Sunday, 3 October 2010

गजल

गजल- कालीकांत झा "बूच"


स्वप्न सुन्दरि अहाॅ जीवनक सहचरी ।
निन्न मे आउ अहिना घड़ी दू घड़ी ।।


भोग भोगल जते जे बनल कल्पना,आब भऽ गेल अछि अन्तरक अनमना,

हऽम मानव अहाॅ देव लोकक परी ।




मात्र उत्तापदायी बसंती छटा,आब संतापदायी अषाढ़ी घटा,
काॅट लागनि सुखायल गुलाबी छड़ी ।




रूप अमरित पिया कऽ अमर जे केलहुॅ,विक्ख विरहक खोआ फेर की कऽ देलहुॅ ?

घऽर मे जिन्दगी गऽर मरनक कड़ी ।





वेर वेरूक अहॅक फेर अभयागतम्,अछि सदा सर्वदा हार्दिक स्वागतम्,
कप्प चाहक दुहू नैन मन तस्तरी ।

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तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों