पैघ नहि जीवनसँ दोसर सजा कोनो
नहि कतौ अछि एहि दर्दक दवा कोनो
बंद केने मोनमे छी दुखक सागर
केकरो लागल भनक नहि हवा कोनो
सत्य अंतिम मृत्यु अछि जीवनक सबहक
बेसि एहिसँ आन अछि नहि मजा कोनो
बेइमानी आ कपटकेँ जतय घर नहि
अछि अहाँ लग एहि जगमे पता कोनो
‘मनु’ हियक भीतर अहंकार जे मारय
नहि कतो एहेन भेटल गदा कोनो
(बहरे कलीब, मात्राक्रम : 2122-2122-1222)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
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