Friday, 31 January 2014

गजल



बताह भेलइ  मनुआं आब कोना मानत​           
पुरान यादिक गठरी  फोलि फेरो कानत         

करेज़ चनकल टुकरी भेल  संगी  रूसल​         
समेट सभटा टूटल टूक​   फेरो गानत            

बिसैर नहि पेलक ओकर मधुर यादक पल  
सिनेह नहि बिसरत​   ई बात फ़ेरो ठानत​        
                                                 
ससैर गेलै प्रेमक ताग​ छलई   तानल​                
सहेज सभटा प्रेमक  ताग​  फेरो  तानत​              

सचेत कतबो केलहुँ मोन अप्पन कोना        
जड़ैत डिबिया सन मोनक इ गप के जानत                                              

सभ पाँतिमे मात्राक्रम  - 1212+2222+122+22
तिथि:३१/०१/२०१४

©राम कुमार मिश्र

गजल

नेहक झूठ आश नै दिअ
धरती बिनु अकाश नै दिअ

हो अस्तित्व नै हमर जतऽ
तेहन ठाम बास नै दिअ

अनहारे रहत हमर हिय
ई फुसिकेँ प्रकाश नै दिअ

हम छी जाहिमे बसल नै
से बेकार सांस नै दिअ

नै चाही सिनेह एहन
जिनगीमे हतास नै दिअ

मात्रा क्रम : 2221-2122
(मफऊलात–फाइलातुन)

© कुन्दन कुमार कर्ण

Thursday, 30 January 2014

गजल

हेतै खतम गुटबाज बेबस्था
बनतै सभक आवाज बेबस्था

भेलै बहुत चीरहरणक खेला
राखत निर्बलक लाज बेबस्था

देसक आँखिमे नोर नै रहतै
सजतै माथ बनि ताज बेबस्था

मिलतै सभक सुर ताल यौ ऐठाँ
एहन बनत ई साज बेबस्था

"ओम"क मोन कहि रहल छै सबकेँ
करतै आब किछु काज बेबस्था

दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-लघु, दीर्घ-दीर्घ-लघु-दीर्घ, दीर्घ-दीर्घ प्रत्येक पाँतिमे एक बेर।

गजल



जेना नदी किनारकेँ जीबन
तेना बिना पिआरकेँ जीबन

एकै नजरि तँ देलहुँ आ
भेलै मँहग उधारकेँ जीबन

लै एकटा तँ दोसरा छोड़ै
बस एहने लचारकेँ जीबन

खैरात भेटलौ कते पूछै
मंदिरसँ ई मजारकेँ जीबन

हड़ताल तोड़ि देलकै सभटा
बेकार बोनिहारकेँ जीबन

सभ पाँतिमे 2212+12+122 मात्राक्रम अछि।


सुधार लेल सुझाव सादर आमंत्रित अछि।

Wednesday, 29 January 2014

गजल

हमरा देखिते ओ लजा गेलै
जादू नेहकेँ ओ चला गेलै

भेलै कात नै ई नजरि कनियो
चुप्पे चाप नैनसँ बजा गेलै

रहितो दूर देहसँ हमर जे ओ
छातीमे बुझायल सटा गेलै

अनचिन्हार छल ओ मुदा एखन
सदिखन लेल अप्पन बना गेलै

कुन्दन केर ओ मानिकेँ जिनगी
कोमलसन हियामे बसा गेलै

मात्रा क्रम:2221-2212-22

© कुन्दन कुमार कर्ण

रुबाई


चरा लेलक जरा देलक खेतके  
पटा लेलक लिखा लेलक खेतके
दहेजक माँग आ बैसल सेठबा  
कना देलक मिटा देलक खेतके  

१२२२ १२२२ २१२

Sunday, 26 January 2014

छद्म गजल

आलचोना साहित्यमे "काव्याभास" शब्द बेसी प्रचलति छै। "काव्याभास" मने ई जे कोनो रचना काव्य तँ नै थिक मुदा किछु प्रयत्नसँ ओकरा काव्य घोषित कएल गेल हो।आ ई प्रयत्न काव्य स्तरपर सेहो भ' सकैए ओ भाइ-भतीजावाद बला, मूँह देखि मुंगबा बला सेहो भ' सकैए।
मैथिलीमे "सन" शब्द प्रतिरूपक दर्शन लेल व्यवहार होइत अछि। जेना "ई गदहा सन अछि" मने एहन मनुख जकरा लेल ई कहल गेल छै से गदहा तँ नै अछि मुदा ओकर किछु लक्षण गदहा सन छै। आब ई लक्षण रूप रंगसँ आहार-बेबहार ओ गुण-अवगुण धरि भ' सकैए।
मैथिलीक ई सभसँ बड़का बेमारी छै जे जँ घर-परिवारमे वा संबंधमे वा कमसँ कम गतातीमे एकौटा साहित्यकार बनि जाइए तँ बाद-बाँकीकेँ साहित्यकार होइत कनियों देरी नै होइ छै।जँ कियो नै छथि तँ जँ मित्रो छथि तँ साहित्यकार बनबाक गारंटी ( वारंटी बहुत कमजोर शब्द छै)  हेबे करैए मैथिलीमे। स्व. प्रभाष कुमार चौधरी साहित्यकार की भेला... गंगेश गुंजन जीकेँ साहित्यकार होमएमे देरी नै भेल। आ गंगेश गुंजन साहित्यकार छथि तँ हुनक "गजल सन किछु" मैथिली गजलक मीलक पाथर भ' गेल।

"दुःखक दुपहरिया" गंगेश गुंजनजीक लिखल पोथी छनि जे की लेखकक मतानुसार "हमर किछु गीत गजल सन' संकलन" छनि। ई पोथी क्रांतिपीठ प्रकाशन, पटनासँ १९९९मे प्रकाशित भेल। ऐ पोथीक पहिले पाँति थिक "ई संकलन स्वाधीन लयक हमर किछु छन्दोबद्ध रचना सब थिक"। ऐ पाँति महँक दूटा शब्द समूहपर बेसी धेआन देब आवश्यक। पहिल " स्वाधीन लयक" आ दोसर "किछु छन्दोबद्ध रचना"।
कने विषयांतर करैत हम कही जे " ई बच्चा एकटा नपुंसक वा बाँझक थिक" की ई सही हेतै। सभ लोक कहता नै ई संभवे नै छै। तँ चलू आब एही नियमकेँ गुंजनजीक पाँतिपर फिट करी। फिट केलापर अहूँ सभकेँ पता चलि गेल हएत जे "स्वाधीन लय" बला रचना कहियो छंदोबद्ध नै भ' सकैए। छंदोबद्ध रचना अनिवार्यरूपसँ कोनो ने कोनो निश्चित लयमे बान्हल रहै छै। तखन ई कोन छंदोबद्ध रचना थिक। भ' सकैए जे गुंजनजी नव छंदक जन्म देने होथि जेना हिन्दीमे गुलजार त्रिवेणी ओ मैथिलीमे रामदेव प्रसाद मंडल "झारूदार" झारू नामक छंदक अविष्कार केलाह। मुदा गुलजार ओ झारूदार जी ओइ नव छंदक व्यवस्था सेहो देलाह जे ई छंद एना लिखल जाए। मुदा गुंजनजीक पोथीमे एकर अभाव अछि। तँए हम ई मानि रहल छी जे गुंजनजी अन्हार घरमे हथोड़िया दैत मात्र तुकान्त रचनाकेँ छंदोबद्ध कहि गेला। आगू एही भूमिकामे कहल गेल अछि जे " पारंपरिक..... जे गीत-गजल भेटत से अपन सहजतामे"। प्रश्न तँ एहूठाम छै जे गजल तँ केखनो स्वाधीन लयमे होइते नै छै तखन फेर कोन गजल? विषय सूचीमे "कविता क्रम" देल गेल अछि जे सद्यः प्रमाण अछि जे रचनकारकेँ कविता-गीत-गजलक बीच अंतर नीक जकाँ बूझल छनि आ ओ लौल वश सभ विधामे अपन नाम घोसिया रहल छथि वा रचनाकारकेँ ई अंतर सभ नै बूझल छनि जे हुनक ज्ञानक स्तर सेहो भ' सकैए। चूँकि ई पोथी "गीत-गजल सनक किछु संकलन" छै मने निर्विवाद रूपसँ गजल नै छै बल्कि गजल सनकेँ छै ( गीत लेल गीतक आलोचक आबथि आगू) तँए हम आब ऐ पोथीपर बेसी चार्चा नै करब मुदा हम फेरो ई धेआन देआब' चाहब जे गजल नहियों रहैत कोन कारणसँ गुंजनजीकेँ गजलकार मानल गेल। के हुनका गजलकार मानलक। हम ई केखनो नै मानि रहल छी जे गुंजनजीकेँ ज्ञान नै छलनि बल्कि हम तँ हुनक स्पष्टवादितासँ प्रभावित भेलहुँ जे ओ अपन रचनाकेँ गजल नै मानि "गजल सन" मानलथि कारण हुनका पूरा विश्वास छलनि जे हुनक रचना गजलक मापदंडपर नै छनि। मुदा किछु आलोचक प्रभाषजीक आभामंडलमे आबि गुंजनजीकेँ गजलकार बना देलक। आ एहीठामसँ शुरू होइत अछि धुरखेल जैमे स्पष्ट रूपसँ गुंजनजी सेहो भाग लेलथि। गुंजनजी "मैथिली गजल आलोचक" सभहँक अन्हरजालीकेँ नीक जकाँ चीन्हि ओकर फायदा उठौलनि आ अपना-आपकेँ गजलकार मनबाब' लगलथि। आ एहीठामसँ हम हुनक आलोचक बनि गेलहुँ। जै गंगेश गुंजनजीक सपष्टवादितासँ हम शुरूमे प्रभावित रही आब ओही गंगेश गुंजनजीक लौल देखि हम हुनकर कथित गजलक विरोधी छी। पाठक सभ लगमे ई पोथी हेतनि की नै से पता नै तँ आउ अहूँ सभ पढ़ू ई "गीत गजल सन' किछु संकलन" निच्चा बला लिंकपर क्लिक कए कऽ--

http://sites.google.com/a/shruti-publication.com/shruti-publication/Home/DukhakDuphariya_GangeshGunjan.pdf?attredirects=0

Wednesday, 22 January 2014

गजल

शीत सन शीतल तरल उज्जर हँसी
कंच परहँक ओस अछि हुनकर हँसी

आइ चुप छथि ओ बहुत देरसँ किए
काल्हि बड़ ठहकल रहै जिनकर हँसी

गहुमने सनकेँ तँ ईहो तेज छै
ढ़ोरिया सभ हँसि रहल साँखर हँसी

धाह देहक होइ छै अजगुत सनक
गलि क' बहि गेलै तुरत पाथर हँसी

लोकतंत्रक भीड़मे छै पेंच यौ
मोटका सन बुझि पड़ै पातर हँसी


सभ पाँतिमे 2122+2122+212 मात्राक्रम अछि।

Monday, 20 January 2014

गजल

गजल
गजल

हाड़ कँपकपा रहल अछि जाड़ 
देह कनकना रहल अछि जाड़ 

ठाढ़ भेल डाँर कसने दोमि 
टांग थरथरा रहल अछि जाड़ 

बस गरीब आ अमीरी देख 
बोल बड़बड़ा रहल अछि जाड़ 

साज बाज टोप चादर देखि 
माथ धड़ खसा रहल अछि जाड़
कैथरी लदल मनुखकेँ पाबि 
दाँत कटकटा रहल अछि जाड़ 

हाल की कहू अपन राजीव 
मोन चटपटा रहल अछि जाड़ 

२१२ १२१२ २२१ 
@ राजीव रंजन मिश्र 

गजल

गजल

दिन कहुना काटि लेलहुँ राति भारी भ' गेल
कछ्मच्छी फेर मोनक आइ हाबी भ' गेल 

कोनो चीजक कखन ऐ ठाम भेटल ग' दाम
अनढनकेँ सोझ लोकक हाथ कारी भ' गेल 

ललसा छल संग भेटित चारि टा लोककेर
धरि सभ क्यौ पेट खातिर कामकाजी भ' गेल 

ककरा के हाथ जोड़त आ कि आशीष देत
रहि अपने शानमे सभ खानदानी भ' गेल 

अजगुत राजीव ऐ ठा रीत सभटा जगतकँ
बड़ बजने भोथ लोकक वाहवाही भ' गेल 

२२२ २१२२ २१२२ १२१ 
@ राजीव रंजन मिश्र 

गजल

गजल

कखनोकँ मोन सहकि जाइ छै
अनढनकँ  लेल सनकि जाइ छै

जे साँझ भोर रहल गुम सदति
सेहो त' लोक चहकि जाइ छै

ई नेह चीज त' थिक एहने
भेटल कि डाँर लचकि जाइ छै

बड जे कठोर करम बानिकेँ
तकरो त' हाथ झड़कि जाइ छै

राजीव ई त' बुझल बात थिक
चानन पसरि क' गमकि जाइ छै 

221 2112 212
@ राजीव रंजन मिश्र 

गजल

गजल

काटि मनुख जिबिते छागरकेँ
स्नान करत गंगासागरकेँ

दोष सदति ताकत गामक धरि
बानि अपन झरकल बागरकेँ 

आब बहत के तीला चाउर
पेट खगल सभकेँ गागरकेँ

चान चकोरक जोड़ी लाजे
देखि रहल हिय सौदागरकेँ 

मोन अकछि खहड़ल राजीवक
एक भरोसा नटनागरकेँ 

2112  22 222
@ राजीव रंजन मिश्र 

गजल

गजल

आँखि आँखिमे सभटा कहि गेल
बात बातमे जुलमी गहि गेल 

नैन बाणकेँ मारुक खंजरसँ
मोन प्राण अधमारल रहि गेल 

पल उठा क' देखल ओ जखने त'
विश्वमित्र देबालो ढहि गेल

औ नयन कमानक सर बेधलसँ 
वीर हारि टा सगरो महि गेल 

नेह धारमे डूबल राजीव
भोर साँझ सभ तारन सहि गेल 

२१२१ २२२ २२१ 
@ राजीव रंजन मिश्र 

Sunday, 19 January 2014

गजल

प्रस्तुत अछि अमित मिश्र जीक ई गजल


जीतपर हारक कड़ी बनिते छै भाइ
प्रीतपर साढ़े सती लगले छै भाइ

मरि कऽ ओ चलि गेल सबकेँ देने नोर
गाममे ओकर हँसी बचले छै भाइ

सजल मधुशाला भरल डेगे डेगपर
भोज्य बिनु चुप पेट बड भुखले छै भाइ

भेल छै रौदी पियासल धरती सगर
आँखिमे सगरो नमी बनले छै भाइ

हँसि सकी हँसि लिअ जखन धरि कानै "अमित"
दाव ई सबकेँ उलट पड़िते छै भाइ

2122-2122-2221
फाइलातुन-फाइलातुन-मफऊलातु

गजल

ओ केखनो दवाइ बनि गेल
आ केखनो कसाइ बनि गेल

गप्पे छलै पचास बिग्घाक
सभ योजना हवाइ बनि गेल

हम उड़ि रहल छलहुँ अनेरेक
ओ संगमे लटाइ बनि गेल

आँखिक कमाल छै की हँसी केर
मोनक जहर मिठाइ बनि गेल

जेबी हमर ससुर जकाँ बौक
मँहगी तँ घर जमाइ बनि गेल


सभ पाँतिमे 2212+12+1221 मात्राक्रम अछि


Friday, 17 January 2014

गजल


प्रेम कलशसँ अमृत अहाँ पीया तँ दिअ
मुइल जीवन फेरसँ हमर जीया तँ दिअ

काल्हि नै बाँचत शेष जीवन केर किछु
एकटा सुन्नर अपन सन धीया तँ दिअ

रहअ दिअ हमरा आब चाही प्राण नै
मैरतो  बेरीया अपन हीया तँ दिअ 

प्राण बिनु देहक हाल देखू आब नै
बाटपर ओगरने आँखिकेँ सीया तँ दिअ

जाइ छी ‘मनु’ पाछूसँ नै टोकब अहाँ
अपन हाथसँ काठी कनी दीया तँ दिअ

(बहरे हमीम, मात्रा क्रम- २१२२-२२१२-२२१२)
जगदानन्द झा ‘मनु’         

गजलकार परिचय शृखंला भाग-40




काशीकान्त मिश्र "मधुप" 1906-1987

काशीकान्त मिश्र “मधुप”जीकेँ १९७०मे (राधा विरह, महाकाव्य) पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त मैथिलीक भेटलनि। प्रशस्त कवि आ मैथिलीक प्रचार-प्रसारक समर्पित कार्यकर्ता ’झंकार’ कवितासँ क्रान्ति गीतक आह्वान कएलनि । प्रकृति प्रेमक विलक्षण कवि । ’घसल अठन्नी कविताक लेल कथ्य आ शिल्प-संवेदना—दुहू स्तर पर चरम लोकप्रियता भेटलनि। ई आधुनिक मैथिलीक प्राय; पहिल एहन साहित्यकार छथि जे की गद्य नै लिखलनि।

मैथिलीमे हिनक एक गोट गजल उपल्बध अछि जे की पूरा-पूरी अरबी बहरपर अछि।

गजल

मिथिलाक पूर्व गौरव नहि ध्यान टा धरै छी
सुनि मैथिली सुभाषा बिनु आगियें जड़ै छी

सूगो जहाँक दर्शन-सुनबैत छल तहीँ ठाँ
हा आइ "आइ गो" टा पढ़ि उच्चता करै छी

हम कालिदास विद्या-पति-नामछाड़ि मुँहमे
बाड़ीक तीत पटुआ सभ बंकिमे धरै छी

भाषा तथा विभूषा अछि ठीक अन्यदेशी
देशीक गेल ठेसी की पाँकमे पड़ै छी?

औ यत्र-तत्र देखू अछि पत्र सैकड़ो टा
अछि पत्र मैथिलीमे एको न तैं डरै छी
(2212-122-2212-122)
१९३२मे मैथिली साहित्य समिति, द्वारा काशीसँ "मैथिली-संदेश" नामक पत्रिकामे प्रकाशित

Thursday, 16 January 2014

गजल

कहिया हेबै उरीन बाबा
कम छै श्वासक जमीन बाबा

नचलहुँ हम गाम नग्र कारण
ढ़ौआ सनकेँ तँ बीन बाबा

हम्मर झगड़ा छलै घरे भरि
बाहर आनल अमीन बाबा

मजदूरक काज करत रोबो
हँसि रहलै ई मशीन बाबा

भेटत हुनकर सिनेह हमरा
कहिया हेतै सुदीन बाबा



हरेक पाँतिमे 22+2212+122 मात्राक्रम अछि।

Tuesday, 14 January 2014

गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा सम्मान" बर्ख 2013 ( गजल )

हमरा सूचित करैत इ परम हर्खक अनुभव भए रहल अछि जे अनचिन्हार आखर द्वारा प्रस्तुत "गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा सम्मान" बर्ख 2013 लेल ओस्ताद ओमप्रकाशजीक मास सितम्बरमे प्रकाशित हुनक गजलकेँ देल जा रहल अछि। हुनका बधाइ। एहि सालक मुख्यचयनकर्ता छलाह ओस्ताद जगदीश प्रसाद मंडल । हुनका धन्यवाद।


प्रस्तुत अछि ओस्ताद जगदीश प्रसाद मंडल जीक टिप्पणी जे की हमरा मेलपर पठाएल गेल अछि।

गजलक निर्णए-

बिनु गजलकारक परिचय देने आशीषजी नअटा गजल निर्णए करैले पठा देलनि। परिचयक खाहिंस ऐ दुआरे जे के केते दि‍नसँ लिखि रहल अछि। नव-पुरानक विचार तँ करबे अछि। जँ से नै कएल जाएत तँ के केतएसँ शुरू केलनि आ केतए अखनि छथि। संगे, जे नव लिखिनि‍हार छथि हुनकामे कथी नवता छन्‍हि। नवतो तँ नवता छी। पुरान वस्‍त्र रहि‍तो जँ कि‍यो मेघडम्बर ओढ़ि बर्खामे चलै छथि वा मिरजइ पहीरै छथि तँ इतिहासक नजरिये पुरान भलहिं बूझि पड़ए मुदा नव पीढ़ीक लेल तँ नवे हएत। गजल पढ़िते मनपर भार पड़ल। भार भरैक कारण भेल जे ने गजल लि‍खै छी आ ने गजलक शास्‍त्र पढ़ि समीक्षक छी। ओना समीक्षाक जे प्रक्रि‍या अछि ओ एहेन ओझरा गेल अछि जे निर्णए करब समस्‍या बनि गेल अछि। समस्‍या ई जे केतौसँ सि‍मटी, केतौसँ बालु, केतौसँ गि‍ट्टी लऽ सानि-बाटि पीलर ठाढ़ होइए। अपन लूरि एतबे देखै छी जे जे कि‍छु मनमे फूड़ल ओकरा कागतपर उतारि लेलौं। आशीष जीक बिसवासी आदेशकेँ नकारि‍यो तँ नहियेँ सकै छी। मुदा अपन बात दोसर किए बुझता। ओइ नओ (नबो) गजलक पाँति ऐ तरहेँ अछि-

“(१) दर्दसँ भरल छी हम,
(२) कोना अहाँकेँ घुरि कहब आबै लेल,
(३) तरेगण लाख छै तैयो नगर अन्‍हार रहिते छै,
(४) एक ठोप प्रेम चलते तड़पैत छी,
(५) हम जँ पीलहुँ शराबी कहलक जमाना,
(६) मि‍ललौं अपन चानसँ भेल पुलकित मन,
(७) घोड़ा जखन कोनो भऽ नांगर जाइ छै,
(८) पढ़ल पंडित मुदा रोटीक मारल छी,
(९) कहियो तँ हमर घरमे चान एतै।”

नओकेँ देखला पछाति मनमे उठल, गजल की?
वएह ने गीतक संगबे कहबैए। ओहो ने साहि‍त्यक महतपूर्ण अंग छी। मुदा ओहनो अंग तँ नहियेँ छी जेकरा नजरअंदाज कएल जाए। जे शाश्वत कल्‍याणकारक अछि वएह ने सुन्दर भेल।
नओ गजल ऊपरा-ऊपरी अछि। सबहक अपन-अपन उदेस आ रस्‍ता-बाट छै। भाव रूपमे नओ मजगूत अछि, जे खुशीक बात भेल। नओक कि‍छु पाँति- “जिनगी कऽ बाटपर सदिखन, सहि चोट नित चलल छी हम” संकल्प संग जुड़ल अछि। तहिना दोसर गजलक- “बुझलहुँ अहाँ बैसल मोनमे छी हमर, ई दूर गेलौं हमरा कनाबै लेल” जिनगीक बहुत पैघ वि‍चार अछि। तेसर- “गजब छै रीत दुनियाँ केर मरने राख धरि फेकै, मुदा सदिखन सभक मनमे अमिट सन यादि बसिते छै” बहुत पैघ रहस्यक उद्घाटन केलनि। चारिम- “सोन सन जीवन निशामे मातल रहय, तेँ उधारी माँगि दुख पिबैत छी” जीवनक बेवहारिक पक्षक उद्घाटन केलनि। पाँचम- “भटकलहुँ बड्ड भेटेए नेह मोनक, देख मुँह नै करेजक सुनलक जमाना” जेना शिवजीक हि‍मालयमे बैस कि‍छु बाजि रहला अछि। छठम- “ओकर बढ़ल डेगसँ दर्द हरिया उठल, पायलक सुनते स्वर भेल जीबित मोन” पैघ वि‍चार रखलनि। सातम- “खाए कए मौसी हजारो मूषरी, बनि बैसलै कोना कऽ बड़की दाइ छै” छाल्ही खौका बि‍लाइक चर्च सुन्दर ढंगसँ केलनि। आठम- “पढल पंडित मुदा रोटीक मारल छी, बजै छी सत्य हम थोंथीक हारल छी” एक कालखंडक जीवंत चर्च केलनि। नअम- “मानक गुमान धरले रहत एतय, नोरक लपटिसँ झरकिकऽ मान जेतै” संगे दोसर पाँतिमे कहै छथि- “हक अपन "ओम" छीनत ताल ठोकिकऽ, छोड़ब किया, कियो की दान देतै” ‘सूइ अग्रे’ महाभारतसँ लऽ कऽ सीता राम जीक- ‘अछि सलाइमे आगि’ धरिक वि‍चार जेना उगलि देलनि। युगानुकूल गजलक केहेन ध्‍वनि आ झंकार हेबा चाही ई तँ गजलकारे बुझता। नओ गजलमे ‘कहियो तँ हमर घर चान एतै’ सवोपरि गजल अछि। अंतमे, एकटा बात आरो, भाषा आ साहित्य पवित्र धारक धारा छी। जइमे आनो-आन शब्द औत आ भावो एबे करत। तँए भाषा आकि साहित्य मरि जाएत एहेन बात नै। गंगा सदृश्य कारखाना शुद्ध करैवाली छथि, तहि‍ना भवलोकमे भवजाल ने पकड़ि लिअए, ई तँ सबहक जिम्‍मा छियन्हि‍हेँ। आशीषजी, जे जनलौं से केलौं। नै पान तँ पानक डंटीओसँ यज्ञ पूर्ति होइते छै।
जगदीश प्रसाद मण्डल
१३-०१-२०१४ 
प्रतियोगितामे देल गेल ई 9टा गजल एना अछि---

गजल

1
दर्दसँ भरल गजल छी हम
शोकसँ सजल महल छी हम

सुख केर आशमे बैसल
दुखमे खिलल कमल छी हम

भितरी उदास रहितो बस
बाहरसँ बनि हजल छी हम

जिनगी कऽ बाटपर सदिखन
सहि चोट नित चलल छी हम

कुन्दन सुना रहल अछि ई
संघर्षमे अटल छी हम

मात्रा क्रम :२२१२+१२२२

2

कोना अहाँकेँ घुरि कहब आबै लेल
बड़ दूर गेलहुँ टाका कमाबै लेल

नै रीत कनिको प्रीतक बुझल पहिनेसँ
टूटल करेजा अछि किछु सुनाबै लेल

लागल कपारक ठोकर जखन देखलहुँ
नै आँखिमे नोरक बुन नुकाबै लेल

बुझलहुँ अहाँ बैसल मोनमे छी हमर
ई दूर गेलहुँ हमरा कनाबै लेल

कोना कऽ ‘मनु’ कहतै आब अप्पन दोख
घुरि आउ फेरसँ संसार बसाबै लेल

(बहरे- सलीम, मात्रा क्रम-२२१२-२२२१-२२२१)

3

तरेगण लाख छै तैयौ नगर अन्हार रहिते छै
बरू छै भीड़ दुनियाँमे मनुख एसगर चलिते छै

सजल छै आँखिमे सपना नदी नाला हरित धरती
जकर बेटा सुखी ओ माइक श्रृंगार सजिते छै

गजब छै रीत दुनियाँ केर मरने राख धरि फेकै
मुदा सदिखन सभक मनमे अमिट सन यादि बसिते छै

अहा वा आह धरि बाजब अहाँ आ बाट निज पकड़ब
अहींकेँ हास्य अभिनयमे हमर संसार जरिते छै

सगर छै खेल आखरकेँ हँसाबै आ कनाबै छै
कतौ टुटिते हिया छै आ कतौ नव नेह रचिते छै

4
एक ठोप प्रेम चलते तड़पैत छी
मान तोहर चित्र नोरसँ पोछैत छी

प्रीतकेँ पकड़ब सहज नै आँखिसँ बुझू
सत हियाकेँ हाथ लेने हँकमैत छी

आइ बदलल सन लगै छै दुषित हवा
एक जोड़ा मोर तन-मन मिलबैत छी

सोन सन जीवन निशामे मातल रहय
तेँ उधारी माँगि दुख पिबैत छी

धातुकेँ सोना तँ बनबै छै आगिये
तेँ सिनेहक आगिमे तन जड़बैत छी
बहरे जदीद
2122-2122-2212
5
हम जँ पीलहुँ शराबी कहलक जमाना
टीस नै दुख करेजक बुझलक जमाना

भटकलहुँ बड्ड   भेटेए नेह  मोनक
देख मुँह नै करेजक सुनलक जमाना

लिखल कोना कहब की की अछि कपारक
छल तँ बहुतो मुदा सभ छिनलक जमाना

दोख नै हमर नै ककरो आर कहियौ
देख हारैत   हमरा हँसलक जमाना

दर्द जे भेटलै    नै ‘मनु’ कनी बूझब
आन अनकर कखन दुख जनलक जमाना
6
मिललौँ अपन चानसँ भेल पुलकित मोन
बीतल पहर विरहक भेल हर्षित मोन

छल आँखि सागर ताहिसँ सुनामी उठल
बहलौँ तकर वेगसँ भेल विचलित मोन

बाजल तँ जेना बुझु फूल झहरल मुखसँ
ठोरक मधुर गानसँ भेल शोभित मोन

ओकर बढ़ल डेगसँ दर्द हरिया उठल
पायलक सुनते स्वर भेल जीबित मोन

प्रीतक तराजू पर तौललौँ धन अपन
विरहक दिया जड़ते भेल पीड़ित मोन
बहरे सलीम ,मात्राक्रम २२१२ २२२१ २२२१
7
घोड़ा जखन कोनो भऽ नाँगड़ जाइ छै
कहि ओकरा मालिक झटसँ दै बाइ छै

माए बनल फसरी तँ बाबू बोझ छथि
नव लोक सभकेँ लेल सभटा पाइ छै

घर सेबने बैसल मरदबा छै किए
चिन्हैत सभ कनियाँक नामसँ आइ छै

कानूनकेँ रखने बुझू ताकपर जे
बाजार भरिमे ओ कहाइत भाइ छै

खाए कए मौसी हजारो मूषरी
बनि बैसलै कोना कऽ बड़की दाइ छै

पोसाकमे नेताक जिनगी भरि रहल
जीतैत मातर देशकेँ ‘मनु’ खाइ छै
(बहरे रजज, मात्रा क्रम २२१२ तीन तीन बेर)
8
पढल पंडित मुदा रोटीक मारल छी
बजै छी सत्य हम थोंथीक हारल छी

बुझू कोना सबसँ काते रहै छी हम
उचितवक्ता बनै छी तें त टारल छी

दियादेकें घरक घटना मुदा धनि सन
कटेबै केश कियै हम जँ बारल छी

मधुर बनबाक छल भेलौं जँ अधखिज्जू
सत्ते नोनगर लाड़ैनेंसँ लाड़ल छी

लगै छल नीक नाथूरामकेँ पोथी
मुदा गाँधीक साड़ा संग गाड़ल छी

किओ ने पूजि रहलै कोन गलती यौ
बिना सेनूर अरिपन 'पुष्प' पाड़ल छी
1222 1222 1222 सब पाँतिमे
9

कहियो तँ हमर घरमे चान एतै
नेनाक ठोर बिसरल गान गेतै

निर्जीव भेल बस्ती सगर सूतल
सुतनाइ यैह सबहक जान लेतै

मानक गुमान धरले रहत एतय
नोरक लपटिसँ झरकिकऽ मान जेतै

सुर ताल मिलत जखने सभक ऐठाँ
क्रान्तिक बिगुलसँ गुंजित तान हेतै

हक अपन "ओम" छीनत ताल ठोकिकऽ
छोडब किया, कियो की दान देतै
(दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ)-(ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ)-(ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ)

(मुस्तफइलुन-मफाईलुन-फऊलुन)- प्रत्येक पाँतिमे एक बेर

गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा सम्मान" बर्ख 2013 ( बाल गजल )

हमरा सूचित करैत इ परम हर्खक अनुभव भए रहल अछि जे अनचिन्हार आखर द्वारा प्रस्तुत गजल कमला-कोशी-बागमती-महानंदा" सम्मानक ( बाल गजलक लेल )बर्ख 2013 लेल ओस्ताद अमित मिश्र जीक मास जनवरीमे प्रकाशित हुनक बाल गजलकेँ देल जा रहल अछि। हुनका बधाइ। एहि सालक मुख्यचयनकर्ता छलाह ओस्ताद परमेश्वर कापड़ि । हुनका धन्यवाद।
प्रस्तुत अछि ओस्ताद परमेश्वर कापड़ि जीक टिप्पणी जे की हमरा मेलपर पठाएल गेल अछि।
बालगजल विमर्श

मैथिली गजलक कहबैका बडैता आशीषजी खूब बेसी चिन्हल–जानल काव्य–पुरुष छथि, एहन रचनाधर्मी मुखपुरुख “अनचिन्हार” कोना भ’ सकैछ? गजलके अपन खास प्राविधिक शब्द–भाव होइते अछि । उर्दू-फारसीसँ हिन्दी होइत, गजल मैथिलीक रचनाधर्मी अंगनइ धएने अछि आ शुरुमे ई प्रेम–विछोह, राग–विरोग, हास्य–रोदन, कुन्ठा–संत्रास आदिके गढने–मढने चतरल, पसरल विश्व परिभ्रमण करैत रहल । मैथिलीमे एकर भाव–भंगिमा आ विषय परिदृष्य बेछप रहल अछि । युगीन–सत्य, लोकयथार्थ आ समकालीन सन्दर्भक गुण–वानि आ लेप–रंग लागल अछि । एहनमे कहल जा सकैछ जे मैथिली गजल–संसारक ऐतिहासिकता आ रचनाधर्मीताक अपन खास व्याकरण, परिधि आ परिधान रहल अछि ।
मैथिली बाल संसारक अपन खास पहचान  आ पहुँच रहल अछि । ई बहुत मनभावन, सरस आ मधुर बोल–भासक रहने, बालसंसारमे बहुत प्रचलित रहल अछि । एते होइतो आधुनिक बालगीतक सभटा जड़ि–मूल बाल लोक–भाषा, बाल–मनोविज्ञान आ बालबोध, खेल संचेतना एकरा सङ लागल रहल अछि । इएह कारणे बाते बालगीतक अलग सिद्धान्त ओ व्याकरण खास नहि रहल अछि । बालगजलक रचना परम्परा बहुत एम्हर अस्तित्वमे आएल अछि । ईहो बहुत महत्वपूर्ण सत्य–तथ्य अछि जे बाल गजलक शास्त्रीयता आ सौन्दर्य–विज्ञानक संद्धान्तिक चर्चा–परिचर्चा एतए नहि भेल करैछ । बालगजल लेखनक जे परम्परा प्रचलनमे रहल अछि ओ गजलके अन्भुआर देखा दिखीस’ । एहनमे, काव्य विषयक हमरा सन लोथ–भोंथ भकोलके लेल बालगजल विषयपर मुह खोलब, गाल बजाएब होएत । आ अपने चिन्हार होइतो हमरा, अनचिन्हार कहि परिचय देनिहार आशीष अनचिन्हारजी ५टा गजल पठा एहिपर मन्तव्यात्मक विचार देवाक लेल कहिक’ दुबिधा, दूमाङिमे ध’ देल अछि ।
प्रेषित गजलपर चर्चा करबासँ पहिने एक दूटा बात आओर अपनेके मन पाड़ि दी । बालपन, नेनपनसँ मातल रहैत अछि । अपूर्व कल्पना शक्ति आ अपन खास भाव–जगत होइत छै । बच्चा गाछ–वृक्षसँ बतिया सकैछ । ओएह बालुएके दालि–भातक भोज खा’-खिया सकैछ । ठेङे लाठीके घोड़ा आ पिढ़ीएके मोटर, पिटने मुसराके बौआ आ लते–कपड़ाके कनिया–वर स’ खेलि सकैत अछि । चन्दामामाके खीर–पुरीके भार आ परी–निनियाके झुला मचकीस’ रमा’ अघा सकैत अछि । एकर प्रत्येक खेल लीलामय होइछ आ रसके हिसाबस’ बालगीतमे छौटा रस मात्रे होइछ । सौन्दर्य, विरह, विभत्सादि रसके ओकरा कोनो लेन–देन, माने मतलब नहि रहैछ । ओकर प्रत्येक खेल लीलामय होइछ आ सब खेलके खेल गीत होइत अछि ततबे नहि प्रत्येक वय आ विद्याक गीतके अलग–अलग शब्द भास होइछ । एहि सव कारणे शिशुगीत, बालगीत, बाल खेलगीत आ युवागीत–साहित्य होइत । हमरा जनिते ई सब गजल युवा साहित्यक अन्तरगत अबैत अछि ।
समकालीन रचनाधर्मीताक विषय–परिदृश्य आ भावमूमिक सौन्दर्य–व्याकरणमे युग–सत्य, लोकयथार्थ, सामाजिक सौन्दर्य तथा आन्दोलन परिवर्तनक आकांक्षा तथा अनुरागक ताव–तबर देएमे अबैछ । एहि क्रममे एहि पाँचो गजलके अंटकारने, परेखने बिचला तीन गजल सीझल, सपरल नहि लगैछ । पहिलुका गजल “दू टा बस सोहारी चाही माँ कम्मे त तरकारी चाही” सुन्नर आ महत्वपपूर्ण लगैत अछि । नजरि आ मूल्यांकनक दृष्टि आ दृष्टिकोण व्यक्ति, विद्या आ संस्कार–संस्कृति सापेक्ष होइछ । तएँ कोनो टिप्पणी एवं समीक्षा अन्तिम, परम नहि होइछ । तैयो एतेक त’ कहल जा सकैछ जे सांस्कृतिक उत्कर्ष, जातिए राग रंगमे मातल बोरल, पावनि अति महत्वपूर्ण आ पावन होइछ । एकरे सुन्नर सुभक रंग–भासमे साजि सीटिक’ गढल अमितक गजल बहुत उत्कृष्ट आ बाल मनभावन अछि –
उपहार लेने तँ आबै पावनि कते
हँसनाइ सदिखल सिखाबै पावनि कते

टिकरी बनै आ बनै पेड़ा परिकिया
तें लेर सबहक चुआबै पावनि कते

फूटै कतौ फट्टका आ अरिपन बनै
घरमे बगैंचा सजाबै पावनि कते

सब लोक आबैछ पावनिमे घर अपन
बिछुरल अपनकें मिलाबै पावनि कते

प्रतियोगितामे देल गेल ई ५टा गजल एना अछि---



दू टा बस सोहारी चाही
माँ कम्मे तरकारी चाही

पुरना छिपलीमे नै खेबौ
हमरो नवका थारी चाही

हमहूँ जेबै इसकुल बाबू
पूरा सभ तैयारी चाही

हाटसँ आनू पोथी-बस्ता
मौजा-जूता कारी चाही

इसकूलक जलखैमे हलुआ
पूरी आ तरकारी चाही

छीटब बीया गाछो रोपब
आँगन लग फुलवारी चाही

"नवल"सँ नै हम लट्टू माँगब
हमरो कठही गाड़ी चाही
 मात्रा क्रम : आठ टा दीर्घ सभ पांतिमे

        
फेर एलै दिवाली लेबै फटक्का
फोरबै मिल कए सभ मारत ठहक्का

बड़ रमनगर बुस’ट नव अनलन्हि मामा
देखते सभ भऽ गेलै कोना कऽ बक्का

घीक लड्डू दुनू हाथे दैत भरि भरि
अपन बेटाक कोजगरामे तँ कक्का

दौड़ चलबैत सासुरकेँ फटफटिया
हरसँ भरि थालमे सौंसे फसल चक्का

आइ कुसियारक ट्रककेँ परल पाँछा
संगमे ‘मनु’क गामक छौंड़ा उचक्का

(बहरे असम, मात्रा क्रम- २१२२-१२२२-२१२२)


तिला संक्रातिकेँ खिच्चैर खाले रौ हमर बौआ
ल’जेतौ नै तँ कनिए कालमे ओ आबिते कौआ

चलै बुच्ची सखी सभ लाइ मुरही किन क’ आनी
अपन माएसँ झटपट माँगि नेने आबि जो ढौआ

बलानक घाट मेलामे कते घुमि घुमि मजा केलक
किए घर अबिते मातर बुढ़ीया गेल भय थौआ

कियो खुश भेल गुर तिल पाबि मुरही खुब कियो फाँकेँ
ललन बाबा किए झूमैत एना पी कए पौआ

सगर कमलाक धारक बाटमे बड़ रमणगर मेला
सभ कियो ओतए गेलै कि भेलै ‘मनु’ कुनो हौआ

(बहरे रमल, मात्रा क्रम १२२२-१२२२-१२२२-१२२२)
जगदानन्द झा 'मनु'


इमली उपर चढ़ि भूत बैसल रहै छै
की राति भरि तेँ गाछ जोरसँ बजै छै

पाथर किए उठि जाइ छै पानिमे कह
हल्लुक उतप्लावन बलसँ बड लगै छै

लागैछ खेलक बाद बड भूख सबकेँ
ई खेल सबमे बहुत ऊर्जा जड़ै छै

एना किए दिन राति सब होइ छैकह
धरती सदति सूरजक चक्कर घुमै छै

ई जाड़ गर्मी सब कखन होइ छै कह
सूरज जखन लऽग दूर जा जा बसै छै

मुस्तफइलुन-मुस्­तफइलुन-फाइलातुन
2212-2212-2122
बहरे-सरीअ


उपहार लेने तँ आबै पावनि कते
हँसनाइ सदिखन सिखाबै पावनि कते

टिकरी बनै आ बनै पेड़ा परिकिया
तेँ लेर सबहक चुआबै पावनि कते

फूटै कतौ फट्टका आ अरिपन बनै
घरमे बगैचा सजाबै पावनि कते

सब लोक आबैछ पावनिमे घर अपन
बिछुरल अपनकेँ मिलाबै पावनि कते

नव रंगमे सजल आँगन लागै "अमित"
नेनाक छुट्टी बनाबै पावनि कते

मुस्तफइलुन-फाइलातुन-मुस्तफइलुन
2212-2122-2212

गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा सम्मान" बर्ख 2013 ( आलोचना-समीक्षा )

बर्ख २०१३मे समीक्षा, आलोचना,समालोचना आदि नैकेँ बराबर भेल तँइ " गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा सम्मान" ( समीक्षा, आलोचना,समालोचना प्रभाग)केँ ऐ बर्ख लेल स्थगित कएल गेल अछि।

Monday, 13 January 2014

गजल

गजल

जिनगी जतरा छै मानि चलल हम
पोथी पतरा नै गानि रहल हम

देखल ककरो नै चाँकि कनिकबो
डाहल मोनक निज आप जरल हम

कनकन ठंढीमे ठिठुरल महि धरि
नेहक धधरा ने तापि सकल हम

टोकल ककरो नै गाम नगर बस
नै झूकल आ नै कात हटल हम 

धरनी ज्ञानक थिक स्वर्णकलश बुझि
ठोपे ठोपे बुरिलेल चखल हम 

गुमसुम अपनामे राजीव पड़ल नित
कबिलाहाकेँ कुटिचालि गमल हम 

२२२२ २२१ १२२ 
@ राजीव रंजन मिश्र 

Sunday, 12 January 2014

गजल

गजल- 1.78

हँसि हँसि कऽ दिअ वा कानि कऽ
ओ प्रीत दिअ बस आनि कऽ

अछि गीत अखरा लय बिनु
की करब मुखड़ा जानि कऽ

छथि इन्द्र मुट्ठी बान्हि कऽ
बरखा करत की तानि कऽ

बड करब आदर हम सब
देखू अपन बस मानि कऽ

अछि मरल लाखो प्रेमसँ
देखू तरेगण गानि कऽ

2212-2211
अमित मिश्र

गजल

गजल- 1.79

टूटि रहलै, की बरकि रहल अछि पाथर
वा दुखक मारिसँ चटकि रहल अछि पाथर

नोचि लेलक नरगिद्ध कते नारी तन
देख ई जगकेँ सिसकि रहल अछि पाथर

झूठ फूसिक गप आ सब फाँसी चढ़लै
जज बिकल छल तेँ भड़कि रहल अछि पाथर

मोल केवल पदवीक बरू मुँह कारी
अङगुरीमे सजि चमकि रहल अछि पाथर

बोल मिठका मन जीतत सब जानै छै
बनि कऽ दिल मोमक छलकि रहल अछि पाथर

2122-2211-2222
अमित मिश्र

गजल

गजल-1.80

मिझाएल आगिकेँ पजारि दियौ
कते जोश अछि चलू भियारि* दियौ

सुनू मरि रहल हियाक मारल सब
मुसकिया कऽ साँस धरि नमारि दियौ

मनुख छी तँ सगर नेह-फूल बनू
अपन मनक काँटकेँ बहारि दियौ

रहब कोन विधि अहाँ नरक जगमे
सही योजना चलू विचारि दियौ

सुनू हमर बाँहिमे बचल बल नै
"अमित" झँपल क्रांतिकेँ उघारि दियौ

1221-2121-2112
अमित मिश्र

Saturday, 11 January 2014

गजल

गजल

थाकल जे मरि गेल जगतमे
भेटत की फुसियाहि बहसमे 

की जीतल आ हारि चलल की
जानल के ई बात सहजमे

डाहब सदिखन मोन अपन टा
मतलब ककरा गाम नगरमे

दुनियाकेँ ई खेल पुरनगर
लचरल बुरिबक बीच भँवरमे

करमक सभ राजीव नतीजा
ककरो नै लहि गेल अचकमे

२२२ २२१ १२२ 
@ राजीव रंजन मिश्र 

गजल

गजल

सभ लागल रही साल बीतैत रहल
बिलमल नै कनी साल बीतैत रहल
  
अछि झोँका चलल प्रश्नकेँ एक सए
भेटल की कथी साल बीतैत रहल

बस देखा क' चलि गेल सपने त' बुझू
जनि सुन्नरि परी साल बीतैत रहल

अछि शुरुआत पुनि देह मरदनसँ धियक
टूटल नै कड़ी साल बीतैत रहल

आबो व्यर्थ नै होइ राजीव समय
नबका किछु करी साल बीतैत रहल
  
222 1221 22112 

@ राजीव रंजन मिश्र 

Wednesday, 8 January 2014

गजल



मनुख माल जालकेँ लजा देलक 
छिया डेग डेग पर घिना देलक 

कुकरमी त' भेल पातकी देखू 
सहकि नाक कान सभ कटा देलक 

सजा फेर एक नारि हेबाकें 
सहल ओ धिया हिया कना देलक  

चलल खेल धरि लहास पर सेहो 
सगर राजनीति सभ चला देलक

जँ राजीव आब बानि नै बदलल  
बुझब व्यर्थ प्राण ई धिया देलक 

१२२१ २१२ १२२२ 
@ राजीव रंजन मिश्र 

Friday, 3 January 2014

गजल

गजल-1.77

हुनक आँखिक नोर हम देखने छी
भेल नै जे भोर हम देखने छी

साफ नभपर मेघ बनि बरसि गेलै
ठोप दू इन्होर हम देखने छी

प्रीत छै वा और किछु ओहि दिलमे
जहर पोरे-पोर हम देखने छी

आइ मुट्ठीमे बचल राख केवल
काल्हि छल अंगोर हम देखने छी

पत्र भेटल "अमित"केँ आइ धरि नै
पर मनक सब जोड़ हम देखने छी

2122-212-2122
*पर= परञ्च/मुदा, मिथिलाक विभिन्न क्षेत्रमे "पर"क उच्चारण "परञ्च"क बदले होइत अछि ।

अमित मिश्र

Thursday, 2 January 2014

गजल

गजल-1.76

आब किताबेमे लाज धाख देखू
चुप रहि केवल नबका सियाख देखू

घोर छुआछूतक पढ़ब पाठ मीता
छूबि कने अस्थिक आइ राख देखू

नै जँ दहलि गेल हृदय तखन बाजब
सर्कसमे जन सिसकैत लाख देखू

राति-दिनक अन्तर बूझि लेब तखने
हमर कुटिर, ओकर साफ ताख* देखू

छोड़ि कऽ भागब शिक्षा विभाग मीता
गामहि टा मे शिक्षकक साख* देखू

*ताख= छज्जी
*साख= प्रतिष्ठा
2112-2221-2122
अमित मिश्र

गजल

आइ लव यू शिव
हियसँ बाजू शिव

मोन मन्दिरमे
सभ सजाबू शिव

गीतमे सदिखन
मात्र गाबू शिव

भक्ति घट घटमे
भजि जगाबू शिव

एक नारा बस
नित लगाबू शिव

२१२२-२

© कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

हमरा दया आ दुआ दुन्नू चाही
भगवान संगे खुदा दुन्नू चाही

सभ ठीक छै ठीक छै सभ ठीके छै
कुटियासँ कटिया पता दुन्नू चाही

नेता तँ अछि नीक मिश्रण संसारक
सज्जन मुदा बेठुआ दुन्नू चाही

ऐ क्रांतिमे जोश अनुभव सभ लागत
तँइ बूढ़ संगे युवा दुन्नू चाही

शुभकामना अछि अहाँकेँ सुख सागर
हमरा सजा आ मजा दुन्नू चाही

भौजी जँ हारथि तँ भैयाजी आबथि
हुनका तँ घर आ जथा दुन्नू चाही



मतलाका पहिल पाँति लोकप्रचलित शब्दावलीपर अधारित अछि।

सभ पाँतिमे 2212+2122+222 मात्राक्रम अछि।

अपने एना अपने मूँह-22

मास दिसम्बर २०१३मे कुल २०टा पोस्ट भेल जकर विवरण एना अछि---

जगदानंद झा मनु जीक कुल ४टा पोस्टमे ४टा गजल आएल।
कुंदन कुमार कर्णजीक १टा पोस्टमे १टा गजल आएल।
अमित मिश्र जीक ६टा पोस्टमे ६टा गजल आएल।

आशीष अनचिन्हारक १०टा पोस्टमे--- ४टा गजल, २टा भक्ति गजल, १टा अपने एना अपने मूँह आ २टा पोस्टमे जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल जीक २टा आलोचना प्रस्तुत कएल गेल।

Wednesday, 1 January 2014

गजल



मरजादाक भान रखने मान होइ छैक सदिखन
निकहा लेल संग अनका आन होइ छैक सदिखन  

इतिहासक उनटि जँ पन्ना लिअ' त' यैह टा कहत जे
रहने नीक दल सफल कप्तान होइ छैक सदिखन 

गप बाजब अमेरिकाकेँ नीक थिक खराब नै धरि
काजक लोककेँ अपन खरिहान होइ छैक सदिखन 

नेता आचरणसँ निज आदर्श श्रेष्ठ भेल तहने
दुनियामे तकर यशक गुनगान होइ छैक सदिखन

बुझि राजीव गेल करतब आ सिमान अपन से
मनुखक रूपमे पुनमकेँ चान होइ छैक सदिखन

२२२१ २१२२ २१२१ २१२२ 
@ राजीव रंजन मिश्र  

गजल



अपन संग होइक बस सभ हालमे 
नवल सोच होइक ऐ नब सालमे 

चलू फेर सभ गोटे मिलि जाइ आ 
खिला दी कमल सगरो महि थालमे 
बदलि लेब दुनियाकेँ अपनेसँ हम
रहत फेर तागत नै जंजालमे  

समयकेँ त कोसब वीरक बानि नै 
बड़ी शान सौरभ छै सुरतालमे 

सखा यैह राजीवक शुभकामना 
रही स्वस्थ सुधिगर सभ सभकालमे 

१२२१ २२२ २२१२ 

@ राजीव रंजन मिश्र

गजल

नव बरखक नव सोच नवल हो
नव हरखक  नव शक्ति सबल हो

हो मंगलमय सभ तरहेँ जिनगी
प्रेमक अमृत  रस धार बहल हो ​

जाति धरम कुटुम्बक नहि रगड़ा
पसरल घ्रिणाक देवाल ढ़हल हो

पावन मधुर  सुर​-ताल  जल हो
असल अजादीक दीपक धवल हो

सत ज्ञान-पुंजक प्रबाह प्रबल हो
मातु पिता आ गुरु चरण कमल हो

वर्ण १४
तिथि: ०१/०१/२०१४

©राम कुमार मिश्र
तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों