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शनिवार, 13 अगस्त 2011

गजल

संसद केर फोटो मे किछुओ नहि हेर-फेर
नागनाथ,साँपनाथ,इएह दुनू बेर-बेर
लागैत अछि अजुका ई दिनो अन्हार रहत
सुरूज मलान छथि एखनहुं उबेर बेर
एकबाली लोक सभक दागल सभ साँढ छै
तोड़ि रहल जहिपतार करचीक सभ घेर-बेर
मातल आर्केस्ट्रा मे आजुक सभ गोपिका
राधिकोक टेर नहि मुरली के टेर बेर
घामक टघार बहैछ श्रीमंतक माथ पर
उमकल सीमान पर जन-गण के जेर-बेर
गाम भेल नन्दिग्राम,घर-घर सिंगूर भेल
"अरबिन"सभ संग रहू एहन अन्हेर बेर

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

गजल

जीवनक जे अगिन-पथ के पार एताह

जीजिविषा मे से अजित,आजाद हेताह


बूड़ि,जे निष्ठाकेँ सदिखन मोन रखताह

ओ सियासी खेल मे बरबाद हेताह


माथ अछि जिनकर सिंहासन के चरण पर

आम-जन के माटि मे ओ खाद हेताह


ओ वैधानिक अनुकम्पा के प्रावधानसँ

मूल भए सकलाह नहि,अनुवाद हेताह


अछि हुनक निर्माण मे कोनो खराबी

उच्छिष्ट छथि ओ,तेँ कोना उत्पाद हेताह


धन्य!’अरबिन’ तों एलह मैथिल गजलमे

फेर केओ खुसरो की तोहर बाद हेताह

रविवार, 26 जून 2011

गजल

क्लस्टर बम,प्रक्षेपास्त्र टामहाक हमरे छल
जीवित लहास बनल जे इराक हमरे छल


भारत,सोनार बंग आकि पाक हमरे छल
“एकोहंबहुस्याम”-ई मजाक हमरे छल


एखन भने परमाणु कचरा केर याचक छी
‘विश्वगुरु हम छी’-से वेदवाक् हमरे छल


गांधी छलहुँ जखन हमरे सुराज छल
दागी पर खादी केर झक पोशाक हमरे छल


हमरे ओ मुण्ड छल कटि गेल जे रैजकी सँ
बाजारक बीच पड़ल कान-नाक हमरे छल


हमरे छल डिडिर जे बाँटलक सहोदर केँ
अधरतिया आजादीक ढोल-ढाक हमरे छल


‘अबिरन’रहबैया छी रोगहा समाजक हम
लसनि जेकर लागल अछि से सुजाक हमरे छल

बुधवार, 15 सितंबर 2010

गजल

प्रस्तुत अछि अरविन्द ठाकुरक गजल- अरविन्द ठाकुर
साभार विदेह

छिछिआइछ उत्कंठा हमर खन आर लग, खन पार लग
हमर लिखल उजास सभक मोल की संसार लग

जाल मुँहमे बोल नञि, छपय बहेलिया के बयान
चिड़ैक बोली बुझत से नञि लूरि छै अखबार लग

रंगबिरही जिनीससँ ठाँसल रहै सभटा दोकान
किन्तु जन-बेचैनी के औषधि नञि रहै बजार लग

एक समझौता सँ शासन वामनक सरकस बनल
नञि छलै पट्ठा कोनो दमगर बचल दरबार लग

बुन्न मे सागर भरल, अणु मे भरल ऊर्जा अपार
बिन्दु सरिपहुँ लम्बवत भए ठाढ़ होइछ आधार लग

लोक-लादल नाह बाढ़िक पानि मे अब-तब मे छै
ओ घिंचाबय छथि फोटो बान्ह पर पतवार लग

नफा के वनतंत्र मे पग-पग बिचौलिया रक्तबीज
अकिल गुम्म अछि, केकर मारफत अर्जी दी सरकार लग

उपरचन्ती माल के चस्का चढ़ल “अरबिन” एतेक
बनल छी लगुआ कि भिरुआ, जायब नञि अधिकार लग

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

गजल


जनपथ छोड़ि राजपथ जायब से हमरा की नीक लगैए
उखरि मे मूड़ी घोसिआयब से हमरा की नीक लगैए


बक सँ कौआ बनल ठाढ़ छी काजर घर मे
तहि पर चानन ठोप लगायब से हमरा की नीक लगैए


चोरि करब हम मुदा शान सँ चौकीदारक संग रहब
लाज-शरम ताखा पर राखब से हमरा की नीक लगैए


भ्रष्ट दुपहरा केर एहन बहसल बसात मे
लंक-दहन लेल आगि पजारब से हमरा की नीक लगैए


छमा करू अरबिन उचित किन्नहुँ नहि बाजब
सुधिजन आगाँ गाल बजायब से हमरा की नीक लगैए

रविवार, 20 दिसंबर 2009

गजल


छाती तँ तानल छल शस्त्र उठयबाक बेर
कोंढ़ किए काँपि रहल लास उठयबाक बेर


पात बिछयबाक बे लोकक करमान छल
यार सभ अलोपित भेल ऐंठ उठयबाक बेर


आयातित महारानी फाहा बुझाइत छल
घोल किए परमाणुक भार उठयबाक बेर


दाउन बेर धानक तँ मारिते महाजन छल
एक्को टा जन नहि नार उठयबाक बेर


प्रवचन मे घौसय छथि धैरज केर महिमा ओ
सभ टा बिसरि जाइ छथि कष्ट उठयबाक बेर


अरबिन उतारा किछु विध्वंसक होइत अछि
नीक जकाँ सोचै छल प्रश्न उठयबाक बेर
तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों