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मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

गजल

गजल

नव किछु कहू घटल की कहए छी
ताहूमँहक असल की कहए छी 

मिठगर करू कनी बोल अपन किछु
सदिखन वचन तनल की कहए छी 

आँहाँ विचारमे सभ त' कठिनगर
फरिछा कहू सरल की कहए छी 

आंगुरसँ गाइन पुराओल बहरमे
ई शेर आ गजल की कहए छी 

खहियारि गप्प राजीव कहब जे
बाजू खखसि दबल की कहए छी 

२२१२ १२२ ११२२
@ राजीव रंजन मिश्र 

सोमवार, 20 जनवरी 2014

गजल

गजल
गजल

हाड़ कँपकपा रहल अछि जाड़ 
देह कनकना रहल अछि जाड़ 

ठाढ़ भेल डाँर कसने दोमि 
टांग थरथरा रहल अछि जाड़ 

बस गरीब आ अमीरी देख 
बोल बड़बड़ा रहल अछि जाड़ 

साज बाज टोप चादर देखि 
माथ धड़ खसा रहल अछि जाड़
कैथरी लदल मनुखकेँ पाबि 
दाँत कटकटा रहल अछि जाड़ 

हाल की कहू अपन राजीव 
मोन चटपटा रहल अछि जाड़ 

२१२ १२१२ २२१ 
@ राजीव रंजन मिश्र 

गजल

गजल

दिन कहुना काटि लेलहुँ राति भारी भ' गेल
कछ्मच्छी फेर मोनक आइ हाबी भ' गेल 

कोनो चीजक कखन ऐ ठाम भेटल ग' दाम
अनढनकेँ सोझ लोकक हाथ कारी भ' गेल 

ललसा छल संग भेटित चारि टा लोककेर
धरि सभ क्यौ पेट खातिर कामकाजी भ' गेल 

ककरा के हाथ जोड़त आ कि आशीष देत
रहि अपने शानमे सभ खानदानी भ' गेल 

अजगुत राजीव ऐ ठा रीत सभटा जगतकँ
बड़ बजने भोथ लोकक वाहवाही भ' गेल 

२२२ २१२२ २१२२ १२१ 
@ राजीव रंजन मिश्र 

गजल

गजल

कखनोकँ मोन सहकि जाइ छै
अनढनकँ  लेल सनकि जाइ छै

जे साँझ भोर रहल गुम सदति
सेहो त' लोक चहकि जाइ छै

ई नेह चीज त' थिक एहने
भेटल कि डाँर लचकि जाइ छै

बड जे कठोर करम बानिकेँ
तकरो त' हाथ झड़कि जाइ छै

राजीव ई त' बुझल बात थिक
चानन पसरि क' गमकि जाइ छै 

221 2112 212
@ राजीव रंजन मिश्र 

गजल

गजल

काटि मनुख जिबिते छागरकेँ
स्नान करत गंगासागरकेँ

दोष सदति ताकत गामक धरि
बानि अपन झरकल बागरकेँ 

आब बहत के तीला चाउर
पेट खगल सभकेँ गागरकेँ

चान चकोरक जोड़ी लाजे
देखि रहल हिय सौदागरकेँ 

मोन अकछि खहड़ल राजीवक
एक भरोसा नटनागरकेँ 

2112  22 222
@ राजीव रंजन मिश्र 

गजल

गजल

आँखि आँखिमे सभटा कहि गेल
बात बातमे जुलमी गहि गेल 

नैन बाणकेँ मारुक खंजरसँ
मोन प्राण अधमारल रहि गेल 

पल उठा क' देखल ओ जखने त'
विश्वमित्र देबालो ढहि गेल

औ नयन कमानक सर बेधलसँ 
वीर हारि टा सगरो महि गेल 

नेह धारमे डूबल राजीव
भोर साँझ सभ तारन सहि गेल 

२१२१ २२२ २२१ 
@ राजीव रंजन मिश्र 

सोमवार, 13 जनवरी 2014

गजल

गजल

जिनगी जतरा छै मानि चलल हम
पोथी पतरा नै गानि रहल हम

देखल ककरो नै चाँकि कनिकबो
डाहल मोनक निज आप जरल हम

कनकन ठंढीमे ठिठुरल महि धरि
नेहक धधरा ने तापि सकल हम

टोकल ककरो नै गाम नगर बस
नै झूकल आ नै कात हटल हम 

धरनी ज्ञानक थिक स्वर्णकलश बुझि
ठोपे ठोपे बुरिलेल चखल हम 

गुमसुम अपनामे राजीव पड़ल नित
कबिलाहाकेँ कुटिचालि गमल हम 

२२२२ २२१ १२२ 
@ राजीव रंजन मिश्र 

शनिवार, 11 जनवरी 2014

गजल

गजल

थाकल जे मरि गेल जगतमे
भेटत की फुसियाहि बहसमे 

की जीतल आ हारि चलल की
जानल के ई बात सहजमे

डाहब सदिखन मोन अपन टा
मतलब ककरा गाम नगरमे

दुनियाकेँ ई खेल पुरनगर
लचरल बुरिबक बीच भँवरमे

करमक सभ राजीव नतीजा
ककरो नै लहि गेल अचकमे

२२२ २२१ १२२ 
@ राजीव रंजन मिश्र 

गजल

गजल

सभ लागल रही साल बीतैत रहल
बिलमल नै कनी साल बीतैत रहल
  
अछि झोँका चलल प्रश्नकेँ एक सए
भेटल की कथी साल बीतैत रहल

बस देखा क' चलि गेल सपने त' बुझू
जनि सुन्नरि परी साल बीतैत रहल

अछि शुरुआत पुनि देह मरदनसँ धियक
टूटल नै कड़ी साल बीतैत रहल

आबो व्यर्थ नै होइ राजीव समय
नबका किछु करी साल बीतैत रहल
  
222 1221 22112 

@ राजीव रंजन मिश्र 

बुधवार, 8 जनवरी 2014

गजल



मनुख माल जालकेँ लजा देलक 
छिया डेग डेग पर घिना देलक 

कुकरमी त' भेल पातकी देखू 
सहकि नाक कान सभ कटा देलक 

सजा फेर एक नारि हेबाकें 
सहल ओ धिया हिया कना देलक  

चलल खेल धरि लहास पर सेहो 
सगर राजनीति सभ चला देलक

जँ राजीव आब बानि नै बदलल  
बुझब व्यर्थ प्राण ई धिया देलक 

१२२१ २१२ १२२२ 
@ राजीव रंजन मिश्र 

बुधवार, 1 जनवरी 2014

गजल



मरजादाक भान रखने मान होइ छैक सदिखन
निकहा लेल संग अनका आन होइ छैक सदिखन  

इतिहासक उनटि जँ पन्ना लिअ' त' यैह टा कहत जे
रहने नीक दल सफल कप्तान होइ छैक सदिखन 

गप बाजब अमेरिकाकेँ नीक थिक खराब नै धरि
काजक लोककेँ अपन खरिहान होइ छैक सदिखन 

नेता आचरणसँ निज आदर्श श्रेष्ठ भेल तहने
दुनियामे तकर यशक गुनगान होइ छैक सदिखन

बुझि राजीव गेल करतब आ सिमान अपन से
मनुखक रूपमे पुनमकेँ चान होइ छैक सदिखन

२२२१ २१२२ २१२१ २१२२ 
@ राजीव रंजन मिश्र  

गजल



अपन संग होइक बस सभ हालमे 
नवल सोच होइक ऐ नब सालमे 

चलू फेर सभ गोटे मिलि जाइ आ 
खिला दी कमल सगरो महि थालमे 
बदलि लेब दुनियाकेँ अपनेसँ हम
रहत फेर तागत नै जंजालमे  

समयकेँ त कोसब वीरक बानि नै 
बड़ी शान सौरभ छै सुरतालमे 

सखा यैह राजीवक शुभकामना 
रही स्वस्थ सुधिगर सभ सभकालमे 

१२२१ २२२ २२१२ 

@ राजीव रंजन मिश्र

गुरुवार, 23 अगस्त 2012

गजल

बाल गजल

दीदी हम सभ मिलि क झंडा बनेबै ना
पंद्रह अगस्त क' तिरंगा फहरेबै ना

भाईजी तू कागत केर झंडा बनाबय
बांसक करची आनि क' डंडा लगेबै ना

सभ गोटेक हाथे एक एक टा क चाही
हम सभ संगहिं घर सँ बहरेबै ना

अहि दिनक बड्ड मोल छई गै बहिना
घूमि घूमि सगरो से सभ के बतेबै ना

तू सभ सुनिहैंन संच मंच बैस कए
नेताजी बनि हम जे भाषण सुनेबै ना

सभ गोटे ठाढ़ भए आँगन में संगहिं
मिलल कंठ सँ जन गण मन गेबै ना

झंडा फहरा क' प्रसादो त होबाक चाही
बाबा सँ कहि क' खुब बुनिया मंगेबै ना

पढि लिखि पैघ भ' देश आर समाजक
"राजीव" सभ रुपे मान हम बढेबै ना

(सरल वार्णिक बहर,वर्ण-१५)
राजीव रंजन मिश्र

गजल

बाल गजल

गली गली में झंडा फहरेबै हम
गामे गामे तिरंगा लए जेबै हम

बहुत मोल छैक स्वतंत्रता केर
घरे घरे सभके ई बतेबै हम

केसरिया थिक बल आर विराग
सभके बल पौरुष जगेबै हम

उज्जर सत्त मोनक ईजोर छैक
निश्छल रहि जिवन बीतेबै हम

हरियर थिक खेतक लहलही
धरती सए मोती उपजेबै हम

चक्र अशोक कहय छै जे कहियो
अन्याय कए नै माथ झुकेबै हम

'राजीव' सप्पत लैत छी सभ मिलि
भारत मायक' मान बढेबै हम

(सरल बार्णिक बहर,वर्ण-१३)

राजीव रंजन मिश्र

गजल


भक्ति गजल

प्रगटल कृष्ण कन्हैय्या सभ गाबै बधैय्या छथि
मंगल दीप जराबै जन्मल रास रचैय्या छथि

नारद जी नाचथि आर संग में ब्रम्हा जी नाचथि
तिर्पित सभ छै शंकर जी नाचै ता ता थैय्या छथि

गोकुल में सभ मिलि ढोल बजाबै मगन भए
नर नारि बिहूँसि क' सगरो गाबै सवैय्या छथि

नन्दराय दुन्नू हाथे लुटाबै छथि हीरा आ मोती
स्नेह विभोर भ' निहूँछथि यशोमति मैय्या छथि

साधू संत सभ हरषि धाओल चंहु दिसि सँए
कष्ट निवारण ला आयल माखन खबैय्या छथि

सगरो ब्रज गोकुल हरिआओल रातहिं राति
मोर मुकुट धारी त' संसारक रखवैय्या छथि

चेतथि अपना के कंस आ दुर्योधन सभतरि
आयल मनमोहन कालिया नाग नथैय्या छथि

"राजीव" मगन भए मनबय कृष्ण जन्मोत्सव
दैत सभके सगरो कृष्णाष्टमिक बधैय्या छथि

(सरल वार्णिक बहर,वर्ण-१८)
राजीव रंजन मिश्र

गजल

भक्ति-गजल

हे श्याम सुन्दर राधावर गिरधारी यौ
हे मुरली मनोहर रसिक बिहारी यौ

घोर बिप्पति पड़ल छै सगरो धरती
बिनबै छी प्रभु एक बेर अवतारी यौ

आबु फेरो हे यशोदा नंदन छाल्ही चोर
हम देब माखन मिसरी भरि थारी यौ

ब्रज भूमि सरिस देश सुन्न परल छै
ज्ञान बिनु अकुलायल छै नर नारी यौ

हे कान्हा केशव रास रचैय्या प्रगटू न'
भीड़ परल अछि सन्तन पर भारी यौ

जनमल कंस दुर्योधन सगरो महि
नहि देखल अर्जुन भीम गदाधारी यौ

बसन हीन भेल छैक अबला भारत
लाज बचाबू चीर बढ़ा कृष्ण मुरारी यौ

सहस्त्र कालिया बैसल छै छत्र काढने
गंगा जमुना कोसी गंडक भेल कारी यौ

ने आब अहाँ बिनु आस कोनो नंदलाला
कन्हैय्या नटवर नागर बनवारी यौ

कल जोरि याह टा बस विनबै "राजीव"
ने तोहि बिसरि होई हेहर मुरारी यौ

(सरल वार्णिक बहर वर्ण-१५)
राजीव रंजन मिश्र

गजल

भक्ति गजल

कन्हैया अहाँ प्रगटू न फेर एक बेर यौ
नंदलाला अहाँ जन्मू न महि पर फेर यौ

देखू भीर पड़ल संतन पर चहुँ दिसि
निर्दयी भए किएक अहाँ केने छी देर यौ

दुनिया दारी सभटा बिगरल उजरल
लागल छैक दुर्योधन आ कंसक ढेर यौ

अर्जुन हारल आ भीमो त भागि परायल
युधिष्ठिर बिन छै सौंसे मचल अन्हेर यौ

अबला नारी घर घर बिलखि रहल छै
चीर बढाबू कृष्णा भारतक नारी केर यौ

प्रलय पड़ल अछि बिनबैत बुझबैत
अहीं छी नंदलाला भक्त जनक सुसेर यौ

"राजीव" करैत अछि विनती यदुनंदन
हे मनमोहन जगत में करु उबेर यौ

(सरल वार्णिक बहर,वर्ण-१६)

राजीव रंजन मिश्र

गजल

गजल

कनी सोची खनिक लेल हम करय जे की चाही
पूछी आर बुझाबी मोन कए पाबय जे की चाही

बिना सोचने करैत चलैत बड्ड दिन बीतल
बजबाक काल ध्यान रहै बताबय जे की चाही

कहल बुढ पुरान जे सत् बाजी हया राखि क'
मिठ्गर बोल सँ बुझा दी जताबय जे की चाही

चुप्प रहब आ बड्ड बाजब दुन्नु ख़राब थिक
माहिर त' इशारे बुझा दैथि होबय जे की चाही

नै उखली बाप दादा आ नै सहैत रही सभटा
सामंजस्य राखि कए आब करी तय जे की चाही

किछु कैल केर दाबी आ किछु विद्रोहक भावना
ध्यान राखि उभय पक्षक बिचारय जे की चाही

समस्या ने छैक कोनो जकर निदान नहि थिक
जौं पूर्वाग्रह तजि सभ क्यौ नियारय जे की चाही

विनम्र जौं ने ठीक त' उदंडतो ने छैक जवाब
दुनू कए सहजोरि सोची निकालय जे की चाही


कथू करय स पहिले राखि ली अवधारि कए
मुलभूत उद्देश्य समाजक होमय जे की चाही

(सरल वार्णिक बहर,वर्ण-१८)

राजीव रंजन मिश्र

गजल

गजल

कहियो दिवाली त कहियो रमजान मनि गेल
मंदिर आ मस्जिदक नामे त देश हक़नि गेल

पाहिले एक्कहि गाछक दु गोट ठैढ छल दुनू
आइ काल्हि एक दोसर सँ अनजान बनि गेल

छल संगहि संग कष्ट सह्बाक काल सदिखन
सुखक घड़ी म सनकल आ अरारि ठनि गेल

राम आर रहीम म कोनो अंतर कहाँ छलैक
धर्मक नामे तहन कोना शोणित तपनि गेल

होली म खाइत पुआ आ ईदक सेवई बँटाय
मुल्ला आ पंडित मुदा सभटा स्नेह दफनि गेल

भगवान आ अल्लाह त एक्कै बना पठौने छला
नहिं जानि कोना हिन्दू आ मुसलमान बनि गेल

गाँधी जिन्ना नेहरु आ गफ्फार सबहक "राजीव"
सनकी सभ दंगा फसाद कए मान हनि गेल

(सरल वार्णिक बहर,वर्ण-१८)
राजीव रंजन मिश्र

गजल


गजल

आई मोन बेदर्दी पागल अछि
कतेक दिनक पियासल अछि

नहि जानि हैत की आजुक राति
टेमी स ततारल दागल अछि

पोखरिक थम्हल पानि में जेना
पाथर क्यउ एक मारल अछि

नहिं जानि हम सम्हरब कोना
करेज हमर त डाढल अछि

बुझबी एकरा हम परतारी
नै जानि अनेरो हकासल अछि

मानल नहि एक्को बात हमर
"राजीव" बेकल भ' फाटल अछि

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण- १२)

राजीव रंजन मिश्र
तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों