चलि अहाँ संगे हमर जीवन ताड़ि दिअ
छी पियासल हम कनी अमरित ढारि दिअ
चारु दिस अन्हार पसरल अछि मोनमे
आबि दीया एकटा प्रीतक बारि दिअ
डेग डोलैए हमर नेहक आसमे
प्राण बनि देहक अहाँ जीवन धारि दिअ
मेघ धेने अछि सुखक आँगनमे किए
आ अपन मुसकीसँ ओ सभटा मारि दिअ
आर नहि हमरा तँ चाही किछु प्रेममे
बस अहाँ जीवन अपन ‘मनु’पर हारि दिअ
(बहरे जदीद, मात्राक्रम : 2122-2122-2212)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’