भगवती जकर माए ओ टुगर रहल कोना
हाथ छै दुनू भेटल रंक ओ कहल कोना
माथ पर हमर सदिखन हाथ माय छथि रखने
एहिठाम रहलै कोनो कठिन टहल कोना
लेब छोरि जीवन देबाक गप्प जे सोचत
संग-संग ओकर सुख शांति नहि बहल कोना
शेरकेँ घरे बैसल नहि शिकार भेटै छै
घरसँ जे निकलबै नहि घर बनत महल कोना
काज नहि अपन हिस्सा केर ‘मनु’ करी हम सब
ई सहज सगर दुनिया नहि बनत जहल कोना
(मात्राक्रम 212-1222 /212-1222, सभ पाँतिमे)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
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