Saturday, 31 January 2009

गजल


भोज ने भात हर-हर गीत की करू
लागल भूख कहू मीत की करू

जिनगी अजगुत जिबनिहार विचित्र
केखनो घृणा केखनो प्रीत की करू

प्रेम बदलि रहल समयो सँ बेसी
केखनो आगि केखनो शीत की करू

मनुख के पहिचानब बड्ड कठिन
केखनो बिग्घा केखनो बीत की करू

चललहुँ मिलाबए गरा सँ गरा
भेटल दुश्मन नहि मनमीत की करू

1 comment:

  1. एहि बेर तं कँपकपी आनि देलियैक, बिहारि आनि देलियैक।

    प्रेम बदलि रहल समयो सँ बेसी
    केखनो आगि केखनो शीत की करू



    चललहुँ मिलाबए गरा सँ गरा
    भेटल दुश्मन नहि मनमीत की करू
    सत्ते
    पलास्टिकक कंठ सँ बाजू कतेक

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तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों