गुरुवार, 17 अक्टूबर 2013

गजलक लहास


कलानन्द भट्ट कृत गजल संग्रह “कान्हपर लहास हमर” केर आलोचना, आलोचक/समीक्षक – जगदानन्द झा ‘मनु’

हमरा पढ़क शौभाग्य भेटल कलानंद भट्ट कृत गजल संग्रह “कान्हपर लहास हमर” जे की १९८३मे प्रकाशित भेल अछि। एहि गजल संग्रहमे कलानंद भट्ट जीक गजल प्रति सम्बोधन ‘गजलक मादे’क अलाबा कुल ४८टा गजल वा गजल सन किछु अछि। भट्टजी अप्पन संबोधन ‘गजलक मादे’मे तँ विभक्ति सटा कए लिखने छथि मुदा बाद बांकी गजल सभमे विभक्ति शब्दसँ हटा कए लिखल अछि। ई संकेत अछि हुनक वा हुनक समकालीन मैथिली लेखकक द्वारा गद्य आ पद्यमे मैथिली प्रति कएल गेल अन्तर।
एहि संग्रहक मादे, गजलक व्याकरण पक्षपर अबैत छी। एक गोट गजल लेल सभसँ आवश्यक अछि काफिया आ रदीफक पालन मुदा एहि संग्रहक किछु गिनतीक गजल छोरि कए बाद बांकी गजलमे काफिया आ रदीफक दोख अछि। जेना एहि संग्रहक पहिले गजलक मतला देखू –
“घर घरेक आगि सँ अछि जरल जा रहल
भाइ  सँ  भाइ   द्वेषे   भरल जा रहल ”
आब एहि मतलाक हिसाबे काफिया भेल ‘रल’, मुदा एहि गजलकेँ आँगाक शेर सबहक काफिया अछि – ‘बनल’, ‘बनल’, ‘चलल’, ‘कयल’।
गजल तीन केर मतला देखू –
“कहू की कथा कहुना जीबि  रहल छी
फाटल गुदरी अपन हम सीबि रहल छी”
आब एहि मतलाक काफिया भेल ‘ीबि’,  मुदा गजलक आन-आन  शेरक काफिया अछि, ‘लीबि’,’पीबि’, ‘खीचि’, ‘पीति’। एहिठाम ‘लीबि’ आ ‘पीबि’ तँ ठीक मुदा ‘खीचि’ आ ‘पीति’ ?
गजल ६ केर मतला –
“बाट बाधित पहाड़े छै पाटल जखन
सीयत दरजी के आकासे फाटल जखन”
एहिठाम काफिया भेल ‘ाटल’ जेना की काटल, चाटल, साटल, मुदा एहि गजलक आन आन काफिया अछि ‘साटल’, ‘फाटल’, ‘जागल’, ‘लागल’। एहिठाम ‘साटल’ तँ ठीक अछि, ‘फाटल’ ठीक मुदा एकर पुनः प्रयोग आ ‘जागल’ आ ‘लागल’ ?
गजल संख्या १२ केर मतला –
“अहाँ जीबिते मनुक्ख केँ जरा रहल छी
घेरि गामे केँ स्वाहा करा रहल छी”
मतलाक काफिया भेल ‘रा’ मुदा एहि गजलक आगाँक शेरक काफिया प्रयोगमे अछि, ‘दनदना’,’खड़ा’, ’चला’, ‘बना’, ‘रचा’, ऐ गजल तेसर शेरक काफिया ’खड़ा’ ठीक अछि बांकी सभ गल्ती।
एहि तरहे १८,१९,२०,२१,२२,३३,४८म गजलक काफिया ठीक नहि अछि।
अंतिम गजलक मतला आओर देखू –
“शहर केर सागर मे आइ गाम डूमि रहल
कामांध कामिनी केँ पकड़ि जेना चूमि रहल”
आब उपरकेँ मतलामे काफिया भेल ‘ूमि’ (दीर्घ ऊ कार आ मि) मुदा एहि गजलक आन शेरक काफिया राखल गेल अछि, ‘घूमि’, ‘चूसि’, ‘रेड़ि’, ‘बूकि’, आब घूमि ठीक बाद बांकी ‘चूसि’, ‘रेड़ि’, ‘बूकि’, कोन मादे ठीक भऽ सकैत अछि।
उपरका उदाहरन सभसँ एक डेग आगू बैढ़ बहुत रास गजल तँ एहनो अछि जाहिठाम काफिया केर कोनो स्थाने नहि राखल गेल अछि। आउ देखी किछु एहनो गजल-
गजल संख्या सातक मतला अछि –
“मरि मरि क’ जे जीबय से आदमी चाही
राखय बिहाड़ि हाथ मे से आदमी चाही”
आब एहि मतलामे देखी तँ दुनू पाँतिमे कोमन अछि “से आदमी चाही” अर्थात ई भेल रदीफ। आब रदीफसँ पहिने एहि शेरक दुनू पाँतिमे कोनो काफिया अछि ? नहि ने। एहि तरहे एहि गजलक सभ शेर बिना काफियाक अछि। एहिठाम गजलकार जानि अनजानि नहि जानि किएक ने धियान देलन्हि, मतलाक निच्चाक पाँतिकेँ कनिक बदैल कए काफिया ठीक कएल जा सकैत छल, देखू –
मरि मरि क’ जे जीबय से आदमी चाही
बिहाड़ि हाथमे राखय से आदमी चाही
एहिठाम एकटा गप्प धियान देबए बला अछि जे गजल शास्त्र अनुसार बिना रदीफक गजल तँ कहल जा सकैए परन्च बिन काफियाक गजल, जेना बिन कनियाँ ब्याहक कल्पना। एहि तरहे, एहि संग्रहमे बहुत रास गजल बिन काफियाकेँ कहल गेल अछि जेना गजल संख्या ११,२३,३०,३८,३९,४१,४४,आ ४६। एक बेर फेरसँ गजल संख्या ४६ केर मतला देखी –
“ठेंगा जकाँ ठाढ़ भेल नागे देखैत छी
हम बाट-घाट सभठाम नागे देखैत छी”
आब एहि मतलाक दुनू पाँतिमे कोमन अछि “नागे देखैत छी” जे की रदीफ भेल आ रदीफसँ पहिने काफिया लापता अछि।
कतौ कतौ काफिया ठीको अछि तँ काफियामे एक्के शव्दक प्रयोग बेर-बेर अछि। जेना गजल संख्या २९ क मतला देखी तँ-
“जनम व्यर्थ बेटीकेँ देलौं विधाता
कर्म अपकर्म हम कोन केलौं विधाता”
ऐ शेरमे रदीफ भेल ‘विधाता’ आ काफिया भेल ‘ेलौं’। आब एहि गजलक आन-आन शेरक काफिया अछि, ‘बनेलौं’, ‘चढ़ेलौं’, ‘सिरजेलौं’, ‘बनेलौं’, ‘चढ़ेलौं’। मतलाक शेरक हिसाबे काफिया दुरुस्त अछि मुदा ‘बनेलौं’ आ ‘चढ़ेलौं’ शव्दक आवृति काफियामे एकसँ बेसी बेर अछि। एहि तरहे गजल संख्या १५ आ ४५ मे सेहो काफियामे एक शव्दक आवृति एक बेरसँ बेसी बेर भेल अछि।
बहुत रास गजलमे तँ काफिया आ रदीफ दुनू असमंजसकेँ अबस्थामे अछि अथबा कहू तँ दुनूकेँ दुनू गल्ती अछि। जेना गजल संख्या ३५केर मतला देखी –
“बानरक हेँज जकाँ बौख रहल लोग
रंगल सियार जकाँ लौक रहल लोक”
एहि मतलामे देखी तँ रदीफ भेल ‘रहल लोक’ आ काफिया ‘ौऽ‘, मुदा एहि गजलक आन-आन शेर सबहक काफिया आ रदीफ दुनू संगे अछि, ‘दौड़ रहल लोक’, ‘सिरमौर बनल लोक’, ‘पछोड़ पड़ल लोक’, ‘सिलौट रहत लोक’। एहि शेर सभमे, ‘दौड़ रहल लोक’मे मतलानुसार काफिया आ रदीफ दुनू दुरुस्त अछि मुदा तेसर आ पाँचम शेरमे रदीफ गल्ती अछि आ चारिम शेरमे तँ काफिया आ रदीफ दुनू गरबड़ागेल अछि। कहि तँ एहि गजलकेँ पाँचो शेरधरि गजलकार ई नहि निर्धारित कए सकल छथि जे कोन काफिया अछि आ कोन रदीफ, एहि असमंजसमे खिच्चैर बनि सम्पूर्ण गजल लहास बनि गेल अछि। बिल्कुल एहने तरहक बीमारीसँ ग्रस्त गजल ४३ सेहो अछि।
एहिठाम हम कही तँ गजलकारकेँ सामर्थपर नहि हुनक गजल व्याकरण प्रति अज्ञानताकेँ दोखी मानि सकैत छी। किएक तँ सामर्थक गप्प करी तँ एहि संग्रहक १७ म गजलमे दोहरा काफियाक सफल पालन कएल गेल अछि एकरा हुनक सामर्थ अथवा बाय लक कहि सकैत छी। जिनका काफिया आ रदीफ केर ज्ञान हेतनि ओ अतेक बेसी गल्तीक गुंजाइस नहि छोरता। एहि सन्दर्भमे २४ सम गजलक मतला देखू –
“सरिपहुँ अहाँ भैया कमाल करै छी
अछि भ्रष्ट आचरण मुदा गाल करै छी”
अर्थक मादे कहू तँ एहि शेरक दोसर पाँतिमे “करै”केँ जगह ‘बजै’ हेबा चाही मुदा गजलकार “करै छी”केँ रदीफ मानि “ाल”केँ काफिया बनोलनि। एहि तरहे मतलाक काफिया आ रदीफ ठीक अछि मुदा गजलक आन-आन शेरक काफिया आ रदीफ संगे अछि, “ताल करै छी”, “नेहाल करै छी”, “जाल करै छी”, एतए धरि सभ ठीक मुदा अंतिम शेरमे अछि “टाल रखै छी” रदीफ ‘करै छी’केँ जगह रखै छी अर्थात रदीफ गल्ती एकरे कहै छैक, ‘सौँसे खीरा खाए कऽ पेनी तीत’।
आब आबी काफिया आ रदीफकेँ बाद गजल व्याकरण केर महत्वपूर्ण पक्ष बहरपर, तँ ई कहैमे कोनो संकोच नहि जे संग्रहक पूरा-पूरी गजल बेबहर अछि। सरल वार्णिक बहरक साइद ओहि समयमे जनमे नहि भेल छल आ नहि एहि रूपमे संग्रहक कोनो गजल उतरि रहल अछि। वर्णवृत सेहो कोनो गजलमे नहि अछि, कतौ कोनो गजलक एक आधटा शेरमे वर्णवृत अबितो अछि तँ गजलक बांकी शेरमे नहि अछि। एकटा उदाहरन देखू संग्रहक १४हम गजलमे गजलकार वर्णवृत करैक प्रयासमे छथि –
गजलक मतला अछि –
“भेल ई की कहाँ सँ लहरि गेल अछि
 २१२  -२१२ -   ११२  - २१२
प्रश्नवाचक धरा पर पसरि गेल अछि”
२१२ – २१२ -  २१२ -   २१२
एहि मतलामे २१२-२१२-२१२-२१२केँ वर्णवृत बनैत-बनैत बिगैर गेल अछि। एहिठाम या तँ गजलकार वर्णवृतसँ अज्ञात छथि अथवा चानबिंदुकेँ दीर्घ मानै छथि। गजलक आगू केर तीनटा शेरमे  २१२-२१२-२१२-२१२केर सटीक वर्णवृतक प्रयोग अछि। गजलक दोसर शेर देखू –
“आदमी आदमी केर बैरी बनल
 २१२ – २१२ – २१२ -२१२
कोन नभसँ घृणा ई उतरि गेल अछि”
२१२  – २१२ – २१२ - २१२   
मुदा गजलक पाँचम शेरमे अबैत-अबैत वर्णवृत टूटि गेल अछि। पाँचम शेर –
“उर काँपैछ धरतीक भालरि जकाँ
 २२२-   १२      -२१२   -२१२
युग आदम कोना फेर पलटि गेल अछि”
२२२-२२२- १ १२- २१२ 
जँ कनिक धियान देने रहितथि तँ एतेक लअग एला बाद वर्णवृत पूरा ने होबाक कोनो कारण नहि। कहब ई जे इहो गजल बेबहर भेल।
कतौ कतौ बुझाइत अछि जेना भट्टजी समकालीन हिंदी गजलकार सभसँ प्रेरणा लऽ कऽ मात्रिक छंदक प्रयोगक फिराकमे छथि। हलाँकी मात्रिक छंद गजलक हिस्सा नहि अछि तथापि एहि संग्रहक गजल एहनो सिस्टममे पूर्ण फिट नहि भए रहल अछि। पहिले गजलक मतला देखू –
“घर घरेक आगिसँ अछि जरल जा रहल
२१२१ -२११२-१२२१२
भाइ सँ भाइ द्वेषे भरल जा रहल”
२११२-२२२१-२२१२
वर्णवृत तँ नहिए अछि मुदा मतलाक दुनू पाँतिमे २०-२० टा मात्रा अछि। ऐ तरहे गजलक तेसर चारिम आ पाँचम शेरमे २०-२० टा मात्रा अछि मुदा दोसर शेरक मात्रा गनियो कए कम बेसी अछि। गजलक दोसर शेर –
“कोन आयल जमाना जुआरी एतय (२१ मात्रा)
 भवना अविवेकी बनल जा रहल” (१९ मात्रा)
एहिना सम्पूर्ण संग्रहमे नहि कोनो गजल मात्रिक गणनामे पूर्ण अछि आ नहि वर्णवृतमे। मने ई संग्रह पूरा-पूरी बेबहर गजल संग्रह अछि। काफिया आ रदीफक अशुध्यताक कारणे एहि तरह केर रचनाक संग्रहकेँ अजादो गजल केर श्रेणीमे रखनाइ उचित नहि।
गजल व्याकरणक एकटा आओर महत्वपूर्ण हिस्सा अछि मकता, अर्थात गजलक अंतिम शेर जाहिमे शाइर अपन नाम अथवा उपनामक देने होथि। एहि संग्रहक कोनो गजलमे मकताक प्रयोग नहि अछि।
आब आबी भाषा पक्षपर। गजलक भाषा एहन होबा चाही जे सुनिते माँतर मुँहसँ निकलै वाह ! वाह ! आ ई की सुनलहुँ आइ आ बुझै लेल दू दिन बादो शव्दकोश ताकैत रहू। एहि पोथीमे एकर सदत अभाब अछि। बहुत उपरकेँ भाषा, माटि थालमे ओँघरे वलाकेँ लेल जेना सुन्दर चौपाइ जकाँ नीक तँ बड्ड छै मुदा किछु बुझलौं नहि। किछु कठीन शव्द, ऐ संग्रहक पहिले गजलक एकटा शेर –
“क्षुब्ध धरती गगन नयन मूनल अपन
अछि वसाती बलाती बनल जा रहल”
आब ऐ शेरक की अर्थ बूझल जेए ? आ जँ बुझबो करब तँ कतेक काल बाद आ ओहो के ?
एकटा आओर शेर ३७ सम गजलसँ –
“घर छोट-छोट भीत चूना सँ ढेउरल
चित्र ओहि पर राधा कृष्णक ललाम”
चूना, चित्र हिंदीक बेसाहल शव्द ओहूपर अर्थ की? ई ललाम की ? के बुझत ? कठीन भारी भरकम शव्दकेँ अलाबो एहि संग्रहक भाषा मैथिली अवश्य अछि मुदा एहने-एहने पोधी पढ़ला बाद हिंदीक दलाल सभ कहैत छै जे मैथिली हिंदीक अंग अछि अथवा हिंदीक उपभाषा अछि। ऐ संग्रहक बहुत कम एहेन गजल अछि जाहिमे हिंदी शव्दक प्रयोग नहि हुए। देखी किछु हिन्दीक शव्द –
गजल १ मे – चमन
गजल 2 मे – श्रम, विवशता
कनीक आगू आबि गजल १० मे – विकृति, रक्त
गजल ११ मे – आदेश, वैशाखी, आतंकित
गजल १२ मे – विकट, मनुष्यता, क्रूरता
गजल १४ मे – कहाँ, प्रश्नवाचक, धरा, संशकित, आभास
गजल १६ मे – निष्क्रिय, शिथिल, सदृश्य, विस्मय
गजल १८ मे –  मुरझायल
गजल १९ मे – कहर, अग्रसर
कनी आओर आगू बढ़ी, गजल ३८ मे – घटा, उषम, विषम, जल
बांकीओ गजलमे एनाहिते हिंदी शव्दक भरमार अछि। कतौ-कतौ तँ एकछाहा हिंदीए अछि। १५हम गजलकेँ ई दुनू शेर देखू –
“घरमे फूटल क्रिया गर्म सीमांत अछि
भावना संकुचित विषमयकारी ने भेल

मंत्र मधुमय कहाँ ओ विश्व वन्धुत्व केर
कोन उतरल ई युग दुराचारी ने भेल”
उपरकेँ दुनू शेरमे कतेक शव्द मैथिलीक अछि ? ३९ म गजल केर ई शेर देखू –
“उर बसा द्वेष इर्ष्या घृणा केर लहरि
रक्त तर्पण करैछ ने कोनो जानवर”
जँ ई मैथिली तँ हिंदी की ?  

आब आबी भाव पक्षपर, तँ एहि संग्रहक सभ गजलक भाव पक्ष जबरदस्त अछि। समाजक कोनो एहन कोण नहि जाहिपर शाइर ऐ संग्रहमे वर्णन नहि केने होथि।  चापलूसीसँ शुरू कए आम लोकक जीवनक विषमता, भ्रस्टाचार, महगाइ, अपहरण, लूटि-पाट, राजनीति सभ विषयपर अपन  कलम चलबैत एक एक भावकेँ उजागर करैमे सफल छथि मुदा भाव केतबो नीक किएक नहि हुए जँ गजल गजलक व्याकरणसँ अछूत अछि तँ  ई ओनाहिते भेल जेना बड्ड नीक बिन प्राणकेँ  मनुक्खक देह। 

शनिवार, 12 अक्टूबर 2013

गजल

कोना कहब हम घुरि गाम आबै लेल

गेलौं अहाँ  दिल्ली धन  कमाबै लेल

 

कहबै करेजक हम दर्द दुख ककरासँ

छी गप्प रखने बहुते सुनाबै लेल

 

ठोकर कपारक लागल जखन सबतरिसँ

नहि नोर आँखिक बचलै नुकाबै लेल

 

सदिखन अहाँ बैसल मोनमे बनि मीत

की  दूर गेलौं  हमरे कनाबै लेल

 

कोना क ‘मनु’ कहतै आब अप्पन दोष

घुरि आउ फेरसँ  दुनियाँ  बसाबै लेल

 

(बहरे सलीम, मात्रा क्रम  2212-2221-2221)

✍🏻 जगदानन्द झा ‘मनु’


शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013

गजल

गजल – १२

जिनगी एक वरदान छी
दैवक देलहा दान छी

राखू सोच मोनक सही
जिनगी पैघ सम्मान छी

कर्मक बाटपर नित चलू
कर्में पूर्ण पहचान छी

बुझि संघर्ष जियबै जखन
जिनगी शान अभिमान छी

कुन्दन बुझि चलल बात ई
जिनगी दू दिनक चान छी

2221+2212
बहरे – मुक्तजिब

© कुन्दन कुमार कर्ण

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सोमवार, 7 अक्टूबर 2013

पहरा-अधपहरा

आइ हम पढ़लहुँ बाबा बैद्यनाथ कृत " पहरा इमानपर " जे की 1989मे प्रकाशित भेल आ ऐमे कुल मिला तीस टा गजल अछि। धेआन देबै विभक्ति शब्दमे सटल अछि आ ई गजलकारे द्वारा कएल गेल अछि आ हमरा लोकनि सेहो ऐ परम्पराक अनुयायी छी। तीसटा गजलकेँ छोड़ि ऐ संग्रहमे आरसी प्रसाद सिंह, गोपाल जी झा गोपेश, सोमदेव, मार्कण्डेय प्रवासी, जीवकान्त, रमानंद झा रमण, छात्रानंद सिंह झा ओ विभूति आनंद जीक संक्षिप्त टिप्पणी सेहो अछि। ई गजल संग्रह मात्र 32 पन्नाक अछि। आश्चर्य ऐ गप्पक जे 1989मे प्रकाशित भेलाक बाबजूदो ओहि समयक आन गजलकार ( जे की एखनो जीवित आ रचनारत छथि ) ऐ गजल संग्रह कोनो चर्चा नै केने छथि। जँ गौरसँ अहाँ 1989-2008 बला कालखण्ड देखब तँ बहुत कम्मे ठाम हिनक वा हिनकर पोथीक चर्च भेटत आ ओहूमे अधिकांश चर्च अ-गजलकार ( मुदा अपना विधामे प्रतिष्ठित ) रचनाकार द्वारा भेल अछि।
की कारण छै जे एकटा गजलकार दोसर गजलकारक चर्चा नै करए चाहैत अछि। खराप वा नीक बादक विषय भेल मुदा चर्चा तँ हेबाक चाही। हमर गजल एहन, हमर गजल ओहन ऐ तरहँक चर्चा बहुत भेटत मुदा एकटा गजलकार दोसर गजलकारक चर्चा नै करत। आखिर किए ? वा एना कहू जे गजलकारक चर्चा के करत कथाकार की नाटककार  आ की आन। जँ ई सभ करबो करता तँ ओहन समयमे जखन की गजल पूर्णरूपेण विकसित भ' क' देखार भ' जाएत तखन। मुदा प्रारम्भिक कालमे तँ स्वयं एक गजलकारकेँ दोसर गजलकारक चर्चा कर' पड़तन्हि, आलोचना आ समीक्षा कर' पड़तन्हि तखने आनो आलोचक सभ गजलपर लिखबाक प्रयास करता। जँ प्रारम्भिके कालमे अहाँ सोचि लेबै मात्र हमरे गजल चर्चा योग्य दोसरक नै तखन अहाँ गजल लीखू की आन कोनो विधा ओकर विकास नै हएत।  मात्र पुरने गजलकार सभमे एहन बेमारी छै से नै नव गजलकार सभ सेहो ऐ बेमारीकेँ पोसने छथि। नवमे देखी तँ चंदन झा, राजीव रंजन मिश्र, पंकज चौधरी नवल श्री,जगदानंद झा मनु, अमित मिश्र आदिमे आलोचना-समालोचना-समीक्षा लिखबाक प्रतिभा छनि मुदा ओकरा उपयोग नै करै छथि। आब हमरा लग ई प्रश्न अछि जे जँ ई सभ केकरो चर्च नै करथिन्ह तँ हिनका लोकनिक चर्च के करत। आब ई सभ जरूर कहता जे हम सभ स्वानतः सुखाय रचना करै छी तँए हमर  समीक्षाक कोनो जरूरति नै मुदा हमरो बूझल अछि, हुनको बूझल छन्हि आ सभकेँ बूझल छै जे साहित्यकार केखनो स्वानतः सुखाय रचना नै करै छै। केकरो ने केकरो लेल ओ रचना जरूर रचै छै.................खास क' एहन समयमे जखन की हरेक रचनाकार अपना आपकेँ प्रगतिशील आ जनवादी घोषित करै अछि। हमरा बुझने कथित स्वानतः सुखाय बला रचना जनवादी आ प्रगतिशील भैए नै सकैए। कारण प्रगतिशील आ जनवादी रचना जनता लेल लिखल जाइ छै स्वानतः सुखाय लेल नै। हमरा बुझने आने विधाकार जकाँ प्रारम्भिक दौरमे गजलकारकेँ गजलक दिशा बनाब' पडतै। हँ बादमे बहुत सम्भव जे आनो विधाकार सभ गजल आलोचनापर हाथ चलाबथि मुदा शुरू तँ गजलकारेकेँ कर' पड़तै।  सभ नव-पुरान गजलकारकेँ ऐ दिशामे सोचबाक चाही। हरेक पोथीमे नीक वा खराप रहै छै मुदा जँ चर्चे नै करबै तँ ओ सोंझा कोना आएत। हमरा जनैत एक गजलकार द्वारा दोसर गजलकारक आलोचना नै करबाक परंपरा जे सियाराम झा सरस जी द्वारा शुरू कएल गेल तकरा चंदन झा, राजीव रंजन मिश्र, पंकज चौधरी नवल श्री, अमित मिश्र आदि नीक जकाँ बढ़ा रहल छथि। आ अंततः ई भविष्य लेल खतरनाक साबित हएत। मुदा ओमप्रकाश जी हमर कथनक अपवाद छथि। ओ जतबा मनोयोगसँ अपन गजल लीखै छथि ततबा मनोयोगसँ ओ दोसरक गजल पढ़ि ओकर आलोचना समीक्षा करै छथि। हमरा जनैत ओमप्रकाश जी मैथिली गजलक पहिल आलोचक-समालोचक-समीक्षक छथि ( बहरयुक्त कालखण्ड बला )। चंदन झा, राजीव रंजन मिश्र, पंकज चौधरी नवल श्री,जगदानंद झा मनु, अमित मिश्र आदि ओमप्रकाश जीसँ प्रेरणा ल' क' कमसँ कम बर्खमे एकटा गजल पोथीक आलोचना लिखथि तँ मैथिली गजल नीक दिशामे आबि जाएत। नव गजलकारकेँ बहुत बेसी दायित्व लेब' पड़तन्हि तखने गजलक दिशा सही हेतै। आ जँ गजलक दिशा सही भेलै तँ बूझू जे गजलकारक दिशा सेहो सही भ' गेलै। ओना हम ई जरूर कह' चाहब जे हरा लोकनि ऐ बहसमे समय नै बरबाद करी जे के आलोचना केलाह आ के नै केला। जे भेलै से भेलै मुदा आबसँ शुरू भ' जेबाक चाही।
आब हमरा लोकनि आबी बाबा बैद्यनाथ जीक कृतिपर। कृति थिक गजल आ तँए हम एकरा तीन भागमे बाँटब--
१) व्याकरण पक्ष २) भाषा पक्ष, आ ३) भाव पक्ष
तँ पहिले देखी व्याकरण पक्ष। ऐ संग्रहक कोनो गजलमे वर्णवृत नै अछि। मने पूरा-पूरी ई संग्रह बेबहर गजल संग्रह थिक। किछु उदहारण देखू। पहिने ऐ संग्रहक पहिल गजलक मतला आ तकर बाद ओकर दोसर शेर देखू----
एक बेर फेरु नजरि शरण हम आयल छी
२१२-१२२-१२-१२२२२२
वा २१२-१२-२२१२-१२२२२२
सौंसे संसारसँ हम सदति सताएल छी
२२२२२२-१२-१२२२
वा २२२२११-२२१-१२२२

ई छल मतला आ एकर दूनू तरहें होमए बला मात्रा क्रम अहाँ सभहँक सामनेमे अछि। कहबाक मतलब जे मतलामे वर्णवृत नै अछि। आब कने एही गजलक दोसर शेर देखी---
सभ दिन हम मोह निशामे सूतल रहलौं
२२२११-२२२२२२२
व्यर्थ-जंजालमे हम जन्म गमायल छी
२१२२-१२२२-११२२२
वा २१-२२१२२१२-१२२२
तँ हरा लोकनि ई देखि रहल छी जे गजलमे वर्णवृत नै अछि मने गजल बहर युक्त नै अछि।
आ ई हालति प्रायः तीसो गजलमे अछि। कोनो गजलक कोनो शेरक दुन्नू पाँतिमे तँ वर्णवृत आबि जाइए मुदा ओकर आगू-पाछू बलामे नै। जेना एकटा उदाहरण देखू। ई उनतीसम गजलक मतला थिक--
भोर भागल जेना दूपहर देखि कs
२१२२-२२२-१२२-११
गाम गामो ने रहलै शहर देखि कs
२१२२-२२२-१२२-११
तँ हमरा लोकनि ई देखलहुँ जे ऐ मतलामे तँ वर्णवृत अछि। मुदा एही गजलक आगूक शेर देखू---
आयत गरमी जखन नहि पानियें पड़त
२२२२-१२२२-१२-१२
हेतै खेती ने छुच्छे नहर देखि कs
२२२२२२२-१२२-१२
आब अहाँ सभ अपने बूझि सकै छिऐ जे गड़बड़ी कत' छै। संग्रहक तीसो गजलमे ई बेमारी छै। किछु लोक कहि सकै छथि जे भ' सकैए जे शाइर ओहि समयमे हिन्दी गजलमे प्रचलित मात्रिक छन्दमे लिखने हेता। तँ हमर कहब जे मात्रिक छन्द गजलक छन्द होइते नै छै आ दोसर गप्प जे ओ उदाहरणमे देल शेरक मात्राकेँ जोड़ि ईहो देखि लेथु जे मात्रिक छै की नै।
व्याकरणमे मात्र बहरे ( वर्णवृते ) नै होइ छै काफिया आ रदीफ सेहो होइत छै। ऐ संग्रहक रदीफ ठीक अछि ( कारण रदीफ अपरिवर्तित होइ छै तँए --) । ऐ संग्रहक अधिकांश काफिया ठीक अछि मात्र किछुए काफिया गलत अछि। आ हमरा बुझैत ओइ समय ( १९८९क ) केर हिसाबसँ ई बहुत बड़का उपल्बधि अछि। जखन की आइ २०१३मे एहन स्थिति अछि जे गजलपर एतेक चर्चाक बादों महान गजलकार सभ काफिया एहन सरल वस्तुमे गलती करै छथि। हमरा हिसाबें बाबा बैद्यनाथ जी ऐ लेल बधाइ केर पात्र छथि। आब देखी किछु गलत काफियाक सूची जे ऐ संग्रहमे अछि---
दोसर गजलक मतला---
झगड़ा कियै बझल छै गामक सिमानपर
पहरा कोना लगयबै लोकक इमानपर
ऐ मतलामे काफिया शास्त्रक हिसाबें  काफिया भेल--- " इ " स्वरक संग "मानपर"। मुदा एकर बाद आन-आन शेर सभमे क्रमशः " गुमानपर ", " जानपर", "पुरानपर " ," दलानपर " , " कुरानपर ", " नादान पर", " तूफानपर" आ "कृपाणपर" अछि। (जँ ऐ गजलमे पर विभक्ति नै रहतै तँ काफिया ऐ मतलामे काफिया शास्त्रक हिसाबें  काफिया होइतै--- " इ " स्वरक संग "मान" संगे-संग जँ मतलामे "सिमानपर" केर बाद जँ " जानपर" आबि जइतै तखन ऐ गजलक सभ काफिया एकदम्म सही भ' जइतै। आब हमरा विश्वास अछि जे गजलक जानकारक संग पाठक सभ सेहो बुझि गेल हेता जे गड़बड़ी कत' छै )| ठीक इएह गड़बड़ी ऐ संग्रहक गजल संख्या 16,13,19 आ 27मे सेहो अछि। तहिना गजल संख्या दसकेँ देखू। ई गजल बिना रदीफक अछि ( बिना रदीफकेँ तँ गजल भ' सकैए मुदा बिना काफियाक नै )---

पहिल शेर अछि--
क्यो एकरा दयौक नहि टोक
ई अछि बहिरा ओ अछि बौक
आन शेरक काफिया अछि--झोंक, थोक, नोक, आलोक आदि। काफिया शास्त्रक हिसाबें टोक केर काफिया, थोक, नोक, आलोक , आदि। मुदा ऐ शेरमे टोक केर काफिया अछि बौक जे की गलत अछि।
आब आबी कने ऐ संग्रहक भाषा पक्षपर। भाषा तँ ऐ संग्रहक मैथिली थिक मुदा गजल संख्या ६मे काफिया बैसाब' के चक्करमे एहनो काफिया ल' लेलथि जे की हिन्दीक क्रिया अछि आ मैथिलीमे मान्य नै अछि। गजल संख्या ६ केर मतला देखू---

बन्धुवर कोन बाट दुनियाँ  जा रहल छै
सत्य कानय झूठ कीर्तन गा रहल छै
ऐ गजलक आन शेरक काफिया सभ अछि-- पा, खा, छा, बा ( मूँह बा ), आ ....
आब ई देखू जे एतेक हिन्दी क्रियामेसँ मात्र टूइएटा क्रिया मैथिलीमे मान्य छै-- जा एवं खा। बाद बाँकी एखन धरि मान्य नै छै। हमरा हिसाबें अग्राह्य हिन्दी क्रियाकेँ प्रयोग करब भाषाकेँ दूषित करबाक चेष्टा अछि। तथाकथित प्रगतिशील गजलकार नरेन्द्र एही प्रकारक भाषाक प्रयोग करै छथि आ ऐ लेल हम ने बाबा बैद्यनाथ जीक समर्थन करै छी आ ने नरेन्द्र जीक। हँ, एतबा कहबामे हमरा कोनो संकोच नै जे नरेन्द्र जी अपन १००मेसँ ९५टा गजलमे एहन भाषा प्रयोग करै छथि तँ बाबा बैद्यनाथ १००मेसँ १टामे। ओना ऐ ठाम ई जानब रोचक हएत जे एहन काफियाक प्रयोग करब अनुचित नै छै बशर्ते की भाषा बदलि जेबाक चाही। जँ नरेन्द्र जी वा बाबा बैद्यनाथ जी ऐ काफिया सभहँक प्रयोग अपन गामक वा पड़ोसी गामक मैथिलीक जोलहा रूपमे गजल लीखि करथि तँ ई काफिया सभ बिल्कुल सही होइत। हम बाबा बैद्यनाथ जीक उपरमे लेल गेल गजल संख्या ६क मतलाकेँ ऐ रूपमे देखा रहल छी---
भाइ केन्ने दुनियाँ जा रहलइय'
साँच कानै झुट्ठा गा रहलइय'
( आन शेर पाठकक कल्पनापर छोड़ल जाइए)
आब अहाँ अपने अनुभव क' सकै छिऐ जे काफिया तँ वएह हिन्दीक छै मुदा फिट एवं प्रवाहपूर्ण भ' गेल छै। शाइरकेँ मात्र बस एतबा देखबाक छै। नै तँ भाषाकेँ दूषित होइत देरी नै लागत। जँ ऐ काफिया सभहँक प्रयोग मैथिली क जोलहा रूपमे वा चंपारण, मुज्जफरपुर, सीतामढ़ी, बेगूसराय, वैशाली एँ झारखंड बाल मिथिला क्षेत्रक भाषाक संग करबै तँ गजलक कल्याण सेहो हेतै आ मैथिलीक सेहो। भाषाक सम्बन्धमे एकटा आर गप्प ऐ संग्रहक अधिकांश गजलमे मैथिलीक चलंत रूप ( मने गाम-घरमे बाज' बला रूप ) प्रयोग भेल अछि जे की मैथिली गजल लेल शुभ अछि। हँ, एतेक अपेक्षा हम बाबा बैद्यनाथ जीसँ जरूर केने छलहुँ जे ओ पूर्णियाक छथि तँ हुनक रचनामे पूर्णियामे बाजल जाइत मैथिलीक स्वरूप रहत । जँ ऐ अधारपर देखी ई संग्रह कने हमरा निराश केलक ( ई हमर व्यतिगत आलोचना अछि, गजलक व्याकरणसँ फराक देखल जाए एकरा )। जेना की उपरे इंगित क' चुकल छी जे गजलकार स्वयं शब्दमे विभक्ति सटेबाक पक्षमे छथि आ हमरा हिसाबें ई मैथिलीक लेल नीक। आ अन्तमे आउ ऐ संग्रहक भाव पक्षपर। मैथिली साहित्यमे " भाव " सभसँ सस्ता छै। जकरा देखू से भाव केर नाङरि पकड़ि साहित्यिक वैतरणी पार करै छथि। तँए ऐ संग्रहक सभ गजलक भाव पक्ष उन्नत अछि। आ ऐ पक्षपर हमर कोनो कथन नै रहत। कारण जखन सभ पक्ष हमहीं कहि देब तखन तँ पाठकक रूचि खत्म भ' जेबाक डर रहत तँए पाठक संग आन सभ गोटासँ अनुरोध जे बाबा बैद्यनाथ कृत " पहरा इमानपर " नामक गजल संग्रह पठथि आ अपन-अपन विचार देथि। जिनका ई पोथी कोनो कारणवश नै उपल्बध भ' रहल छनि से ऐ लिंकपर जा क' एकर पी.डी.एफ फाइल डाउनलोड क' एकरा पठथि https://dbb13891-a-96a2f0ab-s-sites.googlegroups.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/Pahra_Iman_Par.pdf?attachauth=ANoY7cqrLAai8QAw-5s2DKPbDbL7tkHkNm21JzW7JHpvcnMWa4eUTBj1upJeipTdGs5Ktg9FNASU7n1e23fURUkX_RGJ71_vvSGXUY_jCYzAoJL4WNpIi5YRY-krxar5gRQH8bbqGR7PJznA3E4jjZ3p_n8mZob_0_evLolQsqCFMQFI0tK9CAQplBo3fiCIwMurjrvuSmUoaMS3fj98oxyqnZnnb65L3iOIQwe3rykiAnOw3nyPYQA%3D&attredirects=0 । ई डाउनलोड बिल्कुल फ्री अछि मने साहित्यमे प्रयोग होमए बला " भाव "सँ बहुत बेसी सस्ता।
कने रुकू, जे गोटा भाव लेल तरसैत हेता तिनका लेल मात्र किछु शेर हम  देखाबए चाहब ( उनतीसम गजलक आठम शेर )
राति-दिन बउआ खाली कमेन्ट्री सुनए
कियैक पढ़तै क्रिकेटक लहर देखि कs
ऐ शेरकेँ पढ़ू आ तखनुक संग एखुनका समयकेँ देखू। कोनो फर्क नै भेलैए। पहिने रेडियोमे बैट्री नै देल जाइ छलै क्रिकेटक समयमे आब केबल लाइन कटबा देल जाइ छै। पढ़ाइपर क्रिकेटक की असर छै से एकै शेरमे देखा गेल छथि शाइर। पढ़ाइए किए ई क्रिकेट तँ आन छोट-छोट खेलकेँ सेहो नाश क' देलक। शाइर ऐ शेरक माध्यमे सेहो धेआन दिअबैत छथि। एही प्रकारक ज्वलंत मुद्दा सभकेँ बाबा बैद्यनाथ अपन गजलमे लेने छथि जे की आन शाइरक गजलमे दुलर्भ अछि। भाव केर ऐ चर्चामे ११म गजलक अंतिम शेर कहने बिना पूरा नै हएत---
कहियो जँ मोन पड़य अप्पन अतीत जीवन
बस आँखि मूनि दूनू कनियें लजा लिय
ऐ शेरकेँ पढ़ू आ एकर मतलब निकालू। झटहा फेकेलै कहीं आ लगलै कहीं। इएह भेलै गजलत्व जकरा बारेमे कहल जाइ छै जे गजलक शेर सीधा करेजमे लगै छै। जँ एकैसम गजलकेँ देखी तँ निश्चित रूपसँ ई बाल गजल अछि ( बाल गजल रहितों व्यस्क लेल ओतेबे प्रासंगिक अछि ) आ ओजपूर्ण सेहो अछि-

छोड़ू अपन कपटकेँ आ उदार बनू भैया
गाँधी सुभाष नेहरुक अवतार बनू भैया
अइ संग्रहमे श्रृंगार रसक गजल सेहो अछि जे की पाठकक लेल छोड़ल जाइए। तँ आसा अछि जे आब अहाँ सभ जरूर एकरा पढ़बै।

गजल

नेताक भेषमें सभ कामचोर छैक
तामससँ लोक देशक तेँ अघोर छैक

चुल्हा गरीबके दिन राति छैक बन्द
जे छैक भ्रष्ट घर ओकर इजोर छैक

ककरा करत भरोसा आम लोक आब
निच्चा अकान उप्पर घूसखोर छैक

चाही विकास चाही नै विनाश आब
जनताक ठोरपर मचिगेल शोर छैक

आलोचना करत 'कुन्दन' कतेक आर
जे चोर ओकरे मुँह एत जोर छैक

221+212+221+2121

© कुन्दन कुमार कर्ण

© www.facebook.com/kundan.karna

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2013

गजल

कियो घिरनी सन बना गेल हमरा
अपन आँचरपर नचा गेल हमरा

गरीबक नोरसँ सरापसँ धनी छै
बुझू ई गप्पे लजा गेल हमरा

जरब डिबिया सन छलै मोनमे ई
मुदा अधरतिये मिझा गेल हमरा

सुखाइत पोखरि तँ बाजल इनारसँ
मनुख असगर पी सुखा गेल हमरा

तँ ओ मरि गेलाक बादे कहत किछु
भरोसक सीमा जिया गेल हमरा

12222+122+122 हेरक पाँतिमे

अपने एना अपने मूँह-19

मास फरवरी २०१३मे कुल ५५टा पोस्ट भेल जकर विवरण एना अछि--
ओमप्रकाश जीक २टा गजल आ एकटा आलोचना आएल।
अमित मिश्र जीक कुल ३३टा पोस्टमे-- १४ टा हुनक अपने अवाजमे गाएल गजलक वीडियो अछि। ४टा रुबाइ अछि आ १५टा गजल अछि।
सुमित मिश्र जीक ८टा पस्टमे--७टा गजल आ १टा बाल गजल अछि।
जगदानंद झा मनु जीक १टा बाल गजल,  १टा गजल आ आ १टा रुबाइ अछि।
प्रदीप पुष्प आ बालमुकुन्द पाठक जीक १-१टा गजल आएल।
आशीष अनचिन्हारक ६टा पोस्टमे-- २टा गजल, ३टा सम्मान सम्बन्धी घोषणा आ १टा अपने एना अपने मूँहसँ सम्बन्धित पोस्ट अछि।
ऐ मासमे प्रदीप पुष्प जी बहर युक्त गजलकारक रूपमे चिन्हित कएल गेलाह।

मार्चमे कुल ५१टा पोस्ट भेल जाहिमे--
२१टा पोस्टमे २१टा विडियो अछि जैमे शाइरक अपन अवाजमे अपने गजल गाएल अछि।
जगदानंद झा मनु जीक ५टा पोस्टमे ४टा गजल आ १टा भक्ति गजल अछि।
सुमित मिश्र जीक ५टा पोस्टमे ४टा गजल आ १टा भक्ति गजल अछि।
आशीष अनचिन्हारक ३टा पोस्टमे २टा सम्मान सम्बन्धी घोषणा आ १टा गजल अछि।

अप्रिल मासमे कुल ८टा पोस्ट भेल जैमे--
अमित मिश्र केर ४टा पोस्टमे ४टा गजल आ १टा पोस्टमे १टा गजल अछि।
जगदानंद झा मनु के २टा पोस्टमे १-१टा गजल आ भक्ति गजल अछि।
सुमित मिश्र केर १टा पोस्टमे १टा गजल अछि।

मइ मासमे कुल ९टा पोस्ट भेल जैमे--
जगदानंद झा मनुक जीक ३टा पोस्टमे २टा बक्ति गजल आ १टा गजल आएल।
कुन्दन कुमार कर्ण केर २टा पोस्टमे २टा गजल अछि।
बालमुकुन्द पाठक केर २टा पोस्टमे २टा गजल अछि।
अमित मिश्र केर २टा पोस्टमे २टा रुबाइ अछि।

मास जूनमे कुल २४टा पोस्ट भेल जकर विवरण एना अछि---
पंकज चौधरी नवल श्री जीक १७टा पोस्ट भेल जाहिमे १५टा गजल आ २टा बाल गजल अछि।
कुन्दन कुमार कर्ण, अमित मिश्र आ बालमुकुन्द पाठकक २-२टा गजल अछि।
जगदानंद झा मनु जीक १टा गजल अछि।

जुलाइ मासमे कुल ६टा पोस्ट भेल जाहिमे ---                                                                                           कुन्दन कुमार कर्ण जीक २टा गजल अछि आ आशीष अनचिन्हारक ४टा पोस्टमे २टा गजलकार परिचय श्रृंखला आ २टा गजल अछि।

अगस्त मासमे मात्र १टा पोस्ट भेल जे की अमित मिश्र द्वारा भेल आ जैमे १टा गजल अछि।

सितम्बर मासमे कुल ८टा पोस्ट भेल जैमे--
अमित मिश्र जीक ३टा पोस्टमे ३टा गजल, ओमप्रकाश जीक २टा पोस्टमे २टा गजल, आ राम कुमार मिश्र, जगदानंद झा मनु, एवं कुन्दन कुमार कर्ण जीक १-१टा पोस्टमे १-१टा गजल अछि।
ऐ मासमे रामकुमार मिश्र जी नव गजलकारक रूपनमे चिन्हित भेलाह।

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

गजल

गजल - तीन

जिनगीक बाट पर कांट गरबे करत
दरदक टीस सं करेज जरबे करत

जिनगी मे भेटत बसंत केर मधुवन
पतझर केर पात मुदा झरबे करत

जिनगी मे जितब हजार मगर तगमा
हरब​ऽक​ जोगार दुनिया करबे करत

मेहनति  केर घाम सं पाटि लेब जिनगी
सफलता केर बखारी त भरबे करत

कर्मठ बनल रहबै जौ सदिखन ‘राम’
दरिद्रता केर दानव त मरबे करत

(सरल वार्णिक बहर​) वर्ण - १६
© राम कुमार मिश्र



बुधवार, 25 सितंबर 2013

गजल

भूख छल प्रेमक भूखले रहि गेलहुँ
याह सोचिक हम टूटले रहि गेलहुँ

एक ओकर खातिर बनल सभ बैरी
सभसँ जिनगी भरि छूटले रहि गेलहुँ

पटकि देलक घैला जकाँ हिय एना
जाहि कारण हम फूटले रहि गेलहुँ

भरल प्रेमक कोठी, परल खाली छै
प्रेम बिन ओकर लूटले रहि गेलहुँ

कुन्दनक बखरा परल नीरस जिनगी
शोक संगे नित जूटले रहि गेलहुँ

२१२२ २२१२ २२२

© कुन्दन कुमार कर्ण

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रविवार, 15 सितंबर 2013

गजल

जे केयो करै छै काम
तकरे लोक लै छै नाम

जकरा संग छै ईमान
चर्चा तकर छै सबठाम

जे केलक मरम बुझि कर्म
से नै रहल छै बेकाम

कथनीमें भरोसा कोन
करणीमें रहै छै दाम

कहबी कुन्दनक छी याह
किछु छै खास, किछु छै आम

२२२१ (मफऊलात)
सब पाँतिमें दू बेर

© कुन्दन कुमार कर्ण
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शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

गजल

हम गजल कोना कहू भीड़मे रसगर
सगर मुँह बेने मनुख भेसमे अजगर

पाइ घोटाला हबालाक खाएकेँ
रोग छै सबकेँ पकरने किए कसगर

बहिन माए भाइ बाबू अपन कनियाँ
सब तकै सम्बन्धमे दाम ली जथगर

गामकेँ बेटा परेलै शहर सबटा
खेत एकोटा रहल आब नै चसगर

छै बिकाइ प्रेम दू-दू टका मोले
रीत ‘मनु’केँ नै लगै छै कनी जसगर

(बहरे कलील, मात्रा क्रम – २१२२-२१२२-१२२२)

जगदानन्द झा ‘मनु’    

गजल



गजल – दू



गाम छोड़ति हम कैन गेलउ

बाम भेलइ दिन जैन गेलउ



नेह टूटल सब बन्धु छूटल

भाग भूटल हम मैन गेलउ



माटि पावन हम छोड़ि आयल

प्रीति  माहुर हम सैन गेलउ



साग बारिक फल फूल बारिक

फेर​ पायब हम ठैन गेलउ



‘राम’ गामक रस छोड़ि आयल

फेर आयब हम ठैन गेलउ



सभ पैत में आखर - १२ आ मात्रा - १६

तिथि: १३/०९/२०१३

© राम कुमार मिश्र

गजल

गजल-1.68

राति छै बेसी बचल कम जाम* छै
हमर नोरक दाम ओकर नाम छै

राजनीतक उठल बिर्रो देश भरि
जे छलै दायाँ बुझू से बाम छै

घाव टिभकै खूब चिट्ठी खोलिते
पस हियामे भरल नेहक दाम छै

गारि पढ़ियो वा अहाँ लाठी धरू
देशकेँ चक्का रहल बस जाम छै

आँखिमे छै भोर सोहावन "अमित"
बाँहिमे बान्हल नविन सन गाम छै

*दारू
2122-2122-212
अमित मिश्र

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

गजल

आइ किछु मोन पडलै फेरसँ किए
भाव मोनक ससरलै फेरसँ किए

टाल लागल लहासक खरिहानमे
गाम ककरो उजडलै फेरसँ किए

आँखि खोलू, किए छी आन्हर बनल
नोर देशक झहरलै फेरसँ किए

चान शोभा बनै छै गगनक सदति
चान नीचा उतरलै फेरसँ किए

"ओम" जिनगी अन्हारक जीबै छलै
प्राण-बाती पजरलै फेरसँ किए
(दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ)-(ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ)-(दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ)
(फाइलातुन-फऊलुन-मुस्तफइलुन) - १ बेर प्रत्येक पाँतिमे

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

गजल

गजल-1.67
तरेगण लाख छै तैयौ नगर अन्हार रहिते छै
बरू छै भीड़ दुनियाँमे मनुख एसगर चलिते छै

सजल छै आँखिमे सपना नदी नाला हरित धरती
जकर बेटा सुखी ओ माइक श्रृंगार सजिते छै

गजब छै रीत दुनियाँ केर मरने राख धरि फेकै
मुदा सदिखन सभक मनमे अमिट सन यादि बसिते छै

अहा वा आह धरि बाजब अहाँ आ बाट निज पकड़ब
अहींकेँ हास्य अभिनयमे हमर संसार जरिते छै

सगर छै खेल आखरकेँ हँसाबै आ कनाबै छै
कतौ टुटिते हिया छै आ कतौ नव नेह रचिते छै

अमित मिश्र

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

गजल

कहियो तँ हमर घरमे चान एतै
नेनाक ठोर बिसरल गान गेतै

निर्जीव भेल बस्ती सगर सूतल
सुतनाइ यैह सबहक जान लेतै

मानक गुमान धरले रहत एतय
नोरक लपटिसँ झरकिकऽ मान जेतै

सुर ताल मिलत जखने सभक ऐठाँ
क्रान्तिक बिगुलसँ गुंजित तान हेतै

हक अपन "ओम" छीनत ताल ठोकिकऽ
छोडब किया, कियो की दान देतै

(दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ)-(ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ)-(ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ)
(मुस्तफइलुन-मफाईलुन-फऊलुन)- प्रत्येक पाँतिमे एक बेर
तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों