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रविवार, 24 अगस्त 2014

विदेह भाषा सम्मान (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान)

विदेह भाषा सम्मान
(समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान)
२०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह)
२०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास)
२०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह)
२०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो-  तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद)

सोमवार, 24 मार्च 2014

गजलक माध्यमसँ कथाक लोकप्रियता लेल कहल गेल ढेर रास बात -(राजीव रंजन मिश्र आ ओम प्रकाश झा द्वारा)

गजलक माध्यमसँ कथाक लोकप्रियता लेल कहल गेल ढेर रास बात -(राजीव रंजन मिश्र आ ओम प्रकाश झा द्वारा)-
८१म सगर राति दीप जरय कथा गोष्ठीक आयोजन देवघरमे २२ मार्च २०१४ शनि दिन संध्यासँ २३ मार्च २०१४ रवि दिन भोर धरि सम्पन्न। ई आयोजन देवघरमे बमपास टाउन स्थित "बिजली कोठी" नम्बर ३ मे श्री ओम प्रकाश झा जीक संयोजकत्वमे सम्पन्न भेल।
८२ म सगर राति ३१ मइ २०१४ केँ मेँहथ गाममे हएत। ई विशुद्ध रूपसँ बाल कथा (विहनि आ लघु कथा) विशेषांक रहत। संयोजक- गजेन्द्र ठाकुर।

सोमवार, 21 मई 2012

“माँझ आंगनमे कतिआएल छी” मुन्नाजीक रुबाइ आ गजल संग्रह


“माँझ आंगनमे कतिआएल छी” मुन्नाजीक रुबाइ आ गजल संग्रहक नाम अछि। कतिआएल आ सेहो माँझ आंगनमे! की कबीरक उलटबासीक प्रभाव अछि ई आकि गजलक स्वभाव अछि ई? नहिये ई कबीरक उलटबासीक प्रभाव अछि नहिये ई गजलक स्वभाव अछि, ई एकटा यथार्थ अछि। मुन्नाजी सन कतेको लोक कतिआएल छथि, प्रतिभा अछैत हेराएल छथि। मुदा गजलकार सभटा दोख अपनेपर लऽ लै छथि।

आब तँ माँझ आँगनमे कतिआएल छी
अपने चालिसँ आब बेरा गेलहुँ हम
आ सएह कारण अछि जे ओ नोरक सुख भोगऽ लागै छथि।
नोर तँ खसैए मुदा मजा सन लगैए
केहन नीक प्रेमक दुख लेलहुँ हम

बड़का खाधिमे खसै छथि आ तहू लेल अपनेकेँ दोखी मानै छथि:
छोटको ठेससँ नै सबक लेलहुँ हम
तँए बड़का खाधिमे खसि गेलहुँ हम


तँ की गजलकार प्रेमक महत्व बिसरि गेल छथि, नै प्रेम तँ सभकेँ चाही।
सभ उमेर वर्गकेँ प्रेम चाही
मरितो धरि कुशल-छेम चाही

आ हिनका जँ कोस दू-कोस मात्र चलबाक रहितन्हि तखन ने, हिनका तँ बहुत आगाँ बढ़बाक छन्हि तेँ प्रेम चाही।
डाहसँ पहुँचब कोस-दू कोस
आगू बढ़बा लेल तँ प्रेम चाही

आ से सभ ठाम। एकटा हमर संगी छल, एकटा परीक्षामे टॉप केलक तँ बाजल- नै कम्पीट करै छी तँ नै करै छी, आ करै छी तँ टॉप करै छी। ओ गजलकार नै छल जँ रहिते तँ अहिना लिखितए:
बदरी लादल रहै कोनो बात नै
जदि बरसी तँ बरिसात बनि कऽ

आ नजरि-नजरिक फेर आ हाफ ग्लास फुल ई दुनूटा अवधारणा ऐ रूपमे ओ राखै छथि:
नजरि उठा कऽ देखबै तँ खाली बुझाएत ई दुनियाँ
नजरि गरा कऽ देखबै तँ सभ देखाएत ई दुनियाँ

समालोचना आ विरोध दुनूकेँ गजलकार नीक मानै छथि।
पक्षधरसँ राखू अपनाकेँ बचा कऽ
विपक्षीक सभ बातकेँ नै तीत बुझू

महगाइसँ लोक बेकल अछि मुदा तकरा लेल झुमैत मचानक बिम्ब देखू:
महगाइसँ खूने नै हड्डियो सुखाइए
आब झुलैत मचान सन लगैए लोक

आ ई उलटबासी देखू, बिम्ब नव, भावना शाश्वत:
हम तँ घूर जड़ेलौ गर्मी मासमे
मिझाएल आगिसँ पसाही कहियो

ई कोन गोष्ठी छी जे अछि कोन पत्रिकाक प्रायोजित चिट्ठी छपबाक राजनीति सन, ई रुबाइ देखू:
मोन भए उठल दुखित होहकारीसँ
उठि दर्शक भागल मारामरीसँ
प्रायोजक तँ पथने रहल कान अपन
कर्ता देखार भेला जतियारीसँ

मुदा बाढ़िक विषय जँ मैथिली गजलक अंग नै बनए तँ बुझू जे गजलकार समाजसँ कतिआएल छथि। मुदा से नै अछि।
धार एखन धरि तँ उफानपर अछि
लोक ताका-ताकी करैत बान्हपर अछि

आब पड़ाइन घटल अछि, मिथिलासँ पड़ाइन। बाहरी लोक बिहारीकेँ मजदूर आ श्रमिकक पर्यायवाची मानि लेने छथि। तहूपर गजलकारक कलम चलल अछि।
बिहारक सिरखारी बदलि गेल सन लगैए आब
श्रमिक घटलासँ कंपनी-मालिक लगै बिहारी जकाँ

मुन्नाजीक गजल आ रुबाइ स्वच्छन्द रूपसँ बमकोला जेकाँ बहल अछि। शेरक स्वभाव होइ छै जे जँ ओकरा नेकासँ कहल जाए तँ आह-बाह लोक करिते अछि। मैथिलीमे गजल-रुबाइ जइ तरहेँ प्रसारित भऽ रहल अछि से देखि कऽ यएह लागि रहल अछि जे जतेक ई विधा अपनाकेँ पसारि रहल अछि तइसँ बेशी मैथिली लाभान्वित भऽ पसरि रहल अछि।
--गजेन्द्र ठाकुर १९ मइ २०१२

मंगलवार, 31 जनवरी 2012

मजहर इमामक मृत्यु


मजहर इमाम- जन्म १९३० ई. दरभंगा (बिहार)मे आ मृत्यु २०१२ ई. दिल्लीमे। आजाद गजल लिखैबला (ओना बेशी गजल ओ बहरयुक्त लिखलन्हि) श्री मजहर इमामकेँ हुनकर काव्य संग्रह "पिछले मौसम का फूल" लेल उर्दूमे साहित्य अकादेमी पुरस्कार १९९६ ई. मे देल गेल। ओ "आजाद गजल"केँ स्थापित केलन्हि। "पिछले मौसम का फूल"मे ५५ टा बहरयुक्त आ ३ टा आजाद गजलक संकलन अछि। ओ १९८८ ई.मे श्रीनगर दूरदर्शनमे केन्द्र निदेशकक पदसँ अवकाश ग्रहण केने रहथि।

(साभार समदिया http://esamaad.blogspot.in/2012/01/blog-post_4386.html )

रविवार, 22 जनवरी 2012

मैथिली गजल- गजेन्द्र ठाकुर, गायन दीक्षा भारती

मैथिली गजल- गजेन्द्र ठाकुर, गायन दीक्षा भारती

मैथिली गजल (बहरे मुतकारिब)- गजेन्द्र ठाकुर, गायन दीक्षा भारती

मैथिली गजल- गजेन्द्र ठाकुर, गायन दीक्षा भारती

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

मैथिली गजलशास्त्र-१४

मैथिली गजलक पहिल दुर्भाग्य तखन देखा पड़ैत अछि जखन एतए गजलकेँ मुस्लिम धर्मसँ जोड़ि कऽ देखल जाए लगलै आ मुस्लिम धर्म आ ओकर साहित्यकेँ अछोप मानि लेल गेलै। गजलक प्रारम्भ इस्लामक आगमनसँ पूर्वक घटना अछि आ अवेस्ता आ वैदिक संस्कृत मध्य ढेर रास साम्य अछि। दोसर दुर्भाग्य मायानंद मिश्रक ओ कथन भेल जाहिमे ओ घोषणा केलथि जे मैथिलीमे गजल लिखले नै जा सकैए, हुनकर तात्पर्य दोसर रहन्हि मुदा लोक अही तरहेँ ओकरा प्रस्तुत करए लागल, कारण ओ स्वयम् गीतल नामसँ गजल लिखलन्हि। मैथिली गजलमे "अनचिन्हार आखर" सन ब्लाग उपस्थित भेल जतए बहर (छन्दयुक्त) गजल आ गजलकारक लाइन लागि गेल। मुदा सभसँ बड़का दुर्भाग्य ई भेलै जे मैथिलीक किछु तथाकथित शाइर सभ रामदेव झा द्वारा बहर संबंधी विचारकेँ नकारि देलन्हि ( देखू- लोकवेद आ लालकिलामे देवशंकर नवीन जीक आलेख)। जँ वर्तमानमे गजलक परिदृश्यकेँ देखी तँ मोटामोटी दूटा रेखा बनैत अछि (जकरा हम दू युगक नाम देने छी) पहिल भेल "जीवन युग" आ दोसर भेल "अनचिन्हार युग"। आब कने दूनू युग पर नजरि फेरल जाए।


1) जीवन युग- ऐ युगक प्रारंभ हम जीवन झासँ केने छी जे आधुनिक मैथिली गजलक पिता मानल जाइ छथि मुदा ओ कम्मे गजल लीख सकला। मुदा हुनका बाद मायानंद, इन्दु, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, विभूति आनंद,सरस, रमेश, नरेन्द्र, राजेन्द्र विमल, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, रौशन जनकपुरी, अरविन्द ठाकुर, सुरेन्द्र नाथ, तारानंद वियोगी आदि गजलगो सभ भेलाह। रामलोचन ठाकुर जीक बहुत रचना गजल अछि मुदा ओ अपने ओकर क्रम-विन्यास कविता-गीत जकाँ बना देने छथिन्ह मुदा किछु गजलक श्रेणीमे सेहो अबैए। ऐ “जीवन युग”क गजलक प्रमुख विशेषता अछि बे-बहर अर्थात बिन छंदक गजल। ओना बहरकेँ के पूछैए जखन सुरेन्द्रनाथ जी काफियाक ओझरीमे फँसल रहि जाइ छथि। एकर अतिरिक्त आर सभ विशेषता अछि ऐ युगक। आ जँ एकै पाँतिमे हम कहए चाही तँ पाँति बनत---" गजल थिक, ई गजल थिक, आ इएह टा गजल थिक"।

2) आब कने आबी " अनचिन्हार युग" पर। ऐ युगक प्रारंभ तखन भेल जखन इंटरनेटपर मैथिलीक पहिल गजल आ शेरो-शाइरीकेँ समर्पित ब्लाग "अनचिन्हार आखर" ( http://anchinharakharkolkata.blogspot.com ) क जन्म भेल।आ ऐ अन्तर्जालक “अनचिन्हार आखर” जालवृत्तक नामपर हम ऐ युगक नाम "अनचिन्हार युग" रखलहुँ अछि। ऐ युगक किछु विशेषता देखल जाए-



• गजलक परिभाषिक शब्द आ बहरक निर्धारण---- ई सौभाग्य एकमात्र "अनचिन्हारे आखर"केँ छैक जे ओ हमरासँ १३ खंडमे (एखन धरि १३ खण्ड) "मैथिली गजल शास्त्र" लिखेलक। आ ई मैथिलीक पहिल एहन शास्त्र भेल जइमे गजलक विवेचन मैथिली भाषाक तत्वपर कएल गेलै। तकरा बाद आशीष अनचिन्हार सेहो "गजलक संक्षिप्त परिचय" लीख ऐ परंपराकेँ पुष्ट केलथि। आ एकरे फल थिक जे सभ नव-गजलकार बहरमे गजल कहि रहल छथि।

• स्कूलिंग ---- "अनचिन्हार आखर" गजल कहेबाक परंपरा शुरू केलक आ तइमे सुनील कुमार झा, दीप नारायण "विद्यार्थी", रोशन झा, प्रवीन चौधरी "प्रतीक", त्रिपुरारी कुमार शर्मा, विकास झा "रंजन", सद्रे आलम गौहर, ओमप्रकाश झा, मिहिर झा, उमेश मंडल आदि गजलकार उभरि कए अएलाह।

• गजलमे मैथिलीक प्रधानता----"अनचिन्हार युग" सँ पहिने गजलमे उर्दू-हिन्दी शब्दक भरमार छल आ मान्यता छल जे बिना उर्दू-हिन्दी शब्दक गजल कहले नै जा सकैए। मुदा "अनचिन्हार आखर" ऐ कुतर्ककेँ धवस्त केलक आ गजलमे १००% मैथिली शब्दक प्रयोगकेँ सार्वजनिक केलक।

• गजलक लेल पुरस्कार योजना--- "अनचिन्हार आखर" मैथिली साहित्य केर इतिहासमे पहिल बेर गजल लेल अलगसँ पुरस्कार देबाक घोषणा केलक। ऐ पुरस्कारक नाम "गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा" पुरस्कार अछि।

• उपर चारू विशेषताक आधारपर एकटा अंतिम मुदा सभसँ बड़का विशेषता जे निकलल ओ थिक मायानंद मिश्रक ओइ कथनक खंडन, जकर अभिप्राय छल जे मैथिलीमे बहरयुक्त गजल लिखल नै जा सकैए। "अनचिन्हार आखर" सरल वार्णिक, वार्णिक आ मात्रिक छन्दक अतिरिक्त फारसी/ उर्दू बहरमे सेहो मैथिली गजल लिखबाक शास्त्र ओ उदाहरण खाँटी मैथिली शब्दावलीमे प्रस्तुत केलक।

बुधवार, 28 सितंबर 2011

गजल

सोझाँ देखि मोन ललाइए चलू घुरि चली/

ई आस अपूर्ण बुझाइए चलू घुरि चली



कोन पक्का रंगसँ ढौराबी जे धोखराए नै/

मोनक रंगो धोखराइए चलू घुरि चली



छल बुझाइत छली आब बुझि गेल बात/

छलबाक चालि बुझाइए चलू घुरि चली



ठकैए हमरा हम जानि-बूझि ठकाइत/

प्राप्ति भेलै किछु बुझाइए चलू घुरि चली



भारी धापक धम्मक पसरि गेलै सगरे/

ऐरावत ऐल सुनाइए चलू घुरि चली

गजल (बहरे हजज)

महामाला महाडाला करै स्वाहा लगैए ई

अकासी आस छै सोझाँ झझा देतै लगैए ई



कहैए ई मिलेबै आइ नोरोमे कने गोला

जँ भांगे पीबि एतै, भावना पीतै लगैए ई



जहाँ ताकी लगैए प्रेम बाझै छै सरैलामे

खने भोकारि पाड़ैए हँसै नै छै लगैए ई



टिपौड़ी छै बुझेबै बात की, धाही कनी देखू

कटैया पानि जेना ओ, नचै नै छै लगैए ई



गजेन्द्र पूब सुरुजक रहत देतै सूर्यकेँ झाँखी

चढ़त आकास देखै बानसब्बरै लगैए ई

गजल

मनुख जरैए गाम कनैए हमरा की/
चद्दरि तनने फोंफ कटैए हमरा की




बान्हक कातमे घर बनेने बाट जोही/
बाट बिसरि कऽ नै बिलमैए हमरा की



सुन्दर सपना रातुक, देखल बिसरी/
सपना सच नै भेल लगैए, हमरा की



चलू चलै छी नव देशमे घृणा जतऽ नै/
अप्पन देश बिलटि जँ गेलै, हमरा की



गारि देबाले बिर्त देलक हम नै लेलौं/
ऐरावत लेत प्रेम, नै दैए हमरा की

कुण्डली

सत असत मे भेद करू, राखू नै किछु रोख

ततमत नै करू कनियो, जे छै होनी लेख

जे छै होनी लेख, हुए से नीक निकेना

सत्यक जीत हएत , जँ करबै अकसतिकस ने

डर संग असत केर, डर ढाहू मध्य हृदयक

ऐरावतक बुझैत, यएह छी असत्यक सत

सोमवार, 26 सितंबर 2011

कुण्डली

ऐ कुण्डलीक प्रयोग सायास रुपें एहि ब्लाग पर देल गेल अछि। कारण हरेक मैथिली छंद आ उर्दू बहरक समानता-असमानता देखाबए लेल इ नीक रहत।



कुण्डली


बोल वचन हुअए नीक, बूझि बाजी जँ बात

गुम्म रहनाइए ठीक, हुए जँ नमहर जाल

हुए जँ नमहर जाल, लेत ओ लप दऽ भीतर

हल्ला बनि जाएत, नै अछि जँ बेर उचित पर

सुनू हमर ई बात, बात होइए अनमोल

ऐरावत कहि जाय, कहू नै ओल सन बोल

गजल

खेत, आरि, रस्ता सभटा अहीं तँ छी

बेढ़ि चारूकात पड़ता अहीं तँ छी





ओकर इयाद आबैए घुरि घुरि

इयादक याद अगता अहीं तँ छी



भजार मोन पड़ैए, बिदा होइ छी

टूटल सपनाक झंझा अहीं तँ छी





भोरे उदासी उड़ियाइत जाइत

जे बुन्नी बुनिऐल छिच्चा अहीं तँ छी





खुशी छूटल हँसी छूटल जाइए

दुख-सुखक अकाल जा, अहीं तँ छी

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

दोहा/ रोला/ कुण्डलिया

दोहा
दोहा मात्रिक छन्द अछि। दोहामे दू पाँती आ चारि चरण होइत अछि। पहिल चरणमे १३,दोसर चरणमे ११,तेसर चरणमे १३आ चारिम चरणमे ११ मात्रा होइत अछि। पहिल आ तेसर चरणक आरम्भ जगणसँ (जगण U U) नै हएत आ दोसर आ चारिम चरण अन्त हएत दीर्घ-ह्रस्वसँ।
रोला
रोला सेहो मात्रिक छन्द अछि। रोलामे चारि पाँती आ आठ चरण होइत अछि। पहिल चरणमे ११, दोसर चरणमे १३, तेसर चरणमे ११ आ चारिम चरणमे १३ मात्रा, पाँचम चरणमे ११, छअम चरणमे १३ मात्रा होइत अछि। सभ पाँतीक पहिल चरणक अन्तमे दीर्घ-ह्रस्व, वा ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व होइत अछि। सभ पाँतीक दोसर चरणक अन्तमे चारिटा ह्रस्व, वा दूटा दीर्घ, वा दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व (भगण U U), वा ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ (सगण U U ।) होइत अछि। रोलाक प्रारम्भ ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्वसँ नै करू।  

कुण्डलिया
दोहा आ रोलाक कुण्डली (मिश्रण) भेल कुण्डलिया। दोहा लिख दियौ, फेर दोहाक अन्तिम चरणकेँ (११ मात्रा बला) रोलाक पहिल चरण बना दियौ (पुनरावृत्ति) आ फेर रोला जोड़ू। खाली ई ध्यान राखू जे दोहाक पहिल चरणक पहिल शब्द आ रोलाक अन्तिम चरणक अन्तिम शब्द एक्के रहए। कुण्डलियाक पहिल शब्द आ अन्तिम शब्द एक्के होइए। कुण्डलियाक चारिम आ पाँचम चरण सेहो एक्के होइए।

छन्द विचार
साहित्यक दू विधा अछि गद्य आ पद्य।छन्दोबद्ध रचना पद्य कहबैत अछि-अन्यथा ओ गद्य थीक। छन्द माने भेल-एहन रचना जे आनन्द प्रदान करए।

छन्द दू प्रकारक अछि।मात्रिक आ वार्णिक।
मात्रिक गणना
मैथिलीक उच्चारण निर्देश आ ह्रस्व-दीर्घ विचारपर आउ।
शास्त्रमे प्रयुक्त गुरुलघुछंदक परिचय प्राप्त करू।

तेरह टा स्वर वर्णमे अ,,,,लृ - ह्र्स्व आर आ,,,,ए.ऐ,,औ- दीर्घ स्वर अछि।

ई स्वर वर्ण जखन व्यंजन वर्णक संग जुड़ि जाइत अछि तँ ओकरासँ गुणिताक्षरबनैत अछि।

क्+अ= क,

क्+आ=का ।

एक स्वर मात्रा आकि एक गुणिताक्षरकेँ एक अक्षरकहल जाइत अछि। कोनो व्यंजन मात्रकेँ अक्षर नहि मानल जाइत अछि- जेना अवाक्शब्दमे दू टा अक्षर अछि, , वा ।


१. सभटा ह्रस्व स्वर आ ह्रस्व युक्त गुणिताक्षर लघुमानल जाइत अछि। एकरा ऊपर U लिखि एकर संकेत देल जाइत अछि।

२. सभटा दीर्घ स्वर आर दीर्घ स्वर युक्त गुणिताक्षर गुरुमानल जाइत अछि, आ एकर संकेत अछि, ऊपरमे एकटा छोट -।

३. अनुस्वार किंवा विसर्गयुक्त सभ अक्षर गुरू मानल जाइत अछि।

४. कोनो अक्षरक बाद संयुक्ताक्षर किंवा व्यंजन मात्र रहलासँ ओहि अक्षरकेँ गुरु मानल जाइत अछि। जेना- अच्, सत्य। एहिमे अ आ स दुनू गुरु अछि।

जेना कहल गेल अछि जे अनुस्वार आ विसर्गयुक्त भेलासँ दीर्घ होएत तहिना आब कहल जा रहल अछि जे चन्द्रबिन्दु आ ह्रस्वक मेल ह्रस्व होएत।
माने चन्द्रबिन्दु+ह्रस्व स्वर= एक मात्रा

संयुक्ताक्षर: एतए मात्रा गानल जाएत एहि तरहेँ:-
क्ति= क् + त् + इ = ०+०+१= १
क्ती= क् + त् + ई = ०+०+२= २
क्ष= क् + ष= ०+१
त्र= त् + र= ०+१
ज्ञ= ज् + ञ= ०+१
श्र= श् + र= ०+१
स्र= स् +र= ०+१
शृ =श् +ऋ= ०+१
त्व= त् +व= ०+१
त्त्व= त् + त् + व= ० + ० + १
ह्रस्व + ऽ = १ + ०
अ वा दीर्घक बाद बिकारीक प्रयोग नहि होइत अछि जेना दिअऽ आऽ ओऽ (दोषपूर्ण प्रयोग)। हँ व्यंजन+अ गुणिताक्षरक बाद बिकारी दऽ सकै छी।
ह्रस्व + चन्द्रबिन्दु= १+०
दीर्घ+ चन्द्रबिन्दु= २+०
जेना हँसल= १+१+१
साँस= २+१
बिकारी आ चन्द्रबिन्दुक गणना शून्य होएत।
जा कऽ = २+१
क् =०
क= क् +अ= ०+१
किएक तँ क केँ क् पढ़बाक प्रवृत्ति मैथिलीमे आबि गेल तेँ बिकारी देबाक आवश्यकता पड़ल, दीर्घ स्वरमे एहन आवश्यकता नहि अछि।


U- ह्रस्वक चेन्ह
।- दीर्घक चेन्ह

एक दीर्घ =दूटा ह्रस्व U

वार्णिक गणना
संयुक्त्ताक्षरकेँ  एक गानू आ  हलन्तक/ बिकारीक/ इकार आकार आदिक गणना नहि करू। वार्णिक छन्दक परिचय लिअ। एहिमे अक्षर गणना मात्र होइत अछि। हलंतयुक्त अक्षरकेँ नहि गानल जाइत अछि। एकार उकार इत्यादि युक्त अक्षरकेँ ओहिना एक गानल जाइत अछि जेना संयुक्ताक्षरकेँ। संगहि अ सँ ह केँ सेहो एक गानल जाइत अछि।द्विमानक कोनो अक्षर नहि होइछ।मुख्य तीनटा बिन्दु यादि राखू-

1.हलंतयुक्त्त अक्षर-0
2.संयुक्त अक्षर-1
3.अक्षर अ सँ ह -1 प्रत्येक।

आब पहिल उदाहरण देखू
ई अरदराक मेघ नहि मानत रहत बरसि के=1+5+2+2+3+3+1=17 मात्रा

आब दोसर उदाहरण देखू
पश्चात्=2 मात्रा

आब तेसर उदाहरण देखू
आब=2 मात्रा

आब चारिम उदाहरण देखू
स्क्रिप्ट=2 मात्रा

मुख्य वैदिक छन्द सात अछि-गायत्री,उष्णिक् ,अनुष्टुप् ,बृहती,पङ् क्त्ति,त्रिष्टुप् आ  जगती। शेष ओकर भेद अछि अतिछन्द आ  विच्छन्द। छन्दकेँ अक्षरसँ चिन्हल जाइत अछि। यदि अक्षर पूरा नहि भेलतँ एक आकि दू अक्षर प्रत्येक पादमे बढ़ा लेल जाइत अछि।य आ
व केर संयुक्ताक्षरकेँ क्रमशः इ आ  उ लगा कय अलग केल जाइत अछि।जेना-
वरेण्यम्=वरेणियम्
स्वः= सुवः
गुण आ वृद्धिकेँ अलग कयकेँ सेहो अक्षर पूर कय सकैत छी।
ए= अ + इ 
ओ= अ + उ
ऐ= अ/आ + ए
औ= अ/आ + ओ 


सरल वार्णिक छन्दमे ह्रस्व आ दीर्घक विचार नै राखल जाइए। मुदा वार्णिक छन्दमे ह्रस्व आ दीर्घक विचार राखल जा सकैत अछि, कारण वैदिक वर्णवृत्तमे बादमे वार्णिक छन्दमे ई विचार शुरू भऽ गेल छल:- जेना
तकैत रहैत छी ऐ मेघ दिस
तकैत (ह्रस्व+दीर्घ+दीर्घ)- वर्णक संख्या-तीन
रहैत (ह्रस्व+दीर्घ+ह्रस्व)- वर्णक संख्या-तीन
छी (दीर्घ) वर्णक संख्या-एक
(दीर्घ) वर्णक संख्या-एक
मेघ (दीर्घ+ह्रस्व) वर्णक संख्या-दू
दिस (ह्रस्व+ह्रस्व) वर्णक संख्या-दू

मात्रिक छन्दमे द्विकल, त्रिकल, चतुष्कल, पञ्चकल आ षटकल अन्तर्गत एक वर्ण (एकटा दीर्घ) सँ छह वर्ण (छहटा ह्रस्व) धरि भऽ सकैए।
द्विकलमे- कुल मात्रा दू हएत, से एकटा दीर्घ वा दूटा ह्रस्व हएत।
त्रिकलमे कुल मात्रा तीन हएत- ह्रस्व+दीर्घ, दीर्घ+ह्रस्व आ ह्रस्व+ह्रस्व+ह्रस्व; ऐ तीन क्रममे।
चतुष्कलमे कुल मात्रा चारि; पञ्चकलमे पाँच; षटकलमे छह मात्रा हएत।
वार्णिक छन्द तीन-तीन वर्णक आठ प्रकारक होइत अछि जे यमाताराजसलगम् सूत्रसँ मोन राखि सकै छी।
आब कतेक पाद आ कतऽ यति,अन्त्यानुप्रास देबाक अछि; कोन तरहेँ क्रम बनेबाक अछि से अहाँ स्वयं वार्णिक/ मात्रिक आधारपर कऽ सकै छी, आ विविधता आनि सकै छी।
वर्ण छन्दमे तीन-तीन अक्षरक समूहकेँ एक गण कहल जाइत अछि। ई आठ टा अछि-
यगण  U।।
रगण U
तगण ।। U
भगण U U
जगण U U
सगण U U
मगण ।।।
नगण U U U

एहि आठक अतिरिक्त दूटा आर गण अछि- ग / ल
ग- गण एकल दीर्घ ।
ल- गण एकल ह्रस्व U
एक सूत्र- आठो गणकेँ मोन रखबा लेल:-
यमाताराजभानसलगम्
आब एहि सूत्रकेँ तोड़ू-
यमाता U।। = यगण
मातारा  ।।। = मगण
ताराज ।। U = तगण
राजभा U। = रगण
जभान U U = जगण
भानस U U = भगण
नसल U U U = नगण
सलगम् U U । = सगण

रविवार, 24 जुलाई 2011

गजल


बाट तकैत दिन बीति जाएत बुझलिऐ
आस तकैत जिनगी बिताएत बुझलिऐ

आफन तोड़ब अहाँ सुनबै तखन की की
बीतत बेर उदासी कहाएत बुझलिऐ


ऊँह ई टीस उठल फेर वेदना सहै
छी
आदति बनल बनि बुझाएत बुझलिऐ

सहबाक शक्ति जे खतम भेल काल्हियेसँ
सम्वेदना अदौसँ जँ हराएत बुझलिऐ


गढ़ुआरि छी पहिने दर्द नै छल कनेको
दुख सहैक सुभावे कहाएत बुझलिऐ

करऽ पड़त मेहनति तिगुना कैक गुना
गोनरिपर बैसल सोचाएत बुझलिऐ

गभछब ऐ मालक जिरतिआ कहबैत
गोरहन्नी लऽ खपड़िआ गाएत बुझलिऐ

गतायात बन्न, भाव गोपलखत्ता गेलैए
गच्छ बना कऽ गोधियाँ बनाएत बुझलिऐ
ऐरावतक गोधिआँ बनत के असगर
हाथी-हेंज बिसरत हराएत बुझलिऐ

गजल


छोड़ि कऽ जे बिनु बजने जा रहल अछि
हृदै चिरैत आगि सुनगा रहल अछि

नीक लगै छल ओकर बोलक संगोर
जाइए आइ हृदैकेँ कना रहल अछि

नै बुझलिऐ ई एते बढ़ल अछि बात
देखल आइ जे ओ भँसिया रहल अछि

हमरासँ कते की माँगै छल रहरहाँ
जे जुमल ओ बिनु लेने जा रहल अछि

ओकर हाक्रोस हमर चुप्पी सुनै छल
बाजब से बिनु सुनने जा रहल अछि

ऐरावत पटा देलक अपन लहास
नेसुआ कऽ नेढ़िया सृष्टि खा रहल अछि
तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों