Wednesday, 9 December 2015

गजल

देखियौ टुक टुक ताकै छै काठक बनल लोक
मोनमे सब किछु राखै छै काठक बनल लोक
पाँजरक हड्डी झलकै छै चामक तरसँ आब
नै किछो तइयो बाजै छै काठक बनल लोक
अपन फाटल बेमायक दर्दसँ नै कराहैत
महल अनकर टा साजै छै काठक बनल लोक
आगि छातीमे ठंढ़ा पड़ि गेलै लहकि लहकि
फूसियों मुस्की मारै छै काठक बनल लोक
कर्ज नोरक नै ककरो लग बाकी रहत आब
"ओम" कखनो नै कानै छै काठक बनल लोक
2-1-2-2, 2-2-2-2, 2-2-1-2, 2-1 मात्रा क्रम प्रत्येक पाँतिमे।

1 comment:

  1. अपन फाटल बेमायक दर्दसँ नै कराहैत
    महल अनकर टा साजै छै काठक बनल लोक

    ई शेर जबरदस्त अछि। के कहैए जे साम्यवादी रचना खाली मुक्तेछंदमे संभव छै। हुनका सभकेँ ऐठाम देखबाक चाही

    ओना अपन, आ महल ऐ दू शब्दकेँ उच्चारणक हिसाबें 12 मानलासँ बेसी गति आबै छै। 21 मानलासँ गति रूकै छै।

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तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों