किए तीर आँखिसँ अहाँकेँ चलैए
हँसी ई तँ घाएल हमरा करैए
मधुर बाजि पाजेब पैरक छमा-छम
हृदयमे हमर राति दिन ई बजैए
बसंतक हबामे हिलोरे खुजल लट
चकित लोक दाँतेसँ आँगुर कटैए
जखन ससरि जेए अहाँ केर आँचर
पकरिते करेजा कतेको मरैए
अहीँकेँ तँ मुँह देखि जीवैत ‘मनु’ अछि
भ जेए मिलन मोन सदिखन रहैए
(बहरे मुतकारिब, मात्राक्रम 122-122-122-122)
✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’
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