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शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

गजल:


गजल:
गप्प पिबै छी मुखपोथी पर​
गप्प छटै छी मुखपोथी पर​

संग रहै से बिछुरल मीता ​
मीत तकै छी मुखपोथी पर​

गाम​-घरक हम बिसरल​ बोली
बोल सिखै छी मुखपोथी पर​

डाक घरक हम बाटो बिसरल​
पत्र लिखै छी मुखपोथी पर

पंच रहल नञ पनचाइत घर​
पंच बनै छी मौखपोथी पर​

भेंट हमर नञ किनको संगे
कुशल पुछै छी मुखपोथी पर​

कहब गजल से मंचो उजरल​
गजल कहै छी मुखपोथी पर​
सभ पाँतिमे मात्राक्रम –21-122-2222        

© राम कुमार मिश्र

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

गजल

गजल
हरियर कचोर​
पटुआक झोर

छुटलइ कतेक​
पेटक ​मड़ोर​

रोपल जजात​
भेटल चिचोर

मनसा बिदेश
पहिरब पटोर​

प्रेमक सनेश​
चकबा चकोर​

लागल बकोर
पाकल परोर​

फ़ेकू निहूँछि
तामस अघोर​

बातक​  नछोर
जिनगी कठोर​

‘राम’क भरोस​
भेटत इजोर

सभ पाँतिमे मात्राक्रम - 22121

©राम कुमार मिश्र

शनिवार, 13 सितंबर 2014

गजल

गजल - 11

सहसह लोकक भीड़ देखल हम
सुच्चा लोकक लेल बेकल हम​

कटुता क्रोधक उमर बढ़लै टा
नेहक देखल लाश जेकल हम​

माहुर मीझर गप्प गीजै छथि
माहुर गप्पक टीस सेकल हम

बलगर शोणित पीबि मोटेलै
अबला श्राद्धक पात फेकल हम

जीयब निकहा दिनक आशामें
आशक सिम्मर फ़ूल सेबल हम​

सभ पाँतिमे मात्राक्रम –2222-21-222

© राम कुमार मिश्र

सोमवार, 4 अगस्त 2014

गजल

गजल - 10

खेती अगता  आइ   बुझलियै
करमक झटहा आइ बुझलियै

असगर जिनगी मगन रही धरि
लोकक खगता आइ बुझलियै

अनकर तीमन नीक लगै छल​
बारिक पटुआ आइ बुझलियै

बापक टाका खूब उरेलहुँ
अप्पन बटुआ आइ बुझलियै

शहरी जिनगी मिट्ठ लगै छल​
गामक कुटिया आइ बुझलियै

सभ पाँतिमे मात्राक्रम –2222 21 122

© राम कुमार मिश्र

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

गजल

गजल - 9

मूड हमर किछु गरबर अछि
बोल हुनक बड करगर अछि

सूनि हुनक बोली बुझलौ
बाप ब​ऽरक बड धरगर अछि

दाँत टुटल मूँहक सभटा
पाइ बेर धरि दतगर अछि

रीति कोन बेटा बेचब​
गप्प हमर धरि खरगर अछि

‘राम’ कतय बेटी ब्याहब​
गाम​-गाम में अजगर अछि

सभ पाँतिमे मात्राक्रम – 2121+2222
© राम कुमार मिश्र

गाम: रमौली,  बहेड़ा,  दरिभंगा

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

गजल

जाति- धर्मक​  जुन्नामें अँटियाइते रहलहुँ        
छूत​-अछुतक अदहनमें उधियाइते रहलहुँ

पेट कोना जड़लै पतियौलक कियो कहिया
झूठ​-साँचक भाषण धरि पतियाइते रहलहुँ

राज​-पाटक बखड़ामें बटलै अपन मानव​
​ऊँच​-नीचक​  झगड़ामें लतियाइते रहलहुँ

प्यास लगले रहलै गंगा धारमें तैयो
पाप-पुण्यक गंगामें  भसियाइते रहलहुँ     

‘राम’ मनुखक बूझत ​कहिया मोल ई दुनिया
कोण​​-साँन्हिक फ़ेकल धरि बसियाइते रहलहुँ

सभ पाँतिमे मात्राक्रम - 2122+222+2212+22 
तिथि: २४.०२.२०१४
©राम कुमार मिश्र

शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

गजल



बताह भेलइ  मनुआं आब कोना मानत​           
पुरान यादिक गठरी  फोलि फेरो कानत         

करेज़ चनकल टुकरी भेल  संगी  रूसल​         
समेट सभटा टूटल टूक​   फेरो गानत            

बिसैर नहि पेलक ओकर मधुर यादक पल  
सिनेह नहि बिसरत​   ई बात फ़ेरो ठानत​        
                                                 
ससैर गेलै प्रेमक ताग​ छलई   तानल​                
सहेज सभटा प्रेमक  ताग​  फेरो  तानत​              

सचेत कतबो केलहुँ मोन अप्पन कोना        
जड़ैत डिबिया सन मोनक इ गप के जानत                                              

सभ पाँतिमे मात्राक्रम  - 1212+2222+122+22
तिथि:३१/०१/२०१४

©राम कुमार मिश्र

बुधवार, 1 जनवरी 2014

गजल

नव बरखक नव सोच नवल हो
नव हरखक  नव शक्ति सबल हो

हो मंगलमय सभ तरहेँ जिनगी
प्रेमक अमृत  रस धार बहल हो ​

जाति धरम कुटुम्बक नहि रगड़ा
पसरल घ्रिणाक देवाल ढ़हल हो

पावन मधुर  सुर​-ताल  सजल हो
असल अजादीक दीपक धवल हो

सत ज्ञान-पुंजक प्रबाह प्रबल हो
मातु पिता आ गुरु चरण कमल हो

वर्ण – १४
तिथि: ०१/०१/२०१४

©राम कुमार मिश्र

गुरुवार, 31 अक्टूबर 2013

गजल

गजल-4

जौं बूझी त​ऽ जहरी जर्दा जड़ा रहल अछि लोकक जिनगी
सिगरेट  चीलम गांजा गला रहल अछि लोकक जिनगी

चौक​-चौबट्टी दारु केर भट्टी बनल बिनाशक बीखशाला 
चिखना कटिया तारी में लुटा रहल अछि लोकक जिनगी

रंग​-बिरही पुरिया पाकिट धऽ नवतुरियाक रंग देखू
चिबा-चिबा बिख गुटका चिबा रहल अछि लोकक जिनगी

नोतल केंसर आबि रहल छै फोंक करै लेल जिनगी कऽ
धन​-संम्पति लुटा लुटा कना रहल अछि लोकक जिनगी

नशाखोरक जिनगी देखियौ भरल जुआनी बूढ बनल​
दांत टूटि आ डांड़ लीबि लिबा रहल अछि लोकक जिनगी

फेर न भेटत जिनगी बाबू जौं एकरा बरबाद करब
तोरियौ नशाक जाल जे फंसा रहल अछि लोकक जिनगी

लय संकल्प करू दृढ़ निश्चय फेकी सभटा दुर्गुन ‘राम’
देखू सोचू बूझू कोनाकऽ हरा रहल अछि लोकक जिनगी

वर्ण – २२
तिथि: ३१/१०/२०१३

© राम कुमार मिश्र

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

गजल

गजल - तीन

जिनगीक बाट पर कांट गरबे करत
दरदक टीस सं करेज जरबे करत

जिनगी मे भेटत बसंत केर मधुवन
पतझर केर पात मुदा झरबे करत

जिनगी मे जितब हजार मगर तगमा
हरब​ऽक​ जोगार दुनिया करबे करत

मेहनति  केर घाम सं पाटि लेब जिनगी
सफलता केर बखारी त भरबे करत

कर्मठ बनल रहबै जौ सदिखन ‘राम’
दरिद्रता केर दानव त मरबे करत

(सरल वार्णिक बहर​) वर्ण - १६
© राम कुमार मिश्र



शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

गजल



गजल – दू



गाम छोड़ति हम कैन गेलउ

बाम भेलइ दिन जैन गेलउ



नेह टूटल सब बन्धु छूटल

भाग भूटल हम मैन गेलउ



माटि पावन हम छोड़ि आयल

प्रीति  माहुर हम सैन गेलउ



साग बारिक फल फूल बारिक

फेर​ पायब हम ठैन गेलउ



‘राम’ गामक रस छोड़ि आयल

फेर आयब हम ठैन गेलउ



सभ पैत में आखर - १२ आ मात्रा - १६

तिथि: १३/०९/२०१३

© राम कुमार मिश्र
तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों