साधु छै चोर ई मिल कहै चोर सभ
झूठकेँ सत्य एतय रटै चोर सभ
देखि उन्नति लगातार सगरो सभक
भीतरहि डाहमे जड़ि मरै चोर सभ
लूटि कय गाम आ देश जे गेल खा
मंच पर आबि नेता बनै चोर सभ
राति दिन खैट शोणित गरीबक बहै
आइ चैनसँ महलमे रहै चोर सभ
पाप कयने अपन एहि संसारमे
आब ‘मनु’ न्याय डंडसँ डरै चोर सभ
(बहरे मुतदारिक, मात्राक्रम : 212-212-212-212)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
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