Monday, 20 December 2010

गजल

कागतक नाह चलि रहल सुखाएल धार मे

घर छोड़ि घरमुड़िआ दैए लोक पूर्णिमाक अन्हार मे



नाङट लोक,नाङट समय, नाङट व्याख्या

राधा भेटतीह गली-गली कृष्ण हरेक छिनार मे



छद्म भेषें रहितहि त तेहन सन गप्प नहि

मोश्किल छैक फर्क केनाइ मननुख आ हुड़ार मे



किछुओ कहब बड्ड खतरनाक एहिठाम

एकौटा अपन लोक कहाँ एतेक अनचिन्हार मे

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तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों