Friday, 18 August 2017

गजल

हमहूँ पागल की नै ये फल्लाँ के माए
ओहो बाकल की नै ये फल्लाँ के माए

साड़ीनामा धोतीनामा देखिए देखि
जीवन फाटल की नै ये फल्लाँ के माए

ओ उड़ि उड़ि आबै बहुत मुदा उड़िते रहलै
नहिए भेटल की नै ये फल्लाँ के माए

छिड़िआइत रहलै लुत्ती जइँ तइँ जखन तखन
किछु नै बाँचल की नै ये फल्लाँ के माए

खाली बाजहे के छलै ने बाजि देलियै
डर नै लागल की नै ये फल्लाँ के माए

सभ पाँतिमे मात्राक्रम 222-222-222-222 अछि
दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

Thursday, 17 August 2017

गजल

एकै आदमी चोर फकीरक सरदार
बड़ हरीफ लागैए शरीफक सरदार

बाहर टूटल फूटल भीतर चकमक छै
बड़ अमीर लागैए गरीबक सरदार

एना पसरल हेतै गुप्त बात सौंसे
कनपातर लागैए बहीरक सरदार

मोती केर आसमे गहलहुँ धार मुदा
बड़ उत्थर लागैए गँहीरक सरदार

रहि जेतै ई आसन बासन सिंहासन
आ चुप्पे उड़ि जेतै शरीरक सरदार

सभ पाँतिमे 222-222-222-22 मात्राक्रम अछि
दू टा अलग अलग लघुकेँ दीर्घ मानल गेल अछि
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

Monday, 7 August 2017

गजल

मोन पड़लै
नोर खसलै

अर्थ दिव्यांग
शब्द टहलै

बात बजिते
जीह कटलै

देह छुबिते
देह गललै

लोक अप्पन
आन लगलै

सभ पाँतिमे 2122 मात्राक्रम अछि
दोसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर लेल गेल अछि
सुझाव सादर आमंत्रि अछि

Sunday, 30 July 2017

गजल

भरल बरिसातमे नै सताउ सजनी
किए छी दूर लग आबि जाउ सजनी

मिलनके आशमे अंग-अंग तरसै
बदन पर वुँद नेहक गिराउ सजनी

पिआसल मोन मधुमासमे उचित नै
जुआनी ओहिना नै गमाउ सजनी

जियब जा धरि करब नेह हम अहीँके
हियामे रूप हमरे सजाउ सजनी

खुशीमे आइ कुन्दन गजल सुनाबै
मजा एहन समयके उठाउ सजनी

122-212-212-122

© कुन्दन कुमार कर्ण

www.kundanghazal.com

Tuesday, 25 July 2017

गजल

मोन सभहँक अचंभित छलै
चोर ऐठाम मंडित छलै

काज हुनकर बिलंबित मुदा
साज तँ द्रुतबिलंबित छलै

हाथ जोड़ल बहुत भेटि गेल
मोन सभहँक विखंडित छलै

ठोर केनाहुतो चुप रहल
तथ्य रखबासँ वंचित छलै

दुख बला पाँतिमे देखि लिअ
सुख बहुत रास टंकित छलै

दर्द बाँटब सहज नै बंधु
दर्द मोनक अखंडित छलै

सभ पाँतिमे 2122-122-12 मात्राक्रम अछि
तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर अछि
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

Monday, 24 July 2017

गजल

तीने वर्णक बनल मिठाइ
तीने वर्णक बनल मलाइ

तीने वर्णक बनल किताब
तीने वर्णक बनल पढ़ाइ

तीने वर्णक बनल सलाह
तीने वर्णक बनल लड़ाइ

तीने वर्णक बनल फचाँड़ि
तीने वर्णक बनल पिटाइ

तीने वर्णक बनल अकास
तीने वर्णक बनल लटाइ

तीने वर्णक बनल इजोत
तीने वर्णक बनल सलाइ

सभ पाँतिमे 22-2212-121 मात्राक्रम अछि
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

Monday, 17 July 2017

गजल

अपनके अपना हिसाबे बुझू
रचलके रचना हिसाबे बुझू

असलमे सब किछु रहै छै कहूँ
सृजनके सृजना हिसाबे बुझू

हिया पर शब्दक असर जे पड़ै
गजलके गहना हिसाबे बुझू

कहाँ भेटत सोच उठले सभक
धसलके धसना हिसाबे बुझू

जरनिहारोके कतहुँ नै कमी
जरलके जरना हिसाबे बुझू

अतीतक नै याद कुन्दन करू
घटलके घटना हिसाबे बुझू

122-221-2212

© कुन्दन कुमार कर्ण

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Friday, 7 July 2017

भक्ति गजलक परिकल्पना

मैथिलीमे भक्ति गजल नामक परिभाषिक शब्दावली अमित मिश्रजी द्वारा 7 अगस्त 2012केँ “विदेहक फेसबुक “केर पटलपर प्रस्तुत कएल गेल। ओना ओहिसँ बहुत पहिनेहें 16/1/2012केँ जगदानंद झा मनु जी बिना कोनो घोषणाकेँ अनचिन्हार आखरपर भक्ति गजल प्रस्तुत केला। एक बेर फेर मैथिलीक आदिक भक्ति गजलकार कविवर सीताराम झा चिन्हित होइ छथि। विदेहक 15 मार्च 2013 बला 126म अंक भक्ति गजल विशेषांक अछि। भक्ति गजलक संबंधमे फेसबुकपर भेल बहस राखि रहल छी--

            Amit Mishra
एकटा प्रश्न बड दिन सँ मोन मे अछि आइ अहाँ सबहक समक्ष राखि रहल छी ।
जखन गजल समाजक सब क्षेत्र के अपना मे पहिने सँ समेटने छल आ आब ते बाल क्षेत्र के सेहो अपना लेलक त की गजलक माध्यम सँ भक्ति कएल जा सकै यै अर्थात की भक्ति रूप मे गजल लिखल जा सकै यै?
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Comments
पंकज चौधरी hamra hisaabe ta likhal jaa sakaichh..
Amit Mishra एखन धरि हमरा नजरि मे एहन रचना नै आएल तेँए इ बात मोन मे बेर बेर उठैत छल ।
Om Prakash Jha Kiya ne likhal jaa sakai ye.
Amit Mishra जन्माष्टमी पर एकटा एहने रचना बाल गजलक रूप मे आनि रहल छी ।
भक्ति मे लिखल जा सकैछ की नै . इ जानकारी नै छल तेँए ओकरा बाल गजलक रूप मे लिखलौँ मुदा अछि भक्तिए ।
Om Prakash Jha Abass likhu.
Amit Mishra नैन खोलिकऽ कने देखू ने भवानी

2122-1222-2122
Gunjan Shree बिलकुल
Ravi Shankar ek naya suruat hait... best of luck

Roman(Eng) Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi
ANCHINHARAKHARKOLKATA.BLOGSPOT.COM

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Jagdanand Jha उपरोक्त दिनु लिंक भक्तिक गजलक अछि
Amit Mishra मनु जी अपनेक लिँक सँ मोन परक बोझ हल्लुक भऽ गेल ।
बहुत बहुत धन्यवाद
https://www.facebook.com/groups/videha/permalink/353227171422084/

Wednesday, 5 July 2017

गजल

जे कल्पनामे डुबा दै ओ छथि कवि
जे भावनामे बहा दै ओ छथि कवि

शब्दक मधुरतासँ करि मति परिवर्तन
जे दू हियाके मिला दै ओ छथि कवि

साहित्य मानल समाजक अयना छै
जे सोचके नव दिशा दै ओ छथि कवि

खतरा प्रजातन्त्र पर जौँ-जौँ आबै
जे देश जनता जगा दै ओ छथि कवि

संसार भरि होइ छै झूठक खेती
जे लोकके सत बता दै ओ छथि कवि

रचनासँ कुन्दन करै जादू एहन
जे चान दिनमे उगा दै ओ छथि कवि

2212-2122-222

© कुन्दन कुमार कर्ण

http://www.kundanghazal.com

Sunday, 2 July 2017

अपने एना अपने मूँह-38

मास मइ 2017 मे कुल कुल 9टा पोस्ट भेल जकर विवरण एना अछि--
कुंदन कुमार कर्णजीक 3 टा पोस्टमे 2टा गजल, 1टा बाल गजल अछि।
आशीष अनचिन्हारक 6 टा पोस्टमे 4 टा गजल, 1 टा रुबाइ आ 1 टा विश्व गजलकार परिचय शृंखला अछि।



मास जून 2017 मे कुल कुल 8टा पोस्ट भेल जकर विवरण एना अछि--
कुंदन कुमार कर्णजीक 3 टा पोस्टमे 1 टा गजल, 1टा भक्ति गजल आ 1 टा आलोचना अछि।
आशीष अनचिन्हारक 5 टा पोस्टमे 3 टा गजल, 1 टा पोस्टमे मिथिला दर्शन पत्रिकाक कटिंग आ 1 टा विश्व गजलकार परिचय शृंखला अछि।

Friday, 30 June 2017

थोड़े माटि बेसी पानि

शताब्दीसँ बेसीक इतिहास रहल मैथिली गजलके खास क' पछिला एक दशकसँ गजल रचना आ संग्रहक प्रकाशनमे गुणात्मक आ परिमाणात्म दुन्नू हिसाबे वृद्धि भ' रहल छै । एहि क्रममे किछु संग्रह इतिहास रचि पाठक सभक हियामे छाप छोडि देलकै तँ किछु एखनो धरि नेङराइते छै । कारण सृजनकालमे कोनो नै कोनो अंगविहिन रहि गेलै सृजना । संग्रहक भीड़मे समाहित सियाराम झा 'सरस' जीक पोथी 'थोड़े आगि थोड़े पानि' पढबाक अवसर भेटल । जकरा सुरुसँ अन्त धरि पढलाकबाद एकर तीत/मीठ पक्ष अर्थात गुणात्मकताक सन्दर्भमे विहंगम दृष्टिसँ अपन दृष्टिकोण रखबाक मोन भ' गेल । पहिने प्रस्तुत अछि पोथीके छोटछिन जानकारी:
पोथी - थोड़े आगि थोड़े पानि
विधा - गजल
प्रकाशक - नवारम्भ, पटना (2008)
मुद्रक - सरस्वती प्रेस, पटना
गजल संख्या - 80टा
पोथीमे जे छै-

थोड़े आगि राखू थोड़े पानि राखू
बख्त आ जरुरी लै थोड़े आनि राखू (पूरा गजल पृष्ठ 85 मे)
सरस जी प्रारम्भिक पृष्ठमे गहिरगर भावसँ भरल र्इ शेर प्रस्तुत केने छथि जे कि पोथीके नामक सान्दर्भिकता साबित क' रहल छै ।
पोथीमे 'बहुत महत्व राखैछ प्रतिबद्धता' शीर्षकपर दश पृष्ठ खरचा केने छथि सरस जी । जैमे ओ समसामयिक विषय, मैथिली साहित्यक विविध प्रवृति आ गतिविधि, अपन देखल भोगल बात, अध्ययन, संघर्ष, मैथिली आन्दोलनमे कएल गेल योगदान, विदेशी साहित्यकार एवं साहित्यिक कृति सहित ढेर रास विषय वस्तु पर चरचा केने छथि । मैथिली साहित्यिक क्षेत्रमे देखल गेल विकृतिपर जोडगर कटाक्ष करैत ‌ओ कहै छथि "आजुक 75 प्रतिशत मैथिलीक लेखक प्रतिबद्धताक वास्तविक अर्थसँ बहुत-बहुत दूर पर छथि । से बात खाहे कविताक हो कि कथाक, निबन्धक हो वा गीत लेखनक-सब किछु उपरे-उपर जेना हललुक माटि बिलाड़ियो कोड़ए ।" संगे संग ओ लेखक सभकेँ सल्लाह सेहो दैत कहै छथि "लोक जे लेखन कार्यसँ जुड़ल अछि वा जुड़बाक इच्छा रखैछ, तकरा बहुत बेसी अध्ययनशील होयबाक चाही । पढबाक संग-संग गुनबाक अर्थात चिन्तन-मननक अभ्यासी सेहो हेबाक चाही । नीक पुस्तकक खोजमे हरदम रहबाक चाही । जाहि विधामे काज करबाक हो, ताहि विधाक विशिष्ट कृतिकारक कृतिकेँ ताकि-ताकि पढबाक चाही ।"
अपन भाव परसबाक क्रममे ओ किछु हृदयके छूअवला शेर सेहो परसने छथि । जेना-

पूर्णिमा केर दूध बोड़ल, ओलड़ि गेल इजोर हो
श्वेत बस‌ंतक घोघ तर, धरतीक पोरे-पोर हो

प्रेम, वियोग, राजनीतिक, सामाजिक लगायत विभिन्न विषयक गजल रहल एहि संग्रहमे रचनागत विविधताक सुआद भेटत ।

कत' चूकि गेलाह सरस जी ?
कुल 80टा गजल रहल पोथीमे एको टा गजल बहरमे नै कहल गेल अछि । देखी पहिल गजलक मतला आ एकर मात्राक्रम:

बिन पाइनक माछ नाहैत चटपटा रहल, र्इ मैथिल छी
घेंट कटल मुरगी सन छटपटा रहल, र्इ मैथिल छी

पहिल पाँतिक मात्राक्रम - 2 22 21 221 212 12 2 22 2
दोसर पाँतिक मात्राक्रम - 21 12 22 2 212 12 2 22 2

मतलाक दुन्नू मिसराक मात्राक्रम अलग-अलग अछि ।
ढेर रास गजलमे काफिया दोष भेटत । बहुतो गजलमे एके रंगकेँ काफियाक प्रयोग भेटत । कोनो-कोनो मे तँ काफियाक ठेकान नै । पृष्ठ संख्या 19, 25, 30, 31, 34, 52, 55, 57, 61, 64, 81, 82, 92, 93, 96 मे देख सकै छी ।
पृष्ठ-25 मे रहल र्इ गजलके देखू:

सात फेरीक बाद जे किछु हाथ आयल
तत्क्षणें तेहि-केँ हम चूमि लेलियै

दू दिसक गरमाइ सँ दूर मन घमायल
तेहि भफायल - केँ हम चूमि लेलियै

भोर मृग भेल, साँझ कस्तूरी नहायल
ओहि डम्हायल-का हम चूमि लेलियै

कैक शीत-वसंत गमकल गजगजायल
रंग-रंगक - केँ हम चूमि लेलियै

स्वप्न सबहक पैरमे घुघरु बन्हायल
अंग-अंगक - केँ हम चूमि लेलियै

सृजन पथ पर चेतना-रथ सनसनायल
वंश वृक्षक - केँ हम चूमि लेलियै

कोन पिपड़ीक दंश नहुँए बिसबिसायल
ताहि नेहक - केँ हम, चूमि लेलियै

एहिमे मतला सेहो नै छै । बिनु मतलाके गजल नै भ' सकैए । पृष्ठ संख्या 64 मे सेहो एहनाहिते छै:

परबाहि ने तकर जे, सब लोक की कहैए
बहसल कहैछ क्यो-क्यो, सनकल कियो कहैए

कंजूस जेता तोड़ा नौ ठाँ नुकाक' गाड़य
तहिना अपन सिनेहक चिन्ता-फिकिर रहैए

जकरा ने र्इ जीवन-धन जीनगी ने तकरर जीनगी
छिछिआय गली-कुचिये, रकटल जकाँ करैए

कोंढी बना गुलाबक जेबी मे खोंसि राखी
जौं-जौं फुलाइछ, तौं-तौं सौरभ-निशां लगैए

अहाँ लाटरी करोड़क पायब तँ स्वय बूझब
निन्ने निपात होइए, मेघे चढल उड़ैए

तुलता ने कए पबै छी कहुनाक' सोमरस सँ
उतरैए सरस कोमहर, कोन ठामसँ चढैए

पृष्ठ संख्या 37, 42, 44, 50, 55, 59, 72, 78, 81, 94 मे रहल गजल गजलक फर्मेटमे नै अछि आ पृष्ठ संख्या 94 के गजलमे मात्र 4टा शेर छै । कमसँ कम 5टा हेबाक चाही ।

कोनो शब्दके जबरदस्ती काफिया बनाओल गेल छै, जेना की पृष्ठ संख्या 45 मे रहल गजलक अन्तिम शेरमे 'घुसकावना' शब्दक प्रयोग भेल छै ।

मक्तामे शाइरक नामक प्रयोग भेलासँ गजलक सुन्नरता बढै छै जे कि एहि संग्रमे किछु गजल छोड़ि बांकीमे नै भेटत ।

अन्तमे--

गजलक सामान्य निअमकेँ सेहो लेखकद्वारा नीक जकाँ परिपालन नै कएल गेल अछि । गजलप्रति भावनात्मक रुपे बेसी आ बेवहारिक रुपे बहुत कम प्रतिबद्ध छथि लेखक । गजलप्रति न्यान नै केने छथि । गजलक गहिराइ धरि नै पहुंच सकलथि । एहन प्रवृति वर्तमान सन्दर्भमे नवतुरिया सभमे सेहो बढल जा रहल छै जे की मैथिली गजलक लेल सही सूचक नै छी ।
 - कुन्दन कुमार कर्ण

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Tuesday, 27 June 2017

गजल

ई प्रेम हमरा जोगी बना देलक
विरहक महलके शोगी बना देलक

उपचार नै भेटल यौ कतौ एकर
गम्भीर मोनक रोगी बना देलक

मारै करेजामे याद टिस ओकर
दिन राति दर्दक भोगी बना देलक

संयोग जेना कोनो समयके छल
तँइ जोडि दू हिय योगी बना देलक

प्रेमक पुजगरी जहियासँ बनलौ हम
संसार कुन्दन ढोगी बना देलक

221-2222-1222

© कुन्दन कुमार कर्ण

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विश्व गजलकार परिचय शृंखला-7

"बोतल खुली है रक्स में जाम-ए-शराब है"

आइ विश्व गजलकार परिचय शृखंलामे एकटा विशेष गजलकारसँ परिचय कराएब। ओहिसँ पहिने ई निवेदन कऽ दी जे किछु एहन रचनाकार एहन होइ छथि जे कि पाठ्य रूपमे प्रसिद्ध होइत छथि तँ किछु कोनो गायक द्वारा। आइ जिनकासँ हम परिचय कराएब ओ दोसर तरहँक रचनाकार छथि मने हिनक रचना गेलाक बादें प्रसिद्ध भेल। फना बुलंदशहरी (मूल नाम-- मुहम्मद हनीफ) पाकिस्तानक प्रसिद्ध शायर छलाह। प्राप्त जानकारीक अनुसारें ई गुजरावाला (Gujranwala) जिलाक अरूप स्थानक छलाह। बुलंदशहरी प्रसिद्ध शाइर क़मर जलालवीजीसँ शाइरीक शिक्षा लेने छलाह। एहिठाम ईहो जानब रोचक जे बुलंदशहरीजीक गुरू क़मर जलालवीजीक एकटा पोथीक नाम सेहो " मेरे रश्के क़मर" छनि। बुलंदशहरीजीक बेसी जीवनी नहि भेटैत अछि कारण कहियो हिनका पाठ्य रूपमे गंभीरतासँ नहि लेल गेलनि जाहि कारणे एक तरहें पाठ्य रूप बला पाठकक नजरिसँ ओझल छथि। जे गीत-कौआली सुनै छथि हुनका तँ शाइरक नाम बूझल रहैत छनि मुदा जीवनी नहि तँइ हमहूँ असमर्थ छी। जे रचनाकार गायक द्वारा प्रसिद्ध होइत छथि ओहो कोनो एकै-दू गायक द्वारा प्रसिद्ध होइत छथि। बुलंदशहरीजीक रचना "मेरे रश्के-क़मर, तूने पहली नजर, जब नजर से मिलायी मज़ा आ गया" जेनाहिते प्रसिद्ध कौआली गायक "नुसरत फतेह अली" गेला तेनाहिते बुलंदशहरीजीक नाम सभहँक सामने आबि गेल। ओना ओहिसँ पहिने सेहो हुनकर रचना सभ गाएल गेल छल मुदा "मेरे रश्के-क़मर" केर बाते किछु अलग छै। बुलंदशहरीजीक एकटा अन्य रचना " बोतल खुली है रक्स में जाम-ए-शराब है" सेहो प्रसिद्ध भेल। ई रचना नुसरतजीक अतिरिक्त मुन्नी बेगम द्वारा गाएल गेल छै आ व्यक्तिगत तौरपर हमरा मुन्नी बेगम बला भर्सन बेसी नीक लागल अछि।
भारतक साधारण जनता बुलंदशहरीजी नाम तखन चिन्हलक जखन कि  अरिजीत सिंह द्वारा "मेरे रश्के-क़मर" रचनाक नवका भर्सन आएल आ तकर बाद ई रचना फेरसँ भारतमे प्रसिद्ध भऽ गेल मुदा अफसोचजनक जे मूल रचनाकारक संबंधमे फेर सभ अपरिचित रहि गेल। एकठाम यूट्यूबपर एकरा अरिजीत सिंह द्वारा गाएल आ नुसरत फतेह अली द्वारा लिखल सेहो भेटत। चूँकि बुलंदशहरीजीक बारेमे बेसी तथ्य नहि अछि तँइ एहिठाम हम "मेरे रश्के क़मर" रचना सुनाबी जे कि नुसरत जी गेने छथि (परिशिष्टमे ई रचना सेहो देल गेल अछि) --



आब एही रचनाकेँ अरिजीत सिंह केर अवाजमे सुनू--


आब सुनू मुन्नी बेगमजीक अवाजमे ""बोतल खुली है रक्स में"--

एही रचनाकेँ फेरसँ मुन्निए जीक अवाजमे सुनू आ अंतर ताकू--



आब फना बुलंदशहरीजीक किछु प्रसिद्ध रचना देल जा रहल अछि जे कि विभिन्न गायक द्वारा गाएल अछि--

आँख उठी मोहब्बत ने अंगडाई ली ( गायक नुसरत फतेह अली खान)






उर्दू लिपिमे बुलंदशहरीक जीक रचना पढ़बाक लेल एहिठाम आउ-- https://issuu.com/rchakravarti/docs/deevaan-e-fanabulandshehri

परिशिष्ट--
मेरे रश्के-क़मर, तूने पहली नजर, जब नजर से मिलायी मज़ा आ गया 
बर्क़ सी गिर गयी, काम ही कर गयी, आग ऐसी लगायी मज़ा आ गया


जाम में घोलकर हुस्न कि मस्तियाँ, चांदनी मुस्कुरायी मज़ा आ गया 
चाँद के साये में ऐ मेरे साक़िया, तूने ऐसी पिलायी मज़ा आ गया


नशा शीशे में अगड़ाई लेने लगा, बज्मे-रिंदा में सागर खनकने लगा
मैकदे पे बरसने लगी मस्तिया, जब घटा गिर के छायी मज़ा आ गया


बे-हिज़ाबाना वो सामने आ गए, और जवानी जवानी से टकरा गयी
आँख उनकी लड़ी यूँ मेरी आँख से , देखकर ये लड़ाई मज़ा आ गया


आँख में थी हया हर मुलाकात पर , सुर्ख आरिज़ हुए वस्ल की बात पर
उसने शरमा के मेरे सवालात पे, ऐसे गर्दन झुकाई मज़ा आ गया


शैख़ साहिब का ईमान बिक ही गया, देखकर हुस्न-ए-साक़ी पिघल ही गया
आज से पहले ये कितने मगरूर थे, लुट गयी पारसाई मज़ा आ गया


ऐ “फ़ना” शुक्र है आज वादे फ़ना, उस ने रख ली मेरे प्यार की आबरू
अपने हाथों से उसने मेरी कब्र पर, चादर-ऐ-गुल चढ़ाई मज़ा आ गया

क्रेडिट--


विश्व गजलकार परिचय शृंखलाक अन्य भाग पढ़बाक लेल एहि ठाम आउ--  विश्व गजलकार परिचय 


Monday, 19 June 2017

गजल

हुनका लेल सिंदुर एलै हमरा लेल जहर
देखू नेह कोना भेलै हमरा लेल जहर

अमरित एकरा हम कोना ने मानू कहू से
अपने हाथें देने गेलै हमरा लेल जहर

जीवन धारने छै जहरक कर्जा तइँ तँ सखी
बहुते देर धरि घुरिएलै हमरा लेल जहर

खिस्सा सुनि कऽ किछु ने बजलै चुप्पे रहलै तखन
बहुते कनलै आ पछतेलै हमरा लेल जहर

मोनक बात कहने रहियै अपना लोकसँ आ
अनचिन्हार सेहो लेलै हमरा लेल जहर


सभ पाँतिमे 2221-22-22-2221-12 मात्राक्रम अछि
दोसर आ चारिम शेरक दूनू पाँतिमे एक-एकटा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

Sunday, 18 June 2017

भक्ति गजल

अन्त सभके एक दिन हेबे करै छै
छोडि दुनिया एक दिन जेबे करै छै

मोन आनन्दित जकर सदिखन रहल ओ
गीत दर्दोके समय गेबे करै छै

जै हृदयमे भक्ति परमात्माक पनुकै
बुद्ध सन बुद्धत्व से पेबे करै छै

प्रेम बाटू जीविते जिनगी मनुषमे
मरि क' के ककरोसँ की लेबे करै छै

दान सन नै पैघ कोनो पुण्य कुन्दन
लोक फिर्तामे दुआ देबे करै छै

बहरे-रमल [2122-2122-2122]

© कुन्दन कुमार कर्ण

www.kundanghazal.com

Tuesday, 13 June 2017

गजल

हुनके विकास
जनता उदास

संसद बनलै
चोट्टा निवास

अपने अर्थी
अपने लहास

जेबी जानै
हाटक हुलास

बूड़ल देशक
दर्शन झकास



सभ पाँतिमे 22-22 मात्राक्रम अछि
दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

Sunday, 11 June 2017

मिथिला दर्शनमे प्रकाशित किछु गजल

मिथिला दर्शनक Nov-dec-16 अंक मे प्रकाशित किछु गजल





Friday, 9 June 2017

गजल

चुपचाप देखब कपारमे
चुपचाप चाहब कपारमे

ओ जे जे कहथिन सएह सभ
चुपचाप मानब कपारमे

सपना अपन आँखि के बहुत
चुपचाप डाहब कपारमे

ई नोर हुनके हँसी सनक
चुपचाप कानब कपारमे

देखा कऽ लिखलहुँ ई पाँति आ
चुपचाप मेटब कपारमे

सभ पाँतिमे 2212-212-12 मात्राक्रम अछि
दोसर आ चारिम शेरक पहिल पाँतिमे एकटा दीर्घकेँ लघु मानि लेबाक छूट लेल गेल छै
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

Sunday, 28 May 2017

गजल

बाग नै पूरा बस एक टा गुलाब चाही
हो भरल नेहक खिस्सासँ से किताब चाही

लोक जिनगी कोना एसगर बिता दए छै
एक संगीके हमरा तँ संग आब चाही

दर्दमे सेहो मातल हिया रहै निशामे
साँझ पडिते बोतलमे भरल शराब चाही

मोनमे मारै हिलकोर किछु सवाल नेहक
वास्तविक अनुभूतिसँ मोनके जवाब चाही

सोचमे ओकर कुन्दन समय जतेक बीतल
आइ छन-छनके हमरा तकर हिसाब चाही


2122-2221-212-122

© कुन्दन कुमार कर्ण

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गजल

नौकर बनलै गरीब बच्चा
होटल मोटल ईंटा भट्ठा

रसगुल्ले सन के जीवन छै
दुइए दिनमे खट्टा खट्टा

अपना अपनी केलहुँ बड़ाइ
अपने कहलहुँ अच्छा अच्छा

अइ नेहक मारल हमहूँ छी
दुनियाँ लागै फिक्का फिक्का

किछु परसादी हमरो भेटल
हमहूँ खेलहुँ फक्के फक्का

सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि
दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

Friday, 26 May 2017

गजल

कियो हँसलै कोनो बातपर
कियो कनलै कोनो बातपर

कियो उठि गेलै बड़ ऊँच आ
कियो खसलै कोनो बातपर

कियो चुप्पे रहलै देर धरि
कियो बजलै कोनो बातपर

कियो पाथर बनि जिंदा रहल
कियो गललै कोनो बातपर

कियो रहलै तहिआएल सन
कियो भजलै कोनो बातपर

सभ पाँतिमे 1222-22-212 मात्राक्रम अछि
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

Monday, 22 May 2017

गजल

रस रंग साधना काम्य हमर
मधु सिक्त वासना काम्य हमर

अछि हियमे राखल नेह मधुर
विष रिक्त भावना काम्य हमर

छोट छीन जीवन रहै मुदा
सही प्रस्तावना काम्य हमर

अहाँ जपैत रहू विनाशकेँ
नीक संभावना काम्य हमर

संग रही स्वस्थ रही अतबे
छोट शुभकामना काम्य हमर

सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि (बहरे मीर)
दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि
सुझाव सादर आमंत्रित अछि



Sunday, 21 May 2017

विश्व गजलकार परिचय शृंखला-6

अवधी भाषा उत्तर प्रदेशक 19 टा जिला- सुल्तानपुर, अमेठी, बाराबंकी, प्रतापगढ़, इलाहाबाद, कौशांबी, फतेहपुर, रायबरेली, उन्नाव, लखनऊ, हरदोई, सीतापुर, खीरी, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, गोंडा, फैजाबाद आ अंबेडकर नगरमे अवधी पूरा बाजल जाइ छै। जखन कि 6 टा जिला- जौनपुर, मिर्जापुर, कानपुर, शाहजहांबाद, बस्ती और बांदा केर किछु क्षेत्रमे एकर सेहो प्रयोग होइत छै। बिहारक किछु भाग आ नेपालक किछु जिलामे सेहो अवधी बाजल जाइ छै। एक अतिरिक्त मॉरिशस, त्रिनिदाद एवं टुबैगो, फिजी, गयाना, सूरीनाम सहित आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आ हॉलैंड देशमे सहो अवधी बाजल जाइ छै। आइ अवधी भाषाक गजलकार बजरंग बिहारी "बजरू" जीसँ परिचय प्राप्त करी।
















बजरंग बिहारी "बजरू"

मूल नाम-- बजरंग बिहारी तिवारी आ एही नामसँ हिंदीमे सेहो लेखन। खास कऽ हिंदीमे दलित विमर्शपर हिनक काज छनि।
विधा : गजल, आलोचना, विमर्श
जन्म : 1 मार्च 1972केँ उत्तर प्रदेशक गोंडा जिलामे भेल छनि।


हरेक प्रांतीय भाषा जकाँ अवधीमे सेहो बहुत गजल लिखल कहल गेल अछि। मुदा एखन धरि अवधी गजलमे सेहो बहरक समानता नै देखबामे आबै आ आने प्रांतीय भाषा जकाँ उच्चारणक आघात महत्वपूर्ण कारक अछि। मैथिली आ भोजपुरीमे गजलक व्याकरण पूरा स्थापित भऽ गेल अछि। उम्मेद अछि जे आनो प्रांतीय भाषामे गजलक व्याकरण जल्दिये स्थापित हएत।अवधी गजलमे बजरू जीक गजलक भाषा (जबान) बेसी प्रखर आ मारुक अछि। त पढ़ू बजरू जीक किछु गजल--


1

हेरित है इतिहास जौन दिन झूठ बदलि कै फुर होइगा
झूर आँख अंसुवात जौन दिन झूठ बदलि कै फुर होइगा

हंडा चढ़ा सिकार मिले बिनु राजाजी बेफिकिर रहे
बोटी जब पहुंची थरिया मा झूठ बदलि कै फुर होइगा

बिन दहेज सादी कै चर्चा पंडित जी आदर्स बने
कोठी गाड़ी परुआ1 पाइन झूठ बदलि कै फुर होइगा

“खाली हाथ चले जानाहै” साहूजी उनसे बोले
बस्ती खाली करुआइन जब झूठ बदलि कै फुर होइगा

‘बजरू’ का देखिन महंथ जी जोरदार परबचन भवा
संका सब कपूर बनि उड़िगै झूठ बदलि कै फुर होइगा


2

चढ़ेन मुंडेर मुल नटवर न मिला काव करी
भयी अबेर मुल नटवर न मिला काव करी

रुपैया तीस धरी जेब, रिचार्ज या रासन
पहिलकै ठीक मुल नटवर न मिला काव करी

जरूरी जौन है हमरे लिए हमसे न कहौ
होत है देर मुल नटवर न मिला काव करी

माल बेखोट है लेटेस्ट सेट ई एंड्राइड
नयी नवेल मुल नटवर न मिला काव करी

रहा वादा कि चटनी चाटि कै हम खबर करब
बिसरिगा स्वाद मुल नटवर न मिला काव करी


3

गजल मामूली है लेकिन लिहेबा सच्चाई
बिथा किसान कै खोली कि लाई गहराई

इस्क से उपजै इसारा चढ़ै मानी कै परत
बिना जाने कसस बोली दरद से मुस्काई

तसव्वुर दुनिया रचै औ’ तसव्वुफ अर्थ भरै
न यहके तीर हम डोली न यहका लुकुवाई

धरम अध्यात्म से न काम बने जानित है
ककहरा राजनीति कै, पढ़ी औ’ समझाई

समय बदले समाज बोध का बदल डारे
बिलाये वक्ती गजल ई कहैम न सरमाई

चुए ओरौनी जौन बरसे सब देखाए परे
‘बजरू’ कै सच न छुपे दबै कहाँ असनाई

4

चले लखनऊ पहुंचे दिल्ली,
चतुर चौगड़ा बनिगा गिल्ली

हाटडाग सरदी भय खायिन,
झांझर8 भये सुरू मा सिल्ली

समझि बूझि कै करो दोस्ती,
नेक सलाह उड़ावै खिल्ली

बब्बर सेर कार मा बैठा ,
संकट देखि दुबकि भा बिल्ली

‘बजरू’ बचि कै रह्यो सहर मा,
दरकि जाय न पातर झिल्ली


5

का बेसाह्यो कस रहा मेला
राह सूनी निकरि गा रेला

बरफ पिघली पोर तक पानी
मजा–खैंहस संग– संग झेला

के उठाए साल भर खर्चा
जेबि टोवैं पास ना धेला

गे नगरची औ मुकुटधारी
मंच खाली पूर  भा खेला

बहुत सोयौ राति भर ‘बजरू‘
अब न लपक्यो भोर की बेला


6

जियै कै ढंग सीखब बोलिगे काका
भोरहरे तीर जमुना डोलिगे काका

आँखि  अंगार  कूटैं  धान  काकी,
पुरनका घाव फिर से छोलिगे काका

झरैया  हल्ल  होइगे  मंत्र  फूंकत
जहर अस गांव भीतर घोलिगे काका

निहारैं   खेत   बीदुर  काढ़ि  घुरहू,
हंकारिन पसु पगहवा खोलिगे काका

बिराजैं   ऊँच   सिंघासन   श्री   श्री
नफा नकसान आपन तोलिगे काका

भतीजा हौ तौ पहुंचौ घाट ‘बजरू‘
महातम कमलदल कै झोरिगे काका


7

उठाए बीज कै गठरी सवाल बोइत है
दबाए फूल कै मोटरी बवाल पोइत है

इन्हैं मार्यौ उन्हैं काट्यौ तबौं न प्यास बुझी
रकत डरि कै कहां छिपिगा नसै नसि टोइत है

जुआठा कांधे पर धारे जबां पर कीर्ति–कथा
सभे जानै कि हम जागी असल मा सोइत है

कहूं खोदी कहूं तोपी सिवान चालि उठा
महाजन देखि कै सोची मजूरी खोइत है

ई घटाटोप अन्हेंरिया उजाड़ रेह भरी
अहेरी भक्त दरोरैं यही से रोइत है

8

देस–दाना भवा दूभर राष्ट्र–भूसी अस उड़ी
कागजी फूलन कै अबकी साल किस्मत भै खड़ी

मिली चटनी बिना रोटी पेट खाली मुंह भरा
घुप अमावस लाइ रोपिन तब जलावैं फुलझड़ी

नरदहा दावा करै खुसबू कै हम वारिस हियां
खोइ हिम्मत सिर हिलावैं अकिल पर चादर पड़ी

कोट काला बिन मसाला भये लाला हुमुकि गे।
बीर अभिमन्यू कराहै धूर्तता अब नग जड़ी

मिलैं ‘बजरू’ तौ बतावैं रास्ता के रूंधि गा
मृगसिरा मिरगी औ’ साखामृग कै अनदेखी कड़ी


शब्दार्थ---

परुआ= यूँ ही, मुफ्त में
मुल= लेकिन
नटवर= नेटवर्क
बिथा= व्यथा, पीड़ा
लुकुआई= छिपाना
चौगड़ा= खरगोश
गिल्ली= गिलहरी
झांझर= जीर्ण-शीर्ण, कमज़ोर
सिल्ली= शिला, चट्टान

एहि शृंखला केर स्रोत अवधी भाषाक पत्रिका "अवधी कै अरघान" अछि।

विश्व गजलकार परिचय शृंखलाक अन्य भाग पढ़बाक लेल एहि ठाम आउ--  विश्व गजलकार परिचय 

Wednesday, 10 May 2017

रुबाइ

नवका सीसोक नव पात समान चेहरा
गैंची माछसँ भरल खेतक धान चेहरा
केकरो लेल किछु नै मुदा हमरा लेल
हमर मोन हमर देह हमर जान चेहरा

बाल गजल

गामक बूढ हमर नानी
छै ममतासँ भरल खानी

पूजा पाठ करै नित दिन
दुखिया लेल महादानी

खिस्सा खूब सुनाबै ओ
राजा कोन रहै रानी

भोरे भोर उठा दै छै
सुधरै जैसँ हमर बानी

नम्हर छोट सभक आगू
कहलक बनि क' रहू ज्ञानी

2221-1222

© कुन्दन कुमार कर्ण

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Tuesday, 9 May 2017

गजल

एखन हारल नै छी खेल जितनाइ बाकी छै
इतिहासक पन्नामे नाम लिखनाइ बाकी छै

गन्तव्यक पथ पर उठलै पहिल डेग सम्हारल
अन्तिम फल धरि रथ जिनगीक घिचनाइ बाकी छै

विद्वानक अखड़ाहामे करैत प्रतिस्पर्धा
बनि लोकप्रिय लोकक बीच टिकनाइ बाकी छै

लागल हेतै कर्मक बाट पर ठेस नै ककरा
संघर्षक यात्रामे नोर पिबनाइ बाकी छै

माए मिथिला नै रहितै तँ के जानितै सगरो
ऋण माएके सेवा करि कऽ तिरनाइ बाकी छै

सब इच्छा आकांक्षा एक दिन छोडिकेँ कुन्दन
अन्तर मोनक परमात्मासँ मिलनाइ बाकी छै

2222-2221-221-222

© कुन्दन कुमार कर्ण

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Monday, 8 May 2017

गजल

जे अछि जयकार विरोधी
से अछि दरबार विरोधी

ई मानू या नै मानू
सभ छै अधिकार विरोधी

संसारे खातिर देखू
भेलै संसार विरोधी

खाली संगे भरलाहा
बनतै अवतार विरोधी

चारू दिस बंदूक मुदा
कहलक हथियार विरोधी

सभ पाँतिमे 222-222-2 मात्राक्रम अछि
दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों