तोहर प्रेममे पड़ि पीबैत छी हम तँ
ई जुनि कनिको बुझै जीबैत छी हम तँ
ताड़ीमे डूबि भोरेसँ साँझ धरि ‘मनु’
फाटल करेज अपन सीबैत छी हम तँ
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
A Research Blog On Maithili Ghazal & Sher-o- Shayari
तोहर प्रेममे पड़ि पीबैत छी हम तँ
ई जुनि कनिको बुझै जीबैत छी हम तँ
ताड़ीमे डूबि भोरेसँ साँझ धरि ‘मनु’
फाटल करेज अपन सीबैत छी हम तँ
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
हुनकर प्रेमक धाहसँ हम गुलाबी भ गेलौं
बुझलनि नहि ओ हमरा हम शराबी भ गेलौं
हँसि कय हम लूटेलौं मोन सगरो अपन बुझि
भेटल नहि कनिको मोजर हिसाबी भ गेलौं
सुनलौं बहुते एखन धरि सभक चुप भ सबटा
सुनिते देरी मोनक हम जवाबी भ गेलौं
जीवन भरि नेना पोसब रहल आस अनके
चाकर बनिते सरकारी नवाबी भ गेलौं
जगमे बहुते धोखा पाबि सिखलौं रहब हम
असगर ‘मनु’ आखर संगे किताबी भ गेलौं
(मात्राक्रम 2222-222-122-122 सभ पाँतिमे)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
नहि सिनेहक मोल मिसियो बुझलक हमर
लोक हँसि हँसि कय करेजा तजलक हमर
डोर साँसक जेकरा देलौं हाथमे
नहि हिया ओहो तँ संपति तकलक हमर
करु भरोसा आब कोना ककरोसँ हम
प्रिय छल जे मोनकेँ बड़ खुनलक हमर
मीत छल मोनक सगर जे सुखमे बनल
बुझि घड़ी दुख केर ओ नहि सुनलक हमर
देत अनकर दोष नहि ‘मनु’ कनिको हिया
एहने बिधना कपारे लिखलक हमर
(बहरे जदीद, मात्राक्रम 2122-2122-2212)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
जनवरी २०२५ मे कुल दू टा पोस्ट भेल जाहिमे आशीष अनचिन्हारक एक पोस्टमे अपने एना अपने मूँह अछि आ जगदानंद झा 'मनु' केर एक टा गजल अछि।
फरवरी एवं मार्च २०२५ मे कोनो पोस्ट नहि अछि।
अप्रैल २०२५ मे कुल एक टा पोस्ट भेल जाहिमे जगदानंद झा मनुक एक गजल अछि।
मइ २००५ मे कुल ५ पोस्ट अछि जाहिमे जगदानंद झा 'मनु' केर १ भक्ति गजल, १ रुबाइ, १ भक्ति रुबाइ एवं २ टा गजलक भीडियो अछि।
जून २०२५ मे कोनो पोस्ट नहि अछि।
जुलाइ २०२५ मे कुल १ टा पोस्ट भेल जाहिमे जगदानंद झा मनुक १ गजल अछि।
अगस्त २०२५ मे कोनो पोस्ट नहि अछि।
सेप्टेम्बर २०२५ मे १ पोस्टमे जगदानंद झा 'मनु' केर १ टा गजल अछि।
अक्टूबर २०२५ मे १ टा पोस्ट भेल जाहिमे आशीष अनचिन्हारक १ टा गजल अछि।
नवंबर २०२५ मे १ टा पोस्ट भेल जाहिमे आशीष अनचिन्हारक १ टा गजल अछि।
दिसंबर २०२५ मे ३ पोस्ट भेल जाहिमे आशीष अनचिन्हारक २ टा गजल एवं जगदानंद झा 'मनु' केर १ टा गजल अछि।
छुपि-छुपि राति दिन हम बाट निहारै छी
जल्दीसँ आबू बड़ आस कराबै छी
पूरा होयत कखन ‘मनु’ मनोकामना
हमरा किए नहि करेजसँ लगाबै छी
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
अपन एकटा पुरान वार्णिक गजलकेँ, कनीक पॉलिश कय क बहरे हजजमे प्रस्तुत क रहल छी।मतलाक मिसरा-ए-ऊला सभार, ओम प्रकाश जी, लाइव मोशायरा विदेह फेशबूक ग्रूपसँ (03/03/2012)।
गजल
अहाँ कखनो तँ बाट हमर घरक धरबै
अहाँ बिन हाथ नहि दोसर वरक धरबै
निहारै राति दिन हम बाट खाली छी
अहाँ कखनो कनी कोनो सड़क धरबै
सगर सिंगार टुकली नाककेँ नथिया
अहीँ सेनुर पियाजी सिथ परक धरबै
मिलनकेँ आसमे साजनसँ हम चललौं
गड़ी घोड़ा ज भेटल नहि टरक धरबै
हमर जीवन सगर अछि ई अहीँ वास्ते
अहाँ बिन छोरि जीवन ‘मनु’ नरक धरबै
(बहरे हजज, मात्राक्रम- 1222-1222-1222, मतलाक मिसरा-ए-ऊलामे दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानक छूट लेल गेल अछि।)
सुझाव, समीक्षा, आदेश सादर आमंत्रित अछि।
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
प्रेम जिनकासँ छल ओ मुँह मोरि लेलनि
नेग दर्दक द झट नाता तोरि लेलनि
ओ हमर दर्दकेँ हँसि खिल्ली उड़ाकय
छोरि आनसँ किए नाता जोरि लेलनि
प्रेम केनाइ की बुझता निर्दयी ओ
जे हृदय केकरो छनमे कोरि लेलनि
सीखता की चलब नेहक फूलपर ओ
संग चलनाइ शूलक जे छोरि लेलनि
‘मनु’ अनाड़ी कपट छलकेँ चिन्हलक नहि
मोन नहि ओ करेजोकेँ झोरि लेलनि
(बहरे असम, मात्राक्रम 2122-1222-2122)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
अहाँ मुस्कैत रही हमरा देखैत रही
अहाँकेँ प्रेम गजल नव-नव सुनबैत रही
रुसल सजनी जँ रही प्रेमसँ बौसैत रही
सगर गुणगान अहाँकेँ हम गाबैत रही
मधुरगर बोल अहाँ सदिखन बाजैत रही
अहाँकेँ सुनि क सिनेहे हम ताकैत रही
अहाँ ढारैत रही डुबि हम पीबैत रही
सुनरकी संग हिया रसमे तीतैत रही
अहाँ जीतैत रही ‘मनु’ हम हारैत रही
पिया मनुहार सँ ई जीवन जीबैत रही
(मात्राक्रम 1222-112-2222-112 सभ पाँतिमे)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
हमरा प्रेम करु सदिखन बसन्ती पिया
नहि बाबूक हम यौ आब रहलहुँ धिया
बहुते जतन सोलह वर्ष सम्हारलहुँ
सहलो जाइए नहि आब टूटे हिया
साजन लेल रखने नेह छी कोंढ़ तर
रुकि नहि करु जुलम तरसै हमर ई जिया
आँकुर मोनमे प्रेमक जखन फूटलै
दुनियामे रहल नहि आब कोनो ठिया
साउन बीत गेलै टूटि दम अछि रहल
जल्दी आउ ‘मनु’ जरि गेल आशक दिया
(बहरे कबीर, मात्राक्रम 2221-2221-2212)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’