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सोमवार, 6 जून 2011

 गजल

होइत छैक बरखा आ रे बौआ
कागतक नाह बना रे बौआ

देखिहें घुसौ ने चोरबा घर मे
हाथ मे ठेंगा उठा रे बौआ

तोरे पर सभटा मान-गुमान
माएक मान बढ़ा रे बौआ

छैक गड़ल काँट घृणाक करेज मे
प्रेम सँ ओकरा हटा रे बौआ

नहि झुकौ माथ तोहर दुशमन लग
देशक लेल माथ कटा रे बौआ

रविवार, 5 जून 2011

 गजल

कानए लागल पात नुका कए राति मे
खीजए लागल पात नुका कए राति मे

बेशर्मीक हद टपि गेल केओ ने कहलक
हूथए लागल पात नुका कए राति मे

नहि छैक पाइ जे कराओत इलाज दर्दक
कूथए लागल पात नुका कए राति मे

अपने सँ नजरिबंद हम रंग-महल मे
देखए लागल पात नुका कए राति मे

सुआद लगलैक खाली शोणित केर
चुसए लागल पात नुका कए राति मे

अनचिन्हार देह-दरसक रहस्य बूझल
छूबए लागल पात नुका कए राति मे

बुधवार, 1 जून 2011

 गजल

इजोत लेल अन्हेर नगरी जाइत लोक
सपना मे सपनाक भात खाइत लोक

खेत आब पटाओल जाइछ शोणित सँ
पानि महँक तेल जकाँ छताइत लोक

जकरा जतेक भेटैक सएह बड़ अगत्ती
खएलाक पछातिओ गुंगुआइत लोक

छोड़लकै डनियाँ तेहन ने अगिनबान
मोने मे पजरि मोने मे पझाइत लोक

बसातक कमी भए गेलैक गामो मे
आँक्सीजनक बोतल मे औनाइत लोक

बुधवार, 25 मई 2011

गजल

मालक खातिर माल-जाल बनल लोक
देखाँउसक खातिर कंगाल बनल लोक


भूखक दर्द होइत छैक इजोतो सँ तेज
पेटक खातिर दलाल बनल लोक


वृत टूटल मिलल समानान्तर रेखा
बिनु कागजीक प्रकाल बनल लोक


सत्य-सत्य ने रहल ने रहल फूसि- फूसि
अपनेक लेल अपने जंजाल बनल लोक


सुस्जित आनन चानन ललाट
नुनिआएल देबाल बनल लोक

गजल

एहि रुपें सभ मे करार हेतैक
खाए लेल मनुखे जोगाड़ हेतैक


बनि गेल मीडिआ पोर्नोग्राफी
आब सए मे सए फिराड़ हेतैक


सेक्स, बलात्कार बढ़ि रहल अविराम
लोक मे बहिनोक ने विचार हेतैक


वयस सँ पहिनेहें बच्चा जवान
अर्पूणे पंचमे बर्खे रति-झमार हेतैक


चेतह अनचिन्हार कने बिलमि जाह
खने मे लोक बेसम्हार हेतैक

मंगलवार, 3 मई 2011

गजल

अहूँ पड़ाएल छलहुँ हमहूँ पड़ाएल छलहुँ
अहूँ घबड़ाएल छलहुँ हमहूँ घबड़ाएल छलहुँ


साइत एहने भेट लिखल छल कपार मे
अहूँ लजाएल छलहुँ हमहूँ लजाएल छलहुँ


रुकलाहा जिनगीक लेल सौरी बेर-बेर सौरी
अहूँ उबिआएल छलहुँ हमहूँ उबिआएल छलहुँ

शेर चल गेल आब ताल दए की हएत
अहूँ सुटिआएल छलहुँ हमहूँ सुटिआएल छलहुँ

रहि गेलहुँ अनचिन्हार करेज सटेलाक बादो
अहूँ अगुताएल छलहुँ हमहूँ अगुताएल छलहुँ

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

गजल

एना जे धड़ के नेड़ा बैसल छी
जिनगीक अर्थ के हेड़ा बैसल छी

नहि होइन्ह अन्हार हुनक कोबर मे
तँए अपन करेज जरा बैसल छी

उराहल इनारक पानि सँ कब्ज होइए
गंगोजल के सड़ा बैसल छी

भेटबे करत केओ ने केओ कहिओ
एही उम्मेद पर अपना के जिया बैसल छी

करोट फेरब के परिवर्तन कहल जाइए
जखन की आत्मे के सुता बैसल छी

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

गजल

बेमार छी मुदा बेमार नहि लगैत छी
दवाइ खाइ से कहिओ ने चाहैत छी

हमरा अहाँ नीक लगलहुँ सभ दिन सँ
मुदा प्रेम अछि से कहि नहि पबैत छी

विसर्जनक पछाति बला मूर्ति छी हम
भसा देल गेलहुँ मुदा नहि डुबैत छी

सभ दिन हमरा लेल मधुश्रावनिए थिक
टेमी दगेलाक पछातिओ नहि कुहरैत छी

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

गजल

जादू-मंतर मारि देलकै ओ जाइत-जाइत
मोन केकरो हरि लेलकै ओ जाइत-जाइत

जकरा अबिते भोर आबि गेलैक ठोर पर
आँखि मे साँझ आनि देलकै ओ जाइत-जाइत

हाथ जकर थरथराइत छलैक फूलो तोड़बा सँ
कोमल-करेज तोड़ि देलकै ओ जाइत-जाइत

उखरल छलैक सुलबाइ मुदा तैओ
आँकर-पाथर पचा लेलकै ओ जाइत-जाइत

अनचिन्हारक ठोर मे सटलै अनचिन्हारक ठोर
मुदा मुँह घुमा लेलकै ओ जाइत-जाइत

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

गजल

सटै जँ ठोर अनचिन्हारक अनचिन्हार सँ त बुझिऔ होली छैक
बाजए जँ केओ प्यार सँ त बुझिऔ होली छैक

बेसी टोइया-टापर देब नीक नहि भाइ सदिखन अनवरत
निकलि जाइ जँ अन्हार सँ त बुझिऔ होली छैक

केहन- केहन गर्मी मगज मे रहै छैक बंधु
मनुख बचि जाए जँ गुमार सँ त बुझिऔ होली छैक

की दुख होइत छैक चतुर्थीक राति मे नहि बुझि सकबै
हँसी जँ आबए कहार सँ त बुझिऔ होली छैक

जहाँ कनही गाएक भिन्न बथान तहाँ सुन्न- मसान
होइ कोनो काज सभहँक विचार सँ त बुझिऔ होली छैक





सोमवार, 14 मार्च 2011

गजल

कीनल खुशी पर हसूँ कतेक
पलास्टिकक कंठ सँ बाजू कतेक

रहस्य बेपारक बुझबै नहुँ-नहुँ
देखू कमजोर हाथ मे तराजू कतेक

आधुनिको नहि उत्तर आधुनिक जुग
बच्चा बेचैत मनुख गर्जू कतेक

बिनु आँकरक भात कतए भेटत
कहू कओरे-कओरे थुकरु कतेक

अनचिन्हारक चश्मा लागल आखिँ पर
कहू दोसर लग हम बैसू कतेक

मंगलवार, 8 मार्च 2011

गजल

मोन मे बैसल मात्र एकटा साँप

बाहर सह-सह करैत कएकटा साँप



लगबैत रहलहुँ वएट आ सूचना तंत्र

बढ़ैत रहल महँगी आपदा साँप



बिकनीक डिजाइन छैक वा सुन्दरीक अपने

छाती मे लेपटाएल तगमा साँप



बुझाएत नहि रहत पाते मे मिझराएल

एनाहित डसँत सुगबा साँप







शुक्रवार, 4 मार्च 2011

गजल

के कनैत अछि एहिठाम हमरा लेल

के रहैत अछि एहिठाम हमरा लेल



केकरो सपना मे अएबैक हम भ्रम नहि पोसब

के सुतैत अछि एहिठाम हमरा लेल



उठनाइ खराप नहि मुदा कनेक अहूँ सोचिऔ

के उठैत अछि एहिठाम हमरा लेल



अनवरत बसातक संग आबि रहल गर्दा

के उड़ैत अछि एहिठाम हमरा लेल



अनचिन्हार नाम अनचिन्हार गाम अनचिन्हार सभ

के गबैत अछि एहिठाम हमरा लेल

मंगलवार, 1 मार्च 2011

गजल

मोन कतबो मरलिअइ मोन रहि गेलैक मुदा

छवि कतबो हटेलिअइ आँखि मे बसि गेलैक मुदा



हाँड़-पाँजड़ रहए ने थिर चित्त चंचल

नोरक धार सँ आँखि दहि गेलैक मुदा



बैसल छी घर मे एकसरे एखन

कान मे केओ किछु कहि गेलैक मुदा



एक त विख्ख ताहू मे इ प्रेमक विख्ख

रोकिते-रोकिते चढ़ि गेलैक मुदा



मुँह जे देखिऐक त लगैक अनचिन्हारे सन

की करु प्रेम सँ करेज मथि गेलैक मुदा

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

गजल

एहि तरहें प्रेम लेल तरसल हमर करेज

बरखाक हद तोड़ि बरसल हमर करेज



नहि देखाएत ओकर नाम सच मानू

अछि बड्ड हाथक दकचल हमर करेज



नहि भेटतैक हमर प्रेमक गोपी केकरो

माघ मासक गाछी जकाँ उजरल हमर करेज



कनेक अहूँ खाउ कनेक अहूँ खाउ

भोजक अन्न जकाँ परसल हमर करेज



कतबो रोकबै नहिए रुकत औ सरकार

अनचिन्हारक संग उड़रल हमर करेज



सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

गजल

किछु दूर चलब हमहूँ जँ संग दए सकी

रंगि देब हम सभ के जँ रंग दए सकी



अन्हारो मे चलब बिनु ठोकर खएने

चलबाक जँ कनिको ड़ंग दए सकी



कहबै जँ चार पर चड़बै पहाड़ पर

किछुओ ने असंभव जँ उमंग दए सकी



कोने-कोन मे बैसल कतेको राम

मारल जाएत रावण जँ धनुष भंग दए सकी



मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

गजल

हमर ठोर पर बस अहिंक नाम

चारू पहर बस अहिंक नाम



लोक मरैए अहाँक रूप देखि

सुन्दरताक जहर बस अहिंक नाम



किछु नहि बचल हमरा लग

तएँ सगरो उमर बस अहिंक नाम



नीक लगैए इ दुखक गाम हमरा

सुखक नगर बस अहिंक नाम



मोनक उत्फाल करेजक बिहाड़ि

आँखिक भमर बस अहिंक नाम

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

गजल

अपने सँ आगि लगबैत छी आ मिझबैत छी

अपने सँ पीबि कए खसैत छी आ सम्हरैत छी



आँखि मे पड़ल नोरक धन लकथक देखू

अपने जमा करैत छी आ लुटबैत छी



शांत पूर्णिमाक राति मे अशांत करेज हमर

अपने सँ हकार दैत छी आ नोंत पुड़ैत छी



एहि टूटल करेज के एक बेर फेर टुटबाक इच्छा

अपने सँ करेज तोड़ैत छी आ कुहरैत छी



के बूझत हमर दुख आ दर्द एहि ठाम

अपने सँ चिन्हार होइत अनचिन्हार रहैत छी

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

गजल

बटोही केहन छैक बाट पर चलि कए देखिऔ

पिआसलक पिआस घाट पर चलि कए देखिऔ



घर मे घोंघाउज केने कोनो लाभ नहि

सस्ती मँहग हाट पर चली कए देखिऔ



कमजोर वस्तुक मर्म ओना नहि बुझाएत

दिबाड़ लागल टाट पर चलि कए देखिऔ



कोना बुझबै कुसिआर आ सिठ्ठी के संबंध

कने कोल्हुआरक राट पर चली कए देखिऔ



नहि रहत कनबो मोल अहाँक गुण केर

बिनु पैंकिग हाट पर चलि कए देखिऔ

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

गजल

आरो बनतै कतेक बहन्ना देखबाक चाही

जनताक बनतै कतेक सन्ना देखबाक चाही



भात-दालि कात भेल नून-सोहारी पर आफद

फटकी कतेक सपनाक चन्ना देखबाक चाही



थपड़ी त अदौ सँ बजिते आएल अछि

लुटतै के कतेक टन्ना देखबाक चाही



घरक बोझ छिड़िआ रहल एम्हर सँ ओम्हर

कोम्हर हेड़ा गेल जुन्ना देखबाक चाही



खेतो के पता नहि कि भए गेलैक अछि

खादो देलाक पछाति मरहन्ना देखबाक चाही



तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों