Friday, 19 December 2014

नवगछुलीक प्रांजल सरस रसाल: नव अंशु

नवगछुलीक प्रांजल सरस रसाल : नव अंशु




भावक स्पष्ट प्रवाहक बहन्ने साहित्यमे पद्य विधा अतुकांत रूपेँ पसरि रहल अछि ।पद्य विधाक विकास हेतु एकर अनिवार्यता भने देखऽमे आबय मुदा वर्तमान पद्य चिरकालिक आ कतिपय लोकप्रिय रहत, ई भविष्यक गर्तमे, मुदा प्रश्न-चिन्ह धरि अवश्य अछि ।

एहि परिपेक्ष्यमे मैथिली साहित्यमे किछु काँच वयसक गीत-गजलकारक प्रवेश भेल छन्हि जे लय, राग, गतिक संग साहित्य आड़िमे बान्हल छथि, ओहिमे 21 वर्षक गजलकार अमित मिश्रक नाओं महत्वपूर्ण अछि । ओना तँ साहित्यक सब सरल विधा यथा- गीत, गजल, कथा, लघुकथा, नाटक, एकांकी, कविता, बाल-साहित्य आदिमे हिनक लेखनी गत किछु वर्खसँ प्रवाहमय अछि मुदा हिनक लोकप्रियताक पहिलुक प्रस्तुति गजल संकलन "नव अंशु"सँ भेल ।नव अंशु मने नव किरण, मने नव भोर, मने नीक दिनक पहिल आभास, मने नव ऊर्जाक संपूर्ण संसारमे पहिल संचरण ।एहि पोथीक नाओंक पाछु गजलकारक एहने सन भाव रहल हेतनि ।

अनचिन्हार आखरसँ प्रेरित भऽ कऽ लिखल गेल एहि गजल, हजल आ रुबाइ संकलनमे प्रेमी-प्रेयसीसँ आगाँ बढ़ि कऽ जीवन आयामक बहुत रास अवस्थाकेँ विविध रूपेँ प्रदर्शन कएल गेल जे निश्चय द्रव्यमूलकसँ बेसी विचारमूलक  अछि । गजल लेखनक मौलिक सीमा एकर व्याकरणक संग-संग सरल वार्णिक बहरसँ लऽ कऽ अरबी बहरमे लिखल गेल गजल मानक आ पूर्ण मानल जाए । सबटा गजलमे शेर, रदीफ, काफिया, मकता आ मतलाकेँ सरस बनयबासँ बेसी बीजगणितीय आ अंकगणितीय बनाओल गेल जे जनप्रियतासँ ऊपर उठि कऽ एहि विधाक मैथिलीमे विकासक लेल उचित आ अनुकरणीय प्रयोग मानल जाए ।

व्याकरण गजलक मौलिक मानकतासँ बान्हल अछि , कुश ठामक काससँ उखाड़ल अछि  मुदा शब्द-शब्दक प्रवाह तँ शायरक स्वत: स्फूर्त प्रतिभाक प्रदर्शन अछि -

" चान देखलौं तँ सितारा की देखब
अन्हारक रूपकेँ दोबारा की देखब "

पहिल गजल सरल वार्णिक बहरमे छन्हि, मुदा मकताक प्रयोग नहि, ओना मकता गजलक कोनो अनिवार्य अंश सेहो नहि अछि ।

कतहु-कतहु गजलकार अपन वयसे जकाँ काँच लगैत छथि तँ कतहु-कतहुँ परिपक्व प्रेमी सन झंकारयुक्त उदवोधन हिनक नैसर्गित नहि तँ आशुत्व भरल दैहिक गुणक अनुलोम जकाँ लगैत अछि-

" जे किछु कहब हँसि क ऽ कहू
प्रेमक जालमे फँसि कऽ कहू

खसा दिअ आइ बिजुरी अहाँ
रूपक चानन घसि कऽ कहू "

लयात्मक गजलमे ई भाव आ बान्ह मैथिलीमे बहुत अल्प ठाम भेटल अछि ।एहि रूपेँ शायर अभिवादन आ धन्यवादक पात्र छथि मुदा व्याकरणकेँ क्रमवद्ध आ अनुशासित करबाक क्रममे कतहु-कतहु भाव झुझुआन सेहो भऽ गेल छन्हि जेना-

" बना लेब दुलहिन अपन
अमित कने खखसि कऽ कहू"

ई तँ मात्र एकटा उदाहरण परञ्च जौं सम्पूर्ण संकलनक मनोवाचन कएल जाए तँ एतबा धरि कहल जा सकैछ जे शायर गजल विधाक भविष्यक अपन जनमाषामे एकटा अंश धरि अवश्य छथि ।एहि संकलनक पश्चात बहुत रास परिपक्व आ अरबी बहरयुक्त गजल मैथिलीमे लिखने छथि जे अप्रकाशित छन्हि ।

अरबी बहरमे लिखल एकटा गजल विविध रूपक जीवनान्दकेँ सिनेहक आवरणसँ संघोरि कऽ कऽ प्रदर्शित कएल गेल जे अनुखन आ रोचक मानल जाए-

" गजल नै, नै गीत लिखलौं
जँ लिखलौं तँ प्रीत लिखलौं

बरसबै नै मेघ बनबै
ढहल आँगन भीत लिखलौं"

एकटा रुबाइ जे समर्पण आ प्रेमक अद्भुद छटा देखबैत अछि-

"अहाँ सन मीतसँ एतबे प्रीत चाही
जे नै बिसरि सकी एहन अतीत चाही
हारब हम मजा हमर आएत मुदा
सदिखन अहाँक सब मोड़पर जीत चाही "

संपूर्ण संग्रहकेँ देखलाक बाद एकटा बात अनसोहाँत लगैत अछि जे गजलकारक पूर्ण परिचय कतौ नै देल अछि, पोथीसँ गजलकारक बारेमे नामक अलावे और कोनो जानकारी नै भेटैत अछि जे प्रकाशनक कमी/गलती वा मुद्रणक कमी लगैत अछि ।

बहरे तबील, बहरे मुतकारिब, बहरे जदीद, बहरे मुजास, बहरे काफिर आदि बहरमे संजोगल संकलन आकर्षक छन्हि ।पाठक प्रभावित हेताह ई विश्वास कएल जा सकैछ मुदा जाहि सरल पाठककेँ आनंदक अनुभूति कम ओ एकरा घृत मानि सुआद लऽ सकैत अछि, किएक तँ मंचक लेल लिखल गेल चालू पद्यसँ ई ईतर एकटा साहित्यिक कृति अछि ।
एहिमे भावक संग संग व्याकरणक बान्ह बहुत दृढ़ अछि मुदा सब गजल गेय तेँ मंचक लेल सेहो अनुगामिनी आ प्रयुक्तक संग-संग उपयुक्त मानल जाए ।व्याकरणक ज्ञान छन्हि, भावक आत्मस्फूर्त प्रतिभा छन्हि आवश्यकता छन्हि तँ मात्र परिपक्व संयोजनक जे भविष्य निर्धारण करतनि आ ओहिपर विशेष ध्यान दैत अगिला संकलनकेँ प्रदर्शित करताह, एहि विश्वासक संग युवा प्रतिभाकेँ साधुवाद ।

पोथी- नव अंशु
विधा- गजल, हजल, रुबाइ
गजलकार- अमित मिश्र
प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन,  दिल्ली
संस्करण- 2012
दाम- 200 टाका

समीक्षक- शिव कुमार झा"टिल्लू"





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तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों