गजल मने प्रेम, प्रेम मने जीवन, जीवन मने अहाँ।

21.3.12

गजल@प्रभात राय भट्ट

गजल@प्रभात राय भट्ट



गजल:-
अहाँ विनु जिन्गी हमर बाँझ पडल अछि
सनेह केर पियासल काया जरल अछि


दूर रहितो प्रीतम अहाँ मोन पडैत छि
प्रीतम अहिं सं मोनक तार जुडल अछि


तडपैछि अहाँ विनु जेना जल विनु मीन
अहाँ विनु जिया हमर निरसल अछि


नेह लगा प्रीतम किया देलौं एहन दगा
मधुर मिलन लेल जिन्गी तरसल अछि


अहाँ विनु प्रीतम जीवन व्यर्थ लगैय
की अहाँक प्रेमक अर्थ नहीं बुझल अछि
..............वर्ण-१६...........
रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

20.3.12

गजल

प्रस्तुत अछि रूबी झाजिक एकटा गजल सरल वार्णिक बहर में

तरहत्थी दीप जरा हम ठारै छलौ,
अहाँक जोहैत रस्ता हम ठारै छलौँ ,

अहाँ आएब एहि बाटे फुईसे छलै ,
लेलौं किए हाथो पका हम ठारै छलौँ ,

कठोर अहाँ देखलौं नै आँखिक नोर ,
मुदा कानि आँखि फुला हम ठारै छलौँ ,

हमर दर्दक मोल नै जनलौ अहाँ ,
कनी बुझितहुँ व्यथा हम ठारै छलौँ ,

अहीं केर आशमें जँ मरब कहियो ,
नै आनब नामो कदा हम ठारै छलौँ ,

बेदर्दी अहाँ दर्द बुझब कि हमर,
मुदा व्यर्थ पिडा बता हम ठारै छलौँ|

-----------वर्ण -१४ ---------
रूबी झा

19.3.12

गजल

खतम सब काज भेल हमर ,
स्वतंत्र मिजाज भेल हमर ,
कतौ जिनगी छलै धधकै ,
खुशी पर राज भेल हमर ,
पुरान जँ गाछ , मज्जर नव ,
अपन त' अवाज भेल हमर ,
सरस पल भेल बड दिन पर ,
सदेह इलाज भेल हमर ,
सदिखन गजल लिखैत रहब ,
"अमित" नव साज भेल हमर . . . । ।
बहरे-वाफिर
{मुफाइलतुन /U-I-U-U-I 2 बेर सब पाँति मे}
अमित मिश्र

गजल

राति क' जानि नै किए नीन नै होइ यै ,
कतबो टाका मे श्वप्न किन नै होइ यै ,
जग फोँफ काटै हम करोट फेरै छी ,
दोसरो सँ मिठ सुख छीन नै होइ यै ,
अनंत अकास तरेगण पसरल ,
पुर्णिमा मे अमावश मलीन नै होइ यै ,
दर्दक दुहल देह दैबो नै देखै छै ,
देह दुखित , दाबत दिन नै होइ यै ,
प्रेयषी प्रेमक पता पलक पुछैए ,
पुनः पाबि पंक पथ नीन नै होइ यै ,
जिनगी जहल अपने लोक बनेलक ,
आब त' सुखल नोरो भीन नै होइ यै ,
कते कठिन छै किनब कतौ प्रेम ,
हमहुँ भिखमंगा , देख घीन नै होइ यै ,
प्रेम मे दर्द , नीनक मेल नै होइ छै ,
"अमित" दुनू कहियो तीन नै होइ यै . . . । ।
अमित मिश्र

18.3.12

गजल

प्रस्तुत अछि रूबी झाजिक एकटा गजल सरल वार्णिक बहर में

जग में बेटी के सम्मान भेटै कहियो
माई बापक अभिमान भेटै कहियो

माँ केर कोईख सँ लेलें दुनु जनम
मुदा अधिकार समान भेटै कहियो

भैर देश के आई सम्हारने छै बेटी
अपन समाजो में मान भेटै कहियो

पहुँच गेलै बेटी अंतरिक्ष अखन
वसुंधरा पर सम्मान भेटै कहियो

भेल चौपट मिथिला दहेज प्रथा सँ
दहेज़ बिनु वरदान भेटै कहियो

घुटि मरे "रूबी" पुरुखक समाज में
एको दिन नारी प्रधान भेटै कहियो

रुबी झा

गजल@प्रभात राय भट्ट

गजल@प्रभात राय भट्ट



गजल:-
वसंत ऋतू में आएल सगरो वसंत बहार
वनस्पतिक पराग गमकौने अनन्त संसार


हरियर पियर उज्जर पुष्प आर लाले लाल
पुष्पक राग केर उत्कर्ष अछि वसंत बहार


झूमी रहल कियो गाबी रहल नाचे कियो नाच
पलवित भेल प्रेम मोन में अनन्त उद्गार


सीतल सुन्दर सजल बहैय वसंत पवन
मनोरम प्रकृतिक दृश्य अछि वसंत बहार


मोर मयूरक नृत्य मधुवन कुह्कैय कोईली
मधुर मुस्कान सगरो आनंद अनन्त संसार


प्रेम मिलन मग्न प्रेमी पुष्पित वसंत बहार
मोन उपवन सुरभित भेल अनन्त संसार
.............वर्ण-१८.............
रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

17.3.12

गजल

प्रस्तुत अछि रूबी झाजिक एकटा गजल सरल वार्णिक बहर में

सगरो नगरी मे कतेक , शोर भs गेलए
हुनक रुपक इजोत सँ , भोर भs गेलए

यौबन केर रौद चम-चम चमकै एना
नहा इजोरिया, रसीक चकोर भs गेलए

केखनो गुदरी ज्यो फाटल, लेलैंह पहीर
देह हुनकर सजल , पटोर भsगेलए

अनुपम सुन्नैर लगैत जेना ओ अप्सरा
मेनका के रुप जेना कोनो ठार भsगेलए

वो लेलेन अन्गराई ,करेज बुढबो पिटे
छौरा देखैक लेल त हलखोर भsगेलए
--- -- -- -- -- - --वर्ण -१६ --- -- -- -- --
रुबी झा

16.3.12

गजल

कोन टोना केलकै जोगिया सदिखन करेजा हमर जरिते रहल ,
चोरि केने चैन होशो हमर सदिखन अनेरे उड़िते रहल ,
नै छलै डर एत' मरबाक आ नै मोन मे दर्द अंदेशा छलै ,
देख नवका एत' बहिते हवा से आब नेहक गजल मरिते रहल ,
भागि गेलै कोन नगरक गली मे आइ देखा क' सतरंगी सपन ,
बाट जोहैते भ' जेतै कखन की ,आँखि मे नोर बड भरिते रहल ,
उजरि गेलै जखन कोनो उपवनक कोनटा परक गाछक फूल यौ ,
तखन सबटा कोयलक मधुर बोली संग दर्दक हवा उड़िते रहल ,
आइ खोजै छी अपन ओहि जादूगर कए फेर खेला खेलबै ,
"अमित " केने आश नेहक , सदिखन भीतरे-भीतर जरिते रहल . . . । ।
bahre madid
faelatun-faelun
( I-U-I-I-I-U-I ) 3 BER
amit mishra

गजल

करेजक घर त' खोलू कने ,
कते छै प्रेम देखू कने ,
अहाँ हेबै सराबोर यौ ,
नगर मे आबि देखू कने ,
मजा एतेक छै एत' यौ ,
मना नै करब मानू कने ,
नयन के बाट धेने प्रथम
सिनेहक चार उतरू कने .
सिहकि रहलै हमर दिल सँ धुन ,
प्रितक सरगम त' गाबू कने ,
मनक अछि आश संगे मरब ,
सिनूरक मान राखू कने ,
गजल एगो अहाँ गाबि लिअ ,
"अमित" हाथो बढ़ाबू कने . . . । ।
मुजाइफ{U-I-I-I-U-I-I-U-I}
अमित मिश्र

गजल

प्रस्तुत अछि रूबी झाजिक एक गोट गजल सरल वार्णिक बहर में ----
गजल -
हे यै शोना,आँहाक रुप लगै सोना जेकाँ
गोर गालक तील कोनो जादु टोना जेकाँ

मेघ सन कारी केश गरदन शोभैय
जुट्टी एँचल आँहाक नागक फेना जेकाँ

चितवन चंचल जेहन कामी हिरनी
ताहु पर काजर मशीह भौं शोना जेकाँ

देह छर-हर गाछ कुसियारक जेना
रस पोरे-पोर चीनीक बसोना जेकाँ

आँहा चली बाट मोन होय बड्ड उचाट
गम गम गमकै छी फुलक दोना जेकाँ
-------------वर्ण -१५ ---------
रुबी झा

15.3.12

गजल

जखन राति आएल कारी ,पिया यौ अहाँ मोन पड़लौ ,
जखन होइ घर मोर खाली , पिया यौ अहाँ मोन पड़लौ ,
अहाँ दूर बैसल सताबैत छी साँझ-भोरे सदिखने ,
सनेसोँ जँ आएल देरी ,पिया यौ अहाँ मोन पड़लौ ,
बरसलै प्रथम बूँद वर्षा , मिलन यादि आबै तखन यौ ,
विरह केर तानल दुनाली ,पिया यौ अहाँ मोन पड़लौँ ,
पिया जी जखन बहल पवना ,मधुर गीत गाबैत कोयल ,
जखन काँट मे फसल साड़ी , पिया यौ अहाँ मोन पड़लौँ ,
जँ देखब कतौ छिपकली डर सँ बोली फुटै नै हमर यौ ,
जँ धड़कै हमर सून छाती , पिया यौ अहाँ मोन पड़लौँ ,
कने आबि नेहक जड़ल भाग फेरो सँ चमका दिऔ यौ ,
"अमित" आश देखैत रानी ,पिया यौ अहाँ मोन पड़लौ . . . । ।
बहरे -मुतकारिब
{ह्रस्व-दीर्ध-दीर्ध 6बेर सब पाँति मे }
अमित मिश्र

गजल

भेलै इ सरकार आन्हर ,
कानै इ देशो भ' असगर ,
कोना कहब आइ सोना ,
सगरो त' छै भेल गड़बड़ ,
सांसद बनल हाट माछक .
नाचै असल , बनि क' बानर ,
बनलै बजट , लूट मचलै ,
कारी टका ,बनल सागर ,
मरलै कते एत' कोना ,
के करत यौ खोज एकर ,
पोर्नो चलै राज त'र मे ,
लाजे "अमित" रचल आखर . . . । ।
{मुस्तफइलुन-फाइलातुन//I-I-U-I-I-U-I-I}
बहरे-मुजास
अमित मिश्र

गजल

आई काल्हि तँ राजनीतिक बाजार बहुत गर्म अछि
देखू नेता सभहँक हाल बनल बड्ड बेशर्म अछि

चानन टिका लगा कs ओ बनल बडका-बडका भक्त
नहि पुछू एहि संसार में केने कतेक कुकर्म अछि

जए अछि कर्मयोद्धा धीर बीर, ओ बजैत नहि अछि
चुप्प भs करैत सदिखन अपन-अपन कर्म अछि

भैय्यारी आ सद्भावना इ तँ सबसँ बड़का प्रेम अछि
जे लडाबए एक दोसर सँ ओ नहि कोनो धर्म अछि

हम छी मैथिल, आ नहि कोनो आन हमर धर्म अछि
सपनो में एकरा त्यागि,सबसँ बडका अधर्म अछि
- - - - - - - - -- - वर्ण-२० - - - - - - - -
***जगदानन्द झा 'मनु'

गजल

बहरे-जदीद मे एकटा गजल लिखबाक कोशीश केलौहुँ से अपने सबहक समक्ष प्रस्तुक क' रहल छी ।
चादरो फाटल सड़ल बड , उठबै कखन ,
बाढ़ि एलै भासलै घर , बनतै कखन ,
कोन , कोना ,नाह भेटत मजधार मे ,
राति दिनकर ,दिन क' चन्ना बूझै कखन ,
चोरि भेलै चैन आ चाहो के अमल ,
देह टूटै ,दोष अनका देबै कखन ,
डाँग लागै दैब के अधगेरे जखन ,
पानि मानव एक बूँदो माँगै कखन ,
बेचबै बेटा जँ जिनगी बचतै ,तखन ,
"अमित" कह ने पानि सगरो घटतै कखन . . . । ।
फाइलातुन-फाइलातुन-मुस्तफइलुन
{ I-U-I-I-I-U-I-I-I-I-U-I} एक बेर सब पाँति मे ।
अमित मिश्र

गजल

नेता आ गुन्डा के एकै बूझू ,
आगू आबू देखू जल्दी जागू ,
दौड़ा-दौड़ी केने लेने झोरी ,
लूटै टाका मागै वोटो देखू ,
कारी केने टाका गाँधी बाला ,
कूदै झूठे भ्रष्टाचारी ,सोचू ,
बोली खूंखार डेरेलै नेना ,
मारू लाठी हाथो-टाँगो तोड़ू ,
गाड़ी-घोड़ा भेलै खेलौना यौ ,
एतै हेतै जादू खेला झाड़ू ,
नेता नै भेलै गुन्डा ,मानू ने ,
गुन्डे भेजै छी , अन्हारे देखू . . . । ।
वार्णिक बहर
{10 टा दीर्घ सब पाँति मे }
अमित मिश्र

14.3.12

गजल


एखन राति कटै छी हम कनिते-कनिते,
एखन दिन बीतै  पहर गनिते-गनिते ।
लगै अछि ई जीवन अकारथ, अचानक,
बिसरलहु गामो शहर तकिते-तकिते ।
पहुँचलहु ने जानी कोना एहि चौबटिया,
बिसरलौ ठेकाना कखन चलिते-चलिते ।
कहाँ कऽ सकलियइ एकचारी हम ठाढ़ो,
बिकेलइ घरारी महल बन्हिते-बन्हिते ।
कही कोन कथा आओर सुनायब की पाँति,
शब्दहुँ  हेराओल  गजल पढ़िते - पढ़िते ।
नियति केर फेरा मे ओझरायल ''चंदन",
छिड़ियेलै सपना पलक मुनिते-मुनिते ।

गजल


जगरने मे राति बीतल,
छलै नोरे, राति शीतल ।
चाँदो कनलै, ओस झहरल,
लगै छै तइँ, भोर तीतल ।
कछमछाइत मोन प्राणो,
करे फेरी, राति बीतल ।
बुझय चाही, नियति से रण,
रहल छी हाइर कि जीतल ।
पुछय सभ, की भेल "चंदन"
कही कोना कि की बीतल ।


गजल


हरहोर भेलै, बड़ शोर भेलै,
सजलै बरात, मटकोर भैलै ।
मरबा सजलै, पिपही बजलै,
नटुआ केर नाच बेजोर भलै ।
जे भोग छेलइ, भरि पोख छेलै,
तीमन तरुआ, तिलकोर भेलै ।
हम बैसल छी, अनहरिये मे,
जे चान छेलइ, से चकोर भेलै ।
"चंदन" हिय हर्ष उफनइ छइ,
जौँ कूदल आँखि सँ नोर भेलै ।

गजल


हम बैसले छी अन्हारे,
छी हेलइत बिचहि धारे ।
तेजलक मीता-भजारो,
छोड़लक संग परिवारे ।
जाधरि छल धनक अम्बारे,
खुब भेतइत छल पियारे ।
आई असगरे परल छी,
एहि भरले, बिच-बजारे ।
नहि बचल कोनो अधारे,
"चंदन" कर्मक मारि खिहारे ।

13.3.12

गजल

नरहीया भुकैए हमर घराडी पर
बसलौं परदेश में हम खोबाडी पर

दूध-दही पान मखान सब छोरि एलौं
छी पेट पोसने तs दु-टुक सुपारी पर

जे किछ कमेलौं हाथ-पएर तोरि कय
साँझ परैत खर्च भेल छूछे तारी पर

बचेलौं बर्ख भरि पेट काति-काति कय
गमेलौं गाम जए-आबक सबारी पर

छोरु दोसरक आसा अपन बसाऊ यौ
घुरि आउ मनु सोनसन घराडी पर
***जगदानन्द झा 'मनु'