गालपर तिलबा कते शान मारैए
निकलु नै बाहर सभक जान मारैए
देखलौं जतए अहीँपर नजरि सबहक
सभ तरे तर आँइखक बाण मारैए
तिर्थमे पंडित तँ मुल्ला मदीनामे
सभ अहीँकेँ राति दिन तान मारैए
आइ सुन्नरि मोहमे बूढ़ नव डूबल
देखिते मुँह फारि मुस्कान मारैए
काज कोनो नै बनेए जँ जीवनमे
‘मनु’ अहीँ लग फूल आ पान मारैए
(बहरे कलीब, मात्राक्रम - 2122-2122-1222, दोसर शेरक दोसर पाँतिमे “आँखि” केर उच्चारण “आँइख” जकाँ लेवक छूट लेल गेल अछि।)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
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