हमरा प्रेम करु सदिखन बसन्ती पिया
नहि बाबूक हम यौ आब रहलहुँ धिया
साजन लेल रखने नेह छी कोंढ़ तर
रुकि नहि करु जुलम तरसै हमर ई जिया
बहुते जतन सोलह वर्ष सम्हारलहुँ
सहलो जाइए नहि आब टूटे हिया
आँकुर फूटि गेलै आब मनमे हमर
रोपल जे करेजामे सिनेहक बिया
साउन बित रहल दम टूटि ‘मनु’केँ रहल
जल्दी आउ ने जरि गेल आसक दिया
(बहरे कबीर, मात्राक्रम 2221-2221-2212)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’