शुक्रवार, 26 मार्च 2010

मैथिली गजल शास्त्र- भाग-१

गजलक उत्पत्ति अरबी साहित्यसँ मानल जा सकैत अछि मुदा ओतए ई अरकान माने कोनो उत्तेजक घटनाक वर्णन विशेषक रूपमे छल। मुदा गजल जे एहि अरकान सभक समुच्चय अछि से फारसीक छी। फेर ओतएसँ गजल उर्दू-हिन्दी आ आब मैथिलीमे आएल अछि।
मायानन्द मिश्र मैथिली गजलकेँ गीतल कहलन्हि, मुदा हम एतए ओकरा गजले कहब आ अरबी फारसीक छन्द-शास्त्रक किछु शब्दावलीक प्रयोग करब। से मैथिली गजल शास्त्रक शब्दावली भेल अरूज ।
बहर: उन्नैस टा अरबी बहर होइत अछि। एतेक बहर मोन रखबाक आवश्यकता नहि। किएक तँ बहर माने थाट, राग-रागिनी। एहि उन्नैसटा अरबी बहरक बदला मैथिली लेल नीचाँमे भारतीय संगीत (स्रोत स्व. श्री रामाश्रय झा रामरंग) दऽ रहल छी। आ किएक तँ देवनागरी आ मिथिलाक्षरमे जे बाजल जाइत अछि सएह लिखल जाइत अछि (ह्रस्व इ सेहो मैथिलीमे अपवाद नहि अछि) से ह्रस्व आ दीर्घ स्वरकेँ गनबाक विधि मैथिलीमे भिन्न अछि, सेहो एतए देल जाएत। जाहि बहरमे शेरमे आठ (माने शेरक दुनू मिसरामे चारि-चारि) अरकान हुअए से भेल मसम्मन आ जाहि बहरमे शेरमे छह (माने शेरक दुनू मिसरामे तीन-तीन) अरकान हुअए से भेल मुसद्द्स । एतए मैथिलीमे विभक्ति सटा कऽ लिखबाक वैज्ञानिक आधार फेर सिद्ध होइत अछि कारण गजलमे जे विभक्ति हटाइयो कऽ लिखब तैयो अरकान गनबा काल तेना कऽ गानए पड़त जेना विभक्ति सटल हुअए, विभक्ति लेल अलगसँ गणना नहि भेटत।
जाहि बहरमे एक्केटा रुक्न हुअए से भेल मफरिद बहर आ जाहिमे एकटा सँ बेशी रुक्न हुअए (रुक्नक बहुवचन अराकान) से भेल मुरक्कब बहर।
दूटा अराकान पुनः आबए तँ ओकरा बहरे-शिकस्ता कहल जाएत।
मिसरा आ शेर: मैथिली गजलमे दू पाँतीक दोहा जे कोनो उत्तेजक घटनाक विशेष वर्णन करैत अछि तकरा मिसरा वा शेर कहै छी। दुनू पाँती एकट्ठे भेल शेर आ ओहि दुनू पाँतीकेँ असगरे मिसरा कहब। मतलाक दुनू मिसरामे एकरंग काफिया माने तुकबन्दी होएत।
ऊला आ सानी: शेरक पहिल मिसरा ऊला आ दोसर मिसरा सानी भेल। दू मिसरासँ मतला आ दू पाँतीसँ दोहा बनल।
अरकान (रुक्न) आ जिहाफ: आठ टा अरकान (एकवचन रुक्न) सँ उन्नैस टा बहर बहराइत अछि। से अरकान मूल राग अछि आ बहर भेल वर्णनात्मक राग। अरकानक छारन भेल जिहाफ । जेना वरेण्यम् सँ वरेणियम्।
तकतीअ: दू पाँतीक कोनो उत्तेजक घटनाक विशेष वर्णन करैत दोहा जे मिसरा वा शेर अछि आ कएक टा मिसरा वा शेर मिलि कऽ गजल बनैत अछि, तकर शल्य चिकित्सा लेल तकतीअ अछि। से मिसरा कोन राग-रागिनीमे अछि तकर तकतीअसँ बहर ज्ञात होइत अछि ।

मतला (आरम्भ) आ मकता (अन्त): गजलमे पहिल शेर मतला आ आखिरी शेर मकता भेल। मतलाक दुनू मिसरामे तुक एकरंग मुदा मकतामे कवि अपन नाम दै छथि। मकताक कखनो काल लोप रहत, एकरा सन्दर्भसँ बुझब थिक मुदा मतलाक रहब अनिवार्य।

काफिया आ रदीफ: तुकान्त काफिया आ ओकर बाद वा कफियायुक्त शब्दक पहिनेक शब्द/ शब्द समूहकेँ रदीफ कहैत छिऐ। काफिया युक्त शब्द बदलत मुदा रदीफ नञि बदलत। काफिया वर्ण वा मात्राक होइ छै आ रदीफ शब्द वा शब्द समूहक।
दूटा काफियाबला शेर जू काफिया कहल जाइत अछि।
एक दीर्घक बदला दूटा ह्रस्व सेहो देल जा सकैए।
जेना काफिया वर्ण आ मात्राक संग शब्दकेँ सेहो प्रयुक्त करैत अछि तेहिना रदीफ एकर विपरीत शब्द आ शब्दक समूहमे सन्निहित वर्ण आ मात्राकेँ सेहो प्रयुक्त करिते अछि। ऐ तरहेँ पहिल पाँतीमे जँ शब्द समूह रदीफ अछि तँ तँ दोसर पाँतीमे ओकर कोनो एक शब्द दोसर शब्दक अंंग भऽ सकैए आ ओइ काफिया युक्त शब्दमे रदीफक उपस्थिति रहि सकैए।

दूटा काफियाक बीचमे सेहो रदीफ रहि सकैए, रदीफ ऐ तरहेँ अनुपस्थितसँ लऽ कऽ एक शब्द, शब्दक समूह वा वाक्य भऽ सकैत अछि जे अपरिवर्तित रहत। मुदा काफिया युक्त शब्द गजलमे बदलैत रहत। मैथिली व्याकरणक दृष्टिसँ अपरिवर्तित मात्रा अपरिवर्तित अपूर्ण शब्दकेँ बिना रदीफक गजल कहि सकै छिऐ, कारण काफियाक मूल विशेषता छिऐ (अपरिवर्तित मात्रा वा अपरिवर्तित अपूर्ण शब्द) .. जँ शब्द वा शब्दक अपरिवर्तित समूह दृष्टिसँ देखी तँ एतए रदीफ अनुपस्थित अछि ...ओना रदीफ अनुपस्थित सेहो रहि सकैए, शास्त्रीय दृष्टिसँ कोनो दिक्कत नै अछि.. से प्रारम्भमे बिना रदीफक गजलक बदला "एक शब्द, शब्दक समूह वा वाक्य" जे अपरिवर्तित रहए, सएह रदीफक रूपमे प्रयुक्त करू।
मैथिली गजल शास्त्र :
पहिने कमसँ कम ३७कीबला कीबोर्ड लि
एहिमे १२-१२ टाक तीन भाग करू। १३ आ २५ संख्या बला की सा,आ सां दुनूक बोध करबैत अछि। सभमेँ पाँचटा कारी आ सातटा उज्जर कीअछि। प्रथम १२ मंद्र सप्तक, बादक १२ मध्य सप्तक आ, सभसँ दहिन १२ तार सप्तक कहबैछ। १ सँ ३६ धरि मार्करसँ लिखि लिय। १ आ तेरह सँ क्रमशः वाम आ दहिन हाथ चलत।

१२ गोट कीकेर सेटमे ५ टा कारी आ सात टा उज्जर कीअछि।
प्रथम अभ्यासमे मात्र उजरा कीकेर अभ्यास करू। पहिल सात टा उजरा कीसा, रे, , , , , नि, अछि आ आठम उजरा की तीव्र सं अछि जे अगूलका दोसर सेटक स अछि।
वाम हाथक अनामिकासँ स, माध्यमिका सँ रे, इंडेक्स फिंगर सँ ग ,बुढ़बा आँगुरसँ म , फेर बुढ़बा आँगुरक नीचाँसँ अनामिका आनू आ प, फेर माध्यमिकासँ ध, इंडेक्स फिंगरसँ नि, आ बुढ़बा आँगुरसँ सां। दहिन हाथसँ १२ केरसेट पर पहिलकीपर बुढ़बा आँगुरसँ स, इंडेक्स फिंगरसँ रे, माध्यमिकासँ ग, अनामिकासँ म, फेर अनामिकाक नीचाँसँ बुढ़बा आँगुरकेँ आनू आ तख बुध्बा आँगुरसँ प, इंडेक्स फिंगरसँ ध, माध्यमिकासँ नि आ अनामिकसँ सां। दुनू हाथसँ सां दोसर १२ केर सेटक पहिल उज्जर कीअछि। आरोहमे पहिल सेटक सां अछि तँ दोसर सेटक प्रथम की रहबाक कारण सा।
दोसर गप जे की बोर्डसँ जखन आवज निकलयतँ अपन कंठक आवाजसँ एकर मिलान करू। कनियो नीच-ऊँच नहि होय। तेसर गप जे संगीतक वर्ण अछि सा,रे,,,,,नि,सां एकरा देवनागरीक वर्ण बुझबाक गलती नहि करब। आरोह आ अवरोहमे कतेक नीच-ऊँच होय तकरे टा ई बोध करबैत अछि। जेना कोनो आन ध्वनि जेनाकि क केँ लिय आ, की बोर्ड पर निकलल सा,रे...केर ध्वनिक अनुसार क ध्वनिक आरोह आ अवरोह करू।
ई जे सातो स्वरक वर्णन पिछला अंकमे देल गेल छल ओकरासँ आगू आऊ। एहि सातू स्वरमे षडज आ पंचम मने सा आ प अचल अछि, एकर सस्वर पाठमे ऊपर नीचाँ होयबाक गुंजाइस नहि छैक। सा अछि आश्रय आकि विश्राम आ प अछि उल्लासक भाव। शेष जे पाँचटा स्वर अछि से सभटा चल अछि, मने ऊपर नीचाँक अर्थात् विकृतिक गुंजाइस अछि एहिमे। सा आ प मात्र शुद्ध होइत अछि। आ आब विकृति भसकैत अछि दू तरहेँ शुद्धसँ ऊपर स्वर जायत किंवा नीँचा। जदि ऊपर रहत स्वर तँ कहब ओकरा तीव्र आ नीचाँ रहत तँ कोमल कहायत। म कँ छोड़ि कय सभ अचल स्वरक विकृति होइत अछि नीचाँ, तखन बुझू जे रे, ,, निई चारि टा स्वरक दू टा रूप भेल कोमल आ शुद्ध। केर रूप सेहो दू तरहक अछि, शुद्ध आ तीव्र। रे दैत अछि उत्साह ग दैत अछि शांति म सँ होइत अछि भय ध सँ दुःख
आ नि सँ आदेश। शुद्ध स्वर तखन होइत अछि, जखन सातो स्वर अपन निश्चित स्थान पर रहैत अछि। एहि सातो पर कोनो चेन्ह नहि होइत अछि।
जखन शुद्ध स्वर अपन स्थानसँ नीचाँ रहैत अछि तँ कोमल कहल जाइत अछि, आ ई चारिटा होइत अछि एहिमे नीचाँ क्षैतिज चेन्ह देल जाइत अछि, यथा- रे॒, ग॒, ध॒, नि॒।

शुद्ध आ मध्यम स्वर जखन अपन स्थानसँ ऊपर जाइत अछि, तखन ई तीव्र स्वर कहाइत अछि, एहिमे ऊपर उर्ध्वाधर चेन्ह देल जाइत अछि। ई एकेटा अछि- म॑।
एवम प्रकारे सात टा शुद्ध यथा- सा,रे,, , , , नि, चारिटा शुद्ध यथा- रे॒,ग॒,ध॒,नि॒ आ एकटा तीव्र यथा म॑ सभ मिला कय १२ टा स्वर भेल।
एहिमे स्पष्ट अछि जे सा आ प अचल अछि, शेष चल किंवा विकृत।
आब फेर कीबोर्ड पर आऊ। ३७ टा की बला कीबोर्ड हम एहि हेतु कहने चालहुँ,किएक तँ १२, १२, १२ केर तीन सेट आ, अंतिम ३७म तीव्र सां केर हेतु।
सप्तक मे सातटा शुद्ध आ पाँचटा विकृत मिला कय १२ टा भेल!
वाम कातसँ १२ टा उजरा आ कारी की मंद्र सप्तक, बीच बला १२ टा की मध्य सप्तक आ, २५ सँ ३६ धरि की तार सप्तक कहल जाइत अछि।

आरोह- नीचाँ सँ ऊपर गेनाइ, जेना मंद्र सप्तकसँ मध्य सप्तक आ मध्य सप्तकसँ तार सप्तक।
मंद्र सप्तकमे नीचाँ बिन्दु, मध्य सप्तक सामान्य आ तार सप्तकमे ऊपर बिन्दु देल जाइत अछि, यथा-
स़, ,ग़,म़,प़,ध़,ऩ सा,रे,,,,,नी ‍ सां,रें,गं,मं,पं,धं,निं
अवरोह- तारसँ मध्य आ मध्यसँ मंद्र केँ अवरोह कहल जाइत अछि।

वादी स्वर- जाहि स्वरक सभसँ बेशी प्रयोग रागमे होइत अछि। समवादी स्वर- जकर प्रयोग वादीक बाद सभसँ बेशी होइत अछि। अनुवादी स्वर- वादी आ समवादी स्वरक बाद शेष स्वर। वर्ज्य स्वर- जाहि स्वरक प्रयोग कोनो विशेष रागमे नहि होइत अछि। पकड़- जाहि स्वरक समुदायसँ कोनो राग विशेषकेँ चिन्हैत छी।
गायन काल सेहो सभ राग-रागिनीक हेतु निश्चित रहैत अछि। १२ बजे दिनसँ १२ बजे राति धरि पूर्वांग आ १२ बजे रातिसँ १२ बजे दिन धरि उत्तरांग राग गाओल-बजाओल जाइत अछि।
पूर्वांग रागक वादी स्वर मे कोनो एक टा (सा, रे, , , प ) होइत अछि। उत्तरांगक वादी स्वरमे (म,,,नि,सा)मे सँ कोनो एक टा होइत अछि। सूर्योदय आ सूर्यास्तक समयमे गाओल ज्आय बला रागकेँ संधि प्रकाश राग कहल जाइत अछि।
रागक जाति
रागक आरोह आ अवरोहमे प्रयुक्त्त स्वरक संख्याक आधार पर रागक जातिक निर्धारण होइत अछि।
एकर प्रधान जाति तीन टा अछि। १. संपूर्ण (७) २.षाड़व(६) ३.औड़व(५) आ एहिमे सामान्य स्वर संख्या क्रमशः ७,,५ रहैत अछि।
आब एहि आधार पर तीनूकेँ फेँटू।
संपूर्ण-औरव की भेल? हँ पहिल रहत आरोही आ दोसर रहत अवरोही। कहू आब। (७,५) एहिमे सात आरोही स्वर संख्या आ ५ अवरोही स्वर संख्या अछि। संपूर्णक सामान्य स्वर संख्या ऊपर लिखल अछि(७) आ औड़वक (५) । तखन संपूर्ण-औड़व भेल(७,५)। अहिना ९ तरहक राग जाति होयत। १.संपूर्ण-संपूर्ण(७,७) २.संपूर्ण-षाड़व(७,६) ३.संपूर्ण-औड़व(७,५)
४. षाड़व-संपूर्ण- (६,७)
५. षाड़व- षाड़व - (६,६)
६. षाड़व -औड़व (६,५)
७.औड़व-संपूर्ण(५,७)
८.औड़व- षाड़व(५,६)
९. औड़व- औड़व(५,५)

थाट:
थाट- एकटा सप्तकमे सात शुद्ध, चारिटा कोमल आ एकटा तीव्र स्वर (१२ स्वर) होइत अछि। एहिमे सात स्वरक ओसमुदाय, जेकरासँ कोनो रागक उत्पत्ति होइत अछि, तकरा थाट वा मेल कहल जाइत अछि।
थाट रागक जनक अछि, थाटमे सात स्वर होइत छैक(संपूर्ण जाति)। थाटमे मात्र आरोही स्वर होइत अछि। थाटमे एकहि स्वरक शुद्ध आ विकृत स्वर संग-संग नहि रहैत अछि। विभिन्न रागक नाम पर थाट सभक नाम राखल गेल अछि। थाटक सातो टा स्वर क्रमानुसार होइत अछि आ एहिमे गेयता नहि होइत छैक।
थाटक १० टा अछि।
१.आसावरी-सा रे ग॒ म प ध॒ नि॒
२.कल्याण-सा रे ग म॑ प ध नि
३.काफी-सा रे ग॒ म प ध नि॒
४.खमाज-सा रे ग म प ध नि॒
५.पूर्वी-सा रे॒ ग म॑ प ध॒ नि ६.बिलावल-सा रे ग म प ध नि ७.भैरव-सा रे॒ ग म प ध॒ नि ८.भैरवी-सा रे॒ ग॒ म प ध॒ नि॒ ९.मारवा-सा रे॒ ग म॑ प ध नि १०.तोड़ी-सा रे॒ ग॒ म॑ प ध॒ नि

वर्ण:
वर्णसँ रागक रूप-भाव प्रगट कएल जाइत छैक। एकर चारिटा प्रकार छैक।
१.स्थायी-जखन एकटा स्वर बेर-बेर अबैत अछि।ओकर अवृत्ति होइत अछि।
२.अवरोही- ऊपरसँ नीचाँ होइत स्वर समूह, एकरा अवरोही वर्ण कहल जाइत अछि।
३.आरोही- नीचाँसँ ऊपर होइत स्वर समूह, एकरा आरोही वर्ण कहल जाइत अछि।
४.संचारी-जाहिमे ऊपरका तीनू रूप लयमे होय।

लक्षण गीत: रचना जाहिमे बादी, सम्बादी,जाति आ गायनक समय केर निर्देशक रागक लक्षण स्पष्ट भजाय।

स्थायी: कोनो गीतक पहिल भाग, जे सभ अन्तराक बाद दोहराओल जाइत अछि।
अन्तरा: जकरा एकहि बेर स्थायीक बाद गाओल जाइत अछि।
अलंकार/पलटा: स्वर समुदायक नियमबद्ध गायन/वादन भेल अलंकार।
आलाप: कोनो विशेष रागक अन्तर्गत प्रयुक्त्त भेल स्वर समुदायक विस्तारपूर्ण गायन/वादन भेल आलाप।
तान: रागमे प्रयुक्त्त भेल स्वरक त्वरित गायन/वादन भेल तान।
तानक गति द्रुत होइत अछि आऽ ई दोबर गतिसँ गायन/वादन कएल जाइत अछि।

आब आउ ताल पर। संगीतक गतिक अनूरूपेँ ई झपताल- १० मात्रा, त्रिताल- १६ मात्रा, एक ताल- १२ मात्रा, कह्रवा- ८ मात्रा दादरा- ६ मात्रा होइत अछि।
गीत, वाद्य आऽ नृत्यक लेल आवश्यक समय भेल काल आऽ जाहि निश्चित गतिक ई अनुसरण करैत अछि, से भेल लय।जखन लय त्वरित अछि तँ भेल द्रुत, जखन आस्ते-आस्ते अछि, तँ भेल विलम्बित आऽ नञि आस्ते अछि आऽ नञि द्रुत तँ भेल मध्य लय।
मात्रा ताल केर युनिट अछि आऽ एहिसँ लय केर नापल जाइत अछि।
तालमे मात्रा संयुक्त रूपसँ उपस्थित रहला उत्तर ओकरा विभाग कहल जाइत अछि- जेना दादरामे तीन मात्रा संयुक्त्त रहला उत्तर २ विभाग।
तालक विभागक नियमबद्ध विन्यास अछि छन्द।आऽ तालक प्रथम विभागक प्रथम मात्रा भेल सम आऽ एकर चेन्ह भेल + वा x आऽ जतय बिना तालीक तालकेँ बुझाओल जाइत अछि से भेल खाली आऽ एकर चेन्ह अछि ०.
ओऽ सम्पूर्ण रचना जाहिसँ तालक बोल इंगित होइत अछि, जेना मात्रा, विभाग,ताली, खाली ई सभटा भेल ठेका।
चेन्ह-
तालीक स्थान पर ताल चेन्ह आऽ संख्या।
सम + वा x
खाली ०
ऽ अवग्रह/बिकारी
- एक मात्राक दू टा बोल
- एक मात्राक चारिटा बोल
एक मात्राक दूटा बोलकेँ धागे आऽ चारि टा बोलकेँ धागेतिट सेहो कहल जाइत अछि।

तालक परिचय
ताल कहरबा
४ टा मात्रा, एकटा विभाग, आऽ पहिल मात्रा पर सम।
धागि
नाति
नक
धिन।

तीन ताल त्रिताल

१६ टा मात्रा, ४-४ मात्राक ४ टा विभाग। १,५ आऽ १३ पर ताली आऽ ९ म मात्रा पर खाली रहैत अछि।
धा धिं धिं धिं
धा धिं धिं धा
धा तिं तिं ता
ता धिं धिं धा
झपताल
१० मात्रा। ४ विभाग, जे क्रमसँ २,,,३ मात्राक होइत अछि।
१ मात्रा पर सम, ६ पर खली, ,८ पर ताली रहैत अछि।
धी ना
धी धी ना

ती ना
धी धी ना

ताल रूपक
७ मात्रा। ३,,२ मात्राक विभाग।
पहिल विभाग खाली, बादक दू टा भरल होइत अछि।
पहिल मात्रा पर सम आऽ खाली, चारिम आऽ छठम पर ताली होइत अछि।
धी धा त्रक
धी धी
धा त्रक

ह्रस्व-दीर्घ गणना
छन्द दू प्रकारक अछि।मात्रिक आ वार्णिक। वेदमे वार्णिक छन्द अछि।
वार्णिक छन्दक परिचय लिअ। एहिमे अक्षर गणना मात्र होइत अछि। हलंतयुक्त अक्षरकेँ नहि गानल जाइत अछि। एकार उकार इत्यादि युक्त अक्षरकेँ ओहिना एक गानल जाइत अछि जेना संयुक्ताक्षरकेँ। संगहि अ सँ ह केँ सेहो एक गानल जाइत अछि।द्विमानक कोनो अक्षर नहि होइछ।मुख्यतः तीनटा बिन्दु मोन राखू-
१. हलंतयुक्त्त अक्षर-० २. संयुक्त अक्षर-१ ३. अक्षर अ सँ ह -१ प्रत्येक।
आब पहिल उदाहरण देखू :-
ई अरदराक मेघ नहि मानत रहत बरसि के=१+५+२+२+३+३+३+१=२० मात्रा
आब दोसर उदाहरण देखू ; पश्चात्=२ मात्रा ; आब तेसर उदाहरण देखू
आब=२ मात्रा ; आब चारिम उदाहरण देखू स्क्रिप्ट=२ मात्रा

छन्दोबद्ध रचना पद्य कहबैत अछि-अन्यथा ओ गद्य थीक। छन्द माने भेल एहन रचना जे आनन्द प्रदान करए । मुदा एहिसँ ई नहि बुझबाक चाही जे आजुक नव कविता गद्य कोटिक अछि कारण वेदक सावित्री-गायत्री मंत्र सेहो शिथिल/ उदार नियमक कारण, सावित्री मंत्र गायत्री छंद, मे परिगणित होइत अछि तकर चरचा नीचाँ जा कए होएत - जेना यदि अक्षर पूरा नहि भेल तँ एक आकि दू अक्षर प्रत्येक पादकेँ बढ़ा लेल जाइत अछि। य आ व केर संयुक्ताक्षरकेँ क्रमशः इ आ उ लगा कए अलग कएल जाइत अछि। जेना- वरेण्यम्=वरेणियम्
स्वः= सुवः।
आजुक नव कविताक संग हाइकू/ क्षणिका/ हैकूक लेल मैथिली भाषा आ भारतीय, संस्कृत आश्रित लिपि व्यवस्था सर्वाधिक उपयुक्त्त अछि। तमिल छोड़ि शेष सभटा दक्षिण आ समस्त उत्तर-पश्चिमी आ पूर्वी भारतीय लिपि आ देवनागरी लिपि मे वैह स्वर आ कचटतप व्यञ्जन विधान अछि, जाहिमे जे लिखल जाइत अछि सैह बाजल जाइत अछि। मुदा देवनागरीमे ह्रस्व एकर अपवाद अछि, ई लिखल जाइत अछि पहिने, मुदा बाजल जाइत अछि बादमे। मुदा मैथिलीमे ई अपवाद सेहो नहि अछि- यथा 'अछि' ई बाजल जाइत अछि अ ह्र्स्व '' छ वा अ इ छ। दोसर उदाहरण लिअ- राति- रा इ त। तँ सिद्ध भेल जे हैकूक लेल मैथिली सर्वोत्तम भाषा अछि। एकटा आर उदाहरण लिअ। सन्धि संस्कृतक विशेषता अछि, मुदा की इंग्लिशमे संधि नहि अछि ? तँ ई की अछि - आइम गोइङ टूवार्ड्सदएन्ड। एकरा लिखल जाइत अछि- आइ एम गोइङ टूवार्ड्स द एन्ड। मुदा पाणिनि ध्वनि विज्ञानक आधार पर संधिक निअम बनओलन्हि, मुदा इंग्लिशमे लिखबा कालमे तँ संधिक पालन नहि होइत छै, आइ एम केँ ओना आइम फोनेटिकली लिखल जाइत अछि, मुदा बजबा काल एकर प्रयोग होइत अछि। मैथिलीमे सेहो यथासंभव विभक्त्ति शब्दसँ सटा कए लिखल आ बाजल जाइत अछि।

छन्द दू प्रकारक अछि।मात्रा छन्द आ वर्ण छन्द ।
वेदमे वर्णवृत्तक प्रयोग अछि मात्रिक छन्दक नहि ।
वार्णिक छन्दमे वर्ण/ अक्षरक गणना मात्र होइत अछि। हलंतयुक्त अक्षरकेँ नहि गानल जाइत अछि। एकार उकार इत्यादि युक्त अक्षरकेँ ओहिना एक गानल जाइत अछि जेना संयुक्ताक्षरकेँ। संगहि अ सँ ह केँ सेहो एक गानल जाइत अछि। एकसँ बेशी मान कोनो वर्ण/ अक्षरक नहि होइछ। मोटा-मोटी तीनटा बिन्दु मोन राखू-
१. हलंतयुक्त अक्षर-०
२. संयुक्त अक्षर-१
३. अक्षर अ सँ ह -१ प्रत्येक।
आब पहिल उदाहरण देखू-
ई अरदराक मेघ नहि मानत रहत बरसि के=१+५+२+२+३+३+१=१७
आब दोसर उदाहरण देखू

पश्चात्=२
आब तेसर उदाहरण देखू
आब=२
आब चारिम उदाहरण देखू
स्क्रिप्ट=२
मुख्य वैदिक छन्द सात अछि-
गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पङ्क्ति, त्रिष्टुप् आ जगती। शेष ओकर भेद अछि, अतिछन्द आ विच्छन्द। एतए छन्दकेँ अक्षरसँ चिन्हल जाइत अछि। जे अक्षर पूरा नहि भेल तँ एक आकि दू अक्षर प्रत्येक पादमे बढ़ा लेल जाइत अछि। य आ व केर संयुक्ताक्षरकेँ क्रमशः इ आ उ लगा कए अलग कएल जाइत अछि। जेना-
वरेण्यम्=वरेणियम्
स्वः= सुवः
गुण आ वृद्धिकेँ अलग कए सेहो अक्षर पूर कए सकैत छी।
ए = अ + इ
ओ = अ + उ
ऐ = अ/आ + ए
औ = अ/आ + ओ

छन्दः शास्त्रमे प्रयुक्त गुरुलघुछंदक परिचय प्राप्त करू।
तेरह टा स्वर वर्णमे अ,,,,लृ ई पाँच ह्र्स्व आर आ,,,,ए.ऐ,,, ई आठ दीर्घ स्वर अछि।
ई स्वर वर्ण जखन व्यंजन वर्णक संग जुड़ि जाइत अछि तँ ओकरासँ गुणिताक्षरबनैत अछि।
क्+अ= क,
क्+आ=का ।
एक स्वर मात्रा आकि एक गुणिताक्षरकेँ एक अक्षरकहल जाइत अछि। कोनो व्यंजन मात्रकेँ अक्षर नहि मानल जाइत अछि- जेना अवाक्शब्दमे दू टा अक्षर अछि, , वा ।

१. सभटा ह्रस्व स्वर आ ह्रस्व युक्त गुणिताक्षर लघुमानल जाइत अछि। एकरा ऊपर U लिखि एकर संकेत देल जाइत अछि।
२. सभटा दीर्घ स्वर आर दीर्घ स्वर युक्त गुणिताक्षर गुरुमानल जाइत अछि, आ एकर संकेत अछि, ऊपरमे एकटा छोट -।
३. अनुस्वार किंवा विसर्गयुक्त सभ अक्षर गुरू मानल जाइत अछि।
४. कोनो अक्षरक बाद संयुक्ताक्षर किंवा व्यंजन मात्र रहलासँ ओहि अक्षरकेँ गुरु मानल जाइत अछि। जेना- अच्, सत्य। एहिमे अ आ स दुनू गुरु अछि।
५. जेना वार्णिक छन्द/ वृत्त वेदमे व्यवहार कएल गेल अछि तहिना
स्वरक पूर्ण रूपसँ विचार सेहो ओहि युग सँ भेटैत अछि। स्थूल रीतिसँ ई विभक्त अछि:- १. उदात्त २. उदात्ततर ३. अनुदात्त ४. अनुदात्ततर ५. स्वरित ६. अनुदात्तानुरक्तस्वरित, ७. प्रचय (एकटा श्रुति-अनहत नाद जे बिना कोनो चीजक उत्पन्न होइत अछि, शेष सभटा अछि आहत नाद जे कोनो वस्तुसँ टकरओला पर उत्पन्न होइत अछि)।
१. उदात्त- जे अकारादि स्वर कण्ठादि स्थानमे ऊर्ध्व भागमे बाजल जाइत अछि। एकरा लेल कोनो चेन्ह नहि अछि। २. उदातात्तर- कण्ठादि अति ऊर्ध्व स्थानसँ बाजल जाइत अछि। ३. अनुदात्त- जे कण्ठादि स्थानमे अधोभागमे उच्चारित होइछ।नीचाँमे तीर्यक चेन्ह खचित कएल जाइछ। ४. अनुदातात्ततर- कण्ठादिसँ अत्यंत नीचाँ बाजल जाइत अछि। ५. स्वरित- जाहिमे अनुदात्त रहैत अछि किछु भाग, आ किछु रहैत अछि उदात्त। ऊपरमे ठाढ़ रेखा खेंचल जाइत अछि, एहिमे। ६. अनुदाक्तानुरक्तस्वरित- जाहिमे उदात्त, स्वरित किंवा दुनू बादमे होइछ, ई तीन प्रकारक होइछ। ७. प्रचय-स्वरितक बादक अनुदात्त रहलासँ अनाहत नाद प्रचयक,तानक उत्पत्ति होइत अछि।

१. पूर्वार्चिकमे क्रमसँ अग्नि, इन्द्र आ सोम पयमानकेँ संबोधित गीत अछि।तदुपरान्त आरण्यक काण्ड आ महानाम्नी आर्चिक अछि।आग्नेय, ऐन्द्र आ पायमान पर्वकेँ ग्रामगेयण आ पूर्वार्चिकक शेष भागकेँ आरण्यकगण सेहो कहल जाइछ। सम्मिलित रूपेँ एक प्रकृतिगण कहैत छी। २.उत्तरार्चिक: विकृति आ उत्तरगण सेहो कहैत छी। ग्रामगेयगण आ आरण्यकगणसँ मंत्र चुनि कय क्रमशः उहगण आ ऊह्यगण कहबैछ- तदन्तर प्रत्येक गण दशरात्र, संवत्सर, एकह, अहिन, प्रायश्चित आ क्षुद्र पर्वमे बाँटल जाइछ। पूर्वार्चिक मंत्रक लयकेँ स्मरण कउत्तरार्चिक केर द्विक, त्रिक, आ चतुष्टक आदि (२,, आ ४ मंत्रक समूह) मे एहि लय सभक प्रयोग होइछ। अधिकांश त्रिक आदि प्रथम मंत्र पूर्वार्चिक होइत अछि, जकर लय पर पूरा सूक्त (त्रिक आदि) गाओल जाइछ।
उत्तरार्चिक उहागण आ उह्यगण प्रत्येक लयकेँ तीन बेर तीन प्रकारेँ पढ़ैछ। वैदिक कर्मकाण्डमे प्रस्ताव, प्रस्तोतर द्वारा, उद्गीत उदगातर द्वारा, प्रतिघार प्रतिहातर द्वारा, उपद्रव पुनः उदगातृ द्वारा आ निधान तीनू द्वारा मिलि कय गाओल जाइछ। प्रस्तावक पहिने हिंकार (हिं,हुं,हं) तीनू द्वारा आ ॐ उदगातृ द्वारा उदगीतक पहिने गाओल जाइछ। ई पाँच भक्त्ति भेल।
हाथक मुद्रा- हाथक मुद्रा १.१.औँठा(प्रथम आँगुर)-एक यव दूरी पर २.२. औँठा प्रथम आँगुरकेँ छुबैत ३.३. औँठा बीच आँगुरकेँ छुबैत ४.४. औँठा चारिम आँगुरकेँ छुबैत ५.५. औँठा पाँचम आँगुरकेँ छुबैत ६.११. छठम क्रुष्ट औँठा प्रथम आँगुरसँ दू यव दूरी पर ७.६. सातम अतिश्वर सामवेद ८.७. अभिगीत ऋग्वेद

ग्रामगेयगान- ग्राम आ सार्वजनिक स्थल पर गाओल जाइत छल। आरण्यक गेयगान- वन आ पवित्र स्थानमे गाओल जाइत छल।
ऊहगान- सोमयाग एवं विशेष धार्मिक अवसर पर। पूर्वार्चिकसँ संबंधित ग्रामगेयगान एहि विधिसँ। ऊह्यगान आकि रहस्यगान- वन आ पवित्र स्थान पर गाओल जाइत अछि। पूर्वार्चिकक आरण्यक गानसँ संबंध। नारदीय शिक्षामे सामगानक संबंधमे निर्देश:- १.स्वर-७ ग्राम-३ मूर्छना-२१ तान-४९
सात टा स्वर सा,रे,,,,,नि, आ तीन टा ग्राम-मध्य,मन्द,तीव्र। ७*३=२१ मूर्छना। सात स्वरक परस्पर मिश्रण ७*७=४९ तान।
ऋगवेदक प्रत्येक मंत्र गौतमक २ सामगान (पर्कक) आ काश्यपक १ सामगान (पर्कक) कारण तीन मंत्रक बराबर भऽ जाइत अछि। मैकडॉवेल इन्द्राग्नि, मित्रावरुणौ, इन्द्राविष्णु, अग्निषोमौ एहि सभकेँ युगलदेवता मानलन्हि अछि। मुदा युगलदेव अछि विशेषण-विपर्यय।
वेदपाठ-
१. संहिता पाठ अछि शुद्ध रूपमे पाठ।
अ॒ग्निमी॑ळे पुरोहि॑त य॒घ्यस्य॑दे॒वम्त्विज॑म।होतार॑रत्न॒ धातमम्।
२. पद पाठ- एहिमे प्रत्येक पदकें पृथक कए पढ़ल जाइत अछि।
३. क्रमपाठ- एतय एकक बाद दोसर, फेर दोसर तखन तेसर, फेर तेसर तखन चतुर्थ। एना कए पाठ कएल जाइत अछि।
४. जटापाठ- एहिमे ज्योँ तीन टा पद क, , आ ग अछि तखन पढ़बाक क्रम एहि रूपमे होएत। कख, खक, कख, खग, गख, खग। ५. घनपाठ-एहि मे ऊपरका उदाहरणक अनुसार निम्न रूप होयत- कख,खक,कखग,गखक,कखग। ६. माला, ७. शिखा, ८. रेखा, ९. ध्वज, १०. दण्ड, ११. रथ। अंतिम आठकेँ अष्टविकृति कहल जाइत अछि।
साम विकार सेहो ६ टा अछि, जे गानकेँ ध्यानमे रखैत घटाओल, बढ़ाओल जा सकैत अछि। १. विकार-अग्नेकेँ ओग्नाय। २. विश्लेषण- शब्द/पदकेँ तोड़नाइ ३. विकर्षण-स्वरकेँ खिंचनाई/अधिक मात्राक बड़ाबर बजेनाइ। ४. अभ्यास- बेर-बेर बजनाइ।५. विराम- शब्दकेँ तोड़ि कय पदक मध्यमे यति। ६. स्तोभ-आलाप योग्य पदकेँ जोड़ि लेब। कौथुमीय शाखा हाउ’ ‘राइजोड़ैत छथि। राणानीय शाखा हावु’, ‘रायिजोड़ैत छथि।
मात्रिक छन्दक प्रयोग वेदमे नहि अछि वरन् वर्णवृत्तक प्रयोग अछि आ गणना पाद वा चरणक अनुसार होइत रहए। मुख्य छन्द गायत्री, एकर प्रयोग वेदमे सभसँ बेशी अछि। तकर बाद त्रिष्टुप आ जगतीक प्रयोग अछि।
१. गायत्री- ८-८ केर तीन पाद। दोसर पादक बाद विराम। वा एक पदमे छह टा अक्षर।
२. त्रिष्टुप- ११-११ केर ४ पाद।
३. जगती- १२-१२ केर ४ पाद।
४. उष्णिक- ८-८ केर दू तकर बाद १२ वर्ण-संख्याक पाद।
५. अनुष्टुप- ८-८ केर चारि पाद। एकर प्रयोग वेदक अपेक्षा संस्कृत साहित्यमे बेशी अछि।
६. बृहती- ८-८ केर दू आ तकरा बाद १२ आ ८ मात्राक दू पाद।
७. पंक्त्ति- ८-८ केर पाँच। प्रथम दू पदक बाद विराम अबैछ।
यदि अक्षर पूरा नहि होइत अछि, तँ एक वा दू अक्षर निम्न प्रकारेँ घटा-बढ़ा लेल जाइत अछि।
(अ) वरेण्यम् केँ वरेणियम् स्वः केँ सुवः।
(आ) गुण आ वृद्धि सन्धिकेँ अलग कए लेल जाइत अछि।
ए= अ + इ
ओ= अ + उ
ऐ= अ/आ + ए
औ= अ/आ + ओ
अहू प्रकारेँ नहि पुरलापर अन्य विराडादि नामसँ एकर नामकरण होइत अछि।
यथा- गायत्री (२४)- विराट् (२२), निचृत् (२३), शुद्धा (२४), भुरिक् (२५), स्वराट्(२६)।
ॐ भूर्भुवस्वः । तत् सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ।
वैदिक ऋषि स्वयंकेँ आ देवताकेँ सेहो कवि कहैत छथि। सम्पूर्ण वैदिक साहित्य एहि कवि चेतनाक वाङ्मय मूर्त्ति अछि। ओतए आध्यात्म चेतना, अधिदैवत्वमे उत्तीर्ण भेल अछि, एवम् ओकरा आधिभौतिक भाषामे रूप देल गेल अछि।
देवनागरीक अतिरिक्त्त समस्त उत्तरभारतीय भाषा नेपाल आ दक्षिणमे (तमिलकेँ छोड़ि) सभ भाषा वर्णमालाक रूपमे स्वर आ कचटतप आ य, र ल व, , , ह केर वर्णमालाक उपयोग करैत अछि। ग्वाङ केर हेतु संस्कृतमे दोसर वर्ण छैक (छान्दोग्य परम्परामे एकर उच्चारण नहि होइत अछि छथि मुदा वाजसनेयी परम्परामे खूब होइत अछि- जेना छान्दोग्य उच्हारण सभूमि तँ वाजसनेयी उच्चारण सभूमीग्वंङ), ई ह्रस्व दीर्घ दुनू होइत अछि। सिद्धिरस्तु लेल सेहो कमसँ कम छह प्रकारक वर्ण मिथिलाक्षरमे प्रयुक्त होइत अछि। वैदिक संस्कृतमे उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित (क्रमशः क॑ क॒ क॓) उपयोग तँ मराठीमे ळ आ अर्द्ध ऱ् केर सेहो प्रयोग होइत अछि। मैथिलीमे ऽ (बिकारी वा अवग्रह) केर प्रयोग संस्कृत जकाँ होइत अछि आ आइ काल्हि एकर बदलामे टाइपक सुविधानुसारे द’ (दऽ केर बदलामे) एहन प्रयोग सेहो होइत अछि मुदा ई प्रयोग ओहि फॉंटमे एकटा तकनीकी न्यूनताक परिचायक अछि। मुदा आकार केर बाद बिकारीक आवश्यकता नहि अछि।
जेना फारसीमे अलिफ बे से आ रोमनमे ए बी सी होइत अछि तहिना मोटा-मोटी सभ भारतीय भाषामे लिपिक भिन्नताक अछैत वर्णमालाक स्वरूप एके रङ अछि।
वर्णमालामे दू प्रकारक वर्ण अछि- स्वर आ व्यंजन। वर्णक संख्या अछि ६४ जाहिमे २२ टा स्वर आ ४२ टा व्यञ्जन अछि।
पहिने स्वरक वर्णन दैत छी- जाहि वर्णक उच्चारणमे दोसर वर्णक उच्चारणक अपेक्षा नहि रहैत अछि, से भेल स्वर।
स्वरक तीन टा भेद अछि- ह्रस्व, दीर्घ आ प्लुत। जाहिमे बाजयमे एक मात्राक समय लागय से भेल ह्रस्व, जाहिमे दू मात्रा समय लागल से भेल दीर्घ आ जाहिमे तीन मात्राक समय लागल से भेल प्लुत।

मूलभूत स्वर अछि- अ इ उ ऋ लृ
पाणिनिसँ पूर्वक आचार्य एकरा समानाक्षर कहैत छलाह।
दीर्घ मिश्र स्वर अछि- ए ऐ ओ औ
पाणिनिसँ पूर्वक आचार्य एकरा सन्ध्यक्षर कहैत छलाह।
लृ दीर्घ नहि होइत अछि आ सन्ध्यक्षर ह्रस्व नहि होइत अछि।
अ इ उ ऋ एहि सभक ह्रस्व, दीर्घ (आ ई ऊ ॠ) आ प्लुत (आ३ ई३ ऊ३ ॠ३) सभ मिला कए १२ वर्ण भेल। लृ केर ह्रस्व आ प्लुत दू भेद अछि (लॄ३) तँ २ टा ई भेल। ए ऐ ओ औ ई चारू दीर्घ मिश्रित स्वर अछि आ एहि चारूक प्लुत रूप सेहो (ए३ ऐ३ ओ३ औ३) होइत अछि, तँ ८ टा ई सेहो भेल। भऽ गेल सभटा मिला कए २२ टा स्वर।

एहि सभटा २२ स्वरक वैदिक रूप तीन तरहक होइत अछि, उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित।
ऊँच भाग जेना तालुसँ उत्पन्न अकारादि वर्ण उदात्त गुणक होइत अछि आ तेँ उदात्त कहल जाइत अछि।
नीचाँ भागसँ उत्पन्न स्वर अनुदात्त आ जाहि अकारादि स्वरक प्रथम भागक उच्चारण उदात्त आ दोसर भागक उच्चारण अनुदात्त रूपेँ होइत अछि से भेल स्वरित।
स्वरक दू प्रकार आर अछि, सानुनासिक जेना अँ आ निरनुनासिक जेना अ।
दत्तेन निर्वृत्तः कूपो दात्तः। दत्त नाम्ना पुरुष द्वारा विपाट्- ब्यास धारक उतरबरिया तट पर बनबाओल, एतए इनार भेल दात्त। अञ प्रत्यान्त भेलासँ दात्तआद्युदात्त भेल, अण् प्रत्यायान्त होइत तँ प्रत्यय स्वरसँ अन्तोदात्त होइत। रूपमे भेद नहि भेलो पर स्वरमे भेद अछि। एहिसँ सिद्ध भेल जे सामान्य कृषक वर्ग सेहो शब्दक सस्वर उच्चारण करैत छलाह।
स्वरितकेँ दोसरो रूपमे बुझि सकैत छी- जेना एहिमे अन्तिम स्वरक तीव्रस्वरमे पुनरुच्चारण होइत अछि।
आब व्यञ्जन पर आऊ।
व्यञ्जन ४२ टा अछि।
क् ख् ग् घ् ङ्
च् छ् ज् झ् ञ्
ट् ठ् ड् ढ् ण्
त् थ् द् ध् न्
प् फ् ब् भ् म्
य् र् ल् व्
श् ष् स्
ह्
य् व् ल् सानुनासिक सेहो होइत अछि, यँ वँ लँ आ निरुनासिक सेहो।
एकर अतिरिक्त्त दू टा आर व्यञ्जन अछि- अनुस्वार आ विसर्जनीय वा विसर्ग।
ई दुनूटा स्वरक अनन्तर प्रयुक्त्त होइत अछि।
विसर्जनीय मूल वर्ण नहि अछि, वरन् स् वा र् केर विकार थीक। विसर्जनीय किछु ध्वनि भेद आ किछु रूपभेदसँ दू प्रकारक अछि- जिह्वामूलीय आ उपध्मानीय। जिह्वामूलीय मात्र क आ ख सँ पूर्व प्रयुक्त्त होइत अछि, दोसर मात्र प आ फ सँ पूर्व।
अनुस्वार, विसर्जनीय, जिह्वामूलीय आ उपध्मानीयकेँ अयोगवाह कहल जाइत अछि।
उपरोक्त्त वर्ण सभकेँ छोड़ि ४ टा आर वर्ण अछि, जकरा यम कहल गेल अछि।
कुँ खुँ गुँ घुँ (यथा- पलिक् क्नी, चख ख्न्नुतः, अग् ग्निः, घ् घ्नन्ति)
पञ्चम वर्ण आगाँ रहला पर पूर्व वर्ण सदृश जे वर्ण बीचमे उच्चारित होइत अछि से यम भेल।
यम सेहो अयोगवाह होइत अछि।
अ आ कवर्ग ह (असंयुक्त्त) आ विसर्जनीय केर उच्चारण कण्ठमे होइत अछि।
इ ई चवर्ग य श केर उच्चारण तालुमे होइत अछि।
ऋ ॠ टवर्ग र ष केर उच्चारण मूर्धामे होइत अछि।
लृ तवर्ग ल स केर उच्चारण दाँतसँ होइत अछि।
उ ऊ पवर्ग आ उपध्मानीय केर उच्चारण ओष्ठसँ होइत अछि।
व केर उच्चारण उपरका दाँतसँ अधर ओष्ठ केर सहायतासँ होइत अछि।
ए ऐ केर उच्चारण कण्ठ आ तालुसँ होइत अछि।
ओ औ केर उच्चारण कण्ठ आ ओष्ठसँ होइत अछि।
य र ल व अन्य व्यञ्जन जेकाँ उच्चारणमे जिह्वाक अग्रादि भाग ताल्वादि स्थानकेँ पूर्णतया स्पर्श नहि करैत अछि। श् ष् स् ह् जकाँ एहिमे तालु आदि स्थानसँ घर्षण सेहो नहि होइत अछि।
क सँ म धरि स्पर्श (वा स्फोटक कारण जिह्वाक अग्र द्वारा वायु प्रवाह रोकि कए छोड़ल जाइत अछि) वर्ण र सँ व अन्तःस्थ आ ष सँ ह घर्षक वर्ण भेल।
सभ वर्गक पाँचम वर्ण अनुनासिक कहबैत अछि कारण आन स्थान समान रहितो एकर सभक नासिकामे सेहो उच्चारण होइत अछि- उच्चारणमे वायु नासिका आ मुँह बाटे बहार होइत अछि।
अनुस्वार आ यम केर उच्चारण मात्र नासिकामे होइत अछि- आ ई सभ नासिक्य कहबैत अछि- कारण एहि सभमे मुखद्वार बन्द रहैत अछि आ नासिकासँ वायु बहार होइत अछि। अनुस्वारक स्थान पर न् वा म् केर उच्चारण नहि होयबाक चाही।
जखन हमरा सभकेँ गप करबाक इच्छा होइत अछि, तखन संकल्पसँ जठराग्नि प्रेरित होइत अछि। नाभि लगक वायु वेगसँ उठैत मूर्धा धरि पहुँचि, जिह्वाक अग्रादि भाग द्वारा निरोध भेलाक अनन्तर मुखक तालु आदि भागसँ घर्षित होइत अछि आ तखन वर्णक उत्पत्ति होइत अछि। कम्पन भेलासँ वायु नादवान आ यैह गूँजित होइत पहुँचैत अछि मुँहमे आ ओकरा कहल जाइत अछि घोषवान, नादरहित भए पहुँचैत अछि श्वासमे आ ओकरा कहल जाइत अछि अघोषवान्।
श्वास प्रकृतिक वर्ण भेल अघोष” , आ नाद प्रकृतिक भेल घोषवान्। जाहि वर्णक उत्पत्तिमे प्राणवायुक अल्पता होइत अछि से अछि अल्पप्राणआ जकर उत्पत्तिमे प्राणवायुक बहुलता होइत अछि, से भेल महाप्राण
कचटतप केर पहिल, तेसर आ पाँचम वर्ण भेल अल्पप्राण आ दोसर आ चारिम वर्ण भेल महाप्राण। संगहि कचटतप केर पहिल आ दोसर भेल अघोष आ तेसर, चारिम आ पाँचम भेल घोषवान्। य र ल व भेल अल्पप्राण घोष। श ष स भेल महाप्राण अघोष आ ह भेल महाप्राण घोष।स्वर होइछ अल्पप्राण, उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित।

तँ आब लीखू मैथिली गजल। कविता, अकविता, गद्य-कविता, पद्य सभ लेल तर्क उपलब्ध अछि। से मैथिली गजल सेहो अनिवार्य रूपमे बहर(छन्द)मे सरल-वार्णिक, वार्णिक आ मात्रिक छन्दमे कहल जएबाक चाही। जेना सोरठा, चौपाइ छै तहिना गजल छै..उर्दूमे ऐ तरहक प्रयास भेलै..आजाद गजलक नामसँ..), कहबाक आवश्यकता नै जे ओ पूर्ण रूपेँ फ्लॉप भऽ गेलै..५३९ ई.सँ अरबीमे बहर युक्त गजल आइ धरि लिखल जा रहल छै, फारसी आ उर्दूमे सेहो बिना बहरक गजल नै होइ छै..गजलमे भगवान धरिक मजाक उड़ाओल जाइत छै, ओइ अर्थमे ओ उदार छै मुदा बहरक मामिलामे ओ बड्ड कट्टर छै, आ ई कट्टरता ने अरबीमे गजलकेँखम केलकै आ ने उर्दूफारसीमे, मात्रा मिलान आ सहज प्रवाह गजलमे एकटा रीतियेँ होइ छै, आ से ओकर विशेषता छिऐ, नै तँ फेर ई नज्म भऽ जेतै..

बुधवार, 24 मार्च 2010

गजल

(मैथिलीक प्रख्यात गायक हेमकान्तक पछिला सप्ताह निधन भ' गेलनि। फरबरी '१० मे दरभंगा रेडियोक महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम 'मैथिली सुगम संगीत'क शुभारंभ हमर रचित आ हेमकान्तक गाओल एही गजल सं भेल छल।एहि गजल कें दोसरो-दोसरो गायक गेने छथि मुदा हेमकान्तक गायन मे जे रवानगी,जे फीलिंग छलनि से दुर्लभ अछि।ई गायन हुनक जीवनक अन्तिम गायन छलनि।से,ई पोस्ट करैत काल ओ बहुत मोन पडि रहल छथि।हुनका प्रति विनम्र श्रद्धांजलि।)

सूतल जागल सोह अहीं के आबैए
ए रुनझुन, ई देह कते भरमाबैए

ठहरल जल छी ठंडा-ठंडा, इतमिनान छी
गरम हवा ई हलचल कोना मचाबैए

लचक अहां के पत्ता-पत्ता कसक फूल के
अइ बगिया के माली मोहि बताबैए

जे कहबै से कहबै लेकिन एखन ने मानब
एखन प्रीत मनुहार हार बरसाबैए

जै मुस्की सं अहां करै छी अल्लो-मल्लो
सै मुस्की ई देखियौ रौद उगाबैए

ठाढ रहै छी एक पएर सं एक चलै छी
केहन अजूबा काज प्रेम करबाबैए

शनिवार, 20 मार्च 2010

गजल


करेजक पौती की थिक बुझलँहु हम आब
मोनक मरौसी की थिक बुझलँहु हम आब


सगर नगर भमि अएलहुँ
घरक चौकी की थिक बुझलहुँ हम आब


भेलहुँ नाङट जखन सभहँक नजरि मे
फाटल तौनी की थिक बुझलहुँ हम आब


ने ढ़ाकी उठैए ने पथिया सम्हरैए
टूटल मौनी की थिक बुझलहुँ हम आब

गुरुवार, 18 मार्च 2010

गजल

ओ मनुक्ख जे टुकडी-टुकडी भेल पडल अछि
अहां चैन सं रही ओ तकरे लेल मरल अछि

जे दीपक हो जडइत चहुंदिस तम कें चिरइत
तकरे दम पर आन दीप मे ज्योति बरल अछि

नेता कें नहि देखियौ नेता कें की देखबै
जत्तहि टेबबै तहीठाम ई जन्तु सडल अछि

लोकतंत्र अछि संविधान अछि न्यायालय अछि
बाहर बाहर ठोस आ भीतर कते तरल अछि

भूमंडल के दौड मे शामिल अहां भोग ले'
मुदा ने जानी विभव-गाछ फल कोन फडल अछि

हिन्दुत्वक मादे सोचलहुं तं ख्याल उठल
ऐंठी बचले अछि एखनहु बस डोर जडल अछि

शुक्रवार, 12 मार्च 2010

गजल

प्रेम जगत के पाया छीबांकी सब किछु माया छी
किए अहां विश्वास करै छीजे छी से ई काया छी
टाका छी जं खर्च करी - तंरुकल तं प्रेतक साया छी
जीवन छी- दोसर ले जीयबजं से नहि तं छाया छी
प्रेम जगत के पाया छी बांकी सब किछु माया छी

गजल

पूरबे आ पश्चिमे सँ अएलै एहन फसादी रे जान
रे जान लगलै बड़का पसाही रे जान


ओ जे मोटेलै बलू कोना मोटेलै रे जान
रे जान खेने हेतै सभटा धन सरकारी रे जान


दोसर के काजो करैए उपर सँ लातो खाइए
एहने होइए बुड़िबक बड़ा बिहारी रे जान


पघिलैए जे लाहक जेना जमैए मोमक जेना
रे जान कहबै ओहए बड़ा सुतारी रे जान

सोमवार, 1 मार्च 2010

गजल

रचना कतेक टका लगतै सपना किनबाक लेल
जूटल घर सरदर अँगना किनबाक लेल


हम मुक्त छी राग-विराग प्रेम-घृणा सँ
रचना कतेक टका लगतै भावना किनबाक लेल


सत्त मानू हम काज करै छी लोकतंत्रक पद्धतिए
रचना कतेक टका लगतै पटना किनबाक लेल


पत्रकारिता गुलाम छैक टी.आर.पीक
रचना कतेक टका लगतै घटना किनबाक लेल

रविवार, 17 जनवरी 2010

गजल

कहिओ सम कहिओ विषम
कहिओ बेसी कहिओ कम्म


होइत रहलै अकाल मृत्यु
कहिओ गोली कहिओ बम


खेलाइत रहलै देह पर
कहिओ देवी कहिओ जम


निकलैत रहल दिन-प्रतिदिन
कहिओ टका कहिओ दम्म


ठकि रहल अनचिन्हार के
कहिओ अहाँ कहिओ हम

सोमवार, 4 जनवरी 2010

गजल

नरेन्द्र जीक गजल

कतबो कहबै सूरति हाल
बहिरा नाचत अपने ताल


कोठी-कान चढ़ाक राखत
कतबो ठोकब अहाँ सवाल


खन नवयुग खन वेद पढायत
फेकत रंग-बिरंगी जाल


भीतर सँ खूनी नरभक्षी
उपर पहिरत मानुष खाल


पढ़ल-लिखल नवयुवक देश के
ठेका पर भ' रहल बहाल


जेहन पछिला साल निखत्तर
तेहने अछि ई नवका साल

रविवार, 3 जनवरी 2010

गजल


देखिऔ कोना भेलैक गाछ के कात भेने
चिड़ैया बाजब छोड़ि देलक परात भेने


अहाँक दरस-परस महग थिक सजनी
सटि सकितहुँ अहाँक देह मे बसात भेने


आशो राखी तँ कनेक नीक जकाँ राखी
दालिए-तीमन ने बचै छैक भात भेने


हरेक घर मे एकटा कए अगत्ती जन्मए
सरकारक निन्न टुटिते छैक खुरापात भेने


लागि गेल छैक भरना सभहँक भग-सोहाग
की हेतैक आगि लग सप्पत सात भेने

मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

गजल


चुप्प अछि मनुख गिद्दर भुकबे करतैक
निर्जीव तुलसी-चौरा कूकूर मुतबे करतैक



वीरता सीमित रहि जाए जँ गप्प धरि
लात दुश्मनक छाती पर पड़बे करतैक



विद्रोह आ अधिकार के अधलाह बुझनिहार
आइ ने काल्हि अपटी खेत मे मरबे करतैक



बसात दैत रहिऔ क्रांतिक आगि के
नहुँए-नहु सही कहिओ धुधुएबे करतैक



लिखैत रहू गजल विद्रोहक अनचिन्हार
केओ ने केओ एकरा गेबे करतैक

गजल


बाजू चोरक लेल ताला की
बेइमानक लेल केबाला की



लोक डुबैए भाव-अभाव मे
डुबबाक लेल नदी-नाला की



लोक खुश होइए तेल-मालिश सँ
एहि रोगिक लेल दवाइ-आला की



फूसेक घर पर होइत छैक दैवी प्रकोप
पाथरक मकान लेल ठनका-पाला की

शनिवार, 26 दिसंबर 2009

गजल


बान्हल हमर मुरेठाकें नहि, रहलै अछि ककरहु सन्त्रास
नहि विमलत बिनु कएने कथमपि, अन्यायी केर सत्यानाश ...

जड़ि जड़ि जेठक तिक्ख रौदमे, उपजाओल हम जे टा अन्न
करब हमहि उपभोग तकर, हम भूतक दास भविष्यक आश ...

गीड़ि लेलौं दुख केर चिनगीकें, उठल आइ मनमे आक्रोश
लगा रहल छी आगि तेहेन जे, भेटत नव गति नवल प्रकाश...

शोणित घाम बहाबैत रहलौं, अद्यावधि जे हम मतिमन्द
अहँक रक्त धारासँ सींचब, आब अपन हम हरियर चास ...

चुप्पी छलए द्रोण शकटारक, उद्घोषण कौटिल्यक थिक
सावधान शोषक ने करए देब, आब आन पर भोग-विलास...

लेब असूलि कौड़ी-छदाम धरि, अपन स्वेद केर मोल अमोल
खेलब फागु अहँक शोणितसँ, लिखब हमहि नबका इतिहास...

गजल

हमर विषपानसँ जुनि होउ प्रमुदित हम ने एसगर छी
अहँ केर शान ू हम ने एसगर छी।

अहँक बारूद हमरा शब्दसँ नहि लड़ि सकत कहिओ
रहू कलमच नुका कहुना कतहु जा, हम ने एसगर छी।

कोनो दुर्भिक्ष, दुर्दिनमे जकर धधरा ने भेलै क्षीण
सभटा से लपट मिलि कए कहैए हम ने एसगर छी।

गजल

जहर केर घोंट भरि सजनी जँ पीबी अहाँक हाथें हम
तँ सत्ते जीबि लेब जिनगी, अमर भ’ अहाँक हाथें हम

अहाँक आँचर के तुलनामे ने किछु थिक स्वर्ग केर उपवन
जकर सब सूतमे पाबी प्रबल सुख अहाँक हाथें हम

अहाँक मुस्कानसँ बिहुँसय दहो दिश जीवनक सपना
भरब ओहि अल्पनामे रंग उत्तम अहाँक हाथें हम।

अहाँक स्पर्शमे जादू ध्वनिक आरोहमे लोरी
अगिनकें होइत निर्मल हम देखल अछि अहाँक हाथें हम।

अहाँ जँ निकट रहि कए देब हमरा जीवनक निजता
तँ जीतब युद्ध सभटा हम अहँक संग अहाँक हाथें हम।

गजल

मोहमुक्ति

पैघक संरक्षण जं किनकहु
भेटि रहल हो भाइ।
गगनसं खसल शीत सम बूझी
जुनि कनिओं इतराइ।
वटवृक्षक छहरि सन शीतल,
रखने जे प्रभुताइ।
मेटा लैछ अस्तित्व अपन,
ओहि तरमे सभ बनराइ।
सागर सन कायामे कखनहु,
जं उफनए आक्रोश।
निधि तट पर बैसल दम्पति केर,
प्रणयने बुझए अताइ।
फांकथि तण्डुल कण पोटरीसं,
मुदित होथि दुहू मीत।
तेहेन बचल नहि कृष्ण एकहुटा,
विवश सुदामा भाइ।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

गजल


जनपथ छोड़ि राजपथ जायब से हमरा की नीक लगैए
उखरि मे मूड़ी घोसिआयब से हमरा की नीक लगैए


बक सँ कौआ बनल ठाढ़ छी काजर घर मे
तहि पर चानन ठोप लगायब से हमरा की नीक लगैए


चोरि करब हम मुदा शान सँ चौकीदारक संग रहब
लाज-शरम ताखा पर राखब से हमरा की नीक लगैए


भ्रष्ट दुपहरा केर एहन बहसल बसात मे
लंक-दहन लेल आगि पजारब से हमरा की नीक लगैए


छमा करू अरबिन उचित किन्नहुँ नहि बाजब
सुधिजन आगाँ गाल बजायब से हमरा की नीक लगैए

रविवार, 20 दिसंबर 2009

गजल


छाती तँ तानल छल शस्त्र उठयबाक बेर
कोंढ़ किए काँपि रहल लास उठयबाक बेर


पात बिछयबाक बे लोकक करमान छल
यार सभ अलोपित भेल ऐंठ उठयबाक बेर


आयातित महारानी फाहा बुझाइत छल
घोल किए परमाणुक भार उठयबाक बेर


दाउन बेर धानक तँ मारिते महाजन छल
एक्को टा जन नहि नार उठयबाक बेर


प्रवचन मे घौसय छथि धैरज केर महिमा ओ
सभ टा बिसरि जाइ छथि कष्ट उठयबाक बेर


अरबिन उतारा किछु विध्वंसक होइत अछि
नीक जकाँ सोचै छल प्रश्न उठयबाक बेर

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

गजल

असली हाथीक नकली दातँ थिक संबंध
लोहछल मोनक खुरापात थिक संबंध

कोना बचतैक आयोगक गठन करू
सुखाएल गाछक हरिअर पात थिक संबंध

केकरो सँ दोस्ती तोड़ब ओतेक सहज नहि
करेजक आँगन मे अंगदक लात थिक संबंध

हटा लिअ अपन मूँह सँ इ मास्क तुरंत
शुद्ध प्राणरक्षक बसात थिक संबंध

बिनु बजने बैसल रहू तमाशा देखू
बैसल बुढ़िआक शह-मात थिक संबंध

शनिवार, 12 दिसंबर 2009

गजल







सागर में आगि बिजली आसमान में

बेचैनी कते ओ जे ऐछ हमर प्राण में



दिन एहनो आयल हमर जिनगी में

बुझ्लों जे अपन मिलल छल आन में



जिनगीक रंग ढंग की देखि हुनकर

रूप बदलैत छन छन आसमान में

गजल



1

रिश्ता दर्द्क ऐछ कागज पर नहीं लिखू

शब्द मर्मक ऐछ चौराहा पर नहीं बाजु

हवाक प्रत्येक झोंक अपन नहीं होइत ऐछ

राती ते अन्हार ऐछ दिन अपन नहीं होइत ऐछ

सव् व्यथा के साज नहीं भेटैत छैक

सवता गीत पर आह नहीं सजैत छैक

सागरक तीर पर बैसली शेफाली पिआस

नेनेजीवन में रमल छी जीवनक आस नेने


खंड खंड जीवन जिनाई जिअल नहीं जैत ऐछ

बुन्न जहर पिनाई पिअल नहीं जैत ऐछ

चिरी चिरी अपन अंतर सीवी, सीअल नहीं जैत ऐछ

भोरे भोर अख़बार में खून डकैती आतंक

शेफाली पढ़हल नहीं जैत ऐछ

बेर बेर देशप्रेम पर भाषण सुनल नहीं जैत ऐछ

दहेजक नाम पर बेटा बेचब सहल नहीं जैत ऐछ

मानवक भीढ़ में हेरायल मानवताक

खोजल नहीं जैत ऐछ

गिध्ह जकां देश कें नोचैत मानव के

देखल नहीं जैत ऐछ

3

कतेक मोसकिल ऐछ जिनाई ,

जिनगीक कैद में साँस लेनाई

कतेक कामना से छुब्ने छलों गुलाब के

आह तरहथ धरी में कान्ट उगी आयल

हृदयक घाह से नोर छलकी आयल

शोनितक खंड में व्यथा भरी आयल

चली देलों एही शहर से अहाँ

मोनक आँगन में जेना कैकटस निकली आयल

ऐना गरैत ऐछ करेज में यादी अहांक

जेना कैक्टस में कोनो फूल खिली आयल


डॉ. शेफालिका वर्मा

२६७, त्रितय ताल , भाई परमानन्द कालोनी

दिल्ली.....९, फ़ोन..०११ २७६०४७९० मो, ०९३११६६१८४७ , ०९९९०१६२०२१







तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों