छूलक जे मोनसँ ओ आखर कहि दिअ
आँखिसँ जे पीलौं ओ सागर कहि दिअ
निर्मोही दुनियामे सभ मतलबकेँ
धोखा जे देलक ओ पाथर कहि दिअ
मोनक कोठीमे छी जे दुख रखने
आजुक दिन ओ सभकेँ सादर कहि दिअ
नेहक रस छलकैए आँखिक रस्ता
प्रेमसँ भरि ओ सुंदर गागर कहि दिअ
प्रेमक आगिसँ जीया धड़कय लागल
कोमल मोनक ‘मनु’ ओ कातर कहि दिअ
(बहरे मीर, मात्राक्रम : 22-22-22-22-22)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
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