जीवनक मेटैत अन्हार बाबूजी
छथि हमर भाग्यक सगर द्वार बाबूजी
छोड़ि सुख काटैत ओ राति-दिन दुख छथि
प्रेम परिवारक तँ आधार बाबूजी
केहनो संकट अबै ठाढ़ सोझाँ ओ
छथि घरक अनमोल रखवार बाबूजी
आँखिमे आशीष लेने हियामे डर
छी अहीं बच्चाक संसार बाबूजी
हारि कखनो जीवनक खेल ‘मनु’ गेलै
सामने मुस्कैत पतवार बाबूजी
(बहरे कलीब, मात्राक्रम : 2122-2122-1222)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
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