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शनिवार, 1 जनवरी 2011

गजल

गजल- कालीकांत झा "बूच"

भरल भवधार छै सजनी कोना पदवार हम करबै
पडल सब भार छै सजनी, कोना पतवार हम धरबै

बनलि हम रूप करे रानी, मुदापंथक भिखारिन छी
जडल घटवार छै सजनी, कोना इजहार हम करबै

सुभावक नाव पर हमरा जखन धऽकऽ चढा देतै
अडल इकरार छै सजनी, कोना इनकार हम करबै

लगै छै मारि के दोमऽ जुआनी मारि बनिवीचे
मुद्दइ सुकुमार छै, सजनी कोना तकरार हम करबै

कहाँ धरिआर हम खसल करूआरि ओ नीचाँ
गहन अनहार छै सजनी, कोना भऽठाढ हम रहबै

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

गजल

गजल- कालीकांत झा "बूच"


सध्यः अहाॅ, मुदा छी सपना एहि जीवन मे
सहजो सुख भऽ गेल कल्पना एहि जीवन मे

विहुॅसल ठोर विवश भऽ विजुकल,
मादक नैन नोर केर नपना एहि जीवन मे


अछि केॅ कतऽ श्रृंगार सजाओत्,
आश लाश पर कफनक झपना एहि जीवन मे


दुनियाॅ हमर एकातक गहवर,
भेल जिअत मुरूतक स्थपना एहि जीवन मे

दीप वारि अहाॅ द्वारि जड़यलहुॅ,
घऽर हम लोकक अगितपना एहि जीवन मे

गजल

गजल- कालीकांत झा "बूच"


अहॅक लेल रंजन, हमर भेल गंजन
केहेन खेल ई, रक्त सॅ हस्त मंजन

तरल नेह पर मात्र दुःखक सियाही,
जड़ल देह हम्मर अहॅक आॅखि अंजन

रचल गेल छल जे, सुखक लोक सुन्दर
चलल अछि प्रलय लऽ तकर सुधिप्रभंजन

मृतक हम, अहाॅ छी सुधा स्वर्ग लोकक
अहॅक लेल यौवन हमर गेल जीवन

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

गजल

आव विसरव कोना सुनू जननी अहॉ, कतेक निर्मल सेहंतित अहॅक ऑचर।
हिय सिहकै जखन वहै लोचन तखन नोर पोछलहुॅ लपेटि हम अहॅक ऑचर।।



कोना अयलहुॅ खलक ? मोन नहि अछि कथा, पवित्र पट सॅ सटल देह भागल व्यथा।

सिनेह निश्छल अनमोल प्रथम सुनलहुॅ मातृबोल, मोह ममताक आन के‘ करत परतर?


दंत दुग्धक उगल, नीर पेट सॅ वहल, देह लुत्ती भरल कंठ सरिता सुखल।
जी करै छल विसविस तालु अतुल टिसटिस, मुॅह मे लऽ चिवयलहुॅ अहॅक ऑचर।



नेना वयसक अवसान ताक‘ चललहुॅ हम ज्ञान, कएलहुॅ गणना अशुद्ध गुरू फोड़ि देलनि कान।

सिलेट वाट पर पटकि मॉक कोर मे सटकि, तीतल कमलाक धार सॅ अहॅक ऑचर।



देखि पॉचमक फल मातृदीक्षा सफल, भाल तिरपित मुदा ! उर तृष्णा भरल।
गेलहुॅ कत‘ हे अम्बे कत‘ गेल ऑचर, ताकि रहलहुॅ हम ऑगन सॅ पिपरक तर।

गजल

गजल- कालीकांत झा "बूच"


श्याम होइछ परक प्रेम अधलाह हे,

तेॅ बिसरि जाह हमरा बिसरि जाह हे ।


दीप बुझि रूप केॅ जुनि हृदय मे धरह,मोहवाती जरा तेल नेहक भरह ।

कऽ देतऽ जिन्दगी केॅ ई सुड्डाह हे,तेॅ बिसरि जाह हमरा विसरि जाह हे ।


हऽम मधुबन मे साॅझक पहिल तारिका,तोॅ फराके बनावह अपन द्वारिका ।
उठि रहल अछि अनेरेक अफवाह हे,



हम विमल राश केर खास संयोजिका,छी प्रवल गोप केर प्रेयसी गोपिका,

घाट सॅ खुलि चुकल अछि हमर नाह हे,




मोन मे उत्तरी सागरक जल भरह,लाख चुचुकारी बर्फक महल मे धरह,
हम तहू ठाम बरबानलक धाह हे,

गजल

गजल- कालीकांत झा "बूच"


स्वप्न सुन्दरि अहाॅ जीवनक सहचरी ।
निन्न मे आउ अहिना घड़ी दू घड़ी ।।


भोग भोगल जते जे बनल कल्पना,आब भऽ गेल अछि अन्तरक अनमना,

हऽम मानव अहाॅ देव लोकक परी ।




मात्र उत्तापदायी बसंती छटा,आब संतापदायी अषाढ़ी घटा,
काॅट लागनि सुखायल गुलाबी छड़ी ।




रूप अमरित पिया कऽ अमर जे केलहुॅ,विक्ख विरहक खोआ फेर की कऽ देलहुॅ ?

घऽर मे जिन्दगी गऽर मरनक कड़ी ।





वेर वेरूक अहॅक फेर अभयागतम्,अछि सदा सर्वदा हार्दिक स्वागतम्,
कप्प चाहक दुहू नैन मन तस्तरी ।

गजल

गजल- कालीकांत झा "बूच"


आशवर शीघ्र श्रावण मे औता पिया,
प्यास पर नीर पावन बहौता पिया ।।

देखि हुनका सुखक मारि सहि ने सकब,खसि पड़ब द्वारि पर ठाढ़ रहि ने सकब,

पाशतर थीर छाती लगौता पिया,प्यास पर नीर पावन बहौता पिया ।।



भऽ उमंगित बहत आड़नक बात ई,उल्लसित भऽ रहत चाननक गात ई,
पाततर पिक बनल स्वर सुनौता पिया,प्यास पर नीर पावन बहौता पिया ।।

मन उमड़ि गेल बनि गेल यमुना नदी,तन सिहरि गेल जहिना कदंबक कली,

श्वास पर धीर बंसुरी बजौता पिया,प्यास पर नीर पावन बहौता पिया ।।
तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों