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शनिवार, 23 दिसंबर 2017

विश्व गजलकार परिचय शृंखला-8

बहुत काल एहन होइत छै जे बेमतलबक भारी अवाजक भीड़मे हल्का अवाज हेड़ा जाइत छै। हिंदी गजलमे सभसँ बड़का बेमारी छै जे जाहि गजलमे खाली अमीर-गरीब,लाल झंडा आदिक उल्लेख रहै छै तकरा महान मानि लेल जाइ छै। ई बेमारी किछु हद धरि मैथिली गजल संसारमे सेहो अछि। एहि लिस्टमे हम दुष्यंत कुमारक नाम नै राखब कारण दुष्यंत कुमार अपन गजलमे एहि प्रतीक सभहँक प्रयोग केलथि तँ व्यावहारिक रूपसँ इमरजेन्सीमे सरकारक विरोध सेहो केलथि। हमरा ओहन शाइरसँ किछु ने कहबाक अछि जे कि खाली लिखित शब्दसँ अपनाकेँ महान बनबाक प्रयास करै छथि। चूँकि हिंदीमे खाली लिखित शब्दक अधारपर महान बनबाक परंपरा अछि (दुष्यंत सनकेँ छोड़ि) तँइ गजलक मूल स्प्रिट पकड़ए बला गजलकार पं. कृष्णानंद चौबे केर नाम हिंदी गजलसँ हेड़ा गेल। हम पं. कृष्णानंद चौबेकेँ अपन प्रिय गजलकारमेसँ एकटा मानै छी। आउ आइ हम सभ हुनक परिचय प्राप्त करी आ हुनक किछु गजल पढ़ी--

नाम-- पं. कृष्णानंद चौबे



जन्म- 5-8-1933 फर्रुखाबद
मृत्यु- 14-13-2010 (कानपुर)
शिक्षा-स्नातक
1953सँ 1960 धरि बनारससँ प्रकाशित "अमृत पत्रिका" दैनिकमे उपसंपादक। 1961सँ 1980 धरि उद्योग निदेशालय, कानपुरमे "इंडस्ट्रीज न्यूज लेटर" केर संपादन। 1990मे सेवानिवृत। आ ओकर बाद मृत्यु धरि दैनिक जागरण कानपुरसँ संबंध रहला।गजलक अतिरिक्त, हास्य-व्यंग्य, गीत, समीक्षा आदि लिखैत रहला।
गजल संग्रह -- परिंदें क्यों नहीं लौटे

1

आपका मक़सद पुराना है मगर खंज़र नया
मेरी मजबूरी है मैं लाऊँ कहाँ से सर नया

मैं नया मयक़श हूँ मुझको चाहिये हर शै नयी
एक मयख़ाना नया, साक़ी नया, साग़र नया

देखता हूँ तो सभी घर मुझको लगते हैं नये
सोचता हूँ तो नहीं लगता है कोई घर नया

देखिये घबरा न जाये तालियों के शोर में
आज पहली बार आया है ये जादूगर नया

हम किसी सूरत किसी के हाथ बिक सकते नहीं
चाहे वो ताज़िर पुराना हो या सौदागर नया

मेरा शीशे का मकाँ तामीर होने दीजिये
हर किसी के हाथ में आ जायेगा पत्थर नया

2

मंदिरों में आप मनचाहे भजन गाया करें
मैक़दा ये है यहाँ तहज़ीब से आया करें

रात की ये रौनक़ें अपने मुक़द्दर में नहीं
शाम होते ही हम अपने घर चले जाया करें

साथ जब देता नहीं साया अंधेरे में कभी
रौशनी में ऐसी शय से क्यों न घबराया करें

बन्द रहते हों जो अक्सर आम लोगों के लिये
अपने घर में ऐसे दरवाज़े न लगवाया करें

ये हिदायत एक दिन आयेगी हर स्कूल में
मुल्क़ की तस्वीर बच्चों को न दिखलाया करें

क्यों नहीं आता है इन तूफ़ानी लहरों को शऊर
कम से कम काग़ज़ की नावों से न टकराया करें

3

न मिलने का वादा, न आने की बातें
कहाँ तक सुनें दिल जलाने की बातें

हमेशा वही सर झुकाने की बातें
कभी तो करो सर उठाने की बातें

कोई इस ज़माने की कहता नहीं है
सुनाते हो अपने ज़माने की बातें

कहाँ तक सुने कोई इन रहबरों की
हथेली पे सरसों उगाने की बातें

तरस खायेंगी बिजलियाँ भी यक़ीनन
जो सुन लें कभी आशियाने की बातें

अजब-सी लगे हैं फ़क़ीरों के मुँह से
किसी हूर की या ख़ज़ाने की बातें

कभी जो हुईं थीं हमारी-तुम्हारी
वो बातें नहीं हैं बताने की बातें

4

इधर भटके, उधर भटके, भटक कर लौट आये हैं
वो भूले सुब्ह के थे शाम को घर लौट आये हैं

यहाँ से जो गये थे सिर्फ़ बुनियादों के मक़सद से
वहाँ आपस में टकराकर वो पत्थर लौट लाये हैं

तेरी जन्नत मुबारक़ हो तुझे या शेख़ साहब को
ख़ुदा के नाम हम तहरीर लिखकर लौट आये हैं

चले जायेंगे फिर इक बार उनके कुछ न कहने को
हमारा क्या है हम उस दर से अक्सर लौट आये हैं

सभी हैरान हैं आख़िर परिन्दे क्यों नहीं लौटे
ज़मीं पर उनके बस टूटे हुए पर लौट आये हैं

हमारे दिन भी कैसे हैं, गये तो फिर नहीं आये
कई लोगों के अच्छे दिन भी अक्सर लौट आये हैं

क़लम जिनको किया था साफ़गोई के लिये तुमने
मेरी ग़ज़लों की सूरत में वही सर लौट आये हैं

5

ज़िन्दगी के फलसफ़े में अब न उलझाना मुझे
ख़ुद समझ लेना तो उसके बाद समझाना मुझे

मेरी दिन भर की उदासी को समझ लेता है वो
शाम होते ही बुला लेता है मयख़ाना मुझे

आईना भी अब मुझे कुछ अजनबी लगने लगा
अपने ही चेहरे से कहता हूँ कि पहचाना मुझे

आज फिर कुछ बस्तियाँ जलती नज़र आईं मुझे
आज फिर लिखना पड़ेगा एक अफ़साना मुझे

बदहवासी देखिये साक़ी ने यूँ बाँटी शराब
मेरा पैमाना उसे और उसका पैमाना मुझे

इन दिनों तो मुझको तिनके का सहारा भी नहीं
दोस्तो सैलाब की ज़द में न ले जाना मुझे

आज उसकी याद फिर चुपके से दिल में आ गई
आज कुछ आबाद-सा लगता है वीराना मुझे



विश्व गजलकार परिचय शृंखलाक अन्य भाग पढ़बाक लेल एहि ठाम आउ--  विश्व गजलकार परिचय 


मंगलवार, 27 जून 2017

विश्व गजलकार परिचय शृंखला-7

"बोतल खुली है रक्स में जाम-ए-शराब है"

आइ विश्व गजलकार परिचय शृखंलामे एकटा विशेष गजलकारसँ परिचय कराएब। ओहिसँ पहिने ई निवेदन कऽ दी जे किछु एहन रचनाकार एहन होइ छथि जे कि पाठ्य रूपमे प्रसिद्ध होइत छथि तँ किछु कोनो गायक द्वारा। आइ जिनकासँ हम परिचय कराएब ओ दोसर तरहँक रचनाकार छथि मने हिनक रचना गेलाक बादें प्रसिद्ध भेल। फना बुलंदशहरी (मूल नाम-- मुहम्मद हनीफ, जन्म-बुलंदशहर, वर्तमान उत्तरप्रदेश, तात्कालीन भारत) पाकिस्तानक प्रसिद्ध शायर छलाह। प्राप्त जानकारीक अनुसारें ई गुजरावाला (Gujranwala) जिलाक अरूप स्थानक छलाह। बुलंदशहरी प्रसिद्ध शाइर क़मर जलालवीजीसँ शाइरीक शिक्षा लेने छलाह। एहिठाम ईहो जानब रोचक जे बुलंदशहरीजीक गुरू क़मर जलालवीजीक एकटा पोथीक नाम सेहो " मेरे रश्के क़मर" छनि। बुलंदशहरीजीक बेसी जीवनी नहि भेटैत अछि कारण कहियो हिनका पाठ्य रूपमे गंभीरतासँ नहि लेल गेलनि जाहि कारणे एक तरहें पाठ्य रूप बला पाठकक नजरिसँ ओझल छथि। जे गीत-कौआली सुनै छथि हुनका तँ शाइरक नाम बूझल रहैत छनि मुदा जीवनी नहि तँइ हमहूँ असमर्थ छी। जे रचनाकार गायक द्वारा प्रसिद्ध होइत छथि ओहो कोनो एकै-दू गायक द्वारा प्रसिद्ध होइत छथि। बुलंदशहरीजीक रचना "मेरे रश्के-क़मर, तूने पहली नजर, जब नजर से मिलायी मज़ा आ गया" जेनाहिते प्रसिद्ध कौआली गायक "नुसरत फतेह अली" गेला तेनाहिते बुलंदशहरीजीक नाम सभहँक सामने आबि गेल। ओना ओहिसँ पहिने सेहो हुनकर रचना सभ गाएल गेल छल मुदा "मेरे रश्के-क़मर" केर बाते किछु अलग छै। बुलंदशहरीजीक एकटा अन्य रचना " बोतल खुली है रक्स में जाम-ए-शराब है" सेहो प्रसिद्ध भेल। ई रचना नुसरतजीक अतिरिक्त मुन्नी बेगम द्वारा गाएल गेल छै आ व्यक्तिगत तौरपर हमरा मुन्नी बेगम बला भर्सन बेसी नीक लागल अछि। हिनक मृत्यु 26 Nov 1986 मे भेलनि।
भारतक साधारण जनता बुलंदशहरीजी नाम तखन चिन्हलक जखन कि  अरिजीत सिंह द्वारा "मेरे रश्के-क़मर" रचनाक नवका भर्सन आएल आ तकर बाद ई रचना फेरसँ भारतमे प्रसिद्ध भऽ गेल मुदा अफसोचजनक जे मूल रचनाकारक संबंधमे फेर सभ अपरिचित रहि गेल। एकठाम यूट्यूबपर एकरा अरिजीत सिंह द्वारा गाएल आ नुसरत फतेह अली द्वारा लिखल सेहो भेटत। चूँकि बुलंदशहरीजीक बारेमे बेसी तथ्य नहि अछि तँइ एहिठाम हम "मेरे रश्के क़मर" रचना सुनाबी जे कि नुसरत जी गेने छथि (परिशिष्टमे ई रचना सेहो देल गेल अछि) --




आब एही रचनाकेँ अरिजीत सिंह केर अवाजमे सुनू--


आब सुनू मुन्नी बेगमजीक अवाजमे ""बोतल खुली है रक्स में"--

एही रचनाकेँ फेरसँ मुन्निए जीक अवाजमे सुनू आ अंतर ताकू--



आब फना बुलंदशहरीजीक किछु प्रसिद्ध रचना देल जा रहल अछि जे कि विभिन्न गायक द्वारा गाएल अछि--

आँख उठी मोहब्बत ने अंगडाई ली ( गायक नुसरत फतेह अली खान)






उर्दू लिपिमे बुलंदशहरीक जीक रचना पढ़बाक लेल एहिठाम आउ-- https://issuu.com/rchakravarti/docs/deevaan-e-fanabulandshehri

परिशिष्ट--
मेरे रश्के-क़मर, तूने पहली नजर, जब नजर से मिलायी मज़ा आ गया 
बर्क़ सी गिर गयी, काम ही कर गयी, आग ऐसी लगायी मज़ा आ गया


जाम में घोलकर हुस्न कि मस्तियाँ, चांदनी मुस्कुरायी मज़ा आ गया 
चाँद के साये में ऐ मेरे साक़िया, तूने ऐसी पिलायी मज़ा आ गया


नशा शीशे में अगड़ाई लेने लगा, बज्मे-रिंदा में सागर खनकने लगा
मैकदे पे बरसने लगी मस्तिया, जब घटा गिर के छायी मज़ा आ गया


बे-हिज़ाबाना वो सामने आ गए, और जवानी जवानी से टकरा गयी
आँख उनकी लड़ी यूँ मेरी आँख से , देखकर ये लड़ाई मज़ा आ गया


आँख में थी हया हर मुलाकात पर , सुर्ख आरिज़ हुए वस्ल की बात पर
उसने शरमा के मेरे सवालात पे, ऐसे गर्दन झुकाई मज़ा आ गया


शैख़ साहिब का ईमान बिक ही गया, देखकर हुस्न-ए-साक़ी पिघल ही गया
आज से पहले ये कितने मगरूर थे, लुट गयी पारसाई मज़ा आ गया


ऐ “फ़ना” शुक्र है आज वादे फ़ना, उस ने रख ली मेरे प्यार की आबरू
अपने हाथों से उसने मेरी कब्र पर, चादर-ऐ-गुल चढ़ाई मज़ा आ गया

क्रेडिट--


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रविवार, 21 मई 2017

विश्व गजलकार परिचय शृंखला-6

अवधी भाषा उत्तर प्रदेशक 19 टा जिला- सुल्तानपुर, अमेठी, बाराबंकी, प्रतापगढ़, इलाहाबाद, कौशांबी, फतेहपुर, रायबरेली, उन्नाव, लखनऊ, हरदोई, सीतापुर, खीरी, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, गोंडा, फैजाबाद आ अंबेडकर नगरमे अवधी पूरा बाजल जाइ छै। जखन कि 6 टा जिला- जौनपुर, मिर्जापुर, कानपुर, शाहजहांबाद, बस्ती और बांदा केर किछु क्षेत्रमे एकर सेहो प्रयोग होइत छै। बिहारक किछु भाग आ नेपालक किछु जिलामे सेहो अवधी बाजल जाइ छै। एक अतिरिक्त मॉरिशस, त्रिनिदाद एवं टुबैगो, फिजी, गयाना, सूरीनाम सहित आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आ हॉलैंड देशमे सहो अवधी बाजल जाइ छै। आइ अवधी भाषाक गजलकार बजरंग बिहारी "बजरू" जीसँ परिचय प्राप्त करी।
















बजरंग बिहारी "बजरू"

मूल नाम-- बजरंग बिहारी तिवारी आ एही नामसँ हिंदीमे सेहो लेखन। खास कऽ हिंदीमे दलित विमर्शपर हिनक काज छनि।
विधा : गजल, आलोचना, विमर्श
जन्म : 1 मार्च 1972केँ उत्तर प्रदेशक गोंडा जिलामे भेल छनि।


हरेक प्रांतीय भाषा जकाँ अवधीमे सेहो बहुत गजल लिखल कहल गेल अछि। मुदा एखन धरि अवधी गजलमे सेहो बहरक समानता नै देखबामे आबै आ आने प्रांतीय भाषा जकाँ उच्चारणक आघात महत्वपूर्ण कारक अछि। मैथिली आ भोजपुरीमे गजलक व्याकरण पूरा स्थापित भऽ गेल अछि। उम्मेद अछि जे आनो प्रांतीय भाषामे गजलक व्याकरण जल्दिये स्थापित हएत।अवधी गजलमे बजरू जीक गजलक भाषा (जबान) बेसी प्रखर आ मारुक अछि। त पढ़ू बजरू जीक किछु गजल--


1

हेरित है इतिहास जौन दिन झूठ बदलि कै फुर होइगा
झूर आँख अंसुवात जौन दिन झूठ बदलि कै फुर होइगा

हंडा चढ़ा सिकार मिले बिनु राजाजी बेफिकिर रहे
बोटी जब पहुंची थरिया मा झूठ बदलि कै फुर होइगा

बिन दहेज सादी कै चर्चा पंडित जी आदर्स बने
कोठी गाड़ी परुआ1 पाइन झूठ बदलि कै फुर होइगा

“खाली हाथ चले जानाहै” साहूजी उनसे बोले
बस्ती खाली करुआइन जब झूठ बदलि कै फुर होइगा

‘बजरू’ का देखिन महंथ जी जोरदार परबचन भवा
संका सब कपूर बनि उड़िगै झूठ बदलि कै फुर होइगा


2

चढ़ेन मुंडेर मुल नटवर न मिला काव करी
भयी अबेर मुल नटवर न मिला काव करी

रुपैया तीस धरी जेब, रिचार्ज या रासन
पहिलकै ठीक मुल नटवर न मिला काव करी

जरूरी जौन है हमरे लिए हमसे न कहौ
होत है देर मुल नटवर न मिला काव करी

माल बेखोट है लेटेस्ट सेट ई एंड्राइड
नयी नवेल मुल नटवर न मिला काव करी

रहा वादा कि चटनी चाटि कै हम खबर करब
बिसरिगा स्वाद मुल नटवर न मिला काव करी


3

गजल मामूली है लेकिन लिहेबा सच्चाई
बिथा किसान कै खोली कि लाई गहराई

इस्क से उपजै इसारा चढ़ै मानी कै परत
बिना जाने कसस बोली दरद से मुस्काई

तसव्वुर दुनिया रचै औ’ तसव्वुफ अर्थ भरै
न यहके तीर हम डोली न यहका लुकुवाई

धरम अध्यात्म से न काम बने जानित है
ककहरा राजनीति कै, पढ़ी औ’ समझाई

समय बदले समाज बोध का बदल डारे
बिलाये वक्ती गजल ई कहैम न सरमाई

चुए ओरौनी जौन बरसे सब देखाए परे
‘बजरू’ कै सच न छुपे दबै कहाँ असनाई

4

चले लखनऊ पहुंचे दिल्ली,
चतुर चौगड़ा बनिगा गिल्ली

हाटडाग सरदी भय खायिन,
झांझर8 भये सुरू मा सिल्ली

समझि बूझि कै करो दोस्ती,
नेक सलाह उड़ावै खिल्ली

बब्बर सेर कार मा बैठा ,
संकट देखि दुबकि भा बिल्ली

‘बजरू’ बचि कै रह्यो सहर मा,
दरकि जाय न पातर झिल्ली


5

का बेसाह्यो कस रहा मेला
राह सूनी निकरि गा रेला

बरफ पिघली पोर तक पानी
मजा–खैंहस संग– संग झेला

के उठाए साल भर खर्चा
जेबि टोवैं पास ना धेला

गे नगरची औ मुकुटधारी
मंच खाली पूर  भा खेला

बहुत सोयौ राति भर ‘बजरू‘
अब न लपक्यो भोर की बेला


6

जियै कै ढंग सीखब बोलिगे काका
भोरहरे तीर जमुना डोलिगे काका

आँखि  अंगार  कूटैं  धान  काकी,
पुरनका घाव फिर से छोलिगे काका

झरैया  हल्ल  होइगे  मंत्र  फूंकत
जहर अस गांव भीतर घोलिगे काका

निहारैं   खेत   बीदुर  काढ़ि  घुरहू,
हंकारिन पसु पगहवा खोलिगे काका

बिराजैं   ऊँच   सिंघासन   श्री   श्री
नफा नकसान आपन तोलिगे काका

भतीजा हौ तौ पहुंचौ घाट ‘बजरू‘
महातम कमलदल कै झोरिगे काका


7

उठाए बीज कै गठरी सवाल बोइत है
दबाए फूल कै मोटरी बवाल पोइत है

इन्हैं मार्यौ उन्हैं काट्यौ तबौं न प्यास बुझी
रकत डरि कै कहां छिपिगा नसै नसि टोइत है

जुआठा कांधे पर धारे जबां पर कीर्ति–कथा
सभे जानै कि हम जागी असल मा सोइत है

कहूं खोदी कहूं तोपी सिवान चालि उठा
महाजन देखि कै सोची मजूरी खोइत है

ई घटाटोप अन्हेंरिया उजाड़ रेह भरी
अहेरी भक्त दरोरैं यही से रोइत है

8

देस–दाना भवा दूभर राष्ट्र–भूसी अस उड़ी
कागजी फूलन कै अबकी साल किस्मत भै खड़ी

मिली चटनी बिना रोटी पेट खाली मुंह भरा
घुप अमावस लाइ रोपिन तब जलावैं फुलझड़ी

नरदहा दावा करै खुसबू कै हम वारिस हियां
खोइ हिम्मत सिर हिलावैं अकिल पर चादर पड़ी

कोट काला बिन मसाला भये लाला हुमुकि गे।
बीर अभिमन्यू कराहै धूर्तता अब नग जड़ी

मिलैं ‘बजरू’ तौ बतावैं रास्ता के रूंधि गा
मृगसिरा मिरगी औ’ साखामृग कै अनदेखी कड़ी


शब्दार्थ---

परुआ= यूँ ही, मुफ्त में
मुल= लेकिन
नटवर= नेटवर्क
बिथा= व्यथा, पीड़ा
लुकुआई= छिपाना
चौगड़ा= खरगोश
गिल्ली= गिलहरी
झांझर= जीर्ण-शीर्ण, कमज़ोर
सिल्ली= शिला, चट्टान

एहि शृंखला केर स्रोत अवधी भाषाक पत्रिका "अवधी कै अरघान" अछि।

विश्व गजलकार परिचय शृंखलाक अन्य भाग पढ़बाक लेल एहि ठाम आउ--  विश्व गजलकार परिचय 

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

विश्व गजलकार परिचय शृंखला-5

"बुंदेली" बुंदेलखंडक भाषा थिक। वर्तमानमे उत्तर प्रदेशक जालौन, झांसी, ललितपुर, हमीरपुर, बाँदा आ महोबा एवं मध्य-प्रदेशक सागर, दमोह, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, दतियाक अलावे भिंड, ग्वालियर, रायसेन आ विदिशा जिलाक किछु भाग बुंदेलखंड कहल जाइत छै। आइ बुंदेली भाषाक गजलकार सुगमजीसँ परिचय प्राप्त करी--

   महेश कटारे ‘सुगम’

बुन्देली भाषाक सशक्त गजलकार छथि।
जन्म-24 जनवरी 1954
वर्तमान संपर्क- बीना, म.प्र. mobile : 097130 24380 , mahesh.katare_sugam@yahoo.in
कृति-- प्यास (कहानी संग्रह), गाँव के गेंवड़े (बुन्देली ग़ज़ल संग्रह) हरदम हँसता गाता नीम (बाल-गीत संग्रह), तुम कुछ ऐसा कहो (नवगीत संग्रह), वैदेही विषाद (लम्बी कविता), आवाज़ का चेहरा (ग़ज़ल संग्रह)

हरेक प्रांतीय भाषाक गजलक ई दुर्भाग्य छै जे ओ बहरक पालन देरीसँ करैत अछि। कटारेजीक गजल सेहो अपवाद नै मुदा एतेक कहबामे संकोच नै जे मैथिलीक कथित गजल (सियाराम झा सरस एवं राजेन्द्र विमलजी गुट बला)सँ बेसी बहरक पालन बुंदेली गजलमे अछि। प्रस्तुत अछि कटारेजीक किछु बुंदेली गजल--

1

नेंनन के जे बान रामधई
हँस हँस लै रये प्रान रामधई

सुघर सलोंनी सूरत मारै
ऊपर सें मुस्कान रामधई

तुमें देख कें सुख सें सोवौ
है नईंयाँ आसान रामधई

उनकी मीठी बातें सुनवे
तरस जात हैं कान रामधई

जीनें देखौ तुमें ओइकौ
कट जावै चालान रामधई

2
करवे वारे राज कका जू
सब हैं धोखेबाज कका जू

कभऊँ दार पै पथरा पर रये
कभऊँ रुआ रई प्याज कका जू

अब तौ गतें बुरईं होनें हैं
लग रऔ है अंदाज़ कका जू

कर्ज़ा मूड़ ऊपरौ हो गऔ
बढ़ तई जा रऔ ब्याज कका जू

मौ खोलौ तौ मार मार कें
दबा देत आवाज़ कका जू

मरे ढोर सी जनता हो गयी
नेता बन गए बाज़ कका जू

रुआ =रुला /गतें =हालत /ढोर =जानवर /

3
अब तौ आर पार की हुइयै
ज़ोर ज़बर लाचार की हुइयै

एक लड़ाई अस्पताल सें
अब तौ हर बीमार की हुइयै

पैरी सें जो बेइज़्ज़त हैं
उनसें इज़्ज़त दार की हुइयै

बने भिखारी ठाढ़े रत जो
उनकी अब दरबार सें हुइयै

आँखें कान सबई खुल जैहैं
जब जनता सरकार की हुइयै

सुगम फैसला हो केँ रैहै
हुइयै लट्ठ मार की हुइयै

4
चलनी रै रईं सूपा रै रये
उतई कछू कुड मूता रै रये

रै रये साँचे भले आदमी
ओई गाँव में झूठा रै रये

बनीं झुपड़ियाँ दुखयारन कीं
बंगलन में आसूदा रै रये

एक तरफ श्याबासी रै रई
एक तरफ खौं ठूंसा रै रये

सुनत सहत हैं उतई रहत ,जां
गारीं लातें घूँसा रै रये

गाँव-गाँव बस्ती-बस्ती में
बिना कूत के खूँटा रै रये

पढ़े लिखन पै धौंस जमावे
देखौ छाप अँगूठा रै रये

रै रये पथरा बन कें हीरा
ककरा बन कें मूँगा रै रये

5
उडो खेत कौ आद कका जू
बीज मिलौ नें खाद कका जू

साल तेर अब कैसें हुइयै
का खैहै औलाद कका जू

दरखासें दै,दै केन मर गए
सुनी न गयी फ़रयाद कका जू

ढोरन खों चारौ तक नईंयाँ
झरी डरी है नाद कका जू

भाव भूल गए नोंन तेल कौ
कछू न रै गऔ याद कका जू

भरनें हतौ बैंक कौ कर्ज़ा
निकर गयी है म्याद कका जू

अधिकारी नेतन खों समझौ
गू कौ भैया पाद कका जू

मर गए हैं ,जीवन की अब तौ
हल गयी है बुनयाद कका जू

आद=आद्रता /तेर =गुजर ,बसर / गू =पाखाना /पाद =वायु विसर्जन /

6
बातन सें तौ बादर फारौ जा रऔ है
मूरख मौ सें ज्ञान बघारो जा रऔ है

खुशहाली को जज्ञ रचानें हतौ इतै
मनौ महूरत हर दिन टारौ जा रऔ है

झूठी कैवे वारन की पाँचई घी में
सांची जीनें कई वौ मारौ जा रऔ है

बूढी अम्मा प्यासी बैठीं हैं घर में
मंदर में जाकें जल ढारौ जा रऔ है

बुद्धि हो गयी भृष्ट लड़त हैं आपस में
घर कौ नोंनों रूप बिगारौ जा रऔ है

दंगा ,हत्या ,लूट ,जला कें बस्ती खों
'सुगम' दूध कौ क़र्ज़ उतारौ जा रऔ है

7
पढ़े लिखे सब ढोर चरा रये देखौ तौ
बिना पढ़े कुर्सी हतया रये देखौ तौ

बदमाशी सीना तानें घूमत फिर रई
ऊसें सांचे लोग डरा रये देखौ तौ

पैरें कारौ कोट कचैरी में बैठे
एक दूसरे खों उरझा रये देखौ तौ

कुर्सी बैठे चोर दरोगा ठांडे हैं
हिलमिल कें कैसे बतया रये देखौ तौ

दारू पी रये ,गुटका खा रये दिन दिन भर
ज्वानी में कैसे बुढया रये देखौ तौ

कित्तन के संग नेंन लड़े कित्ती छोड़ीं
हँस हँस कें वे सबै सुना रये देखौ तौ

काम तनक सौ सुगम करावे के लानें
बजन फाइलन पै धरवा रये देखौ तौ

8
बड़े घरन के छोरा नईंयाँ
हम रेशम के डोरा नईंयाँ

इज़्ज़त सें हम जीवौ सीखे
टुकड़खोर हथजोरा नईंयाँ

हम चाहत सब सुख सें रैवें
तुम जैसे घरफोरा नईंयाँ

दुनिया की दौलत मिल जावै
ऐसे सोई अघोरा नईंयाँ

गुनन भरे झोला हैं हम तौ
सड़े भुसा के बोरा नईंयाँ

साँची सुगम कैत है मौ पै
मिठबोला मौजोरा नईंयाँ

9
नंगे सपरें ,धोवें और निचोवें का
सतुआ नईंयाँ घर में बोलौ घोरें का

घी होतौ तौ हलुआ तनक बना लेती
चून ख़तम है भूँजें और अकोरें का

नईंयाँ एक छदाम मुठी में मुद्द्त सें
धुतिया के पल्लू में बांधें छोरें का

रूख निखन्नौ डरौ आम वारी रुत में
अमियाँ नईंयाँ एक डार पै टोरें का

ओछी होती अगर गुज़ारौ कर लेते
चददर नईंयाँ अपने पाँव ककोरें का

सपरना =नहाना /घोरना=घोलना /धुतिया =धोती /रूख =पेड़ /निखन्नौ =खाली/टोरें
=तोडना /ओछी =छोटी
ककोरें =समेटना /

10
बातें कर रये बड्डी,ठड्डी
खेलत फिर रये झूठ कबड्डी

राजनीत में कान काट रये
पढ़वे में जो हते फिसड्डी

नें उगलत ,नें लीलत बन रई
गरे फंसी लालच की हड्डी

इक्का धरें तुरुप को फिर रये
लयें फिर रये ताशन की गड्डी

खोटे सिक्का दौड़ लगा रये
जीवन भर जो रहे उजड्डी

सड़कन पै तौ सांड बनत्ते
पद पा कें भई गीली चड्डी

बड्डी =बड़ी /फिसड्डी =पिछड़े हुए /गरे =गले /उजड्डी =झगड़ालू /



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रविवार, 8 नवंबर 2015

विश्व गजलकार परिचय शृंखला-4

वीनस केसरी




942, मुट्ठीगंज, आर्य कन्या चौराहा, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश-211003
मोबाइल-9453.004398
venuskesri@gmail.com
अंजुमन प्रकाशनक महत्वपूर्ण संस्थानक कर्ता छथि आ कम दामपर ई पाठककेँ पोथी उपल्बध कराबै छथि।जश्ने-गजल आ अंतरराष्ट्रिय गजल सम्मेलनक सफल आयोजन कऽ कऽ वीनसजी गजलकेँ एक परिधिसँ बाहर आनि देने छथि।

प्रकाशित पोथी- गजल की बाबत। ऐ पोथीमे गजलक व्याकरणकेँ नीक तरीकासँ बुझाएल गेल छै आ ई हिंदीमे सरलतम तरीकासँ लिखल गेल पोथी छै। वीनसजी जेना व्याकरणकेँ प्रस्तुत करै छथि तैसँ भाव बेसी सरल भऽ जाइत छै। आ इएह चीज हुनक गजलकेँ महत्वपूर्ण बनबैत अछि।


पहिने हिनकर एकटा शेरक तेवर देखू--

बड़े हुए थे जो छोटा हमें बताने से
चुरा रहे हैं नज़र आज वो ज़माने से

आ आब हिनके दू टा गजल पढ़ू-


गजल
1
हर समंदर पार करने का हुनर रखता है वो
फिर भी सहरा पे सफ़ीने का सफ़र रखता है वो

बादलों पर खाहिशों का एक घर रखता है वो
और अपनी जेब में तितली के पर रखता है वो

हमसफ़र वो, रहगुज़र वो, कारवां, मंज़िल वही,
और खुद में जाने कितने राहबर रखता है वो

चिलचिलाती धूप हो तो लगता है वो छाँव सा,
धुँध हो तो धूप वाली दोपहर रखता है वो

उससे मिल कर मेरे मन की तीरगी मिट जाए है,
अपनी भोली बातों में ऐसी सहर रखता है वो

जानता हूँ कह नहीं पाया कभी मैं हाले दिल,
पर मुझे मालूम है सारी खबर रखता है वो

2

ये कैसी पहचान बनाए बैठे हैं
गूँगे को सुल्तान बनाए बैठे हैं

मैडम बोली थीं, घर का नक्शा खींचो
बच्चे हिन्दुस्तान बनाए बैठे हैं

आईनों पर क्या गुजरी है, क्यों ये सब,
पत्थर को भगवान बनाए बैठे हैं

धूप का चर्चा फिर संसद में गूँजा है
हम भी रौशनदान बनाए बैठे हैं

जंग न होगी तो होगा नुक्सान बहुत
हम कितना सामान बनाए बैठे हैं

वो चाहें तो खुद को और कठिन कर लें
हम खुद को आसान बनाए बैठे हैं

पल में तोला, पल में माशा हो कर वो
महफ़िल को हैरान बनाए बैठे हैं

आप को सोचें, दिल को फिर गुलज़ार करें
क्यों खुद को वीरान बनाए बैठे हैं



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रविवार, 25 अक्टूबर 2015

विश्व गजलकार परिचय शृंखला-3

आजुक परिचयमे छथि संजय कुमार कुंदनजी। हिनक परिचय एना अछि--



जन्म-- 7 जनवरी 1955, फॉरबिसगंज (अररिया)
प्रकाशित  काव्य संग्रह-- 'बेचैनियाँ' (2002),'एक लड़का मिलने आता है'(2006), 'तुम्हें क्या बेक़रारी है' (2014), 'भले तुम और भी नाराज़ हो जाओ'(प्रकाश्य).
गजल आ नज्म संग कहानी लेखन सेहो।
संपर्क- द्वारा श्री आर.एन.ठाकुर, शर्मा लॉज के पहले,मोहनपुर ,पुनाईचक, पटना-23(बिहार)
मो. 09835660910

हिनक दू टा गजल पढ़ल जाए--
1

मेरी लुग़त का शायद इक लफ़्ज़ हो ज़िन्दा-सा
दुनिया  से  तेरी  गुज़रा  सो   एक  तमाशा-सा

सदियों का सफ़र कोई  जारी था  मेरे  अन्दर
और   देखनेवालों  ने  देखा   मुझे    बैठा-सा

देखो  न  हिक़ारत  से   हमलोग भी इन्सां  हैं
हाँ , तन पे नहीं रेशम , हाँ , रंग  है  उतरा-सा

वो  लोग  भी  कैसे  थे  देखा  हो मुहब्बत को
लगता है  कहानी-सी , लगता है  फ़साना-सा

वो  लौट के  आएगा  , क्या  लौट के  आएगा
लौटे हुए  क़दमों  की  आहट  के  भरोसा-सा

वैसे  तो  मुलाक़ातें  अब  भी  हैं  हुआ करती
लेकिन  है कहाँ अब  वो  अन्दाज़  पुराना-सा

'कुन्दन'  को  कहीं  देखा ?  पहचानना  आसाँ  है
कुछ-कुछ वो लगे सुलझा,कुछ-कुछ वो दीवाना-सा

2

देखकर चार सू  उठता है  यही एक  सवाल
कब तलक करनी है बर्दाश्त यही सूरते-हाल

एक ग़ुलामाना ज़हन  उसपे हुकूमत से मरूब
कैसे समझोगे तुम आज़ाद तबीयत का मलाल

रहबरे-मुल्क  के पाँओ  तले  सर  है  अपना
हम रियाया हैं के रखना है हमें  उसका ख़याल

बात फैलाई है  ताजिर  की  सियासत ने  यही
पेट की भूख से बढ़कर हैं मज़ाहिब के  सवाल

इक न  इक  सामरी होता  है  यहाँ  तख़्तनशीं
चश्मे-मज़लूम  पे बुनता है तिलिस्मों के जाल

बात से भर न सकेगा ये  रियाया  का शिकम
हाकिमे-शह्र, ज़रा एक भी रोटी  तो  निकाल

इक ज़रा आज ज़ुबाँ मेरी खुल गई  "कुन्दन"
ज़र्द होते हुए चेहरे की ये रंगत  तो  सँभाल



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शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

विश्व गजलकार परिचय शृंखला-2


डा. बलराम शुक्ल


(बलरामजी अपन परिवारक संग)

असिस्टेण्ट प्रोफेसर
संस्कृत विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली 110 007
मो. 09818147903
ईमेल संकेत– shuklabalram82@gmail.com
जन्म  – 25 सितम्बर 1981, गोरखपुर (भारत)
अध्ययन
स्नातक(2001) – संस्कृत, अंग्रेजी साहित्य, मध्यकालीन इतिहास
               गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर
परास्नातक(2003)– संस्कृत (व्याकरणशास्त्रमे विशेषज्ञता)
                दिल्ली विश्वविद्यालय , दिल्ली
                (विश्वविद्यालयमे सर्वप्रथमस्थान एखन धरिक रिकार्ड अंकक
                 उपलब्धि लेल सी डी देशमुख स्वर्णपदक प्राप्त)
शोध (2007)   –   व्याकरण तथा भाषाविज्ञान
                 दिल्ली विश्वविद्यालय , दिल्ली
   (शोधक विषयवाक्यार्थ : "भारतीय सिद्धान्तों का रेलेवेंस सिद्धान्त के सन्दर्भ में विश्लेषण "
(रेलेवेंस पाश्चात्त्य भाषाशास्त्रमे प्रतिपादित एकटा वाक्यार्थ सम्बन्धी एकटा नवीन सिद्धान्त छै जकर प्रतिपादन Dan Sperber तथा Dierdri Wilson नामक विद्वान केलखिन्ह एकर प्रमुख कथ्य छै कि प्रत्येक भाषिक संवाद रेलेवेंसक गारण्टीसँ युक्त होइत छै, मुदा   सभ रेलेवेंसकेँ निश्चित करऽ बला तत्व सभहँक परिगणन नै केन छथि प्रस्तुत शोधमे भारतीय सिद्धान्त सभहँक सहायतासँ सिद्धान्तकेँ दृढतर करबाक प्रयत्न कएल गेल छै। )
प्रमाणपत्र (2008) – फ़ारसी भाषा एवं साहित्य , दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
                             विश्वविद्यालयमे प्रथम स्थान
डिप्लोमा (2009) – फ़ारसी भाषा एवं साहित्य , दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
                             विश्वविद्यालयमे प्रथम स्थान
एडवांस डिप्लोमा (2010) – फ़ारसी भाषा एवं साहित्य , दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
                             विश्वविद्यालयमे प्रथम स्थान
उच्चतर अध्ययन (2011) – फ़ारसी भाषा एवं साहित्य , फ़ारसी भाषा एवं साहित्य विकास
                            केन्द्र , तेहरानईरानप्रथम स्थान
परास्नातक(2012) – फ़ारसी भाषा एवं साहित्य  (प्राचीन साहित्यमे विशेषज्ञताक संग)
                             दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
                             विश्वविद्यालयमे प्रथम स्थान, फ़िरदौसी स्वर्ण पदक प्राप्त 

अध्यापनअनुभव
2014सँ असिस्टेण्ट प्रोफेसर संस्कृतसंस्कृत विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय , दिल्ली
2005सँ 2014असिस्टेण्ट प्रोफेसर संस्कृत, हिन्दू कालेज , संस्कृत विभाग , दिल्ली
                           विश्वविद्यालय दिल्ली
                           व्याकरण , भाषाविज्ञान , साहित्य तथा दर्शन केर निरन्तर अध्यापन
                           पांचटा शोधार्थीक शोध निर्देशन
2004असिस्टेण्ट प्रोफेसर  संस्कृत, हंसराज कालेज , दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली7
2004सँ अद्यावधिदिल्ली विश्वविद्यालय एवं पत्राचार महाविद्यालयमे संस्कृत व्याकरणक निरन्तर अध्यापन


उपलब्धियां
2013राष्ट्रपति द्वारा युवा संस्कृतविद्वानक रूपमेबादरायण व्यास पुरस्कारसम्मानित
2011द्वितीय ईरान विश्वकवि सम्मेलनमे भारतक प्रतिनिधित्व करबाक हेतु तेहरान तथा
           शीराजमे आमन्त्रित अन्य सांस्कृतिक गतिविधि लेल ईरानक विभिन्न शहर सभमे छः 
          बेर भाग ग्रहण। 
2011दर्शन विभागलखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित पुनश्चर्या कार्यक्रममे निम्नोक्त  
           विषयपर अभिभाषण लेल आमन्त्रित
          . भारतीय भाषा दर्शन की प्रमुख समस्यायें
          . वैयाकरणों की भाषा दृष्टि
2009सांस्कृतिक संस्था आरोही  द्वारा उर्दू कवि फैज अहमद फैजख जन्म शताब्दीक
          अवसरपर व्याख्यान लेल आमन्त्रित
2004 सँ अद्यावधिसंस्कृत भारती संस्था द्वारा संस्कृत माध्यमसँ संस्कृत व्याकरणपर वक्तृत्
           लेल अनेक बेर आमन्त्रित
2005विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा शोध लेल वरिष्ठ शोधवृत्ति प्रदत्त
2003विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा शोध लेल कनिष्ठ शोधवृत्ति प्रदत्त
2003विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय अर्हता परीक्षा उत्तीर्ण
संगोष्ठी सभमे प्रस्तुत शोधपत्र
2015लोहिया महाविद्यालय चूरूमे प्रस्तुतप्रातिशाख्यों पर आधुनिक जगत् में हुए शोध
            कार्य।
2014राष्ट्रिय संस्कृत संस्थानमे प्रस्तुतसंस्कृत में अनूदित फ़ारसी साहित्य।
2011 –  संस्कृत विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठीमे प्रस्तुत–   
             मौलाना रूमी की मस्नवी में पञ्चतन्त्र की प्रस्तुति
2011शिब्ली कालेज आजमगढ द्वारा आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठीमे  प्रस्तुत
             संस्कृत साहित्य में मुहम्मद
2011अन्तर्राष्ट्रिय संस्था वेव्स द्वारा आयोजित संगोष्ठीमे प्रस्तुत
            वेदान्त का आधुनिक जीवन में उपयोग
2010इन्द्रप्रस्थ महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित संगोष्ठीमे प्रस्तुत
            वेदाध्ययन में व्याकरण का योग
2010लेडी इर्विन कालेज , दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित संगोष्ठीमे प्रस्तुत
             प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली
2009लेडी इर्विन कालेज , दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा आजित संगोष्ठीमे प्रस्तुत
            जीवन पद्धति के रुप में भारतीय दर्शनएक विहंगम दृष्टि
2008मिराण्डा हाउस , दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित संगोष्ठीमे प्रस्तुत
            आधुनिक संस्कृत साहित्य में छन्दों की प्रवृत्ति
कार्यशालायें
2015संस्कृत विभाग , दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित  विभिन्न दर्शनमे
            प्रतिबिम्बित मीमांसाक सिद्धान्त विषयपर कार्यशाला।
2011संस्कृत विभाग , दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित वाक्यपदीयपर आयोजित 
            कार्यशाला
2011संस्कृत विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित ब्रहमसूत्रपर आयोजित
            कार्यशाला
2011ईरान सांस्कृतिक भवन , दिल्ली द्वारा आयोजित फ़ारसी तथा सामान्य पाण्डुलिपि
            विज्ञानपर आयोजित कार्यशाला
2009दिल्ली विश्वविद्यालयक उच्चशिक्षा विकास विभाग द्वारा आयोजित ओरियेण्टेशन
            कोर्स
 2006सर्वदर्शनसंग्रह विभाग , लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ  द्वारा आयोजित
            माथुरी पञ्चलक्षणीपर कार्यशाला


प्रकाशन
2014मुहतशम काशानीक फ़ारसी मर्सिया केर हिन्दी पद्यानुवादरामपुर रज़ा लाइब्रेरी,
            रामपुर, उत्तरप्रदेश।
2013अमृतरसएक जायज़ा , उर्दू शोधपत्र, तस्फ़िया इण्टरनेशनल जर्नलमे प्रकाशित।
2013शाकुन्तल–  एक फ़ारसी रूपान्तरण, नाट्यम् मे प्रकाशित
2013भारतीय तथा पाश्चात्त्य वाक्यार्थ सिद्धान्तप्रतिभा प्रकाशन, दिल्ली
2013कल्पवल्ली  (आधुनिकसंस्कृतकाव्यसंकलन)मे सात टा कविता प्रकाशितसाहित्य
             अकादमी
2012पञ्चतन्त्र मौलाना, फ़ारसी शोधपत्र, मेह्रो नाहीद  शोधपत्रिकामे, तेहरान, ईरानसँ
            प्रकाशित।
2011 – ‘इश्क आतश’ ( फ़ारसी कविताक संग्रह ) –मिदहत प्रकाशन , तेहरान ,ईरान
20102011तीन कवितायें अर्वाचीन संस्कृतम् मे प्रकाशित
2009– ‘आधुनिक संस्कृत साहित्य संचयन’ ( आधुनिक संस्कृत रचना सभहँक संग्रह ) –
            विद्यानिधि प्रकाशन , दिल्ली
2009पण्डित अम्बिका दत्त व्यासजीक जन्म  सार्द्धैकशतीक अवसरपर स्मारिका केर
           सम्पादन तथा प्रकाशन
2008हिन्दी कवि राजेश जोशी पर आधारित पुस्तकमे एकटा लेख – ‘नीतिशतकएक
           पुनर्रचनाकेर प्रकाशन

शीघ्रप्रकाश्य
  1संस्कृत काव्यलघुसन्देशकाव्यम्’ – राष्ट्रियसंस्कृतसंस्थान , दिल्लीसँ
  2फ़ारसी गजलक नवीन संकलनईरानकल्चर हाउस , दिल्लीसँ।
भाषाज्ञान
1हिन्दीअवगमन, संवाद, लेखन , पठन, रचनात्मक लेखन
2संस्कृतअवगमन, संवाद, लेखन , पठन, रचनात्मक लेखन
3अंग्रेजीअवगमन, संवाद, लेखन , पठन
4फ़ारसीअवगमन, संवाद, लेखन , पठन, रचनात्मक लेखन
5उर्दू  –    अवगमन, लेखन , पठन, रचनात्मक लेखन
    एकर अतिरिक्त प्राकृत तथा अपभ्रंशों मे हस्तक्षेप

  सभहँक अतिरिक्त दिल्लीक अनेक महाविद्यालय सभहँक सांस्कृतिक प्रतियोगिता सभमे अनेकशः निर्णायकक तौरपर आहूत एवं अनेक सांस्कृतिक समितिक पदाधिकारी

हिनक दू टा रचना--


तेरे रू--रौशन को शम्स[1] ही कहा जाये

रात की तरह गेसू गर गिर्द हों छाये


जब उलझ गयीं ज़ुल्फ़ें आपकी ख़यालों से

तब तब अपनी नज़्मों के ज़ुल्फ़ हमने सुलझाये


तोड़ दो मनादिर[2] को तोड़ दो मसाजिद[3] को

ताकि लामकाँ[4] अपने हर मकाँ में रह पाये


मेरे शेर ऐसे हैं जिस तरह कोई बच्चा

कहना और कुछ चाहे और कुछ ही कह जाये


मेरे शेर जिसके हैं वो भी जाने महफ़िल काश

साथ साथ मह्फ़िल के मेरे शेर सुन पाये


[1] सूरज

[2] मन्दिरों

[3] मस्जिदों

[4] गृहविहीन (परमेश्वर)

आशिक़ हुए, असीर[1] हुए, मुब्तिला[2] हुए

देखो तुम्हारे इश्क़ में, हम क्या थे क्या हुए


फ़रहादे कोहकन[3] हो कि मजनूँ फ़िगारतन[4]

हम आशिक़ी में सबसे बहुत पेशपा[5] हुए


खींचे है ताबे इश्क़ तो रोके है उसको शर्म

इक मुल्के हुस्ने नाज़ पे दो पेशवा[6] हुए


ईफ़ा अह्दे चर्ख़[7] तग़य्युर[8] है इसलिये

जितने भी बे वफ़ा हुए सब बा वफ़ा हुए


मारे थे जितने पहले रक़ीबाने तेग़ज़न[9]

सब इस जनम में ले निगहे सुर्मासा[10] हुए


[1] बन्दी

[2] दुर्गति ग्रस्त

[3] पहाड़ काटने वाला फ़रहाद

[4] क्षतविक्षतशरीर मजनूँ

[5] आगे

[6] हाकिम

[7] भाग्यचक्र की शर्तें मानना

[8] परिवर्तन

[9] तलवारबाज़ दुश्मन

[10] कजरारी


हिनक फारसी रचना पढ़बाक लेल ऐठाम आउ--http://drbshukla.blogfa.com/



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तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों