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बुधवार, 1 जुलाई 2015

गजल

आनक सुख देखि क' कानि रहलै लोक
अपनाकेँ भाग्यहीन मानि रहलै लोक

आमदक स्त्रोत नै, खर्चक द्वार बहुतो
एक्कै पाइ बेर-बेर गानि रहलै लोक

बिसरि अपन भाषा, अपन संस्कारकेँ
अंग्रेजी संस्कृति एत' आनि रहलै लोक

पीबि लेलक घोरि-घोरि लाज-लेहाजकेँ
तनिको नै पैघकेँ गुदानि रहलै लोक

गाम-गाम जरि रहल दंगा-फसादमे
घूमि-घूमि जग्गह ठेकानि रहलै लोक

वर्णिक बहर, वर्ण-15

गजल

प्रेममे मीता, बेरबाद छी हम
मूल छथि ओ, अनुवाद छी हम

प्रीतक भाषा, हुनका ठोर अछि
आ दुख भीजल संवाद छी हम

सुखक जिनगी संग काटलहुँ
दुखमे किए, अपवाद छी हम

प्रीतक फसलि, जरलै खेतमे
गिरहत ओ, खाली खाद छी हम

हुनकासँ एहने संबंध, जेना
ओ दिल्ली, आ इस्लामाबाद छी हम

वर्ण-12

शुक्रवार, 26 जून 2015

गजल


नै हरियर नै पीयर छै बेरंगक ई जीवन
नै नोनगर नै मधुर छै बेढ़ंगक ई जीवन

मुहँ बान्हल नदी नै मिलत कहियो जलधिमे
ओहने व्याकुल बेकार बेउमंगक ई जीवन

की सुनत लोक गीत नाद आ की सुनत गजल
पीड़ा कराह सुनि भेल बेतरंगक ई जीवन

कठपुतली भ' नाचै लोक लोकक आँगुर पर
एहि ठाँ गोर हाथ रहितो अपंगक ई जीवन

आब जीयल दुलर्भ छै महँगी आ बइमानीसँ
भेल भ्रष्ट्राचारी तराजूक पासंगक ई जीवन

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 18
© बाल मुकुन्द पाठक

गजल


छै सगरो अन्हार ,किछु नै सुझा रहल अछि
आब केम्हर जाउ ,किछु नै फुरा रहल अछि

मीठ-मीठ गप्प कहि ,जे सत्ता धरि पहुँचल
ओ अंगुरी पर जनताके नचा रहल अछि

जहियासँ फाँट पड़लै खेतसँ घराड़ी धरि
अपनो घर तँ आन सन बुझा रहल अछि

जे रहैत छल शानसँ यौवनमे सभ दिन
ओ बुढ़ारीमे भूखसँ बिल-बिला रहल अछि

जाहि माटिक संस्कारसँ लोक गेलै चान धरि
ओहि माटिके खराब ओ बता रहल अछि

स्वार्थेटा पैघ भेलै आब आजुक व्यवहारमे
पाइ-पाइ लेल लोक -वेद बिका रहल अछि

 वर्ण-17

 © बाल मुकुन्द पाठक

गजल

खाली फूसिक व्यापार हम देखलहुँ संसारमे
हाल सत्यक लचार हम देखलहुँ संसारमे


की टी.वी. ,की अखबार ,सभमे एतबे समाचार
चोरि ,हत्या ,बलात्कार ,हम देखलहुँ संसारमे

जखनेसँ दंगा भेल ,जाति-पाति केर नाम पर
चमकैत तलवार ,हम देखलहुँ संसारमे

की हाट ,की बजार , छै सभ पर महगी सवार
भूखे जिनगी पहाड़ ,हम देखलहुँ संसारमे

मोन पड़ै घर-द्वार ,गामक पोखरिक मोहार
आ ओ पावनि-तिहार ,हम देखलहुँ संसारमे

सगरो व्याप्त अत्याचार ,छै अनठेने सरकार
सूतल हवलदार , हम देखलहुँ संसारमे

वर्ण-18
  © बाल मुकुन्द पाठक

गजल‬

मोनक बेथा ने ककरोसँ कहू
एहि मामिलामे अहाँ चुप्पे रहू

टीस कतबो किए ने बढ़ि जाए
मोने-मोन कानू, मोने-मोन सहू

प्रेमसँ समाज, प्रेमेसँ संसार
प्रेमसँ अहाँ सभक संग रहू

पैघक बात खराबो जौं लागए
सुनिकेँ रहू, उत्तर जुनि कहू

काँट भरल छै बाट जिनगीक
'मुकुन्द' नहुँ-नहुँ बढ़ैत रहू

 वर्ण-12
 © बाल मुकुन्द पाठक

गजल

जे रहैत छल लगमे, ओ दूर भ' गेल
हमर सौंसे करेज भूरे-भूर भ' गेल

बहुते यत्नसँ, घर प्रेमक बनेलहुँ
छुटिते संग सब, चकनाचूर भ' गेल

हाव-भाव ओकर ततेक ने बदलल
ओ बैर नहि रहल, ओ अंगूर भ' गेल

जाहि प्रश्नक उत्तर, बूझल नै हमरा
वैह प्रश्न किएक सोझाँ हुजूर भ' गेल

घुरि आउ मुकुन्द, अहाँ कोनो शर्त पर
आब शर्त सब हमरा, मंजूर भ' गेल

वर्ण-15.

 © बाल मुकुन्द पाठक

सोमवार, 24 जून 2013

गजल

गजल

हम हाल की कहौँ आब बेहाल अछि
बड्ड कठिनसँ बीतल ई साल अछि

जानि नै मृत्यु हाएत केहन हमर
जीबैत जिनगी बनल जंजाल अछि

भ्रष्ट्राचारक गप्प जुनि करु भाइ यौ
नेता अफसर घूसलऽ नेहाल अछि

खूब मजा करु जा धरि अछि जिनगी
काल्हि लऽ जेबाले बैसल उ काल अछि

साँच बाजनिहार नै अछि कोनो ठाम
यौ फूसिक व्यापारमे बड्ड माल अछि

कलपै कानै भीतरे भीतर 'मुकुन्द'
प्रेममे सभक होएत ई हाल अछि

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 14
© बाल मुकुन्द पाठक ।।

गजल

गजल

जहियासँ अपन घर नाहि अछि
तहियासँ केकरो डर नाहि अछि

मोनक बात केकरा कहब आब
ऐहि ठाम कियौ हमर नाहि अछि

वियोगे हमतऽ कलपौँ असगर
अहाँ पर कोनो असर नाहि अछि

सास-पूतोहमे कलह मचल छै
बाँकी ऐहिसँ कोनो घर नाहि अछि

माँग बढ़ल दहेजक चहुँ दिस
आदर्श वियाहक वर नाहि अछि

सभ ठाम दंगा पसरल 'मुकुन्द'
शीश सहित कोनो धड़ नाहि अछि

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 13
© बाल मुकुन्द पाठक ।।

गुरुवार, 16 मई 2013

गजल

गजल

रौद आ बिहाड़िसँ जे लड़ल अछि एहि ठाम
ओतबे गाछ पैघ भऽ बचल अछि एहि ठाम

भूखल छथि राति दिन जाहि लेल गरीब यौ
किनको खरिहानमे सड़ल अछि एहि ठाम

एहि टेक्निकल युगमे बी ए केने हाएत की
एम ए कऽ गाम गाम पड़ल अछि एहि ठाम

जे विपत्तिमे धैर्य राखि लागल अछि काजमे
ओ नभमे चान बनि सजल अछि एहि ठाम

भ्रष्टाचारी शासनमेँ बीकल सरकारी सीट
चुप्पी मारि लोक घरे सूतल अछि एहि ठाम

गेल युग श्रवणकेँ माँ बापक कोनो मोले नै
बूढ़ पूराण पूतसँ डरल अछि एहि ठाम

सरल वार्णिक बहर ,आखर 17
© "बाल मुकुन्द" ।।

गजल

गजल

मिललौँ अपन चानसँ भेल पुलकित मोन
बीतल पहर विरहक भेल हर्षित मोन

छल आँखि सागर ताहिसँ सुनामी उठल
बहलौँ तकर वेगसँ भेल विचलित मोन

बाजल तँ जेना बुझु फूल झहरल मुखसँ
ठोरक मधुर गानसँ भेल शोभित मोन

ओकर बढ़ल डेगसँ दर्द हरिया उठल
पायलक सुनते स्वर भेल जीबित मोन

प्रीतक तराजू पर तौललौँ धन अपन
विरहक दिया जड़ते भेल पीड़ित मोन

बहरे सलीम ,मात्राक्रम २२१२ २२२१ २२२१
© बाल मुकुन्द पाठक

शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

गजल

गजल

पिया बिन ऐहि घर रहिये कऽ की करबै

विरह सन आगिमे जड़िये कऽ की करबै

अपन कनियाँ जखन कहि नै सकब हमरा
पिया करमे अपन धरिये कऽ की करबै

निवाला जखन नै भेटत तँ बुझबै दुख
गरीबक दुख अहाँ सुनिये कऽ की करबै

उड़ाबै देखि खिल्ली लोक हमरा यौ
समाजक बनि हँसी रहिये कऽ की करबै

जखन दर्दक इलाजेँ नै अहाँ लग यौ
तखन बेथा हमर सुनिये कऽ की करबै

बहरे हजज ,मात्रा क्रम १२२२ तीन बेर
© बाल मुकुन्द पाठक ।।

मंगलवार, 29 जनवरी 2013

गजल ,

गजल

आँखि सूतल छै मोन जागल कियै छै
गाछ सूखल छै पात लागल कियै छै

भटकि रहलौँ हम नौकरी लेल जुग मेँ
भाग फूटल छै आस लागल कियै छै

प्रेम मेँ हुनकर टूटि गेलै करेजा
शांत मन तैयोँ आगि लागल कियै छै

गाम रहि रहि केँ याद आबैत रहतै
मोन विचलित छै फेर भागल कियै छै

अपन पीड़ा बेसी बुझाएत तैयोँ
शीश काटल छै देह लागल कियै छै

राति दिन ई सोचैत बाजै मुकुन्दा
नाम ई ओकर आब पागल कियै छै

बहरे - खफीफ ,मात्रा क्रम २१२२-२२१२-२१२२
© बाल मुकुन्द पाठक ।।

गजल ,

गजल

साहीक कांट घटैत गेलै रुप सोहागक बरहैत गेलै
तेल आ बाती सठैत गेलै भूख प्रकाशक बरहैत गेलै

लूट काट दंगा फसादसँ समाज एतोँऽ बनल कुलषित
लोक जतै कटैत गेलै समाज सुधारक बरहैत गेलै

धर्मक व्यापार करै लोक एतोँऽ ठगै निज भेष बदलि कऽ
लोकक आस्था घटैत गेलै काज पंडितक बरहैत गेलै

छैन मातृभूमिक नै कोनो चिँता धन लेल ई नेता बनथि
आ मुद्रास्थिति खसैत गेलै गरीबी देशक बरहैत गेलै

लोक एतोँऽ अछि बनल हत्यारा बेटी जानि भूर्ण हत्या करै
स्त्रीक संख्या घटैत गेलै आ राशि दहेजक बरहैत गेलै

देखि सिनेमा बढ़ल फैसन देखूँ मिथिला यूरोप बनल
संस्कार कियै घटैत गेलै नग्नता देहक बरहैत गेलै

सरल वार्णिक बहर ,वर्ण 22
© बाल मुकुन्द पाठक ।।

गजल ,

गजल

जिनगीक सुख दुख कहैत अछि गजल
जगक सभ कोण मेँ रहैत अछि गजल

सुखी होए किओ वा चाहे होए दुखी भऽ गेल
प्रेमक सरस जेना बहैत अछि गजल

बेदर्द जिनगीमेँ बहैए नोरक सागर
दर्दक दबाइ ओतै बनैत अछि गजल

देखूँ अपन मिथिलाकेँ लोक समाज सभ
मैथलीयोँ मेँ तँ नीक बनैत अछि गजल

बेपर्द जिनगीके देखाबैत आछि अंग ई
आन्हरोँ के आँखि बनि रहैत अछि गजल

मोनक बात कहै बुढ़ कहै जुआन कहै
ओहि बात के धुन मेँ गढ़ैत अछि गजल

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 16
©बाल मुकुन्द पाठक ।।

शनिवार, 29 दिसंबर 2012

हजल


हजल

देखियौ देखियौ जुग केहन भऽ गेलै कक्का यौ
टोपी चश्मा पहिर कऽ चलै छै छौड़ा उचक्का यौ

छमकि कऽ चलैए संगे नटुआ सन केश छै
जीँस टीशर्ट पहिर कऽ अंग्रेज भेल पक्का यौ

चौक पर घूमैत छै बोतल चढ़ा कऽ भोरेसँ
सिगरेटक दिन भरि ई उड़ाबै छोहक्का यौ

अपनाकेँ बड़का ई बुझैत अछि हीरो छौड़ा
मुहँ नै लगाबूँ एकरासँ अछि ई लड़क्का यौ

स्त्री जकाँ श्रृंगार करै छै लगाबैये ठोररंगा
भोरेसँ कटाके दाढ़ी मोछ लागे जेना छक्का यौ

छौड़ी पाछाँ पागल भेल छै काज धाज छोड़िकेँ
हुलिया एकर देखि कऽ मुकुन्द हक्काबक्का यौ

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण17
©बाल मुकुन्द पाठक ।।

देखियौ देखियौ जुग केहन भऽ गेलै कक्का यौ
टोपी चश्मा पहिर कऽ चलै छै छौड़ा उचक्का यौ

छमकि कऽ चलैए संगे नटुआ सन केश छै
जीँस टीशर्ट पहिर कऽ अंग्रेज भेल पक्का यौ

चौक पर घूमैत छै बोतल चढ़ा कऽ भोरेसँ
सिगरेटक दिन भरि ई उड़ाबै छोहक्का यौ

अपनाकेँ बड़का ई बुझैत अछि हीरो छौड़ा
मुहँ नै लगाबूँ एकरासँ अछि ई लड़क्का यौ

स्त्री जकाँ श्रृंगार करै छै लगाबैये ठोररंगा
भोरेसँ कटाके दाढ़ी मोछ लागे जेना छक्का यौ

छौड़ी पाछाँ पागल भेल छै काज धाज छोड़िकेँ
हुलिया एकर देखि कऽ मुकुन्द हक्काबक्का यौ

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण17
©बाल मुकुन्द पाठक ।।

गजल

गजल

हमरासँ जौँ दूर जाएब अहाँ
रहि रहि इयादि आएब अहाँ

सिनेह लेल अहीँके बेकल छी
छोड़ि कऽ हमरा कि पाएब अहाँ

खोजि खोजि के तँ पागल बनलौँ
बताउ कि कतऽ भेँटाएब अहाँ

किएक लेल एहन प्रेम केलौँ
जौँ ई बुझलौँ नै निभाएब अहाँ

बदलि गेलियै अहाँ कोना कऽ यै
हमरासँ नै बिसराएब अहाँ

हमरा छोड़ि गेलौँ मुकुन्द संग
आब कतेक के फसाँएब अहाँ

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण12
©बाल मुकुन्द पाठक ।।

गजल

गजल

सुनु अहाँ कियै हमरा सँ दूर गेलौँ यै
अहीँक चलतै हम तँ नाको कटेलौँ यै

रुप अहाँक देखिकऽ हम तँ मुग्ध भेलौँ
ओहि परसँ कियै ई कनखी चलेलौँ यै

मगन छलौँ अहाँ मेँ काज धाज छोड़िकऽ
प्रेम मेँ तँ हे प्रेयसी जग बिसरेलौँ यै

पढ़बाक उमरि छल छलौँ इक्कीस के
काँलेज के छोड़िकऽ अहाँमेँ ओझरेलौँ यै

मुकुन्द अछि प्रेमी अहाँकँ सभ जानैये
जानसँ बेसी चाहे जे तकरा गंवेलौँ यै

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 15
©बाल मुकुन्द पाठक ।।

गजल

दिल्लीँ मेँ भेल हिंसा आ बलात्कार पीड़िता के फोटो देख के मोनसँ अनायास निकलल किछु पाँति -

गजल

बिना दागक हमर छल ई चान सन मुँह
कुकर्मी नोचि लेलक मिल राण सन मुँह

कि सपना देखलौँ आ लुटि गेल जिनगी
घटल एहन बनल देखूँ आन सन मुँह

रमल रहियै अपन धुनमेँ आ कि एलै
चिबा गेलै हमर सुन्नर पान सन मुँह

बनल नै स्त्री समाजक उपभोग चलते
किए तैयो मनुख नोचै चान सन मुँह

हमर सभ लूटि गेलै ईज्जत व चामोँ
कि करबै जी कऽ लेने छुछुआन सन मुँह

बहरे-करीब मने
"मफाईलुन - मफाईलुन-फाइलातुन"
मात्रा क्रम-1222 - 1222 - 2122
©बाल मुकुन्द पाठक ।।

गजल

गजल

प्रेम नै भाइ ई जहर छै
पोखिरसँ उठल बुझु लहर छै

प्रेम मेँ जान जाएत चलि
तड़पि के मरब ई जहर छै

नै परु प्रेमके जाल मेँ
एखनो एकरे पहर छै

नै करु प्रेमके ई नशा
ई तँ मिसरी धुलल जहर छै

ई मुकुन्दोँ फसिकँ ऐहिमेँ
कहलक प्रेम नै जहर छै

*बहरे- मुतदारिक ।
फाइलुन मने दीर्ध-ह्रस्व-दी ­र्ध चारि बेर ।
© बाल मुकुन्द पाठक ।।
तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों