Thursday, 29 April 2010

मैथिली गजलशास्त्र-५


वेद-ए-मुकद्दस मे वेदक विषएमे अली सरदार जाफरी लिखै छथि- शुऊरे-इन्साँ के आफताबे-अजीम की अव्वलीं शुआएँ- मनुष्यक चेतनाक पहिल किरिण
जेना तमिलमे संस्कृत शब्दक आ तुर्कीमे अरबी शब्दक बहिष्कारक आन्दोलन चलल तहिना फारसीमे (फारसक प्राचीन ग्रन्थ अवेस्ता आ वैदिक-संस्कृतक मध्य समानता द्रष्टव्य) सेहो अरबी शब्दक बहिष्कार आ तकरा स्थानपर आर्य भाषा-समूहक शब्दक ग्रहणक आन्दोलन चलल अछि। मैथिलीमे सेहो हिन्दी-उर्दू शब्दक बहुलतासँ प्रयोग भाषाक अस्तित्वपर संकट जेकाँ अछि, खास कऽ मिथिलाक्षरक मैथिल ब्राह्मण संप्रदाय द्वारा दाह-संस्कार कएलाक बाद।
आब उर्दू गजलपर आबी। १८९३ ई.मे हाली मुकद्दमा-ए-शेर-ओ-शायरी लिखलन्हि जे हुनकर काव्य-संग्रहक भूमिका छल। ओहि समए धरि उर्दू गजलक विषय आ रूप दुनू मृतप्राय छल से हाली विषय-परिवर्तनक आह्वान तँ केबे कएलन्हि संगहि काफिया आ रदीफक सरल स्वरूपक ओकालति कएलन्हि। ओ लिखै छथि जे एकाधे टा शेर आइ-काल्हि नीक रहैए आ शेष गजल फारसीक शब्द सभसँ भरि देल गेल शेरक संकलन भऽ जाइए जाहिसँ ओकर स्तरहीनतापर लोकक ध्यान नञि जाए। से उर्दू गजल धार्मिक कट्टरतापर व्यंग्यक क्षेत्रमे फारसी गजलसँ आगाँ बढ़ि गेल।

संगीत आ गजल गायन
ठाठ कल्याणक अन्तर्गत राग यमनमे त्रिताल १६ मात्रा (दू पाँतिक अनुष्टुप् – ३२ अक्षर) क एतए प्रयोग भऽ सकैए। ठाठ बिलावलक अन्तर्गत राग बिलावल एकताल १२ मात्राक होइत अछि, एतए गायत्री-२४ अक्षरक गजलक प्रयोग भऽ सकैए। कारण वार्णिक गणनाक उपरान्त रेघा कऽ गायककेँ कम गाबए पड़तन्हि आ शब्द/ अक्षरक अकाल नहि बुझना जाएत।
ई मात्र उदाहरण अछि आ से गायकक लेल मैथिली गजल लिखनिहारक लेल नहि।
मैथिलीमे एखन धरि जे गजल लिखल गेल अछि ओहिमे बहरक एकरूपताक कोनो विचार नहि राखल गेल अछि। ने से बहर-विचार फारसी काव्यशास्त्रक हिसाबसँ राखल गेल छै आ ने भारतीय काव्यशास्त्रक हिसाबसँ। आ ताहि कारणसँ मैथिली गजल सभकेँ “गजल सन कविता” मात्र कहि सकै छिऐ। ओना बहरक एकरूपता गजलकार लोकनि द्वारा गजल लिखलाक बाद एक गजलपर आध घण्टा लगेला मात्रसँ कएल जा सकैए।


गजल
सहस्राब्दीक हारि हमर आ जीत ओकर, नै जातिवादीक सोझाँ होएब लरताङर
भेष बदलि जातिपंथी जीति रहल कवि, ऐलुष नै फेर हम हएब लरताङर

एहि भू मार्गक अछि तँ गप्पे विचित्र सन, प्रकाश आएल अछि भेल अन्हार निवृत्त
मयूरपंखी पनिसोखा उगल छै एखने, इन्द्रक मेघकेँ सोंखि करब लरताङर

बनि बाल बुद्धि हम पुछने आइ छलहुँ, ई सत्य अहिंसाक पथ ई विजयक पथ
जीतल जाइए असत्यक रथ हुनकर, टनकाएब नै फेर होएब लरताङर

रस्ता चलैत छलहुँ दिन राति सदिखन, से भेल जाइत छारन नव रस्ता बनल
छी देखि रहल रस्ताक केंचुली भरिगर, गऽ जाइत आगाँ नहि होएब लरताङर

अबैए ओ सत्यक क्षण कोन विपदा बनि, अछि आएल दौगल ओ सुनझाएल अछि
पोखरिक जाइठपर भेल ठाढ़ छी हम, छछड़बाएब घर नै हैब लरताङर

छनगा पीबि शिव देखि रहल चारूकात, विषहन्त ओ घूमि रहल बनल बसात
तांडव ई अहाँक बुद्धि कहैए से त्रिकटु, तगबाए तकरा नै होएब लरताङर

हे भाइ ऐरावत अछि आइ झूमि रहल, कदैमे करैत ओ कदमताल विकराल
चरखा कत्तिनक टकुआ काटब देखल, नहि कदरियाएब खोभब लरताङर





गजल
बरसातिक ई राति बनल सुखराति हे कालि
करब षोडशोपचार आर दए बलि हे कालि

बाल बसन्त भैया बढ़थु बहिनक अछि आस
आस्तीक करैत भैया लेल सुधियो नहि हे कालि

लाल झिंगुर, लाल सिन्दुर, लाल अड़हुल फूल
ताहूसँ लाल देखल ई दृश्य-देश मिथि हे कालि

स्वप्नक सोझाँ सत्यक नै अछि आब कोनो मोल
पोखड़ि झाँखड़ि सगरि घूमि ई देखलि हे कालि


अमुआ फड़ए लदा लदी डारि लीबि-लीबि जाए
ओकर नम्रतामे कोनो अगुताइ सुनलि हे कालि


ऐरावत गजल सन कविता देखू देलनि ई
मैथिलीक गरिमा एहिठाँ देखू सदति हे कालि


गजल

जाइत-जाइत देखल ओ ठाढ़ आर मेघडम्बर सन छाती
भैयाक पीठ धोबिया पाट हुनकर मेघडम्बर सन छाती

पड़ल फेर अकाल करैत हाक्रोस छथि ओ ठाढ़ भेल कात
छाती धकधक उन्नत्त ठाढ़ि दुआर मेघडम्बर सन छाती

देखल ई चित्कार हम भऽ सोझाँ ठाढ़ देबै ओकरा हुतकारी
संकट प्रहारमे धैर्य अपरम्पार मेघडम्बर सन छाती

देखल हुनका आइ छन्हि मुँह क्लान्त मुदा नहि कोनो बात
कर्तव्यक बिच कोनो विश्राम डगर मेघडम्बर सन छाती

सुनू सुनू भाइ गप भेल असम्हार करू पुकार समधानि
भेल मानवक ई हाल करू दुत्कार मेघडम्बर सन छाती

ऐरावत देखल घुरचालि बनल हथियार ओ लेने जाल
छी तैयो ठाढ़ की हम क्षितिजक पार मेघडम्बर सन छाती

(क्रमशः भाग-६ मे)

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