पहिने गजलकार सभसँ----
कोनो पत्रिकाकेँ अपन गजल पठएबासँ पहिने ई देखू जे अहाँक गजल कोन बहरमे अछि। आ से देखि लेलापर तकर नाम लीखू आ संगे-संग ओहि बहरक मात्रा क्रम लिखबे टा करु। कारण अलग-अलग पत्रिकाक अलग-अलग वर्तनी आ ओहि हिसाबें प्रकाशित केने अहाँक गजलक बहर टूटि जाएत। एकरा हम एकटा उदाहरणसँ देखाएब। मानू जे अहाँ कोनो बहरक हिसाबसँ " कए " शब्दक प्रयोग केलहुँ जकर मात्रा क्रम छै UI "ह्रस्व-दीर्घ" मुदा कतेको पत्रिका एकरा " कय" बना देताह जकर मात्रा क्रम छै UU "ह्रस्व-ह्रस्व" वा I "दीर्घ" ( दूटा लघु मिला एकटा दीर्घ )। तँ कतेको पत्रिका एकरा खाली " क' " वा " क " लीखि देताह जकर मात्रा क्रम छै U "ह्रस्व"। आब अहाँ अपने बुझि सकैत छी जे वर्तनी बदलने मत्रा क्रम टूटि जाएत। मने बहर टूटि जाएत आ गजल बेबहर भए जाएत। ऐठाम हम खाली एकटा शब्दक उदाहरण देलहुँ अछि मुदा अनेको शब्दपर ई लागू हएत। तँए गजलक संगे-संग बहरक नाम आ ओकर मात्रा क्रम जरूर लीखी। संगहि-संग गजल वा शेरो-शाइरीक अन्य विधा कोनो पत्रिकाकेँ पठबैत काल संपादक जीसँ ई आग्रह करू जे जँ हुनका अपन वर्तनीक हिसाबें गजल नै बुझान्हि तँ गजल नै छापथि। कारण जखन बहर टूटिए जेतै तँ ओ गजल बेकार।छपियो जाएत तँ कोनो कर्मक नै। जँ गजल सरल वार्णिक बहरमे अछि तैओ ई समस्या आएत। उदाहरण लेल मानू जे अहाँ " नहि " शब्दकेँ प्रयोग करैत एकटा गजल सरल वार्णिक बहरमे लीखि संपादक जीकेँ देलिअन्हि मुदा ओ संपादक जी अपन वर्तनीक हिसाबें ओकरा " नै " लीखि देलखिन्हि। मतलब जे सरल वार्णिक बहर सेहो टूटि गेल। तँए गजलकार सभसँ विशेष आग्रह जे ओ प्रिंट पत्रिकाक संपादककेँ अनिवार्य रूपें लिखथि जे जाहि स्वरूपमे गजल छै ताही स्वरुपमे गजल प्रकाशित हेबाक चाही नै तँ प्रकाशित नै करु।
आब प्रिंट पत्रिकाक संपादक सभसँ-------
जँ संपादक महोदयमे कनियों बुझबाक शक्ति हेतन्हि तँ उपरका विवरणसँ हुनका गजलक संबंधमे व्यवहारिक समस्या बुझा जेतन्हि। तँए संपादक जी लेल हम विशेष नै लिखब।बस हमहूँ एतबे आग्रह करबन्हि जे अपन वर्तनीक पक्ष लए ओ गजलक संग बलात्कार नै करथि। जँ हुनका अपन वर्तनीकेँ रखबाक छन्हि तँ ओ गजलकेँ नै छापथि। या एकटा उपाय इहो भए सकैत छै जे ओ गजलकेँ छापथि आ संगे-संग ई नोट दए देथि जे " ई वर्तनी गजलकार विशेषक वर्तनी थिक, पत्रिकाक नहि"। अंतिकाक संपादक अनलकान्त जी अपन पत्रिकामे एहन नोट छापि लेखक विशेष आ अपन पत्रिका दूनूक वर्तनीक रक्षा केने छथि।
एकटा आर गप्प कविता जकाँ पाँतिकेँ सटा कए छापब गजल परंपराक विरुद्ध अछि। सङ्गे-सङ्ग एक पन्नाक दू भाग वा दू पन्नाक दू भागमे गजलकेँ छापब सेहो गजल परंपराक विरुद्द अछि। एकटा गजल दए रहल छी राजीव रञ्जन मिश्र जीक जाहिसँ ई पता लागत जे एकटा गजलक विभिन्न शेरक बीचमे कतेक जगह रहबाक चाही---------
गजल
कखनो किछु बात बुझल करू मोनक
धरकन दिन राति बनल करू मोनक
ई जे सिसकल त' लता पता सुनलक
आहाँ फरियाद सुनल करू मोनक
छोहक मारल त' घड़ी घड़ी तड़पल
मरहम बनि घाव भरल करू मोनक
कहबो ककरो जँ करब त' के बूझत
संगे बस मीत रहल करू मोनक
गाबी राजीव सदति गजल नेहक
ततबा धरि चाह सुफल करू मोनक
2222 112 1222
शीर्षक द' क' गजल छापब बेकार कारण गजलक शीर्षक नै होइ छै। चूँकि एकटा गजलमे जतेक शेर होइ छै ओतेक विषय रहैत छै गजलमे तँए शीर्षक देबाक परंपरा नै छै। हम अपन एकटा गजल दए रहल छी जाहिसँ ई स्पष्ट हएत जे ऐ तरीकासँ गजल नै प्रकाशित हेबाक चाही-------
गजल
ओकर हाथसँ छूल अछि देह
सदिखन गम गम फूल अछि देह
प्रेमक उच्चासन मिलन छैक
दू टा घाटक पूल अछि देह
कोना चलि सकतै गुजर आब
देहक तँ प्रतिकूल अछि देह
गेन्दा सिंगरहार छै मोन
चम्पा ओ अड़हूल अछि देह
ऐठाँ अनचिन्हार चिन्हार
सभ देहक समतूल अछि देह
मात्रा क्रम-222-2212-21 हरेक पाँतिमे
ऐ तरीकासँ छापब गलत थिक। एहन रूपसँ गजल प्रकाशित करब परम्परा विरुद्ध अछि।गजलमे सदिखन दूटा शेरक बीचमे जगह हेबाक चाही। ओना हिन्दीमे सेहो कविता जकाँ पाँति सटा क' गजल प्रकाशित कएल जाइत छै मुदा एकर मतलब नै जे दोसर इनारमे खसत तँ हमहूँ सभ खसि पड़ब।