Saturday, 29 December 2012

हजल


हजल

देखियौ देखियौ जुग केहन भऽ गेलै कक्का यौ
टोपी चश्मा पहिर कऽ चलै छै छौड़ा उचक्का यौ

छमकि कऽ चलैए संगे नटुआ सन केश छै
जीँस टीशर्ट पहिर कऽ अंग्रेज भेल पक्का यौ

चौक पर घूमैत छै बोतल चढ़ा कऽ भोरेसँ
सिगरेटक दिन भरि ई उड़ाबै छोहक्का यौ

अपनाकेँ बड़का ई बुझैत अछि हीरो छौड़ा
मुहँ नै लगाबूँ एकरासँ अछि ई लड़क्का यौ

स्त्री जकाँ श्रृंगार करै छै लगाबैये ठोररंगा
भोरेसँ कटाके दाढ़ी मोछ लागे जेना छक्का यौ

छौड़ी पाछाँ पागल भेल छै काज धाज छोड़िकेँ
हुलिया एकर देखि कऽ मुकुन्द हक्काबक्का यौ

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण17
©बाल मुकुन्द पाठक ।।

देखियौ देखियौ जुग केहन भऽ गेलै कक्का यौ
टोपी चश्मा पहिर कऽ चलै छै छौड़ा उचक्का यौ

छमकि कऽ चलैए संगे नटुआ सन केश छै
जीँस टीशर्ट पहिर कऽ अंग्रेज भेल पक्का यौ

चौक पर घूमैत छै बोतल चढ़ा कऽ भोरेसँ
सिगरेटक दिन भरि ई उड़ाबै छोहक्का यौ

अपनाकेँ बड़का ई बुझैत अछि हीरो छौड़ा
मुहँ नै लगाबूँ एकरासँ अछि ई लड़क्का यौ

स्त्री जकाँ श्रृंगार करै छै लगाबैये ठोररंगा
भोरेसँ कटाके दाढ़ी मोछ लागे जेना छक्का यौ

छौड़ी पाछाँ पागल भेल छै काज धाज छोड़िकेँ
हुलिया एकर देखि कऽ मुकुन्द हक्काबक्का यौ

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण17
©बाल मुकुन्द पाठक ।।

गजल

गजल

हमरासँ जौँ दूर जाएब अहाँ
रहि रहि इयादि आएब अहाँ

सिनेह लेल अहीँके बेकल छी
छोड़ि कऽ हमरा कि पाएब अहाँ

खोजि खोजि के तँ पागल बनलौँ
बताउ कि कतऽ भेँटाएब अहाँ

किएक लेल एहन प्रेम केलौँ
जौँ ई बुझलौँ नै निभाएब अहाँ

बदलि गेलियै अहाँ कोना कऽ यै
हमरासँ नै बिसराएब अहाँ

हमरा छोड़ि गेलौँ मुकुन्द संग
आब कतेक के फसाँएब अहाँ

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण12
©बाल मुकुन्द पाठक ।।

गजल

गजल

सुनु अहाँ कियै हमरा सँ दूर गेलौँ यै
अहीँक चलतै हम तँ नाको कटेलौँ यै

रुप अहाँक देखिकऽ हम तँ मुग्ध भेलौँ
ओहि परसँ कियै ई कनखी चलेलौँ यै

मगन छलौँ अहाँ मेँ काज धाज छोड़िकऽ
प्रेम मेँ तँ हे प्रेयसी जग बिसरेलौँ यै

पढ़बाक उमरि छल छलौँ इक्कीस के
काँलेज के छोड़िकऽ अहाँमेँ ओझरेलौँ यै

मुकुन्द अछि प्रेमी अहाँकँ सभ जानैये
जानसँ बेसी चाहे जे तकरा गंवेलौँ यै

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 15
©बाल मुकुन्द पाठक ।।

गजल

दिल्लीँ मेँ भेल हिंसा आ बलात्कार पीड़िता के फोटो देख के मोनसँ अनायास निकलल किछु पाँति -

गजल

बिना दागक हमर छल ई चान सन मुँह
कुकर्मी नोचि लेलक मिल राण सन मुँह

कि सपना देखलौँ आ लुटि गेल जिनगी
घटल एहन बनल देखूँ आन सन मुँह

रमल रहियै अपन धुनमेँ आ कि एलै
चिबा गेलै हमर सुन्नर पान सन मुँह

बनल नै स्त्री समाजक उपभोग चलते
किए तैयो मनुख नोचै चान सन मुँह

हमर सभ लूटि गेलै ईज्जत व चामोँ
कि करबै जी कऽ लेने छुछुआन सन मुँह

बहरे-करीब मने
"मफाईलुन - मफाईलुन-फाइलातुन"
मात्रा क्रम-1222 - 1222 - 2122
©बाल मुकुन्द पाठक ।।

गजल

गजल

प्रेम नै भाइ ई जहर छै
पोखिरसँ उठल बुझु लहर छै

प्रेम मेँ जान जाएत चलि
तड़पि के मरब ई जहर छै

नै परु प्रेमके जाल मेँ
एखनो एकरे पहर छै

नै करु प्रेमके ई नशा
ई तँ मिसरी धुलल जहर छै

ई मुकुन्दोँ फसिकँ ऐहिमेँ
कहलक प्रेम नै जहर छै

*बहरे- मुतदारिक ।
फाइलुन मने दीर्ध-ह्रस्व-दी ­र्ध चारि बेर ।
© बाल मुकुन्द पाठक ।।

Friday, 28 December 2012

गजल

भूतलेलौं किए एना मित बना लिअ
छोड़ि सगरो बहानाकेँ  प्रित लगा लिअ

वचन नै देब हम नै किछु मोल एकर
आउ चलि संगमे  हमरो अप्पना लिअ


जीवनक काँट ई   कोना बिछ्ब एते  
संग हमरा लमोनक संसय हटा लिअ

जुनि बुझू आन जगमे सपनोसँ कखनो
बुझि कअप्पन कनी छू ठोरसँ सटा लिअ

रूप सुन्नर अहाँकेँ ई ओहिपर बदरा
जीब कोना करेजामे "मनु" बसा लिअ

(बहरे - असम, मात्रा क्रम २१२२-१२२२-२१२२)

जगदानन्द झा ‘मनु’

Tuesday, 25 December 2012

गजल


नीक नीक लोकक ई केहन काज अछि
बेटा बेचैत नै कनिको किए लाज अछि

मायाक महिमा सगरो पसरल अछि
जतए देखू आब रुपैयाक राज अछि

धर्म निकलैत अछि पाखण्डमे बोड़ि क'
नवका  आइ  केहन एकर शाज अछि

बैमानी शैतानी बिच्चेठाम पोसाइ छैक
शुद्धाक जीवनमे तँ खसल गाज अछि

अप्पन बड़ाइमे 'मनु' बुड़ाइ करै छी
माथक बनल ई कएहन ताज अछि

(सरल वार्णिक वर्ण, वर्ण - 15)
जगदानन्द झा 'मनु' 

मैथिलीक युवा तुर्कक पोथी (बहर युक्त गजल संग्रह सहित)- "हम पुछैत छी", "अनचिन्हार आखर", "निश्तुकी", "अर्चिस", "वर्णित रस", "मोनक बात", "नव अंशु"

Saturday, 22 December 2012

गजल


प्रस्तुत अछि श्रीमती इरा मल्लिक जीक ई बाल गजल-----


ई पोथी तँ हम नै पढ़बै ई तँ बहुत मोटगर छै
मुदा लगैए पढ़हे पड़तै करची बड्ड पातर छै

मिठका पुआ पकबै बाबी छन-मन भनसा घरमे
जत्ते सुन्दरि हम्मर बाबी ततबे पूआ मिठगर छै

बनलै पूआ लगलै भूख गे बुढ़िया हमरा तँ बेसी दे
ई धानी पातक चटनी तँ लागै बहुत झँसगर छै

ओकरा तँ बाबी देलकै छोटकी पूआ वाह भाइ वाह
रे नंगटा देखही हम्मर थारी तँ खुब्बे भरिगर छै

नेना भुटका मगन भेल छै बाबी हँसै छै तरे-तर
हमरा लेल तँ देवी छै जकरासँ घर डटगर छै

कौआ रे नै कर लुप-लुप पूआ धेने छौ बाबी तोरो ले
गाछसँ तों निच्चा उतर आमक गाछ झमटगर छै

सरल वार्णिक २०

Wednesday, 19 December 2012

अनचिन्हार आखर- आशीष अनचिन्हार

माँझ आंगनमे कतिआएल छी- मुन्नाजी

निश्तुकी- उमेश मण्डल

नव अंशु- अमित मिश्र

मोनक बात- चन्दन कुमार झा

कियो बूझि नै सकल हमरा - ओम प्रकाश

तीन जेठ एगारहम माघ- जगदीश प्रसाद मण्डल

Sunday, 16 December 2012

रुबाइ


 
साँवरिया पिया अहाँ ई की कएलहुँ   
साउन चढ़ल छोड़ि चलि कोना गएलहुँ
बहए हवा शितल सिहरैए हमर तन 
कोना रहब बिनु अहाँ बुझि नै पएलहुँ  

Saturday, 15 December 2012

रुबाइ


गामक अधिकारी भेला सैयाँ हमर 
कोना क पकड़तै कियोक बैयाँ हमर 
सभक पेटीक माल आब हमरे छैक 
सैयाँ लएथिन सभटा बलैयाँ हमर 

रुबाइ


 
सिस्टम आइकेँ किए बबाल बनल अछि 
नेता सभ तँ  एकटा जपाल बनल अछि 
बड़का बड़का बागर सभ राज चलबैए
जनताक प्राणेपर सबाल बनल अछि  

Wednesday, 12 December 2012

रुबाइ

रुबाइ-134

बहलै शोणित जड़लै करेजा प्रेमसँ
खस्सी सन छटपट करै आधा प्रेमसँ
की आबो कहबै नीक कहू प्रेमकेँ
जिनगी भेलै क्षणेमे विधबा प्रेमसँ

रुबाइ

रुबाइ-133

जाड़क महिना आबिते रौदक खगता
एना जेना राम राज छै लापता
ओसक छै पथार कुहेसा छै कारी
एना जेना झूठ छै सगरो बढ़ता

रुबाइ

रुबाइ-132

बाझल सम्बन्ध छै वर्चस्वक फेरमे
नेहक घर बिकै सेर सावा सेरमे
केहन युग आबि गेल स्वार्थी लोक छै
नै भेटल हितैसी मनुषक ढेरमे

रुबाइ

रुबाइ-131

ओ आँखिक काजर करेज लाल केलक
जीयल छी किए एहन सबाल केलक
बाहरमे सुमन भीतर दावानल ओ
जहरे सन सुआदसँ नया साल केलक

रुबाइ




रुबाइ-130

चर्चा छै सगरो बजारमे प्रेम क
दर्शन छै सगरो पथारमे प्रेमक
कोनो बान्ह ने रोकलक ने रूकत
भरले छै पौती पेटारमे प्रेमक


रुबाइ

रुबाइ-129

चर्चा छै सगरो बजारमे प्रेम क
दर्शन छै सगरो पथारमे प्रेमक
कोनो बान्ह ने रोकलक ने रूकत
भरले छै पौती पेटारमे प्रेमक

कता

कता

आँगन विदेहक गमकैत चानन सन
पसरतै ई सुगंध मिथिलाक कोण-कोणमे
मैथिल माँटिसँ बनल ज्ञानक बासन सन
सीझै छै कतेको विधाक भात कतेको मोनमे

रुबाइ

रुबाइ-128

जादू कोन चलल रोगाह लड़ि रहलै
एगो चूट्टीसँ तँ हाथी बजरि रहलै
छै तागत संकल्पक आत्मविश्वासक
तेँ अदना बानरसँ लंका जड़ि रहलै

रुबाइ

रुबाइ-127

अनकर खेतक उपजा अपन नै भऽ सकत
बिनु मेहनत केने जन किछु नै कऽ सकत
भेटत अधिकार लाठिए हाथे आब
बेसी विनम्र भेने तँ किछु नै लऽ सकत

रुबाइ

बाल रुबाइ-32

कदिमाक लत्ती भरि बाड़ीमे लतरल
हरियर हरियर सजिमनि चारपर लटकल
कतऽ जाकऽ खेलब मारै छी हम छक्का
सदिखन हमर गेन तँ लत्तीमे अटकल

रुबाइ

बाल रुबाइ-31

जोतल खेतमे दौड़ैत बड खेललौं
लागल चोट नै जँ ठोकरसँ खसि पड़लौं
लागल मोन एते चिड़ियाँ एतऽ जते
कसरत भेलै हमर अहाँ सूतल रहलौँ

गजल


गजल-४१

आब मिथिलाराज चाही
मैथिली के ताज चाही

बाढ़ि आ रौदीसँ मारल
मैथिलो के काज चाही

बड़ रहल बेसुर इ नगरी
सुर सजायब साज चाही

गर्जना गुंजित गगन धरि
दम भरल आवाज चाही

संयमित सहलौं उपेक्षा
नवल नव अंदाज चाही    

*बहरे रमल/मात्राक्रम-२१२२
(तिथि-०७.१२.२०१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

रुबाइ

बाल रुबाइ-30

गामक भोज बैसल पाँतिमे बाबा लऽग
फाटल पात छल दालि बहलै लोटा लऽग
तरकारी पापड़ चटनी सब सना गेल
हम कानै छी बैसल दहीक तौला लऽग

गजल


गजल-४०

प्रेम के आखर कहब हम
नेह के कविता रचब हम

धर्म के हो चेतना धरि
कर्म के पूजा करब हम

वाणिमे हो मौध घोरल
भाव सरितामे बहब हम

आचरण आदर्श निश्छल
दूर निज अवगुण करब हम

चान बनि चमकब गगनमे
दीप बनि सभतरि जड़ब हम

शब्द के हम मान राखब
सत्य के संगे चलब हम

"नवल" ली संकल्प सभ पुनि
मनुख बनि सदिखन रहब हम

*बहरे रमल/मात्राक्रम-२१२२
(तिथि-०१.१२.२०१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

रुबाइ

बाल रुबाइ-29

रोटी दूध गूड़ि कऽ खुआ दिअ ने आब
हमरो गरम कऽ तेल लगा दिअ ने आब
गोदीमे बैसा खिस्सा कहू बाबी
हमरो नीक नेना बना दिअ ने आब

रुबाइ

बाल रुबाइ-28

बेँगक हल्ला अभरैत पोखरि कातसँ
सुग्गा भजन गाबैत अढ़ भेल पातसँ
थारी उगल पूबमे पैघ टा एखन
नव उर्जा भरल पवन बहै छै प्रातसँ

रुबाइ

बाल रुबाइ-27

धानक बालि लाबें सामा खेलै छी
चुगला आइ जाड़ें सामा खेलै छी
भैया दिअ प्रेम बहिन मागि रहल छै
भैया बेढ़ बनबेँ सामा खेलै छी

गजल


गजल-३९

पकडू रेल चलू दिल्ली
भरबै जेल चलू दिल्ली

नेता लूटि रहल सभके
बुझि बकलेल चलू दिल्ली

बैसल बाट कते जोहब
सभ लुटि गेल चलू दिल्ली

सभ छै भूखल कुर्सी के
रोकब खेल चलू दिल्ली

पापक कुण्ड भरल सगरो
सभटा हेल चलू दिल्ली

लागल भीड़ पमरियाकें
सभके ठेल चलू दिल्ली

अपनेमे जुनि झगडू यौ
राखू मेल चलू दिल्ली

धरना देब करब अनशन
मिथिला लेल चलू दिल्ली

क्रांतिक धार "नवल" बहलै
लड़बा लेल चलू दिल्ली

*मात्राक्रम : २२२१+१२२२ (तिथि-१०.११.२०१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री

रुबाइ

बाल रुबाइ-26

घरपर बैसल रहब नीक जाड़ एलै
सीरक तऽर तँ खेलब नीक जाड़ एलै
बढ़ियाँ भोजन आ शीतलहरी चलतै
सब मिलि घूर तापब नीक जाड़ एलै

गजल


गजल-३८

गढू आखर गजल कहियौ
अपन धुनमे रमल कहियौ

अजब छै रीत दुनियाकें
सुधाके सभ गरल कहियौ

करेजक काँट बनलै ओ
मुदा तैयो कमल कहियौ

पसरलै प्रीत नकली बड़
निमहले पर असल कहियौ

जँ गप हुनकर उठल कोनो
किए नैना भरल कहियौ

गमेलौं की तकर गप नै
कथी संगे रहल कहियौ

कियो दूसै करै निंदा
अपन मोनक जँचल कहियौ

रहल परिणाम प्रेमक की
किए चुप छी "नवल" कहियौ

*बहरे हजज/मात्रा क्रम:१२२२ (तिथि-०१.११.२०१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल


बाल गजल-74

पूबमे देखू कने पनिसोखा उगल
पानि कादो खेत खत्तामे छै भरल

भोरमे भेलै झमा झम झम मेघ तें
चूल्हि ठंढाएल छै नै जाड़न जड़ल

रौदमे तपि पानि बदलै छै मेघमे
उपरमे ठंढा भऽ फेरो वर्षा बनल

साँझ भेलै दृश्य मोहक छै मोन खुश
गीत जोरसँ गाबिते सब चिड़ियाँ उड़ल

चान उगलै दूध पूरी देतै बहुत
"अमित" अम्बरमे कते छै डिबिया बरल

फाइलातुन-फाइलातुन-मुस्तफइलुन
2122-2122-2212
बहरे-जदीद

अमित मिश्र


गजल

बाल गजल-73

कन कन पानि कते देहो करै थरथर
प्यासो लागल नै पी सकब छै भिनसर

स्वीटर मोफलरसँ मोटगर भेलौं हम
लेपल तेल बहुत लागैत छी जोकर

कारी दिन कखनसँ छै हाथ छै सुन्न
लिखिते ए अ लिखेलै भेल सब गड़बड़

भैया सब बचले रऽहऽ चलि रहल पाला
तूँ प्रकृतिसँ लड़ें नै ओ सबसँ बलगर

जहिना जीवन तहिना ऋतु तँ बदलै छै
विज्ञानक गप छै लगबै धरा चक्कर

मफऊलातु-मफईलुन-मफईलुन
2221-1222-1222
अमित मिश्र

गजल


गजल-३७

ठेस लागए दियौ आंखि खूजत हमर
मोह मोनक तखने जा टूटत हमर

संगे बटुआ रहत संगी भेटत कते
काज हेतै ओकर टाका बूकत हमर

मानि जकरा अपन अपनोंसँ गेलहुं
कहियो नामो किएक ओ पूछत हमर

सुझतै मुस्की ई ठोढ़क तऽ सभके मुदा
बात मोनक किए कियो बूझत हमर

किछुओ बाँचल ने संग सिनेहक सिवा
लोभी दुनिया कथी आब लूझत हमर

अपना देहक जे दोष से झंपने रहू
सभके माथा के टेटर सूझत हमर

मोह देवे-पितर के रहल नै जखन
मनोरथ मनुखसँ की पूरत हमर

हँसि कऽ जिनगीक माहुर पीबै "नवल"
देहसँ प्राण जाधरि ने छूटत हमर

*आखर-१५ (तिथि-२१.१०.१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल


बाल गजल-72

कारी सिलेटपर उज्जर छपल आखर
ई भंगरैयासँ मेटत सजल आखर

नै बचब गर्दासँ बोरापर जँ बैसब
माँटिपर आँङुरसँ छै बड लिखल आखर

भाषा जँ सीखब तँ बहुते बात बूझब
दोकानपर बोर्डपर छै घसल आखर

पोथी अपन खोलि देखै जे बहुत कम
देखें तँ फोटोक संगे छपल आखर

हिन्दी बहुत लिखल छै आ मैथिली नै
लागै बहुत लोक नै छै पढ़ल आखर

लेखक "अमित" एखनो छै ज्ञानमे कम
तेँ मैथिली सीखि रचबै बचल आखर

मुस्तफइलुन-फाइलातुन-फाइलातुन
2212-2122-2122

अमित मिश्र

गजल


गजल-३६

कियो कात भेल कतियाएत रहत
सभ ठाम कियो सन्हियाएत रहत

कियो जिनगी भरि गुमकी लधनहि
कियो राति-दिन बतियाएत रहत

कियो बस अपनहि टा बात सुनए  
कियो आने पर पतियाएत रहत

चुप बैसल कियो सभ काज करए
कियो फुसियाहें उधियाएत रहत

कियो ठनने किछु एक बाट चलए
दस बाट कियो छिछियाएत रहत

कियो दुःख बूझए अनकहुँ अपने
कियो अपने लै डिरियाएत रहत  

कियो सम्हरैत छै यदि ठेस लगए
कियो बाटे पर खिसियाएत रहत

छै अपन - अपन व्यवहार "नवल"
कियो छीटै कियो छिड़ियाएत रहत

*आखर-१४ (तिथि-१०.१०.१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

बाल गजल -71

सबसँ हम आब दोस्ती करब
मीत बनतै तँ होली करब

हँसब बाजब पढ़ब आ लिखब
खेलमे खूब मस्ती करब

भोरमे योग आसन करब
रोगकेँ आब छुट्टी करब

लोक झगड़ा अनेरे करै
हम तँ नै आब कट्टी करब

मेहनत करब ई प्रण हमर
आब नै टास्क चोरी करब

पाप छै फूसि बजनाइ तेँ
सत्यकेँ नाम वाणी करब

फाइलुन
212 तीन बेर सब पाँतिमे
बहरे-मुतदारिक
अमित मिश्र

गजल

बाल गजल-70

उपरमे लत्ती माँटि तऽरमे अल्हुआ
फड़ल छै बहुते खेत चऽरमे अल्हुआ

आगिमे पाकल सोन्हगर सन स्वाद छै
दूधमे गूरू फेर कऽरमे अल्हुआ

लाल छै उपरसँ रंग उज्जर छै तऽरसँ
खूब खैयौ छै मीठ फऽरमे अल्हुआ

छै गरीबक भोजन अमीरक खेतमे
भेंटि जेतै मिथिलाक घऽरमे अल्हुआ

एकरा नै कहियो चिखलकै "अमित" तेँ
रोपि दिअ बाबू आइ चऽरमे अल्हुआ

2122-2212-2212
फाइलातुन-मुस्तफइलुन-मुस्तफइलुन

अमित मिश्र



गजल


गजल-३५

दू आंगुर के बीच फंसल सिगरेट जड़ै छै जड़बै लेल
जर्दा गुटखा करै गमागम लोकक अंतरी सड़बै लेल

लोलक तर छै गुल तमाकुल धूकि रहल छै बीड़ी गाँजा
धुकैत-धुकैत भट्ठी बनलै नै चाही जाड़णि जड़बै लेल

जे खराप से ओहिना नांगट मदिराक बहन्ना नञि चाही
मधुशालामे शीशी टकड़ेलै नीकसँ नीक के लड़बै लेल

पी क' बोकरै भोकरै कानै आब नञि पीबै सभदिन ठानै
भरलो जेबी करैत छै खाली देह मे दुर्गुण भरबै लेल

घर - घरारी ध' क' भरना वैद्द हकीमक घर ओगरने
भगता के चौखठि धएने छै जंतर खातिर, झड़बै लेल

सौंसे शोणित बिक्ख पसरलै कानै पड़ल मृत शैय्या पर
नोतल मृत्यु आबि रहल छै जिनगी के लड़ि हरबै लेल

आंखि रहैत छै आन्हर भेल कान रहैत ओ भेल बहीर
सौंसे पसरल छै विज्ञापन जकरा चेतबै डरबै लेल

पढ़ल-लिखल काबिल के देखू टाका बूकि क' रोग बेसाहै
भांति-भांति के अवगुण पोसै देहमे पिलुआ फरबै लेल

"नवल" करू संकल्प अहाँ जे एहि कुकर्मसँ दूर रहब
किएक कांट पर पैर धरब जानि बूझि क' गड़बै लेल

*आखर-२२ (तिथि-०९.१०.२०१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल 

दुनियाँमे फँसल मनुखो बरै दीप सन
शोणितकेँ जड़ा जड़िते रहै दीप सन

बसतै प्रेम जतऽ छथि ओतऽ लक्ष्मी बसथि
चिन्ता रहित कष्टोमे हँसै दीप सन

परदा की करब छै घर जँ टूटल अपन
घरबैयेसँ पट लाजक जड़ै दीप सन

स्वाहा सपन यदि रहबै नशामे पड़ल
आगिक काज मधुशाला करै दीप सन

नै देतौ जगह यदि ठाढ़ हेबाक छौ
हेतै सफल जे सदिखन लड़ै दीप सन

जीवन दोसरक सुख लेल अर्पण "अमित"
एहन काज कर जे सब कहै दीप सन

मफऊलातु-मफऊलातु-मुस्तफइलुन
2221-2221-2212
बहरे-कबीर

अमित मिश्र

गजल


गजल-३४

अछि मोन जड़ल ककरा कहबै
पुनि नोर बहल ककरा कहबै

सच बात जहर लगतै सभके
धरि फूसि गढल ककरा कहबै

छल फूसक घर जतए कहियो
बनि गेल महल ककरा कहबै

करिया धन पर सरकार चलै
सभ लूटि रहल ककरा कहबै

चुप बैसल दुःख सहतै सभटा
सभ लोक डरल ककरा कहबै

नहि मोल जखन किछु नेहक छै
गप भाव भरल ककरा कहबै

सभ लीन "नवल" अपने धुनमे
हम गीत गजल ककरा कहबै

*मात्रा-१६ (तिथि-०७.१०.२०१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

गजल

खूने खुनाम छै सम्बन्ध मनुखक आँगनमे
दुश्मनक गाम छै सम्बन्ध मनुखक आँगनमे

खोजैत रहब शांती संग मिल ओ नै भेटत
झगड़ाक धाम छै सम्बन्ध मनुखक आँगनमे

छै छोट गप मुदा एखनसँ हल्लुक नै बुझियौ
बदलैत दाम छै सम्बन्ध मनुखक आँगनमे

टूटैत गेल दुनियाँ संग लोकक सब सीमा
पुरना खराम छै सम्बन्ध मनुखक आँगनमे

चाननक ठोप छोरू आब के छै धर्मात्मा
कलयुगक राम छै सम्बन्ध मनुखक आँगनमे

भेटत जँ नीक संगी फेर इच्छा नै दोसर
स्वर्गक बनाम छै सम्बन्ध मनुखक आँगनमे

2212-1222-1222-22
अमित मिश्र

गजल

गजल

करेजा ओकरो बड कानले हेतै 
जँ सपना अपन हाथसँ तोड़ने हेतै

पड़ल जानपर धर्मो सब बिसरऽ पड़तै 
सही कम फूसि बहुते बाजने हेतै

जँ भोरक शीत कारी रूपकेँ धरतै
सड़कपर रौद्र घटना उचरले हेतै

कहै छै मूर्ख जकरा लोक जग भरिकेँ
उहो किछु किछु भविष्यक सोचने हेतै

अपन लघु रोजगारे टा बचल साधन
कते शिक्षित नगरमे भटकले हेतै

कला जीबाक बड गामक पढ़ू जिनगी*
बिसाढ़सँ "अमित" जिनगी भेटले हेतै

मफाईलुन
1222 तीन बेर
बहरे-हजज
*गामक जिनगी(साहित्यकार जगदीश प्रसाद मण्डलक लघु कथा संग्रह)

अमित मिश्र

गजल


गजल-३३

आँजुरमे भरि कऽ प्रीत रखने छियैक हम
सगतरि बना कऽ मीत रखने छियैक हम

सभटा गप मोने ऐ किछु नै बिसरलौं हम
सेंतने भाव मिठ्ठ-तीत रखने छियैक हम  

उगलतै जँ बिख कियो परवाह नै तकर
करेजामे भरि कऽ शीत रखने छियैक हम

धरणि के घुन खेलकै सभ खाम छै कुठाम
तइयो ठाढ़ भाव-भीत रखने छियैक हम

पसरल कतेक दूर कक्कर सीमान छैक
सभटा नापि बीते-बीत रखने छियैक हम      

किछु ठानि जँ लेलहुँ साधब नञि छै कठिन
मुट्ठीएमे भरि कऽ जीत रखने छियैक हम        

मिथिलाक मान रखने परदेसोमे मैथिल
सहेजने अपन रीत रखने छियैक हम

सिनेह आ अपनैती भेटत जतए "नवल"
सुनबै लै गजल-गीत रखने छियैक हम

*आखर-१७ (तिथि-२५.०९.२०१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

गजल

बाल गजल-69

आनि ले लग्गी तूँ सजल छै जिलेबी
गाछमे बड लुधकल फड़ल छै जिलेबी

लाल छै किछु आ किछु कने काँच हरियर
लेल तोड़ब हम मीठ फल छै जिलेबी

काँट छै बड गाछपर सम्हारि चढ़िहें
छीपपर लटकल तेँ बचल छै जिलेबी

आब हम बीछब तोड़ि नीच्चा खसा तूँ
देख ले जेबीमे भरल छै जिलेबी

गाममे बहुते छल बचल गाछ एगो
गाछ नै तेँ भोगसँ उठल छै जिलेबी

फाइलातुन-मुस्तफइलुन-फाइलातुन
2122-2212-2122
बहरे-खफीफ

अमित मिश्र

गजल

बाल गजल-68

बैसल घूर लऽग खूब गरमाइत मोन
खिस्सा सूनि बाबूसँ हर्षाइत मोन

शीताएल खऽर-पात धधरा नै भेल
सिहकै वर्फ पवनसँ थरथराइत मोन

बैसल चारि दिश लोक भूजा फाँकैत
नोन प्याजकेँ देख भूखाइत मोन

ओतै गाय छै संगमे बाछी ओतऽ
ओकर संगमे खूब खेलाइत मोन

भेलै राति बड फेर बड धधरा भेल
देहो गरम छै फेर अलसाइत मोन

मफऊलातु-मुस्तफइलुन-मफऊलातु
2221-2212-2221
बहरे-हमीद

अमित मिश्र

गजल


बाल गजल-67

जगमग करै जंगल दिवाली रातिमे
जानवर सब नाचल दिवाली रातिमे

भगजोगनी दै दीप भौँरा मोम दै
गोबरसँ घर नीपल दिवाली रातिमे

भालू जँ बाँटै मधु तँ गैया दूधकेँ
सब मदतिमे लागल दिवाली रातिमे

उल्लू उड़ल एलै लऽ लक्ष्मी माइकेँ
सब ठाढ़ कर जोड़ल दिवाली रातिमे

हाथी कहै फोड़ब फटक्का नीक नै
तैयो बहुत फूटल दिवाली रातिमे

हम एक छी सब ठाम भेटल सीख ई
नेहक सुधा भेटल दिवाली रातिमे

मुस्तफइलुन
2212 तीन बेर सब पाँतिमे

अमित मिश्र
 

गजल

बाल गजल-66

जानि नै कतसँ आबै छै मीठ सपना
नित मधुर नीन आनै छै मीठ सपना

राति आबै मुदा भागै भोरमे ई
डरि कऽ ककरासँ भागै छै मीठ सपना

चान आबै उतरि झरना खेत आबै
नव परी संग उतरै छै मीठ सपना

मोनकेँ मोहि लै एहन खेल खेलै
आनि जंगल हँसाबै छै मीठ सपना

दोस्तकेँ संगमे पोथी खोलि पढ़बै
ज्ञान कहियो बहुत दै छै मीठ सपना

भोर जल्दी उठब सपना लेल सूतब
देख कोना कऽ मानै छै मीठ सपना

फाइलातुन-मफाईलुन-फाइलातुन
2122-1222-2122
बहरे-असम
अमित मिश्र

गजल


गजल-३२

अहाँ लेल कृष्ण हम बनी अहाँ राधिका बनि जाए तऽ
हम बंसीक तान छेड़ दी अहाँ राधिका बनि जाए तऽ

प्रेमक हकार दै छी हम आउ बैसू हमरा लऽगमे
सभ गोपीक संग छोड़ि दी अहाँ राधिका बनि जाए तऽ

आर किछु मांगब नञि हम दुनियासँ आ की देवसँ
जे जे कहब से हम करी अहाँ राधिका बनि जाए तऽ

जोहैत-जोहैत आब बाट बड़ भेल छी अधीर हम
अहीं संग हम जीबी मरी अहाँ राधिका बनि जाए तऽ

आँजुरमे प्रेम-पुष्प लऽ प्रेमक गजल कहै "नवल"  
हम भावमे बहैत रही अहाँ राधिका बनि जाए तऽ

*आखर-२० (तिथि-२३.०९.१२)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)

Thursday, 6 December 2012

गजल


जीवन कखन तक छैक नै बुझलक कियो 
कखनो करेजक गप्प   नै जनलक कियो 

भेटल तँ जीवनमे सुखक संगी बहुत 
देखैत दुखमे आँखि नै तकलक कियो 

दुखकेँ अपन बेसी बुझै किछु लोक सभ 
भेलै जँ दोसरकेँ तँ नै सुनलक कियो 

सदिखन रहल भागैत सभ काजे अपन 
आनक नोर घुइरो कs नै बिछ्लक कियो 

जीवन तँ अछि जीवैत 'मनु' सभ एतए 
मइरो कs जे जीवैत नै बनलक कियो 

(बहरे- रजज, 2212 तीन-तीन बेर सभ पांतिमे)
जगदानन्द झा 'मनु' 
  

गजल कमला-कोशी-बागमती-महानंदा" सम्मानक ( बाल गजलक लेल ) पहिल चरण बर्ख-2012 ( मास नवम्बर लेल )

हमरा इ सूचित करैत बड्ड नीक लागि रहल अछि जे " अनचिन्हार आखर"द्वारा स्थापित " गजल कमला-कोशी-बागमती-महानंदा" सम्मानक ( बाल गजलक लेल ) पहिल चरण बर्ख-2012 ( मास नवम्बर लेल ) पूरा भए गेल अछि। मास नवम्बर लेल  बाल मुकुन्द पाठक जीक एहि रचना के चयन कएल गेलैन्हि अछि। हुनका बधाइ। 






बाल गजल

मेला चलब हमहुँ कक्का यौ
पहिरब आइ सूट पक्का यौ

खेबै जिलेबी आ झूलब झूला
संगे संग किनब फटक्का यौ

बैट किनब क्रिकेट खेलै ले
आबि कऽ खूब मारब छक्का यौ

साझेसँ अखारामे कुश्ती हेतै
पहलवानोँ तँ छै लडक्का यौ

अन्तिम बेर छी एतौ हम तँ
जाएब बाबू लऽग फरक्का यौ

कोरा मे कने लिअ ने हमरा
ई भीड़ मेँ मारि देत धक्का यौ

चलू ने जल्दी किनै ले जिलेबी
नै तँ उड़ि जाएत छोहक्का यौ

बाबूओसँ बेसी अहीँ मानै छी
छी बड्ड नीक हमर कक्का यौ

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 11
~ ~बाल मुकुन्द पाठक ।।


ओना ई शुरूआती रचना थिक आ आब पाठक जी अरबी बहरमे खूब लीखि रहल छथि।

Tuesday, 4 December 2012

मास नवम्बर 2012क लेल गजल सम्मान योजनाक पहिल चरण

हमरा इ सूचित करैत बड्ड नीक लागि रहल अछि जे " अनचिन्हार आखर"द्वारा स्थापित " गजल कमला-कोशी-बागमती-महानंदा" सम्मानक पहिल चरण बर्ख-2012 ( मास नवम्बर लेल ) पूरा भए गेल अछि। मास  नवम्बर  लेल बाल मुकुन्द पाठक    जीक एहि रचना के चयन कएल गेलैन्हि अछि। हुनका बधाइ।


गजल

अहाँ हमरा बिसरि रहलौँ
वियोगे हम तँ मरि रहलौँ
घुसिकँ कोनाकँ देहेमेँ
अहाँ हमरा पसरि रहलौँ

बिसरऽ ई लाख चाही हम
बनिकऽ लस्सा लसरि रहलौँ

कियै केलौँ अहाँ ऐना
करेजसँ नै ससरि रहलौँ

छुटल घर आ अहूँ छुटलौँ
दुखेँ हम आब मरि रहलौँ

बहरे -हजज 
'मफाईलुन' (मने 1222) दू बेर 

Saturday, 1 December 2012

अपने एना अपने मूँह-16


मास नवम्बर २०१२मे कुल २२टा पोस्ट भेल जकर विवरण एना अछि---


१) गजेन्द्र ठाकुर जीक १टा पोस्टमे संपूर्ण विदेह पद्य देल गेल।
२) आशीष अनचिन्हारक ८टा पोस्टमे २टा अपने एना अपने मूँह, २टा सिलेबस सम्बन्धी पोस्ट, २टा सम्मान सम्बन्धी पोस्ट, १टा गजलकार परिचय श्रृंखला आ १टा पोस्टमे आनलाइन मोशायरा देल गेल।
३) ओम प्रकाश जीक १टा पोस्टमे १टा गजल अछि।
४) जगदानंद झा मनु जीक ६टा पोस्टमे ६टा गजल अछि।
५) बाल मुकुन्द पाठक जीक ६टा पोस्टमे ४टा गजल आ २टा बाल गजल अछि।

Wednesday, 28 November 2012

गजल

जखन खगता सभसँ बेसी तखन ओ मुँह मोड़ि लेलनि
जानि आफत छोरि हमरा सुखसँ नाता जोड़ि लेलनि

देखि चकमक रंग सभतरि ओहिमे बहि ओ तँ गेली
जानि खखड़ी ओ हमर हँसिते करेजा कोड़ि लेलनि

बन्द केने हम मनोरथ अप्पन सदिखन चूप रहलहुँ
पाञ्च बरखे आबि देख फेर सपना तोड़ि लेलनि

दुखसँ अप्पन अधिक दोसरकेँ सुखक चिन्ता कएने
आँखि जे फूटै दुनू तैँ एक अप्पन फोड़ि लेलनि

चलक सप्पत संग लेलौं जीवनक जतराक पथपर
मेघ दुखकेँ देखते ओ संग  ‘मनु’केँ छोड़ि लेलनि

(बहरे रमल, मात्राक्रम- २१२२  चारि-चारि बेर सभ पांतिमे) 

@ जगदानन्द झा ‘मनु’

Tuesday, 27 November 2012

गजल

गजल

आइ हमर मोन बड्ड खनहन अछि
ककरोसँ हमरा तँ नै अनबन अछि

तरुआ तरकारी आ पापड बनि गेल
देखूँ चूल्हा पर भातो ले अदहन अछि

आसिन एलै बजरखसुआँ गर्मी गेलै
ठंढा ठंढा पुरबा बहै सनसन अछि


फेर दुर्गा मेला हेतै नाच आ लीला हेतै
देखूँ खुदरा पैसा बाजै झनझन अछि

घर परिवार मे तिहार के दिन एलै
अंगना मे चलैत नेना ढ़नमन अछि

कनिये दिनके तँ छै ई पावैनक मजा
कातिकक बाद तँ ऊहे अगहन अछि

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 15
€€बाल मुकुंद पाठक

गजल

गजल

अहाँ बैसला पर कि पाएब एतौ
रहब काजके बिन कि खाएब एतौ
कतोऽ दुख कतोऽ सुख लिखल अछि तँ सबटा
कियै हाथ कर्मसँ हटाएब एतौ

हयौ दोष आ गुणतँ हाएत सभँमेँ
बिना गलत हम नै पराएब एतौ

अहाँ बिसरि अप्पन पुरनका बबंडर
चलूँ नव विचारसँ नहाएब एतौ

कहल केकरो मानबै बात नै जौँ
तँ भूखल अहाँ मरि कनाएब एतौ

बहरे-मुतकारिब ।फऊलुन(मने122)चारि बेर।
~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ बाल मुकुन्द पाठक ।।

गजल

गजल

अहाँ हमरा बिसरि रहलौँ
वियोगे हम तँ मरि रहलौँ
घुसिकँ कोनाकँ देहेमेँ
अहाँ हमरा पसरि रहलौँ

बिसरऽ ई लाख चाही हम
बनिकऽ लस्सा लसरि रहलौँ

कियै केलौँ अहाँ ऐना
करेजसँ नै ससरि रहलौँ

छुटल घर आ अहूँ छुटलौँ
दुखेँ हम आब मरि रहलौँ

बहरे -हजज ।
'मफाईलुन' (मने 1222) दू बेर ।
~ ~ ~ ~ ~ बाल मुकुन्द पाठक ।।

गजल

बाल गजल

मेला चलब हमहुँ कक्का यौ
पहिरब आइ सूट पक्का यौ

खेबै जिलेबी आ झूलब झूला
संगे संग किनब फटक्का यौ

बैट किनब क्रिकेट खेलै ले
आबि कऽ खूब मारब छक्का यौ


साझेसँ अखारामे कुश्ती हेतै
पहलवानोँ तँ छै लडक्का यौ

अन्तिम बेर छी एतौ हम तँ
जाएब बाबू लऽग फरक्का यौ

कोरा मे कने लिअ ने हमरा
ई भीड़ मेँ मारि देत धक्का यौ

चलू ने जल्दी किनै ले जिलेबी
नै तँ उड़ि जाएत छोहक्का यौ

बाबूओसँ बेसी अहीँ मानै छी
छी बड्ड नीक हमर कक्का यौ

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 11
~ ~बाल मुकुन्द पाठक ।।

गजल

गजल

आँखिसँ खसैत नोर रुकत की नै
नोरक सरस आबो सुखत की नै
सुखिकऽ ठोर आब गेल अछि फाटि
फाटल ठोर फेरोसँ जुटत की नै

बेकल जिनगी भरि गेल दर्दसँ
करेजक बेकलता मेटत की नै

आँखिक पलक फूलि गेल कानि कऽ
बंद भेल आँखि फेरो खुजत की नै

जीबाक चाह तँ हटि गेल मोनसँ
मरलोऽ पर दुख ई छुटत की नै

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 13
...............बाल मुकुंद पाठक ।।

गजल

बाल गजल

हाएत दिवाली जड़तै दीप
आँगने आँगन बड़तै दीप
घर दुआरि आँगन सँभमेँ
डेगे डेऽग पर जड़तै दीप

अन्हार रातिमेँ इजोत दैले
मोमबत्ती संगे लड़तै दीप

हम सब खेलब हुक्का पाती
लेसै लेल काज पड़तै दीप

चुक्का डिबिया सबसँ मिलके
गाम प्रकाशसँ भरतै दीप

करै लेल घरकँ द्वारपाली
अन्हार रातिसँ लड़तै दीप

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 11.
.................................................
..............बाल मुकुंद पाठक ।।

Monday, 26 November 2012

गजल


किए तीर नजरिसँ अहाँकेँ चलैए 
हँसी ई तँ घाएल हमरा करैए 

मधुर बाजि खन-खन पएरक पजनियाँ 
हमर मोन रहि रहि कए डोलबैए   

छ्लकए हबामे अहाँकेँ खुजल लट 
कतेको तँ  दाँतेसँ   आङुर कटैए

ससरि जे जए जखन आँचर अहाँकेँ 
जिला भरि  करेजाक धड़कन रुकैए 

अहीँकेँ तँ मुँह देखि जीबैत 'मनु' अछि 
बिना संग नै साँस मिसियो चलैए 

(बहरे - मुतकारिब, मात्राक्रम -122-122-122-122)
जगदानन्द झा 'मनु' 

Saturday, 24 November 2012

रुबाइ

मैथिली साहित्यक आँच सुनगैत अछि 
सगरो नव विधाक ज्वला पजरैत अछि 
कोटी नमन जिनकर बिछल जारैन अछि 
विदेहक बारल आगि 'मनु' लहकैत अछि 

Monday, 19 November 2012

गजल


जेना जेना राति बीतल जाइए 
तेना तेना देह धीपल जाइए 

जुल्मी संगे संग रहितो हे सखी 
नहिए हुनकर मोन जीतल जाइए 

योवनमे पुरबा बसातक जोड़ छै 
साबरिया बिनु नै त' जीबल जाइए    

डूबल निनमे सगर दुनिया छै जखन 
बीया प्रेमक एत' छीटल जाइए 

भोरे उठिते प्रेम बोरल 'मनु' छलौं 
लाजे मरि मुह आब तीतल जाइए  

(मात्राक्रम -222-2212-2212)
जगदानन्द झा 'मनु' 
तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों