Wednesday, 6 October 2010

गजल

प्रस्तुत अछि अरविन्द ठाकुरक गजल
साभार विदेह

जनहित के एहि बजट मे एखन वित्तीय-क्षति अनुमाने पर अछि

हमरा एना किऐ लगैछ जे संकट हमर प्राणे पर अछि

अयोध्या मे रामलला लेल किऐ पड़ल बूइयाँ के संकट

भू-अर्जन के अखिल भारतीय भार जखन हनुमाने पर अछि

सगर देश के सभ इनार मे बैमानी के भांग घोरायल

बनखांट मे बैमानी के जांच-भार बैमाने पर अछि

लूटि-कूटिकए, भीख मांगिकए पेट भरैए लोक, तखन

संविधान केँ आत्मघात सँ तोड़ैक दोष किसाने पर अछि

मार्क्स आर एंजेल्स केँ पीयल, घंटल लाल-किताब मुदा

मोनक कोनो अन्तर्तम मे बस भरोस भगवाने पर अछि

गजल कहैत “अरबिन” जेना हम परकाया-प्रवेश केलहुँ

ने निज के अछि बोध, ने अपन चित आ अकिल ठेकाने पर अछि



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तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों