Saturday, 26 September 2015

विश्व गजलकार परिचय शृंखला-1


सौरभ पांडेय





जन्म-3    Dec.1963

जन्म स्थान- देवघर, झारखंड

पिता- श्री सुरेश चंद्र पांडेय
माता- श्रीमती कमला पांडेय

मूल निवास,द्वाबा, बलिया उत्तर प्रदेश

सौरभ जी मैथिली सहित भोजपुरी आ हिंदीक समान अधिकारी छथि। ई मूलतः भोजपुरी आ हिंदीमे गजल लिखै छथि। गजलक अलावे आन विधा (  मुख्यतः छंद)मे सेहो रचनारत छथि। ई पत्रिका ओपन बुक्स आन-लाइन डाट काम केर प्रबंधन समीति केर सदस्य छथि। विश्वगाथा नामक पत्रिकाक सलाहकार मंडल ओ परामर्शदात्री समूहक सदस्य सेहो छथि। हुनक एकटा कविता संग्रह - "इकड़ियाँ जेबी से" आ छंदक विवेचना शास्त्रक रूपमे "छंद मंजरी" पोथी प्रकाशित छनि।छंद मंजरीकेँ छंदक कार्यशाला कहल जाए तँ कोनो गलत नै।  ऐके अतिरिक्त "परो को खोलते हुए" ऐ पोथीक संपादक छथि।

बिहार राज्य विद्युत परिषद्सँ अपन पिताक अवकाश प्राप्त केलाक बाद सौरभजी करीब पचीस सालसँ इलाहाबादमे छथि आ वर्तमानमे भारत सरकारक विभिन्न योजनाक कार्यरूप देबए बला संस्थाक नेशनल हेड छथि।

ऐ श्रृंखलाक माध्यमसँ हुनक दू गोट गजल (एकटा भोजपुरी आ एकटा हिंदी) दऽ रहल छी---

भोजपुरी गजल

२१२२ १२१२ २२
साफ़ बोले में बा हिनाई का ?
काहें बूझीं पहाड़-राई का ?

चाँद-सूरज में दोस्ती कइसे ?
धंधा-पानी में ’भाई-भाई’ का ?

सब इहाँ जी रहल बा स्वारथ में
हमहुँ जीहीं त जग-हँसाई का ?

चाँद ह ऊ, भला सितारन के -
कवनो इहवाँ सभा बोलाई का ?

आजु साहित्य का मुनाफ़ा हऽ
गीत कइसन ? ग़ज़ल-रुबाई का ?

मुट्ठिये के पकड़ बतावे ले
फेर में ई बीया कलाई का ?

खुदकुशी के हुनर में माहिर हम
कामना का ? कहऽ बधाई का ?

खून मूँहे जे कवनो के लागल
एः के मालूम बा, दवाई का ?

हिन्दी गजल

दुआएँ अग़र अपनी फ़ितरत निभा दें
सुराही व पत्थर की सुहबत करा दें ॥

अभी तक दीवारों में जीता रहा है
उसे खिड़कियों की भी आदत लगा दें ॥

मिला जो उसी पे मुहब्बत लुटाए
चलो बावरे को तिज़ारत सिखा दें ॥

खुदाया गये दिन पलट के न आयें
न आएँ, न सोयी वो चाहत जगा दें ॥

नहीं ये कि बहती बग़ावत लहू में
मग़र जब भी चाहें हुक़ूमत गिरा दें ॥

नमो ब्रह्मऽविष्णु नमः हैं सदाशिव
सधी धड़कनों में अनाहत गुँजा दें ॥

रची थी कहानी कभी कृष्ण ने, वो -
निभाएँ, महज़ अब न भगवत करा दें ॥

हमारी कहानी व चर्चे हमारे
अभी तक हैं ज़िन्दा, बग़ावत करा दें ॥

बयाँ ना हुई अपनी चाहत तो क्या है |
चलो ज़िन्दग़ी को मुहब्बत बना दें ॥

रहा दिल सदा से ग़ुलाबोरुमानी |
हमें तितलियाँ क्यूँ न ज़हमत, अदा दें ॥


गुलिस्ताँ सजे यूँ कि ’सौरभ’ सहर हो |
कहो क्यारियों में वो उल्फ़त उगा दें ॥

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--सौरभ

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