभपर सेहो हाथ चलबै छथि आ ओहूमे कतेको स्थानपर हूसल छथि। तथापि ई उल्लेखनीय जे आनो बहरपर ओ गजल लीखि सकै छथि। नरेन्द्रजी मैथिली-हिंदीक देल उपर बला गजलक बहर संबंधमे हमर ई स्पष्ट मान्यता अछि जे नरेन्द्रजी मात्र लयकेँ बहर मानि लै छथि जखन कि लय आ बहरमे अंतर छै। लय मने गाबि कऽ, गुनगुना कऽ। लयपर लिखलासँ केखनो बहर सटीक भैयो सकैए आ केखनो नहियो भऽ सकैए।
बहर ओ काफियाक आधारपर नरेन्द्रजीक गजलकेँ एकै बेरमे हम गलत नै कहि सकै छी कारण मैथिलीक कथित गजलकार सभसँ बेसी मेहनति नरेन्द्रजी अपन गजलमे केने छथि आ जँ ई थोड़बे मेहनति करतथि वा करता तँ हिनक गजल एकटा आदर्श गजल भऽ सकैए। ओना एहि बातक संभावना कम जे ओ एहि तथ्यकेँ मानताह। करण वएह जिद जे व्याकरण कोनो जरूरी नै छै। रचनामे भाव प्रमुख होइत छै आदि-आदि। मैथिलीमे नरेन्द्रजीक गजल अपन पीढ़ीक अधिकांश गजलकार (सरसजी, तारानंद वियोगी, रमेश, देवशंकर नवीन एवं ओहने गजलकार) सभसँ बेसी ठोस गजल छनि से मानबामे हमरा कोनो शंका नै मुदा बहर ओ काफियाक हिसाबें पूरा-पूरी सही नै छनि (मने नरेन्द्रजी मात्र अपन समकालीनसँ आगू छथि)।  एहिठाम हम नरेन्द्रजीक चारि-चारि टा गजल लेलहुँ मुदा आन ठाम हुनक प्रकाशित वा हुनक फेसबुकपर प्रकाशित मैथिली आ हिंदी गजलक अनुपातसँ ई स्पष्ट अछि जे नरेन्द्रजी मैथिलीमे मात्र संपादकक आग्रहपर गजल लिखै छथि। मने मैथिली गजल हुनकर ध्येय नै छनि। अइ बादों आश्चर्य जे हिंदी गजलमे हुनकर कोनो विशेष स्थान नै छनि। ई बात हम एकटा हिंदी गजल पाठकक तौरपर कहि रहल छी। हुनकर समूहक किछु लोक हुनका भने बिहारक हिंदी गजलकारक लिस्टमे दऽ दौन मुदा वास्तविकता इएह जे हिंदी गजल संसारमे नरेन्द्रजीक कोनो स्थान नै छनि। आ एकरा मात्र राजनीति नै कहल जा सकैए। हिंदी गजलमे एहतराम इस्लाम, नूर मुहम्मद नूर, जहीर कुरैशी सभ पुरान छथि एवं नवमे गौतम राजरिषी, स्वपनिल श्रीवास्तव, वीनस केसरी, मयंक अवस्थी आदि अपन स्थान बना लेला मुदा की करण छै जे नरेन्द्रजी असफल रहि गेला। हम फेर कहब जे हरेक चीजमे राजनीति नै होइ छै। हिंदी गजलक नव शाइर गौतम राजरिषी, स्वपनिल श्रीवास्तव, वीनस केसरी, मयंक अवस्थी आदिक पाछू कोनो संपादकक हाथ नै छलनि मुदा नीक लिखलासँ कोन संपादक नै छापै छै। आ हिनकर सभहँक सभ गजल व्याकरण ओ भाव दृष्टिसँ संतुलित रहै छनि आ तँइ ई सभ बहुत कम समयमे हिंदी गजलमे अपन स्थान बना लेला मुदा नरेन्द्रजी नै बढ़ि सकला आ ताहि लेल मात्र हुनक बहर ओ व्याकरण नै पालन करबाक जिद जिम्मेदार छनि। मैथिली गजलमे तँ ई अपन समकालीन गजलकारसँ आगू बढ़ि जेता मुदा ई हिंदीमे पिछड़ले रहता कारण ओहिठाम बहर सेहो देखल जाइ छै जखन कि मैथिली गजलमे बहर देखानइ आब शुरू भेलैए।

किछु एहन बात जे कि प्रायः हम, सभ आलोचनामे कहैत छियै " मैथिलीक अराजक गजलकार सभ हिंदीक निराला, दुष्यंत कुमार आ उर्दूक फैज अहमद फैज केर बहुत मानै छथि। एकर अतिरिक्तो ओ सभ अदम गोंडवी मुन्नवर राना आदिकेँ मानै छथि। मैथिलीक अराजक गजलकार सभहँक हिसाबें निराला, दुष्यंत कुमार आ फैज अहमद फैज सभ गजलक व्याकरणकेँ तोड़ि देलखिन मुदा ई भ्रम अछि। सच तँ ई अछि जे निराला मात्र विषय परिवर्तन केला आ उर्दू शब्दक बदला गजलमे हिंदी शब्दक प्रयोग केला, तेनाहिते दुष्यंत कुमार इमरजेन्सीक विरुद्ध गजल रचना क्रांतिकारी रूपें केलथि। फैजकेँ साम्यवादी विचारक गजल लेल जानल जाइत अछि। मुदा ई गजलकार सभ विषय परिवर्तन केला आ समयानुसार शब्दक प्रयोग बेसी केला। एहिठाम हम किछु हिंदी गजलकारक मतलाक तक्ती देखा रहल छी ( जे-जे मतला हम एहिठाम देब तकर पूरा गजल ओ पूरा तक्कती हमर पोथी मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहासमे देखि सकै छी)---

सूर्यकांत त्रिपाठी निरालाजीक एकटा गजलक मतला देखू--

भेद कुल खुल जाए वह सूरत हमारे दिल में है
देश को मिल जाए जो पूँजी तुम्हारी मिल में है

मतला (मने पहिल शेर)क मात्राक्रम अछि--2122+2122+2122+212 आब सभ शेरक मात्राक्रम इएह रहत। एकरे बहर वा की वर्णवृत कहल जाइत छै। अरबीमे एकरा बहरे रमल केर मुजाइफ बहर कहल जाइत छै। मौलाना हसरत मोहानीक गजल “चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है” अही बहरमे छै जकर विवरण आगू देल जाएत। ऐठाँ ई देखू जे निराला जी गजलक विषय नव कऽ देलखिन प्रेमिकाक बदला विषय मिल आ पूँजी बनि गेलै मुदा व्याकरण वएह रहलै।

आब हसरत मोहानीक ई प्रसिद्ध गजलक मतला देखू---

चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है

एकर बहर 2122+2122+2122+212 अछि।

आब दुष्यंत कुमारक ऐ गजलक मतलाक तक्ती देखू---

हो गई है / पीर पर्वत /सी पिघलनी / चाहिए,
इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए।

एकर बहर 2122 / 2122 / 2122 / 212 अछि।

फैज अहमद फैज जीक ई गजलक मतला देखू--

शैख साहब से रस्मो-राह न की
शुक्र है ज़िन्दगी तबाह न की

एहि मतलाक बहर 2122-1212-112 अछि।

आब कने अदम गोंडवी जीक एकटा गजलक मतलाक तक्ती देखू—

ग़ज़ल को ले / चलो अब गाँ / व के दिलकश /नज़ारों में
मुसल्सल फ़न / का दम घुटता / है इन अदबी / इदारों में

एकर बहर 1222 / 1222 / 1222 / 1222 अछि।

एहिठाम हम ई मात्र भाव ओ कथ्यसँ संचालित गजलकारक कुतर्कसँ बँचबा लेल देलहुँ अछि। जखन दुष्यंत कुमार सन क्रांतिकारी गजलकार बहर ओ व्याकरणकेँ मानै छथि तखन नरेन्द्रजी वा आन कथित क्रांतिकारीकेँ व्याकरणसँ कोन दिक्कत छनि सेनै जानि।



भाव, कथ्य, विषय ओ भाषाक हिसाबसँ नरेन्द्रजीक गजलक सीमा---

उप शीर्षकमे "सीमा" एहि दुआरे लिखलहुँ जे  भाव, कथ्य ओ विषय लेल कोनो रोक-टोक नै छै जे इएह विषयपर लिखल जेबाक चाही वा ओहि विषयपर नै लिखल जेबाक चाही। अइ ठाम देल गेल नरेन्द्रजीक मैथिली-हिंदी गजलक भाव ओ भाषासँ स्पष्ट भेल हएत जे नरेन्द्रजी चाहे मैथिलीमे लिखथि वा हिंदीमे हुनकर विषय मार्क्सवादी विचारधाराक आगू पाछू रहैत छनि। ओना ई खराप नै छै मुदा दुनियाँ बहुत रास "भूख"सँ संचालित छै चाहे ओ पेटक हो, जाँघक हो कि धन, यश केर हो। जतबे सच पेटक भूख छै ततबे आन भूख सेहो। तँइ एकटा भूखक साहित्यकेँ नीक मानल जाए आ दोसर भूखकेँ खराप से उचित नै। नरेन्द्रजीकेँ सेहो कोनो विपरीत लिंगी आकर्षित केने हेथनि आ कोहबरमे हुनकर करेज सेहो धक-धक केने हेतनि। ओना विचारधाराकेँ महान बनेबा लेल ओ कहि सकै छथि जे ने हमरा कोनो विपरीत लिंगी आकर्षित केलक आ ने कोबरमे करेज धक-धक केलक। ई हुनकर सीमा सेहो छनि हुनकर विचारधाराक सेहो। अइ ठाम एकटा महत्वपूर्ण प्रश्न राखए चाहब जे नरेन्द्रजी वा हुनके सन क्रांतिकारी गजलकार सभ व्याकरणक ई कहि विरोध करै छथि जे व्याकरण कट्टरताक प्रतीक थिक मुदा आश्चर्य जे विषय ओ भावक मामिलामे नरेन्द्रजी वा हुनके सन गजलकार सभ कट्टर छथि। हमरा जतेक अनुभव अछि ताहि हिसाबसँ हम कहि सकैत छी कथित रूपसँ छद्म मार्क्सवादी सभ दोहरा बेबहार करै छथि अपन जीवन ओ साहित्यमे। व्याकरणक कट्टरताक विरोध आ विषय ओ भावक कट्टरताक पालन इएह दोहरा चरित्र थिक। एकै कथ्यपर कोनो विधाक रचना लिखलासँ ओहिमे दोहराव केर खतरा तँ होइते छै संगे संग पाठक इरीटेट सेहो भ' जाइत छै। कोनो रचना जखन पाठके लेल छै तखन पाठकक रुचिक अवमानना किए? हँ एतेक सावधानी लेखककेँ जरूर रखबाक चाही जे पाठकक अवांछित माँग जेना अश्लीलता, दंगा पसारए बला रचना नै लीखथि। एक बेर फेर हम हिंदीक संदर्भमे कहए चाहब जे हिंदी गजलक कथ्य बहुत विस्तृत छै। हिंदी गजलमे साम्यवादी विचारधारा बला गजलक अतिरिक्त आनो विषयपर गजल छै आ हमरा हिसाबें नरेन्द्रजी हिंदी गजलमे नै बढ़ि सकला आ ताहि लेल बहर ओ व्याकरण संग एकै कथ्यपर लिखबाक जिद सेहो जिम्मेदार छनि। एहिठाम देल नरेन्द्रजीक मैथिलीक चारिम गजलमे  "भेड़ सफर" मैथिलीमे अवांछित प्रयोग अछि। नरेन्द्रजीक भाषा प्रयोग खतरनाक अछि। हम जानै छी जे एना लिखलासँ लोक हमरा शुद्धतावादी मानए लागत मुदा हम ई चिंता छोड़ि लिखब जे हरेक भाषामे आन भाषाक शब्दक प्रयोग हेबाक चाही मुदा एकर मतलब नै जे सभ शब्दक प्रयोग मान्य भऽ जेतै। उदाहरण दैत कही जे मैथिलीमे "वफा" शब्द प्रचलित नै अछि मुदा "वफादार" शब्द बहुप्रचलित अछि। एहिठाम प्रश्न उठैत अछि जे जखन वफा शब्दक प्रचलन नै तखन वफादार कोना प्रचलित भेल। ई बात शुद्ध रूपसँ आम जनताक बात छै। आम जनताक जीह आ संदर्भमे "वफा" शब्द नै आबि सकलै जखन कि वफादार उच्चारणक हिसाबसँ आ संदर्भक हिसाबसँ प्रयोग होइत रहल अछि।

निष्कर्ष--- नरेन्द्रजी गजल बहर ओ काफियाक हिसाबसँ दोषपूर्ण तँ अछि मुदा मैथिलीक अपन समकालीन ओ परवर्ती गजलकार यथा सरसजी, रमेश, तारानंद वियोगी, विभूति आनंद, कलानंद भट्ट, सुरेन्द्रनाथ, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, राजेन्द्र विमल संगे एहने आन गजलकार सभसँ बेसी ठोस अछि। हिनक हिंदी गजल सभ सेहो बहर ओ काफियाक हिसाबसँ दोषपूर्ण अछि आ ओहिठाम हिनकासँ पहिने बहुत रास व्याकरण ओ भाव बला गजलकार अपन मूल्याकंन लेल प्रतीक्षारत छथि तँइ हिंदी गजलमे हिनकर टिकब बहुत मोश्किल छनि। विश्वास नै हो तँ हिंदी गजलक गंभीर पाठक बनि देखि लिअ। जँ नरेन्द्रजी व्याकरण पक्षकेँ सम्हारि लेथि आ आनो विषयपर गजल कहथि तँ निश्चित ई बहुत दूर आगू जेता। आ जेना कि उपरक विवेचनसँ स्पष्ट अछि जे हिनका बेसी मेहनति नै करबाक छनि। किछु अहम् ओ व्याकरणकेँ हेय बुझबाक चक्करमे हिनक नीको गजल दूरि भेल अछि। ओना हम उपरे आशंका बता देने छी जे आने कथित क्रांतिकारी जकाँ ईहो व्याकरणकेँ बेकार मानता।

नोट---- 1) एहि समीक्षामे जतेक संदर्भ लेल गेल अछि से हमर पोथी "मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास"सँ लेल गेल अछि तँइ कोनो प्रकारक संदर्भ जेना पं गोविन्द झाजीक कोन पोथीक कोन पृष्ठपर चंद्रबिंदु युक्त स्वर लघु होइत छै आदि जनबाक लेल ओहि पोथीकेँ पढ़ू।
2) बहरक तक्तीमे जँ कोनो असावधानी भेल हो तँ पाठक सभ सूचित करथि। हम ओकरा सुधारब।

Saturday, 30 December 2017

गजल

अइ संसारकेँ अनकासँ मतलब
आ हमरा छलै अपनासँ मतलब 

पूल बनाउ नदी महानदीपर 
कातक धारकेँ लचकासँ मतलब 

भेटै आशीर्वाद या कि सराप 
छै भगताकेँ देवतासँ मतलब

भूआ पसरल जमीनपर तैयो
सिंगरहारकेँ खसबासँ मतलब 

जकरा लग कियो नै अनचिन्हार
अनचिन्हारकेँ तकरासँ मतलब



सभ पाँतिमे 222-222-222 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछिसुझाव सादर आमंत्रित अछि

Wednesday, 27 December 2017

गजल

झाँपल गेलै सत्य वचन
बारल गेलै सत्य वचन

भोरे एलै औफिसमे
थाकल गेलै सत्य वचन

चारू कातक योजनासँ
छाँटल गेलै सत्य वचन

झुट्ठा सभहँक पौतीमे
साँठल गेलै सत्य वचन

ब्रह्मस्थानक वेदीपर
आनल गेलै सत्य वचन

सभ पाँतिमे मात्राक्रम 22-22-22-2 अछि। दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। सुझाव सादर आमंत्रित अछि।

Saturday, 23 December 2017

गजल

माला बैसल तड़िखानामे
ठोपो ढ़ूकल तड़िखानामे

चिखना देखि कऽ लबनी देखि कऽ
पंडित नाचल तड़िखानामे

पूरा दुनियाँमे मरि गेलै
जीवन बाँचल तड़िखानामे

चानन घसलहुँ ठाँओ निपलहुँ
हारो गाँथल तड़िखानामे

बड़ दिनक बाद अनचिन्हारो
अपने लागल तड़िखानामे

सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। सुझाव सादर आंत्रित अछि।

विश्व गजलकार परिचय शृंखला-8

बहुत काल एहन होइत छै जे बेमतलबक भारी अवाजक भीड़मे हल्का अवाज हेड़ा जाइत छै। हिंदी गजलमे सभसँ बड़का बेमारी छै जे जाहि गजलमे खाली अमीर-गरीब,लाल झंडा आदिक उल्लेख रहै छै तकरा महान मानि लेल जाइ छै। ई बेमारी किछु हद धरि मैथिली गजल संसारमे सेहो अछि। एहि लिस्टमे हम दुष्यंत कुमारक नाम नै राखब कारण दुष्यंत कुमार अपन गजलमे एहि प्रतीक सभहँक प्रयोग केलथि तँ व्यावहारिक रूपसँ इमरजेन्सीमे सरकारक विरोध सेहो केलथि। हमरा ओहन शाइरसँ किछु ने कहबाक अछि जे कि खाली लिखित शब्दसँ अपनाकेँ महान बनबाक प्रयास करै छथि। चूँकि हिंदीमे खाली लिखित शब्दक अधारपर महान बनबाक परंपरा अछि (दुष्यंत सनकेँ छोड़ि) तँइ गजलक मूल स्प्रिट पकड़ए बला गजलकार पं. कृष्णानंद चौबे केर नाम हिंदी गजलसँ हेड़ा गेल। हम पं. कृष्णानंद चौबेकेँ अपन प्रिय गजलकारमेसँ एकटा मानै छी। आउ आइ हम सभ हुनक परिचय प्राप्त करी आ हुनक किछु गजल पढ़ी--

नाम-- पं. कृष्णानंद चौबे



जन्म- 5-8-1933 फर्रुखाबद
मृत्यु- 14-13-2010 (कानपुर)
शिक्षा-स्नातक
1953सँ 1960 धरि बनारससँ प्रकाशित "अमृत पत्रिका" दैनिकमे उपसंपादक। 1961सँ 1980 धरि उद्योग निदेशालय, कानपुरमे "इंडस्ट्रीज न्यूज लेटर" केर संपादन। 1990मे सेवानिवृत। आ ओकर बाद मृत्यु धरि दैनिक जागरण कानपुरसँ संबंध रहला।गजलक अतिरिक्त, हास्य-व्यंग्य, गीत, समीक्षा आदि लिखैत रहला।
गजल संग्रह -- परिंदें क्यों नहीं लौटे

1

आपका मक़सद पुराना है मगर खंज़र नया
मेरी मजबूरी है मैं लाऊँ कहाँ से सर नया

मैं नया मयक़श हूँ मुझको चाहिये हर शै नयी
एक मयख़ाना नया, साक़ी नया, साग़र नया

देखता हूँ तो सभी घर मुझको लगते हैं नये
सोचता हूँ तो नहीं लगता है कोई घर नया

देखिये घबरा न जाये तालियों के शोर में
आज पहली बार आया है ये जादूगर नया

हम किसी सूरत किसी के हाथ बिक सकते नहीं
चाहे वो ताज़िर पुराना हो या सौदागर नया

मेरा शीशे का मकाँ तामीर होने दीजिये
हर किसी के हाथ में आ जायेगा पत्थर नया

2

मंदिरों में आप मनचाहे भजन गाया करें
मैक़दा ये है यहाँ तहज़ीब से आया करें

रात की ये रौनक़ें अपने मुक़द्दर में नहीं
शाम होते ही हम अपने घर चले जाया करें

साथ जब देता नहीं साया अंधेरे में कभी
रौशनी में ऐसी शय से क्यों न घबराया करें

बन्द रहते हों जो अक्सर आम लोगों के लिये
अपने घर में ऐसे दरवाज़े न लगवाया करें

ये हिदायत एक दिन आयेगी हर स्कूल में
मुल्क़ की तस्वीर बच्चों को न दिखलाया करें

क्यों नहीं आता है इन तूफ़ानी लहरों को शऊर
कम से कम काग़ज़ की नावों से न टकराया करें

3

न मिलने का वादा, न आने की बातें
कहाँ तक सुनें दिल जलाने की बातें

हमेशा वही सर झुकाने की बातें
कभी तो करो सर उठाने की बातें

कोई इस ज़माने की कहता नहीं है
सुनाते हो अपने ज़माने की बातें

कहाँ तक सुने कोई इन रहबरों की
हथेली पे सरसों उगाने की बातें

तरस खायेंगी बिजलियाँ भी यक़ीनन
जो सुन लें कभी आशियाने की बातें

अजब-सी लगे हैं फ़क़ीरों के मुँह से
किसी हूर की या ख़ज़ाने की बातें

कभी जो हुईं थीं हमारी-तुम्हारी
वो बातें नहीं हैं बताने की बातें

4

इधर भटके, उधर भटके, भटक कर लौट आये हैं
वो भूले सुब्ह के थे शाम को घर लौट आये हैं

यहाँ से जो गये थे सिर्फ़ बुनियादों के मक़सद से
वहाँ आपस में टकराकर वो पत्थर लौट लाये हैं

तेरी जन्नत मुबारक़ हो तुझे या शेख़ साहब को
ख़ुदा के नाम हम तहरीर लिखकर लौट आये हैं

चले जायेंगे फिर इक बार उनके कुछ न कहने को
हमारा क्या है हम उस दर से अक्सर लौट आये हैं

सभी हैरान हैं आख़िर परिन्दे क्यों नहीं लौटे
ज़मीं पर उनके बस टूटे हुए पर लौट आये हैं

हमारे दिन भी कैसे हैं, गये तो फिर नहीं आये
कई लोगों के अच्छे दिन भी अक्सर लौट आये हैं

क़लम जिनको किया था साफ़गोई के लिये तुमने
मेरी ग़ज़लों की सूरत में वही सर लौट आये हैं

5

ज़िन्दगी के फलसफ़े में अब न उलझाना मुझे
ख़ुद समझ लेना तो उसके बाद समझाना मुझे

मेरी दिन भर की उदासी को समझ लेता है वो
शाम होते ही बुला लेता है मयख़ाना मुझे

आईना भी अब मुझे कुछ अजनबी लगने लगा
अपने ही चेहरे से कहता हूँ कि पहचाना मुझे

आज फिर कुछ बस्तियाँ जलती नज़र आईं मुझे
आज फिर लिखना पड़ेगा एक अफ़साना मुझे

बदहवासी देखिये साक़ी ने यूँ बाँटी शराब
मेरा पैमाना उसे और उसका पैमाना मुझे

इन दिनों तो मुझको तिनके का सहारा भी नहीं
दोस्तो सैलाब की ज़द में न ले जाना मुझे

आज उसकी याद फिर चुपके से दिल में आ गई
आज कुछ आबाद-सा लगता है वीराना मुझे



विश्व गजलकार परिचय शृंखलाक अन्य भाग पढ़बाक लेल एहि ठाम आउ--  विश्व गजलकार परिचय 


Friday, 22 December 2017

गजल

भुज्जा चिखना ताड़ी आ पासी चाही
हमरा तड़िखाना चाही लबनी चाही

हुनका भेटनि बड़का बड़का इनाम
बस हमरा छोट छीन बदनामी चाही

हम बोर भ' गेलहुँ चिक्कन चुनमुन खुशीसँ
हमरा किछु लेढ़ाएल उदासी चाही

तों ल' ले दछिनामे पूरा दुनियाँ मुदा
हमरा खाली हुनकर जजमानी चाही

खाली पहनावा बदलल छै इच्छा नै
हुनका राजा आ हमरा दासी चाही

सभ पाँतिमे 222 222 222 22 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। सुझाव सादर आमंत्रित अछि।

Wednesday, 20 December 2017

बयानक संदर्भमे मैथिली गजल

हरेक भाषा साहित्यिक हरेक विधासँ संबंधित बयान अबैत रहैत छै आ ई स्वाभाविक छै। बयान दूनू तरहँक मने सकारात्मक ओ नकारात्मक रहैत छै। मैथिली गजल लेल सेहो समय- समयपर बयान अबैत रहलैक अछि। जँ छोट-मोट बयानकेँ छोड़ि देल जाए तँ मैथिली गजलमे मुख्यतः तीन-चारि टा बयान अछि जे कि अपना समयमे मैथिली गजलकेँ आन्दोलित केलक। पहिल प्रो. आनंद मिश्रजीक बयान, दोसर रमानंद झा रमणजीक बयान, तेसर रामदेव झाजीक बयान आ चारिम मायानंद मिश्रजीक बयान, हम एहिठाम चारू गोटाक बयान राखब आ ओकर विश्लेषण करब एहि विश्लेषणसँ पहिने कहि दी जे ई सभ बयान ओहन-ओहन रचना वा पोथीपर आधारित अछि जे कि प्रकाशित भेल। बहुत रास एहन शाइर जे कि प्रकाशनमे रुचि ने छलनि वा जिनका संपादक कात कऽ दै छलखिन (जेना विजयनाथ झा ओ योगानंद हीराजीक गजलकेँ संपादक सायास नै छापै छलखिन तिनकर सभहँक गजलकेँ एहि बयान देबा कालमे धेआन नै राखल गेल अछि)। ईहो बात धेआनमे राखब जरूरी जे ई बयान सभ मधुपजी, कविवर सीताराम झाजीक वा पं.जीवन झाजीक गजलकेँ बिना व्याकरणपर नपने देल गेल अछि। जँ ई सभ बयान देबासँ पहिने मधुपजी, कविवर सीताराम झाजीक, पं.जीवन झाजीक, विजयनाथ झाजी वा योगानंद हीराजीक गजलकेँ व्याकरणक हिसाबें देखने रहितथि तँ संभवतः हिनक बयान सभ किछु अलग रहैत। तँइ एहि बयान सभकेँ समग्र तँ नै मानल जा सकैए मुदा ओहि अधिकांश गजलक प्रतिनिधित्व तँ करिते अछि जे ओहि कालखंडमे अधिकांश गजलकार द्वारा लिखल गेल। एहि बयान सभहँक विश्लेषणकेँ हम ओहि कालखंडसँ जोड़ि कऽ देखि रहल छी जाहिकालमे ई बयान देल गेल रहै। वस्तुतः इएह सही तरीका छै कोनो तथ्यकेँ जनबाक लेल। तँ देखी बयान आ ओकर विश्लेषण ------

1) प्रो. आनंद मिश्रजीक हिसाबें मैथिलीमे गजल संभव नहि (संदर्भ- 2015 मे मोहन यादवजीक गजल संग्रह "जे गेल नहि बिसरल"मे उदयचंद्र झा विनोदजीक भूमिका। संभवतः ई बयान 1980-85 बीचक अछि)---एहि बयानक मूल रूप हमरा लग नै अछि। तँइ एहि बयानकेँ दू रूपमे लऽ रहल छी। पहिल तँ जे देने छी मने "मैथिलीमे गजल संभव नै"। ई बयान निश्चित रूपें ओहि समयक जे गजलकार सभ सक्रिय छलाह जेना सुधांशु शेखर चौधरी, गोपेश, मायानंद मिश्र, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, केदार नाथ लाभ, कलानंद भट्ट, सियाराम झा सरस, महेन्द्र, छात्रानंद सिंह झा, तारानंद वियोगी, राम चैतन्य धीरज, केदार कानन, रमेश, विभूति आनंद आदिक गजल सभकेँ देखि कऽ देल गेल अछि। जँ हिनकर सभहँक गजल देखल जाए तँ  प्रो. आनंद मिश्रजीक उक्ति सौ प्रतिशत सच अछि। कनियों झूठ नै। मानि लिअ जँ प्रो. जी एहन नै कहने हेथिन तैयो ई सच अछि ओहि समयक सक्रिय गजलकार सभहँक गजल देखि कियो ई बात कहि सकैत छल। गजल लेल बहर आ काफिया अनिवार्य छै (बहरमे किछु छूटक संगे)। मुदा ओहि समयक सक्रिय कोनो गजलकार (ओहिमेसँ एखनो किछु सक्रिय छथि) बहर आ काफियाक पालन नै केने छथि। हिनकर सभहँक कथन छनि जे भाव मुख्य हो मुदा जँ भावे मुख्य मानल जाए तखन कोनो रचनाकेँ गजल कहबाक बेगरते किए? ओकरा कविते किए ने कहल जाए? आखिर कोनो एहन तत्व तँ हेतै जे कविता आ गजलक बीच अंतर आनैत हेतै। कोनो गजलकेँ नीक वा खराप हेबासँ पहिने ओकरा "गजल" होबए पड़ैत छै आ कोनो रचनाकेँ गजल हेबा लेल ओहिमे बहर ओ काफिया अनिवार्य छै। जँ बहर ओ काफिया नै छै तखन ओ गजले नै भेल भने ओकरा नीक वा खराप गीत या कविता कहू से मंजूर मुदा बिना बहर ओ काफियाक गजल नै हएत (रदीफ कोनो गजलमे भैयो सकैए आ नहियो भ सकैए मुदा जाहि गजलमे रदीफ लेल जाएत ताहिमे अंत धरि पालन हएत)।
एक दू गोटेसँ चर्चा केलापर पता चलल जे प्रो. आनंदजी ई मानै छलाह जे मैथिलीमे हुस्न-इश्क नै भऽ सकै छै तँइ मैथिलीमे गजल संभव नै। जँ एहन बात तँ हम प्रो. साहेबसँ असहमत छी कारण हमरा लग विद्यापति छथि जे कि पूरा उर्दू शाइरीसँ बेसी आ पहिने प्रेमपर बात केलाह। किछु विद्वान ई कहि सकै छथि जे विद्यापतिक प्रेम पारलौकिक छल मुदा तखन ई प्रश्न उठै छै जे फेर उर्दू शाइरीक प्रेम पारलौकिक किए नै भऽ सकैए?
जे किछु हो मुदा प्रो. आनंदजीक बयान ओहि समयक गजलकार सभ लेल एकटा चुनौती छल जकरा लेबामे और गलत साबित करबामे ओहि समयक गजलकार सभ असफल भऽ गेलाह। जहाँ धरि एहि बयानक प्रभाव छै हमरा नै बुझाइए जे एहि बयानक कोनो बेसी असरि पड़लै कारण ओहि समयक कथित गजलकार सभ अपन "गलत गजल"मे मग्न छलाह आ प्रो. आनंद मिश्रजी अपन सहविचारक संग प्रोफेसरे टा बनल रहलाह। दूनू पक्षमेसँ किनको ई जनबाक चिन्ता नै रहलनि जे आखिर गजलक असल पक्ष की छै।

2) रमानंद झा रमणजीक हिसाबें वर्तमान गीत गजल मंचीय अर्थलाभक औजार थिक (मिथिला मिहिर फरवरी 1983 ई हमरा लोकवेद आ लालकिलामे सियाराम झा सरसजीक लेखमे उल्लेखित भेटल)-
जँ ओहि समयक सक्रिय गजलकारक गजल देखब तँ पता चलत जे ओ सभ गजलकेँ गेबाक एकटा उपक्रम मानि लेने छलाह। हुनका सभकेँ बुझाइत छलनि (वा छनि) जे गायिकी गजल लेल अनिवार्य छै। जँ गायिकी गजल लेल अनिवार्य रहितै तँ उर्दू गजलमे गालिब आ फिराक गोरखपुरीसँ बेसी महान सुदर्शन फाकिर रहितथि। मुदा से नै भेलै कारण गायिकी गजल लेल अनिवार्य नै। हँ जँ गजलक सभ शर्त पूरा करैत गजलमे गायिकी छै तँ सोनमे सुगंध बला बात भेलै। ओहि समयक गजल सभ गायिकी लऽ कऽ कते मोहग्रस्त छलाह तकर दृष्टांत हमरा विभूति आनंदजीक गजल संग्रह (उठा रहल घोघ तिमिर)मे हुनके भूमिका आ तारानंद वियोगीजीक गजल संग्रह (युद्धक साक्ष्य) केर नव संस्करणक नव भूमिकासँ भेटल। विभूति आनंदजी ओहि भूमिकामे लिखै छथि जे "एगो महत्वपूर्ण प्रसंग.............। तत्क्षण किछुकेँ स्वरो देलथिन।" उम्हर वियोगीजी अपन संग्रहक नव संस्करणक नव भूमिकामे लिखै छथि जे "तखन मोन पड़ै छथि जवाहर झा...........जे हमर छांदस प्रयोग सभहँक संगीत शास्त्रीय व्याख्या करथि।" ई अलग बात जे वियोगीजीक गजलमे कोनो छांदस प्रयोग नै अछि। शास्त्रीय संगीत केर बंदिश तँ कोनो रचनाक पाँति भऽ सकै छै। एहि दूक अतिरिक्त आन गजलकार सभ सेहो गजलकेँ गायिकीसँ अनिवार्यतः जोड़ि देने छथि जाहि कारणसँ ओहि समयक गजल सभ गजल कम आ गीत बेसी लागै छै। अधिकांशतः साहित्यकार ई बुझै छथि जे मंचपर गाबि देलासँ जनता बेसी थपड़ी पीटत आ बहुत संदर्भमे ई बात सच छै। मुदा ओहि समयक गजल लिखनाहर सभ मंचपर हिट हेबाक चक्करमे कथित गजलकेँ गीतक भासमे गाबए लगलाह जाहिमेसँ किछु लोकप्रिय सेहो भेल (जनता द्वारा गीत मानि आ सुनबामे चूँकि ओ गीतेक भास छलै तँइ) जेना सियाराम झा सरसजीक "एक मिसिया जे मुस्किया देलियै," आ एहने सन आर। खास कऽ जे कथित साहित्यकार गीत आ गजल दूनू लिखै छलाह तिनकामे ई गायिकी बला बेमारी बहुत अछि। कलानंद भट्ट गजले लिखै छलाह तँइ हुनक गजलमे एकटा स्थायित्व भेटत ओना ई बात अलग जे भट्टजीक गजलमे सेहो बहर नै छनि आ बहुत ठाम काफिया गलत छनि।तात्कालीन कथित गजलकार सभ गजलकेँ मंच छेकबाक हथियार बना लेला जाहि कारणे ओहि समयक गजलमे कथ्यक गंभीरता छैहे नै। एक बात स्पष्ट कऽ दी खाली लाल झंडा, पसेना, अमीर-गरीब लीखि देलासँ गजल की कोनो रचनामे गंभीरता नै अबै छै। जँ एहि वास्तविकताक भीतर घुसि कऽ देखल जाए तँ रमणजीक बयान बहुत हद धरि सही अछि आ सटीक अछि। रमणजीक एहि बयानक असरि भेल आ गीत सन गजल लिखए बला सभ छिलमिला गेलाह। सरसजी अपन लेखमे एहि बयानकेँ गैर जिम्मेदारी बला बयान मानै छथि (लोकवेद आ लालकिलामे सियाराम झा सरसजीक लेख) मुदा हम रमणजीक एहि बयानकेँ गजलक दृष्टिएँ पूर्ण जिम्मेदारी बला बयान मानै छी। जँ ओहि समयक तात्कालीन गजलकार सभ एहि बयानपर मंथन करितथि तँ आजुक मैथिली गजलक परिदृश्य बहुत निखरल आ विस्तृत नजरि अबैत।
पुरने गजलकार नै बल्कि एखनुक गजलकार सेहो (अनचिन्हार आखरसँ संबंधित किछु गजलकार सेहो) मंच छेकबाक लेल गजलमे गायिकीकेँ अनिवार्य करए चाहै छथि। जखन कि सच बात तँ ई छै जे मंचपर गजल हिट होइत छै मुदा मंच लेल गजलक प्रयोग असफल भऽ जाइत छै से कतेको उर्दू मोशायरामे श्रोताक तौरपर भाग लऽ कऽ हम देखि चुकल छी। उर्दूक प्रसिद्ध शाइर हसरत मोहानीक गजल "चुपके चुपके रात दिन" 1910-1930 मे लिखाएल छै मुदा एहि गजलकेँ गुलाम अली भेटलै 1982मे। तेनाहिते गालिब केर गजल लिखेलै 1820क बाद मुदा ओकर गायिकी रूपमे लोकप्रियता भेटलै जगजीत सिंह द्वारा गेलाक बाद (जगजीतजीसँ पहिने सेहो गाएल जाइत छलै मुदा हम लोकप्रियताक बात कऽ रहल छी)। गायिकी रूपमे हरेक आधुनिक हसरत मोहानीक नसीबमे गुलाम अली आ हरेक आधुनिक गालिब केर नसीबमे जगजीत सिंह लिखाएल रहै छै मुदा आजुक शाइर अपने गेबा लेल आ मंच छेकबा लेल तते उताहुल रहै छथि जे ओ गजलक मूल तत्वकेँ बिसरि जाइ छथि। हमर ई अनुभव अछि जे गजल लेल बहरकेँ अनुपयोगी कहए बला लोक गजलकेँ गेबाक चक्करमे रहै छथि। अन्यथा किछु प्रयासक बाद बहरक निर्वाह केनाइ एकदम आसान होइत छै।

3) रामदेव झाजी मानै छथि जे "साम्प्रतिक गजल रचनाक क्षेत्रमे सुधांशु शेखर चौधरी, गोपेश, मायानंद मिश्र, रवीन्द्रनाथ ठाकुर,केदार नाथ लाभ, कलानंद भट्ट, सरस, महेन्द्र, छात्रानंद, वियोगी, धीरज,केदार कानन, रमेश,अनिल इत्यादि नाम देखल जाइत अछि। हिनका लोकनिक गजलमेसँ किछुमे अवश्ये गजलत्व अछि। परंतु अधिकांशकेँ गजल शैलीमे रचल गीत मात्र कहल जाए तँ अनुपयुक्त नहि। (संदर्भ “मैथिलीमे गजल” डा. रामदेव झा, रचना जून 1984मे प्रकाशित)"--
रामदेव जीक मत रमणजीक मतक विस्तारित रूप अछि। रमणजी मंचपर गजलक प्रवृतिपर बात केने छथि मुदा रामदेवजी गीत सन गजलकेँ सेहो देखार केने छथि जे अधिकांशतः गजलकार गजल नै गीत सन गजल लिखै छथि। रामदेव झाजी स्पष्ट स्वरमे ओहि समयक बहुत रास कथित क्रांतिकारी गजलकार सभहँक गजलकेँ खारिज करै छथि जे कि ओहि समयक हिसाबसँ बड़का विस्फोट छल। ई आलेख ततेक प्रभावकारी भेल जे ओ समयक बिना व्याकरण बला गजलकार सभ छिलमिला गेलाह आ एहि आलेखक विरोधमे विभिन्न वक्तव्य सभ देबए लगलाह। उदाहरण लेल सियाराम झा सरस, तारानंद वियोगी, रमेश ओ देवशंकर नवीनजीक संपादनमे प्रकाशित साझी गजल संकलन "लोकवेद आ लालकिला" (वर्ष 1990) केर कतिपय लेख सभ देखल जा सकैए जाहिमे रामदेव झाजी ओ हुनक स्थापनाकेँ जमि कऽ आरोपित कएल गेल अछि। ओही संकलनमे देवशंकर नवीन अपन आलेख "मैथिली गजलःस्वरूप आ संभावना"मे लिखै छथि जे "............पुनः डा. रामदेव झाक आलेख आएल। एहि निबन्ध मे दू टा बात अनर्गल ई भेल जे गजलक पंक्ति लेल छंद जकाँ मात्रा निर्धारित करए लगलाह आ किछु एहेन व्यक्तिक नाम मैथिली गजल मे जोड़ि देलनि जे कहियो गजल नै लिखलनि"
आन लेख सभमे एहने बात सभ आन आन तरीकासँ कहल गेल अछि। रामदेव झाजीक आलेखक बाद एहन आलेख नै आएल जाहिमे गजलकेँ व्याकरण दृष्टिसँ देखल गेल हो कारण ताहि समयक गजलपर कथित क्रांतिकारी गजलकार सभहँक कब्जा भऽ गेल छल। 

4) मायानंद जी अपन पोथी “अवान्तर” केर भूमिकाक (ई पोथी 1988मे मैथिली चेतना परिषद्, सहरसा द्वारा प्रकाशित भेल)। पृष्ठ 6 पर मायानंदजी लिखै छथि “अवान्तरक आरम्भ अछि गीतलसँ। गीतं लातीति गीतलम्ऽ अर्थात गीत केँ आनऽ बला भेल गीतल। किन्तु गीतल परम्परागत गीत नहि थिक, एहिमे एकटा सुर गजल केर सेहो लगैत अछि। गीतल गजल केर सब बंधन (सर्त) केँ स्वीकार नहि करैत अछि। कइयो नहि सकैत अछि। भाषाक अपन-अपन विशेषता होइत अछि जे ओकर संस्कृतिक अनुरूपें निर्मित होइत अछि। हमर उद्येश्य अछि मिश्रणसँ एकटा नवीन प्रयोग। तैं गीतल ने गीते थिक, ने गजले थिक, गीतो थिक आ गजलो थिक। किन्तु गीति तत्वक प्रधानता अभीष्ट, तैं गीतल।”
उपरका उद्घोषणामे अहाँ सभ देखि सकै छिऐ जे कतेक दोखाह स्थापना अछि। प्रयोग हएब नीक गप्प मुदा अपन कमजोरीकेँ भाषाक कमजोरी बना देब कतहुँसँ उचित नै आ हमरा जनैत मायानंद जीक ई बड़का अपराध छनि। जँ ओ अपन कमजोरीकेँ आँकैत गीतल केर आरम्भ करतथि तँ कोनो बेजाए गप्प नै मुदा मायाजी पाठककेँ भ्रमित करबाक प्रयास केलाह जे कि तात्काल सफल सेहो भेल।
हम अपन पोथी "मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास"मे बहुत रास एहन मैथिली कहबी केर उदाहरण देने छियै जकर दूनू पाँतिमे वर्णवृत मने बहर छै। जाहि भाषाक कहबी धरि बहरमे हो ओहि भाषामे गजल लिखब-कहब सभसँ आसान छै। मुदा हम जेना कि ओही पोथीमे लिखने छी जे माया बाबू लग मैथिल माटि-पानिक परंपराक कोनो जानकारी ने रहनि ओ बस शब्द सजेबाक फेरमे अपन मजबूरीकेँ भाषाक मजबूरी बना देलाह। माया बाबूक एहि बयानक घोर विरोध भेल सरसजी आ हुनक टीम द्वारा मुदा अफसोच जे सरसजी वा हुनक टीम मायाजीक एहि बयानकेँ गलत करबा लेल कोनो सार्थक डेग नै उठा सकल। माया बाबू जाहि फार्मेटक गजल लिखै छलाह तही फार्मेटमे सरसजी आ हुनक टीम लिखै छलाह। मने दूनू टीम बिना बहरक बहर गजल लिखै छल आ एखनो लिखा रहल। मायानंद मिश्र बनाम सियाराम झा "सरस" बला लड़ाइ गजलक लेल नै ई विशुद्ध रूपें नाम आ सत्ताक लड़ाइ छल। वर्तमान मैथिलीमे "बीहनि कथा" आ "लघुकथा" केर लड़ाइ सन  छल ई।

वर्तमान समयमे एहि बयान सभहँक सार्थकता

प्रो.आनंद मिश्रजी आ मायानंद मिश्रजीक बयानक एखन कोनो सार्थकता नै अछि। दूनू गोटाक बयान मैथिली गजलक असल धाराकेँ छोड़ि कऽ देल गेल छल। मैथिली गजलक असल धारा पं.जीवन झा, कविवर सीताराम झा, काशीकांत मिश्र "मधुप" विजयनाथ झा, योगानंद हीरा, जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल" आदिकेँ छुबैत आगू बढ़ल अछि। मुदा हिनकर सभहँक गजलकेँ तात्कालीन संपादक ओ आलोचक द्वारा बारल गेल। जँ हिनकर सभहँक गजलक ओहि समयमे व्याकरणक हिसाबसँ व्याख्या भेल रहैत तँ मैथिली गजलक नकली धाराकेँ आगू बढ़बाक मौका नै भेटल रहितै आ मैथिली गजल गन्हेबासँ बचि गेल रहैत। मुदा दुनियाँक कोनो काज बाँचल नै रहै छै से आब मैथिली गजल आलोचनाक छूटल काज सभ भऽ रहल अछि।
डा. रमानंद झा "रमण" ओ डा. रामदेव झाजीक बयानक एखनो सार्थकता अछि कारण ई दूनू बयान गजलक बाहरी पक्षपर छलै। एहन नै छै जे गजल गायिकीसँ मोहग्रस्त पहिनुके गजलकार छलाह। किछु एखुनको गजलकार एहि मोहमे बान्हल छथि आ आगूक किछु गजलकार सेहो बान्हल रहता। तँइ ई दूनू गोटाल बयान भविष्योमे सार्थक रहत।

(नोट---- गजलक वा अन्य विधाक संदर्भमे हम किनको नीक विचारकेँ अपना सकै छी। मुदा गलत विचारकेँ सदिखन हम आलोचना करैत रहब। एहि आलेखमे जिनकर मतक समर्थन कएल गेल अछि जरूरी नै जे हुनकर सभ मतसँ हम सहमत होइ आ हुनकर गलतो विचारकेँ नुकबैत रही। काल्हि भेने फेर कियो गजलक असल पक्षक विपरीत जेता हुनकर हम आलोचना करबे करब। कोनो विधामे प्रयोग खराप नै मुदा अपन कमजोरीकेँ विधा वा भाषाक कमजोरी बना देबए बला हमर शिकार होइत रहता।)


तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों