शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

मैथिली गजलशास्त्र-१०

आब एक धक्का फेरसँ मैथिलीक उच्चारण निर्देश आ ह्रस्व-दीर्घ विचारपर आउ।
शास्त्रमे प्रयुक्त ‘गुरु’ आ ‘लघु’ छंदक परिचय प्राप्त करू।

तेरह टा स्वर वर्णमे अ,इ,उ,ऋ,लृ - ह्र्स्व आर आ,ई,ऊ,ऋ,ए.ऐ,ओ,औ- दीर्घ स्वर अछि।

ई स्वर वर्ण जखन व्यंजन वर्णक संग जुड़ि जाइत अछि तँ ओकरासँ ‘गुणिताक्षर’ बनैत अछि।


क्+अ= क,


क्+आ=का ।


एक स्वर मात्रा आकि एक गुणिताक्षरकेँ एक ‘अक्षर’ कहल जाइत अछि। कोनो व्यंजन मात्रकेँ अक्षर नहि मानल जाइत अछि- जेना ‘अवाक्’ शब्दमे दू टा अक्षर अछि, अ, वा ।



१. सभटा ह्रस्व स्वर आ ह्रस्व युक्त गुणिताक्षर ‘लघु’ मानल जाइत अछि। एकरा ऊपर U लिखि एकर संकेत देल जाइत अछि।


२. सभटा दीर्घ स्वर आर दीर्घ स्वर युक्त गुणिताक्षर ‘गुरु’ मानल जाइत अछि, आ एकर संकेत अछि, ऊपरमे एकटा छोट -।


३. अनुस्वार किंवा विसर्गयुक्त सभ अक्षर गुरू मानल जाइत अछि।


४. कोनो अक्षरक बाद संयुक्ताक्षर किंवा व्यंजन मात्र रहलासँ ओहि अक्षरकेँ गुरु मानल जाइत अछि। जेना- अच्, सत्य। एहिमे अ आ स दुनू गुरु अछि।

जेना कहल गेल अछि जे अनुस्वार आ विसर्गयुक्त भेलासँ दीर्घ होएत तहिना आब कहल जा रहल अछि जे चन्द्रबिन्दु आ ह्रस्वक मेल ह्रस्व होएत।
माने चन्द्रबिन्दु+ह्रस्व स्वर= एक मात्रा

संयुक्ताक्षर: एतए मात्रा गानल जाएत एहि तरहेँ:-
क्ति= क् + त् + इ = ०+०+१= १
क्ती= क् + त् + ई = ०+०+२= २
क्ष= क् + ष= ०+१
त्र= त् + र= ०+१
ज्ञ= ज् + ञ= ०+१
श्र= श् + र= ०+१
स्र= स् +र= ०+१
शृ =श् +ऋ= ०+१
त्व= त् +व= ०+१
त्त्व= त् + त् + व= ० + ० + १
ह्रस्व + ऽ = १ + ०
अ वा दीर्घक बाद बिकारीक प्रयोग नहि होइत अछि जेना दिअऽ आऽ ओऽ (दोषपूर्ण प्रयोग)। हँ व्यंजन+अ गुणिताक्षरक बाद बिकारी दऽ सकै छी।
ह्रस्व + चन्द्रबिन्दु= १+०
दीर्घ+ चन्द्रबिन्दु= २+०
जेना हँसल= १+१+१
साँस= २+१
बिकारी आ चन्द्रबिन्दुक गणना शून्य होएत।
जा कऽ = २+१
क् =०
क= क् +अ= ०+१
किएक तँ क केँ क् पढ़बाक प्रवृत्ति मैथिलीमे आबि गेल तेँ बिकारी देबाक आवश्यकता पड़ल, दीर्घ स्वरमे एहन आवश्यकता नहि अछि।


U- ह्रस्वक चेन्ह
।- दीर्घक चेन्ह

एक दीर्घ । =दूटा ह्रस्व U

१

बहरे मुतकारिब मुतकारिब आठ–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – चारि बेर

अनेरे धुनेरे जतेको ठकेलौं
बकैतो ढ़कैतो सुझेलौं घनेरौं



२
बहरे मुतदारिक मुतदारिक आठ–रुक्न फा इ लुन (।U।) – चारि बेर

बीकि गेलै तँ की जोतबै खेतमे
झीकि लेतै तँ की बोलतै बेरमे



३
बहरे कामिल कामिल आठ–रुक्न मु त फा इ लुन (UU।U।) – चारि बेर

इनसान जे कहबैत छै सकुचा कऽ छै जँ ठकैल यौ
बहरा कऽ जे कहतै जँ नै सहिते तँ छै कमजोर यौ



४
बहरे वाफिर वाफिर आठ–रुक्न म फा इ ल तुन (U।UU।) – चारि बेर

अबै अछि ओ सुनै अछि ओ जँ जाइत छै बसै अछि ओ
कहै अछि जे सुनै अछि ओ जँ खाइत छै ढकै अछि ओ



५
बहरे रमल रमल आठ–रुक्न फा इ ला तुन (।U।।) – चारि बेर

झूरझामो भेल छी से बात ने की काटने की
से समेटू से लपेटू आर की की आरने छी




६
बहरे रजज रजज आठ–रुक्न मुस तफ इ लुन (।।U।) – चारि बेर

ऐ ओतऽ की छै केहनो आ की अते की छी अए
नै छै कएलो नै सुनै छै की करै भेटैत-ए



७

बहरे हजज हजज :-आठ–रुक्न म फा ई लुन (U।।।) – चारि बेर

अबै छै नै सुनै छै नै बहीरो छै बुझै छै से
नरैमे छी कटै की से जजातो छै बुझै छै से


मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

ghazal

गजल
(1)
बहुत बात मन अछि बहुत बिसरि गेल छी
जिनगीकेर पाँतरमे तेना भटकि गेल छी


नेह-छोह भागल अछि छोड़ि-छाडि़ हमरा
तबधल दुपहरिआ सन मीत लहकि गेल छी


बाट-घाट खून-बलात्कार देखि चुपचाप
कत्ते बेर सत्ते निरदोस ससरि गेल छी


पुरखारथि मौगी लग घरे भरि छजैए
बाहरक हुमाहुमी देखि सटकि गेल छी


भइबट सन जिनगी लगाएब कते बखड़ा
सोचू, जे सोची अहाँ, हम तँ उलझि गेल छी


जिनगी छी युद्ध लड़ू 'पंकज', अहूँ खूब लड़ू
सोचल की, किए एखन एना अटकि गेल छी
(2)
कोना पाँजरसँ चुप्पे ससरि गेलिऐ
जा क' दीगर जहाँमे पसरि गेलिई


कोनो जादू भेलै आ कि टोना भेलै
भेलै ेएहन की छनमे बदलि गेलिऐ


अपन मनक व्यथा हम कहू तँ कोना
मन-मन्दिरसँ सरपहुँ निकलि गेलिऐ


आगि कत्तहु नहि, कत्तहु छै धुआँ मुदा
फेर बूझब की, कोना पजरि गेलिऐ


एक बेर फेर ओहिना महमहा तँ दिऔ
किए 'पंकज'केँ एना बिसरि गेलिऐ

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

गजल

शराब के खराप नहि मानू सदिखन

कनियें बराबर एकरा जानू सदिखन



बेसी पीब त मोन भरि जाएत

मीत थोड़बे-थोड़ पीबू सदिखन



स्वर्गक सुख भेटत जँ देखबै एम्हरो

आरती छोड़ि लबनी टेबू सदिखन



दुखक पहाड़ बड़की टा हौ भाइ

संग मे बोतल राखि फानू सदिखन





शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

गजल

गजल सुख जिनगीक गजल दर्द जिनगीक

रहए ठाढ़ अविचल गजल मर्द जिनगीक



हिमालयक भाए छी वा कैलाशक जन्मल

आगिक गोला गजल सर्द जिनगीक



देखए मे हेतैक लाजो के लाज तेहने

देखाएत अंग-अंग गजल बेपर्द जिनगीक



छैक जाम मगजक जकर बड्ड दिन सँ

हटबैत छैक गजल गर्द जिनगीक



अनचिन्हार साकी परसैए गजल हाला

छैक दवाइ गजल बेदर्द जिनगीक



गजल


गजल
१
छोट-छीन सन बात बहुत अछि
मुँह बिधुऔने ठाढ़ बहुत अछि

ककरा की कहबै के पतिआएत
गह-गहमे अर्थात बहुत अछि

भयौन बनि ओ अछि ठाढ़ सोझाँमे
हाथक गहमे हाथ बहुत अछि

नीक काज देखि गुमसुम छी ठाढ़
चबासी दऽ दियौ बात बहुत अछि

ओकरहि पाछाँ सभ चलू चलै छी
बदलि देत विश्वास बहुत अछि

२
दोस्तियारी बिना ई राह कठिन अछि
निभरोस रहू तँ काल्हि कठिन अछि

अनठेने नै दै छी कान बात किए यौ
घृणो तँ करू जँ सएह भरल अछि

केलहुँ जखन जे काज सेहो नै हट्ठे
भेल नै होअए से काज केलहुँ अछि

सनेस हमर जे नीक नै लगलनि
प्रेमक दूट आखर केओ सुनै अछि

जे फुलवाड़ी लगा कृपा करै जाइ छी
आपरूपी बूढ़ नेना बनैत अछि

३
बिसबासी लोक जे जीवनमे हमर
प्रेम लै-दै बला समाजक परिचर

चिन्ताक मोटगर रेख कपारपर
छल छोट से बनल आब छेबगर

जतेक माँगलक देलहुँ बेशिये कऽ
रेख नहि आओल कखनो माथपर

जकरा पदक होश बेहोश बनौने
घृणा चक्कूओसँ बेशी अछि धरगर

दोसराक दर्दसँ दुखी भेलहुँ अछि
नेनोसँ बेशी जे भेलहुँ सुखितगर

४
खेत-खम्हारक काज कऽ सकलहुँ
सप्पत देल गप्प निमाहि देलहुँ

बिसबास रहए तेँ झगड़ा-झाँटी
पाइ तँ आएल समए गमेलहुँ


झगड़ा करैत छी बहुत अहाँसँ
प्रेम करैत छी बुझा ने सकलहुँ

आकांक्षाक पजरैत अग्निक बिच
पैघ छी तकर चेन्हासी कहलहुँ

देखै छी बजै ने छी कोना ने ई कहू
हमहूँ ओहिना घुरा कऽ कहलहुँ

५
भय रहित सत्यसँ भेँट भेल
सुरेब सम्पूर्ण छल अविचल

चित्रक रंगक करतब लेल
उद्देश्यक पाछाँ भटकि रहल

बड़का सन काजक छाह अछि
देखल विस्तृत सुन्दर बनल

आजुक बात खतम होएत यौ
भोरुका बसात से बिर्रो बनल

पूछू सभसँ आ छोड़ू नै ककरो
नव विहान किए छल रोकल

६
दिन-राति बीतल से मोन पड़ल ऐ
अपन आ आनोपर भरोस अछिये

आस्ते सँ जे सिहकि उठल ई बसात
अन्तर्मनक शक्ति बदलि देत सत्ते

विश्वासपर अडिग चलि रहल छी
नवजीवनपथ समस्या ने कोनो ऐ

सिखबाक ई इच्छा खतम भऽ गेने की
मगजक शान्ति भेटत के ई कहै ऐ

ओहि सोचल बुनल असत्य बातक
सत्यक प्रति ई नरम जे भेलहुँ ऐ

मोन पाड़ल नीक खराप बिसरि कऽ
मित्र बढ़ल अछि आ शत्रु कमल ऐ
७
छातीक धरधड़ी घटि बढ़ल अछि
पएर थाकल बेहोशी थम्हल नहि

प्रेममे पड़ि घुरमि हम रहल छी
साँस फुलल आ उद्वेग कमल नहि

निन्नक मारल अछि आँखि फुलल ई
प्रेमक सभटा आख्यान कहल अछि

कहू किए अछि ई चित घबड़ाएल
स्मृति हँसि सूरति बदलल अछि

माँछ बिनु पानिक उन्टा प्रेम हम्मर
प्रेम पाबि खटबताह बनल अछि

हँसैत ओकर जे मुँह हम देखल
सुन्दर सलिल ई धार बहल अछि

आस बहुत छल क्षणमे से बीतल
आस निराशमे कोनो अन्तर नहि

प्रेम पियासल मोन भेल उचाट ई
ई बिसरि गेने तँ बाट बहुत अछि
८
बकथोथीसँ काज चलत नै
आत्म प्रशंसे बात बनत नै

भौकीसँ हम नै घबड़ाएब
पथमे प्रतिकार करब नै

भार मिलि- कऽ सभ उठबै छी
उठल नै आ की गुड़कल नै

खतम करू बात बड्ड भेल
ठठा हँसू तँ बात बढ़त नै

देखि छूबि अनुभूतिक क्षण
ई पाँती इतिहास बनत नै


शनिवार, 27 नवंबर 2010

गजल- गजेन्द्र ठाकुर

१
रातिक इजोरिया देखि रहल तारा कहलक
तरेगन छोट तैयो इजोतक खिस्सा कहलक

चन्द्रमाक इजोतक चर्च तँ बड़ होइ छै
एहि पिरौँछ इजोतक खेरहा कहलक

उज्जर दपदप इजोतक ई इजोरिया
देत संग अन्हरियामे फरिछा कहलक

पिरौँछ सरिसव फूल हँसि रहल अछि
ई इजोरिया पिरौंछ किए ने से कहलक

२
जे ई गप अहाँ हमरासँ ने कहितौं
जे फूसि-फटक हमरासँ ने करितौं

मोनमे रखबाक हमरा जे रहितै
तँ कोनो आन बहन्ना नै बना सकितौं

ई ठोढ़क फुफरी चानिपर पसेना
घाम चुबैत सुगन्धि पाबि सुरकितौं

आरि-धूर बाटे चली आ जा कऽ पहुँची
बीच सड़क ठाढ़ छै रोकि ने सकलौं

 ३
पिपनी झुकल डिम्हा उठल करजनी सन आँखि छै
की की बीतल नै कहि सकब कहि सकब एखन नै

आ देखल मेघक टिक्कर खसि रहल छै अकासमे
हुलसि ताकल खेत दिस, उल्लास पर्वत चढ़ल ऐ

चढ़ल ई आबि रहल, ई धार बाढ़ि बनि कऽ केहन
बाँचल रहत हमर जलोदीप की गाम हमर ऐ

४
जाऊ कत्तऽ टिटही सेहो इजोरियामे भागल
अन्हरिया राति आ जिनगी झूर-झाम बनल

कते बुझाएब ककरा ई, कते सम्हारब की
जिनगीक प्रयाण संग रस्ता संग्राम बनल

लोथ प्रेत राकश बिच ठाढ़ छी असगर की
मनुक्ख लगैए जे लहास जिनगीक उठल

साँझ अन्हरगर अछि, राति अछि बाँचल की
की भोरक बाट ताकू? फेर साँझ घुरि आएल

इजोरिया छैक कतबो, छै तँ रातिये सगरो
दिनोमे ग्रहण आ सगरो अन्हार पसरल

सोमवार, 22 नवंबर 2010

गजल

बाट अन्हार मे डूबल केकरा बजाउ

जगैत लोक सूतल केकरा बजाउ



चललहुँ लए सप्पत रहब एक संग

बहुतों मोड़ पर छूटल केकरा बजाउ



दुनियाँ इ घालमेलक इ दुनियाँ भ्रमजाल

दुनियाँ स्वर्ण-सुन्नरि-बोतल केकरा बजाउ



राम छथि ठगाएल अल्ला छथि बौआएल

मंदिर-मस्जिद टूटल केकरा बजाउ



लिखबाक लेल व्यग्र अनचिन्हार शेर

अछि अपूर्ण गजल केकरा बजाउ

सोमवार, 15 नवंबर 2010

गजल

इ की केलिऐक बैसले-बैसल अहाँ

आगि लगा देलिऐक बैसले-बैसल अहाँ


रोड़ी कहींक इँटा,बालु, सीमेंट कहींक

महल बना लेलिऐक बैसले-बैसल अहाँ


अगसतस्य पीने छलाह एकटा नदी

सागर सोखि गेलिऐक बैसले-बैसल अहाँ


इन्द्र की करताह परतर अहाँ सँ

जनतंत्र जन्मा देलिऐक बैसले-बैसल अहाँ


लाठी-भाला लए तैआर खेतिहर

परड़ू ठुका देलिऐक बैसले बैसल अहाँ

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

गजल

सभ के दियाबातीक शुभकामना

गुंगुआइत बसात चुप्प रहू

पदुराइत बसात चुप्प रहू



चारु दिस पसरि गेल धूआँ

पझाइत बसात चुप्प रहू



अहाँक कुठां जड़ि जमेने अछि

किकिआइत बसात चुप्प रहू



अहूँ पर हँसत केओ एक दिन

ठिठिआइत बसात चुप्प रहू



जे भेटत अनचिन्हारे भेटत

चिचिआइत बसात चुप्प रहू

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

गजल

गजल- कालीकांत झा "बूच"


सध्यः अहाॅ, मुदा छी सपना एहि जीवन मे
सहजो सुख भऽ गेल कल्पना एहि जीवन मे

विहुॅसल ठोर विवश भऽ विजुकल,
मादक नैन नोर केर नपना एहि जीवन मे


अछि केॅ कतऽ श्रृंगार सजाओत्,
आश लाश पर कफनक झपना एहि जीवन मे


दुनियाॅ हमर एकातक गहवर,
भेल जिअत मुरूतक स्थपना एहि जीवन मे

दीप वारि अहाॅ द्वारि जड़यलहुॅ,
घऽर हम लोकक अगितपना एहि जीवन मे

गजल

गजल- कालीकांत झा "बूच"


अहॅक लेल रंजन, हमर भेल गंजन
केहेन खेल ई, रक्त सॅ हस्त मंजन

तरल नेह पर मात्र दुःखक सियाही,
जड़ल देह हम्मर अहॅक आॅखि अंजन

रचल गेल छल जे, सुखक लोक सुन्दर
चलल अछि प्रलय लऽ तकर सुधिप्रभंजन

मृतक हम, अहाॅ छी सुधा स्वर्ग लोकक
अहॅक लेल यौवन हमर गेल जीवन

गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010

गजल

कोनो वस्तु जखन हेड़ा जाइत छैक वा नष्ट भए जाइत छैक तकरा बादे ओकर महत्व बुझबा मे अबैत छैक। से साँचे।आइ सँ आठ-नए बर्ख पहिने जहिआ हम अपन परिवार, समाज, घर-आगँन के क्षणिक आवेश मे बिसरि अनचिन्हार बनि गेल रही तहिआ इ नीक लगैत रहए मुदा आब जखन की हमर आँगनक जेठ भौजी एहि बर्खक कलश-स्थापन सँ किछुए समय पू्र्व भगवतीक शरण मे चल गेलीह, हमरा लगैए

जे वास्तव मे हम अनचिन्हारे रहि गेलहुँ। हम केकरो चिन्हिए की नहि चिन्हिए मुदा जे-जे हमरा चिन्हैए से हमर संग छोड़बाक मोन बना

लेने अछि तकर अनुभव आब हमरा होइए। मुदा अनुभव भेनहे की हएत।समय पर केकरो वश नहि छैक। मुदा समय के फाड़ि भौजीक जे असीरबाद हमरा लग अछि ताही बले हम एतए हुनक आखर-तर्पण करबाक लेल आएल छी। प्रस्तुत अछि शब्द-श्रद्दांजलिक किछु ठोप बुन्न--------------------------------------------------

सभ बिसरलहुँ मुदा नाम अहाँक इयाद अछि

सच मानू जिनगी हमर आबाद अछि



हमर सभ किछु बस अँहिक देल थिक

नोर बनल चरणामृत हँसी परसाद अछि



भोगि लेब सभ तरहँक सुख पाइ सँ

अँहाक आँचर बिनु सभ बरबाद अछि



भनहि सभ बनि जाएत दुश्मन हमर

अनचिन्हार लग अँहिक असीरबाद अछि





शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

गजल

दर्दक गीत गबैए अनचिन्हार

टूटल करेज जोड़ैए अनचिन्हार



नहि भेटैत छथि ओ हमरा

सपने मे देह छुबैए अनचिन्हार



महँगाइ अनुरूपे आमदनी नहि

हरिश्चन्द्र बनि रोहित बेचैए अनचिन्हार



जहिआ सँ हुनका देखलहुँ हम

सपना देखि करोट फेरैए अनचिन्हार



मीलि गेलै जखन ठोर सँ ठोर

प्रेमक संसार मे घुमैए अनचिन्हार

बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

गजल

प्रस्तुत अछि अरविन्द ठाकुरक गजल
साभार विदेह

जनहित के एहि बजट मे एखन वित्तीय-क्षति अनुमाने पर अछि

हमरा एना किऐ लगैछ जे संकट हमर प्राणे पर अछि

अयोध्या मे रामलला लेल किऐ पड़ल बूइयाँ के संकट

भू-अर्जन के अखिल भारतीय भार जखन हनुमाने पर अछि

सगर देश के सभ इनार मे बैमानी के भांग घोरायल

बनखांट मे बैमानी के जांच-भार बैमाने पर अछि

लूटि-कूटिकए, भीख मांगिकए पेट भरैए लोक, तखन

संविधान केँ आत्मघात सँ तोड़ैक दोष किसाने पर अछि

मार्क्स आर एंजेल्स केँ पीयल, घंटल लाल-किताब मुदा

मोनक कोनो अन्तर्तम मे बस भरोस भगवाने पर अछि

गजल कहैत “अरबिन” जेना हम परकाया-प्रवेश केलहुँ

ने निज के अछि बोध, ने अपन चित आ अकिल ठेकाने पर अछि



सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

गजल



१
तेजगर छी से छद्म ज्ञान छल
खिखिर कटाबै भौकी प्रतिपल

हिल्कोरक संग जाइत बहैत
संग हमर जे घास-फूस छल

अकलबेर मे बिसरि गेल जे
गिरिमाल लेने ठाढ़ ओतै छल


सूर्य-किरिण से मद्धिम-मद्धिम
सेहो गर्दासँ झँपा रहल छल

नटुआ बिपटा बनि हँसै अछि
तोहूँ हमरे सन अछि देखल

जागि अन्हरिया केलहुँ काज जे
सेहो मस्त ओंघाएल सन छल

आन्ही संग झमटगर अछार
बान्ह एखनो अछि सुखा रहल

शान्त भंगिमासँ काज करै जाउ
निराउ वर्षा अछि देखा रहल

मानरि-अबाज रहि कऽ अबैछ
झाँपि बोल ई सुना रहल छल

गप बिच्च ठकुरा दैत रहै छी
काज करू धए कए करिनाल

ताहि मनुख-गाछी भुताहि बिच
ओ मनुक्खगन्ध सूंघि सहै छल

२
बानर पट लैले अछि तैयार
बिरनल सभ करू ने उद्धार

गाएक अर्र-बों सुनि अनठेने
दुहै समऐँ जनताक कपार

पुल बनेबाक समचा छैक नै
अर्थशास्त्र-पोथीक छलै भण्डार

कोरो बाती उबही देबाक लेल
आउ बजाउ बुढ़ानुस - भजार

डरक घाट नहाएल छी हम
से सहब दहोदिश अत्याचार

ऐरावत अछि देखा - देखा कए
सभटा देखैत अछि ओ व्यापार

३

कानैत दुनू बच्चाकेँ देखलहुँ बिछुड़ैत काल
सम्वेदना छै बाँचल जकर चहुँदिस अकाल


बिसरी हँसैत खिलखिलाइ अनमुनाह सन
अछि बुरबक बताह मथसुन्न अछि ई काल

गम्भीर बात विचारेँ ओढ़ल देखल कलुषता
काल सन चंठ अछि सम्वेत ई सुन्ने देखाएल

लाल सूर्यकेँ पीअर कपीश होइतहिँ ओकर
पाँजड़ दबल मनुषता ई-ओ-हे जाइत काल

सुन्न-मसान बोनक मचानपर बैसल छी की
भगजोगनीक बाड़ल भकराड़ ई राति भेल

ऐरावत देखैत इजोतक बिर्रो- बाढ़ि- दुर्भिक्ष
ग्रहणक ई सूर्य थाकल देखै छी चोन्हराएल

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

गजल

आव विसरव कोना सुनू जननी अहॉ, कतेक निर्मल सेहंतित अहॅक ऑचर।
हिय सिहकै जखन वहै लोचन तखन नोर पोछलहुॅ लपेटि हम अहॅक ऑचर।।



कोना अयलहुॅ खलक ? मोन नहि अछि कथा, पवित्र पट सॅ सटल देह भागल व्यथा।

सिनेह निश्छल अनमोल प्रथम सुनलहुॅ मातृबोल, मोह ममताक आन के‘ करत परतर?


दंत दुग्धक उगल, नीर पेट सॅ वहल, देह लुत्ती भरल कंठ सरिता सुखल।
जी करै छल विसविस तालु अतुल टिसटिस, मुॅह मे लऽ चिवयलहुॅ अहॅक ऑचर।



नेना वयसक अवसान ताक‘ चललहुॅ हम ज्ञान, कएलहुॅ गणना अशुद्ध गुरू फोड़ि देलनि कान।

सिलेट वाट पर पटकि मॉक कोर मे सटकि, तीतल कमलाक धार सॅ अहॅक ऑचर।



देखि पॉचमक फल मातृदीक्षा सफल, भाल तिरपित मुदा ! उर तृष्णा भरल।
गेलहुॅ कत‘ हे अम्बे कत‘ गेल ऑचर, ताकि रहलहुॅ हम ऑगन सॅ पिपरक तर।

गजल

गजल- कालीकांत झा "बूच"


श्याम होइछ परक प्रेम अधलाह हे,

तेॅ बिसरि जाह हमरा बिसरि जाह हे ।


दीप बुझि रूप केॅ जुनि हृदय मे धरह,मोहवाती जरा तेल नेहक भरह ।

कऽ देतऽ जिन्दगी केॅ ई सुड्डाह हे,तेॅ बिसरि जाह हमरा विसरि जाह हे ।


हऽम मधुबन मे साॅझक पहिल तारिका,तोॅ फराके बनावह अपन द्वारिका ।
उठि रहल अछि अनेरेक अफवाह हे,



हम विमल राश केर खास संयोजिका,छी प्रवल गोप केर प्रेयसी गोपिका,

घाट सॅ खुलि चुकल अछि हमर नाह हे,




मोन मे उत्तरी सागरक जल भरह,लाख चुचुकारी बर्फक महल मे धरह,
हम तहू ठाम बरबानलक धाह हे,

गजल

गजल- कालीकांत झा "बूच"


स्वप्न सुन्दरि अहाॅ जीवनक सहचरी ।
निन्न मे आउ अहिना घड़ी दू घड़ी ।।


भोग भोगल जते जे बनल कल्पना,आब भऽ गेल अछि अन्तरक अनमना,

हऽम मानव अहाॅ देव लोकक परी ।




मात्र उत्तापदायी बसंती छटा,आब संतापदायी अषाढ़ी घटा,
काॅट लागनि सुखायल गुलाबी छड़ी ।




रूप अमरित पिया कऽ अमर जे केलहुॅ,विक्ख विरहक खोआ फेर की कऽ देलहुॅ ?

घऽर मे जिन्दगी गऽर मरनक कड़ी ।





वेर वेरूक अहॅक फेर अभयागतम्,अछि सदा सर्वदा हार्दिक स्वागतम्,
कप्प चाहक दुहू नैन मन तस्तरी ।

गजल

गजल- कालीकांत झा "बूच"


आशवर शीघ्र श्रावण मे औता पिया,
प्यास पर नीर पावन बहौता पिया ।।

देखि हुनका सुखक मारि सहि ने सकब,खसि पड़ब द्वारि पर ठाढ़ रहि ने सकब,

पाशतर थीर छाती लगौता पिया,प्यास पर नीर पावन बहौता पिया ।।



भऽ उमंगित बहत आड़नक बात ई,उल्लसित भऽ रहत चाननक गात ई,
पाततर पिक बनल स्वर सुनौता पिया,प्यास पर नीर पावन बहौता पिया ।।

मन उमड़ि गेल बनि गेल यमुना नदी,तन सिहरि गेल जहिना कदंबक कली,

श्वास पर धीर बंसुरी बजौता पिया,प्यास पर नीर पावन बहौता पिया ।।

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

गजल

(ग़ज़ल जेकाँ किछु:मैथिली मे)

कोन एहन त्रुटि भ' गेल हमरा अहाँ जकर गीरह बन्हने छी
ककरो कोनो समाद तं नहिएँ चिट्ठी - पत्री बंद केने छी

सबटा युगसंभव मानय मोन बज़ार कें हमहूँ चिन्हने छी
ककर स्नेह आ कोन समर्पणक एहि युग मे निष्ठा धेने छी

करी हिसाब तं की हासिल यौ ह्रदय अहाँ जे पओने छी
सब अभाव-अभियोग कात मे मन जांति सब अनठेने छी

भरि संसार बस्तुएक बाज़ार किछुए मुदा हमहूँ किनने छी
अपनो बस्ती ओहने शो-रूम किछु ने किछु अहूँ सजने छी

दाम पास नहिं रहल आब तं पुरने सबटा अंगेजने छी
मानल आहाँ बहुत देलौन्हें किछु तं हम कहियो देने छी

यैह नियति तं यैह हो सही अहांक देल सबटा धेऩे छी
कहाँ एलनि गुंजन कें गन' अहूं तं भरिसक्के गनने छी.

बुधवार, 15 सितंबर 2010

गजल

प्रस्तुत अछि अरविन्द ठाकुरक गजल- अरविन्द ठाकुर
साभार विदेह

छिछिआइछ उत्कंठा हमर खन आर लग, खन पार लग
हमर लिखल उजास सभक मोल की संसार लग

जाल मुँहमे बोल नञि, छपय बहेलिया के बयान
चिड़ैक बोली बुझत से नञि लूरि छै अखबार लग

रंगबिरही जिनीससँ ठाँसल रहै सभटा दोकान
किन्तु जन-बेचैनी के औषधि नञि रहै बजार लग

एक समझौता सँ शासन वामनक सरकस बनल
नञि छलै पट्ठा कोनो दमगर बचल दरबार लग

बुन्न मे सागर भरल, अणु मे भरल ऊर्जा अपार
बिन्दु सरिपहुँ लम्बवत भए ठाढ़ होइछ आधार लग

लोक-लादल नाह बाढ़िक पानि मे अब-तब मे छै
ओ घिंचाबय छथि फोटो बान्ह पर पतवार लग

नफा के वनतंत्र मे पग-पग बिचौलिया रक्तबीज
अकिल गुम्म अछि, केकर मारफत अर्जी दी सरकार लग

उपरचन्ती माल के चस्का चढ़ल “अरबिन” एतेक
बनल छी लगुआ कि भिरुआ, जायब नञि अधिकार लग
तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों