शनिवार, 30 जुलाई 2016

संशोधन केर मतलब विनाश नै होइ छै

हमर मने आशीष अनचिन्हारक एकटा आलेख दरभंगासँ प्रकाशित दैनिक मिथिला आवाजमे 9 फरवरी 2014केँ "मैथिली गजलमे लोथ गजलकारक योगदान" नामसँ भेल रहै तकर उत्तर दैत सुरेन्द्रनाथजी एकटा आलेख लिखला जे कलकत्तासँ प्रकाशित कर्णामृत केर अप्रैल-जून 2015मे "मैथिली गजलक पूंषत्वहीन आलोचना" केर नामसँ प्रकाशित भेल आ सुरेन्द्रनाथ जीक ऐ आलेखक उत्तर दैत हमर एकटा आलेख कर्णेमृतक नवीन अंक अप्रैल-जून 2016मे "संशोधन केर मतलब विनाश नै होइ छै" नामसँ प्रकाशित भेल अछि। ओना संपादक महोदय किछु काँट-छाँट सेहो केलखनि अछि तँए  मूल आलेख देल जा रहल अछि पढ़ल जाए। संगे-संग ऐ मूल लेखक अंतमे कर्णामृतमे प्रकाशित लेखक कटिंग सेहो देल जा रहल अछि पहिले सुरेन्द्रनाथजीक तकर बाद हमर बला----



संपादक/ उपसंपादक महोदय लोकनिसँ आग्रह जे ऐ आलेखमे आएल सभ उदाहरण आ ओकर लक्षणकेँ यथावत् राखथि कारण गजल उच्चारणपर निर्भर करै छै आ उच्चारण वर्तनीपर। संगे-संग दू शेरक बीचमे जते जगह छै से रहऽ दियौ।

संशोधन केर मतलब विनाश नै होइ छै

(आलोचना)
आशीष अनचिन्हार

अप्रैल-जून 2015मे प्रकाशित सुरेन्द्रनाथ जीक आलेख " मैथिली गजलक पूंषत्वहीन आलोचना" पढ़लहुँ  आ ओहिपर हम अपन किछु विचार राखऽ चाहब। ओना सुरेन्द्रनाथ जीक आलोचना हमर आलेखपर केंद्रित छल तँए पाठककेँ लगतिन जे ई प्रत्यालोचना थिक मुदा सुरेन्द्र नाथ जी अपने ठाम-ठीम किछु स्पष्ट करऽ कहने छथि तँइ ई आलेख लऽ कऽ हम आएल छी आ पाठक सभसँ आग्रह जे एकरा प्रत्यालोचना नै बल्कि सुरेन्द्र नाथजीक आग्रह मानबाक परिणाम बूझथि। जे-जे चीज सुरेन्द्रजी हमरासँ बूझए चाहै छथि वा हुनकर जै-जै विचारपर हमरा आपत्ति अछि से हम क्रमशः बिंदुवार दऽ रहल छी----
1) ऐ लेखक शुरूआतेमे सुरेन्द्रनाथ जी "मैथिली-हिंदी" लऽ कऽ अगुता गेल छथि। हम फेर जोर दऽ कऽ कहब चाहब जे मैथिलीक अधिकांश रचनाकार हिंदीक नकल करैए आ एकर सबूत सुरेन्द्रनाथजी अपने ऐ आलेखमे बहुत बेर देने छथि। कतहुँ ज्ञानेन्द्रक ना तँ कतहुँ अनिरुद्ध सिन्हा तँ कतहुँ हिंदी गजलः संघर्ष और सफलता। कुल मिला कऽ ई आलेख हिंदीक नकल थिक आ ऐ आलेखसँ ई हमर ओ विचार मजगूत भऽ जाइए जकरा तहत हम बेर-बेर कहै छी आ कहऽ चाहब जे मैथिलीक अधिकांश लेखन हिंदीक नकल थिक। ऐ ठाम ई स्पष्ट करब बेसी जरूरी जे सुरेन्द्रनाथ जी रेफरेन्स दैत काल अपन मानसिक वर्णसंकरताक परिचय देने छथि। पूरा दुनियाँक रेफरेन्स तँ दऽ देला मुदा गंगेश गुंजन जीक "बहर-मेनिया" बला कथन ओ कहाँसँ लेला। विदेहमे मुन्नाजीक संयोजनमे गजलक उपर परिचर्चा भेल रहै आ तैमे गंगेश गुंजन जीक आलेखमे ई संदर्भ आएल छै आ बादमे ई आलेख विदेह-सदेहमे प्रिंट रूपमे एलै। मुदा रेफरेन्समे एकर चर्चा नै। की सुरन्द्रनाथजी ई कहि सकै छथि जे अमीर खुसरोक मैथिली मिश्रित गजलक अंश ओ कहाँसँ प्राप्त केने छथि? संगे-संग ओ राजेन्द्र विमलजीक उक्ति कहाँसँ आनि लेलथि जखन की ओ इंटरव्यू विदेहमे प्रकाशित छै (सदेहमे सेहो)| ई छनि सुरेन्द्रनाथजीक मानसिक वर्णसंकरता जकरा ओ बेर-बेर अपन आलेखमे देखेने छथि।
                                                                                            
2) लगैए जे सुरेन्द्रनाथजी जखन तामसमे अबैत हेता तखन हुनक आँखि मुना जाइत हेतनि (मात्र अनुमान) से हम माया बाबू आ नीरजजीक संदर्भमे हिनक तामसकेँ देखैत अनुमान लगा रहल छी। हमरा ने माया बाबूक गीतलसँ परेशानी अछि ने बीतलसँ। हिंदीक नीरजकेँ उँच स्थान मात्र ऐ दुआरे देल गेलन्हि जे ओ हिंदी भाषाक क्षमतापर बिना बयान देने कहलखिन जे गजलक नाम गीतिका हेबाक चाही। ऐठाम धेआन दिऔ नीरजजी ई कहियो नै कहलखिन जे हिंदीमे गजल लिखब संभव नै छै, तँइ हिंदीमे नीरजजीकेँ ऊँच स्थान भेटलनि। ऐकेँ उल्टा माया बाबू अपन अक्षमताकेँ झाँपि ई बयान देला जे मैथिलीमे गजल लिखब संभव नै तँए गीतल हेबाक चाही। दूनू बयानमे फर्क छै तँए दुन्नूक सम्मानो अलग-अलग। हमरा ने माया बाबूपर आपत्ति अछि आ ने हुनक प्रयोगपर हमरा तँ बस हुनकर उद्येश्यपर आपत्ति अछि। माया बाबूक सामने निस्सन मैथिली गजलक परंपरा छल ओइकेँ बाबजूदो एहन बयान किएक?

3) जेना प्रकृति अपन मान्यता लेल केकरो पुछारी नै करै छै तेनाहिते पं.जीवन झा, कविवर सीताराम झा आ मधुपजीक गजलकेँ कोनो आशीष अनचिन्हार वा सुरेन्द्रनाथ की आन कोनो गजलकारक अनुसंशाक जरूरति नै छै। पं.जीवन झा, कविवर सीताराम झा आ मधुपजीक गजल मैथिली गजलक पूर्वज थिक तँ ई तीनू गोटें निश्चित रूपसँ मैथिली गजलक "असल प्रवर्तक” छथि। सुरेन्द्रनाथजी पुछै छथि जे "की  ओ सभहँक (पं.जीवन झा, कविवर सीताराम झा आ मधुपजीक) गजलक व्याकरण अनचिन्हारक आखरक व्याकरणसँ ऐम-मेन मेल खाइत अछि। जँ सएह तँ हुनकर सभहँक अवसान भेलाक बादो मैथिली गजल बाँझ अथवा मसोमात किए बनल रहल?"
आब ऐ प्रश्नक उत्तर तँ सुरेन्द्रनाथजी अपने छथि। बाप बच्चाक लालन-पालन करै छै मुदा जँ बच्चा जवान भेलाक बाद अपना हिसाबें चलै छै तँ फेर ओइमे बापक कते सहभागिता? पं.जीवन झा, कविवर सीताराम झा आ मधुपजी ई तीनू गोटें व्याकरणयुक्त गजल देला मुदा तकर बादक नकलची पीढ़ी जँ पं.जीवन झा, कविवर सीताराम झा आ मधुपजीकेँ नै गुदानै तँ फेर ओइ लेल ई तीनू (पं.जीवन झा, कविवर सीताराम झा आ मधुपजी) किए दोषी हेता। जा धरि मैथिली गजलमे सुरेन्द्रनाथजी सन-सन अराजक गजलकार होइत रहत ता धरि मैथिली गजल बाँझ अथवा मसोमात बनल रहत।ऐ तीनू (पं.जीवन झा, कविवर सीताराम झा आ मधुपजी)क संपूर्ण गजल ओ ओकर व्याकरणिक व्याख्या सहित पढ़बाक लेल "मैथिलीक प्रतिनिधि गजल 1905सँ 2014 धरि" नामक पोथी देखू।

4) बहुत रास अराजक गजलकार जकाँ सुरेन्द्रनाथजी सेहो बहर आ छंदकेँ अलग-अलग मानै छथि। ई माननाइ तेहने भेल जेना कियो वाटर आ पानिकेँ अलग मानथि। बुक आ पोथीकेँ अलग मानथि। सच तँ ई छै जे बहर आ छंदमे मात्र भाषायी अंतर छै। संस्कृतमे छंद कहल जाइत छै तँ अरबीमे बहर। ओना एकटा तात्विक अंतर जरूर छै जे संस्कृतमे छंद व्यापक अर्थ दै छै आ सरल वार्णिक, वर्णवृत आ मात्रिक तीनू छंद अबै छै तँ बहरमे मात्र वर्णवृत। ओना अरबीमे सरल वार्णिक आ मात्रिक छंदक प्रचार नै केर बराबर छै आ वर्णवृतक एकछत्र राज्य छै तँए बहर आ छंद एक समान अछि। वर्णवृत वा बहरक साधारण नियम छै जे ई लघु-गुरू द्वारा निर्धारित होइत छै (बहुत काल लघु-गुरू लेल लघु-दीर्घ वा ह्रस्व-दीर्घ युग्म केर सेहो प्रयोग होइत छै)। आ संस्कृतक वर्णिक छंदमे पहिल पाँतिक मात्राक्रम जे छै सएह सभ पाँतिक मात्राक्रम समान हेबाक चाही आ प्रत्येक शब्दक संख्या समान हेबाक चाही तखन वार्णिक छंद हएत। अरबियोमे तेहने सन छै मुदा आधुनिक भाषामे मात्राक्रम तँ समान रहलै मुदा अक्षर संख्या उपर निच्चा कऽ सकै छी। संगे-संग गजल लिखबा कालमे किछु छूट देल जाइत छै जे की मात्र आवश्यक स्थितिमे प्रयोग होइत छै। आब ई लघु-गुरूक की व्यवस्था छै वा छूट कोन रूपें लेल जेतै से जनबाक लेल कोनो छंदशास्त्रीक पोथी पढ़ि लिअ। ओना हमरा पूरा उम्मेद अछि जे सुरेन्द्रनाथजी लग लघु-गुरू गनबाक ज्ञान हेबे करतनि ( ई उम्मेद हमरा ऐ लेल अछि कारण सुरेन्द्रजी अपन आलेखमे बेर-बेर छूट बला ज्ञानक प्रदर्शन केने छथि)। ऐठाम कही जे गजलक हरेक पाँतिक मात्राक्रम एक समान हेबाक चाही ( एक समान मात्रा आ एक समान मात्राक्रम दूनू अलग-अलग वस्तु छै)।

5) कहबी छै जे "नकल करबाक लेल अकल चाही" मुदा सुरेन्द्रनाथजीकेँ नकलो करबाक बुद्धि नै छनि। ओ कोनो ज्ञानेन्द्र केर पोथीक उदाहरण दै छथि आ कहै छथि जे निराला गजलक व्याकरणकेँ तोड़ि देला। सच तँ ई अछि जे निराला मात्र विषय परिवर्तन केला आ उर्दू शब्दक बदला गजलमे हिंदी शब्दक प्रयोग केला। मैथिलीक बहुत रास शाइर एहने अराजक बयान दैत छथि जे दुष्यंत कुमार व्याकरण तोड़ला तँ अदम गोंडवी ई केला तँ ओ ओना केला। मुदा हिंदीक सभ गजलकार व्याकरणक पालन केला खाली ओ विषय परिवर्तन केला आ हिंदी शब्दक प्रयोग बेसी केला। हम ऐठाम पहिने निराला आ शमशेर बहादुर सिंह केर गजलक व्याकरण देखा रहल छी ( चूँकि सुरेन्द्रनाथजी फैशन आ नकल करैत बिना पढ़ने हिनकर सभहँक नाम लेने छथिन) आ तकर बाद जयशंकर प्रसाद सहित दुष्यंत कुमार, अदम गोंडवी, मुनव्वर राना सहित आन-आन गजलकारक गजलक व्याकरण देखा रहल छी। वास्तवमे सुरेन्द्रनाथजी भ्रम पसारि रहल छथि वा ई कहब बेसी उचित जे ओ अपन अज्ञानताक कारणें भ्रम पसारि रहल छथि।  ऐठाम हम कही जे सुरेन्द्रनाथजी अपन आलेखमे कत्तौ उदाहरण नै देने छथि जे कोन तरहें निरालाजी गजलक व्याकरणकेँ तोड़लखिन मुदा हम उदाहरण दऽ कऽ देखा रहल छी जे हिंदीक सभ गजलकार सभ कोना व्याकरणक पालन केलथि। । तँ पहिने निराला आ शमशेर बहादुरक गजलकेँ देखू--
(संपादक/ उपसंपादक महोदय लोकनिसँ आग्रह जे ऐ आलेखमे आएल सभ उदाहरण आ ओकर लक्षणकेँ यथावत् राखथि कारण गजल उच्चारणपर निर्भर करै छै आ उच्चारण वर्तनीपर।संगे-संग दू शेरक बीचमे जते जगह छै से रहऽ दियौ)
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

भेद कुल खुल जाए वह सूरत हमारे दिल में है
देश को मिल जाए जो पूँजी तुम्हारी मिल में है

मतला ( मने पहिल शेर)क मात्राक्रम अछि-- 2122+2122+2122+212 आब सभ शेरक मात्राक्रम इएह रहत। एकरे बहर वा की वर्णवृत कहल जाइत छै। अरबीमे एकरा बहरे रमल केर मुजाइफ बहर कहल जाइत छै। मौलाना हसरत मोहानीक गजल " चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है" अही बहरमे छै जकर विवरण आगू देल जाएत। ऐठाँ ई देखू जे निराला जी गजलक विषय नव कऽ देलखिन प्रेमिकाक बदला विषय मिल आ पूँजी बनि गेलै मुदा व्याकरण वएह रहलै। हमरा ने ज्ञानेन्द्रसँ मतलब अछि ने सुरेन्द्रनाथसँ। हमरा मात्र पाठकसँ मतलब अछि आब वएह कहथि जे कि निरालाजी व्याकरण कतऽ तोड़लखिन? आब हम ऐठाम सुरेन्द्रजीसँ आग्रह करबनि जे हुनका तँ लघु-गुरूक सिद्धांत अबिते छनि तँ आब बाँचल शेरक निर्णय कऽ लेथु। सभ पाठकसँ आग्रह जे निर्णय करथि जे निराला जी बहरक पालन केला की नै। बाँचल शेर एना छै--

हार होंगे हृदय के खुलकर तभी गाने नये,
हाथ में आ जायेगा, वह राज जो महफिल में है

तरस है ये देर से आँखे गड़ी श्रृंगार में,
और दिखलाई पड़ेगी जो गुराई तिल में है

पेड़ टूटेंगे, हिलेंगे, जोर से आँधी चली,
हाथ मत डालो, हटाओ पैर, बिच्छू बिल में है

ताक पर है नमक मिर्च लोग बिगड़े या बनें,
सीख क्या होगी पराई जब पसाई सिल में है

शमशेर बहादुर सिंह
1
जहाँ में अब तो जितने रोज अपना जीना होना है,
तुम्हारी चोटें होनी हैं हमारा सीना होना है।

वो जल्वे लोटते फिरते है खाको-खूने-इंसाँ में :
'तुम्हारा तूर पर जाना मगर नाबीना होना है!

ऐ गजलक मतलाक मात्राक्रम अछि 1222-1222-1222-1222 आ एकर पालन दोसर शेर सहित आन सभ शेरमे अछि। सुरेन्द्रनाथजीसँ आग्रह जे ओ पूरा गजल पढ़ि लेथि।
चूँकि सुरेन्द्रनाथजीक इच्छित उदाहरण हम दऽ चुकल छी मुदा तैयो हम ऐठाम हिंदी-उर्दूकक किछु महत्वपूर्ण गजलक व्याकरण देखा रहल छी जे तँ मुख्यतः पाठक लेल अछि मुदा सुरेन्द्रनाथ आ हुनकर संगी सेहो देखथि--
जयशंकर प्रसाद

सरासर भूल करते हैं उन्हें जो प्यार करते हैं
बुराई कर रहे हैं और अस्वीकार करते हैं

उन्हें अवकाश ही इतना कहां है मुझसे मिलने का
किसी से पूछ लेते हैं यही उपकार करते हैं

जो ऊंचे चढ़ के चलते हैं वे नीचे देखते हरदम
प्रफ्फुलित वृक्ष की यह भूमि कुसुमगार करते हैं

न इतना फूलिए तरुवर सुफल कोरी कली लेकर
बिना मकरंद के मधुकर नहीं गुंजार करते हैं

'प्रसाद' उनको न भूलो तुम तुम्हारा जो भी प्रेमी हो
न सज्जन छोड़ते उसको जिसे स्वीकार करते हैं

प्रसादजी ऐ गजलक बहर अछि-- 1222-1222-1222-1222
आजुक समयक प्रसिद्ध शाइर आ फिल्मी गीतककार जावेद अख्तरजीक ई गजल देखू जे की जगजीत सिंह गेने छथि--
तमन्ना फिर मचल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ
ये मौसम ही बदल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ
1222-1222-1222-1222

आब पूरा गजल देखू--

तमन्ना फिर मचल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ
ये मौसम ही बदल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ

मुझे गम है कि मैने जिन्दगी में कुछ नहीं पाया
ये ग़म दिल से निकल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ

नहीं मिलते हो मुझसे तुम तो सब हमदर्द हैं मेरे
ज़माना मुझसे जल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ

ये दुनिया भर के झगड़े, घर के किस्से, काम की बातें
बला हर एक टल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ

आब हसरत मोहानीक ई प्रसिद्ध गजल देखू--

2122-2122-2122-212
चुपके-चुपके- रात दिन आँ-सू बहाना- याद है
हमको अब तक- आशिक़ी का- वो ज़माना -याद है

आब पूरा गजल देखू--

चुपके-चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है

बा-हज़ाराँ इज़्तराब-ओ-सद हज़ाराँ इश्तियाक़
तुझसे वो पहले-पहल दिल का लगाना याद है

तुझसे मिलते ही वो बेबाक हो जाना मेरा
और तेरा दाँतों में वो उँगली दबाना याद है

खेंच लेना वोह मेरा परदे का कोना दफ़तन
और दुपट्टे से तेरा वो मुँह छुपाना याद है

जानकर सोता तुझे वो क़स्दे पा-बोसी मेरा
और तेरा ठुकरा के सर वो मुस्कराना याद है
(ई गजल बहुत नमहर छै तँए मात्र पाँच टा शेर दऽ रहल छी)

कबीर दासक एकट गजलकेँ तक्ती कऽ कऽ देखा रहल छी--

बहर—ए—हजज केर ई गजल जकर लयखंड (अर्कान) (1222×4) अछि--

ह1 मन2 हैं2 इश्2, क़1 मस्2ता2ना2, ह1 मन2 को 2 हो 2, शि1 या2 री2 क्या2

हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ?
रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ?

जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते,
हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या ?

खलक सब नाम अपने को, बहुत कर सिर पटकता है,
हमन गुरनाम साँचा है, हमन दुनिया से यारी क्या ?

न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से,
उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ?

कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से,
जो चलना राह नाज़ुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या ?

तेनाहिते आजुक प्रसिद्ध शाइर मुनव्वर राना केर ऐ गजलक तक्ती देखू—

बहुत पानी बरसता है तो मिट्टी बैठ जाती है
न रोया कर बहुत रोने से छाती बैठ जाती है

यही मौसम था जब नंगे बदन छत पर टहलते थे
यही मौसम है अब सीने में सर्दी बैठ जाती है

नकाब उलटे हुए जब भी चमन से वह गुज़रता है
समझ कर फ़ूल उसके लब पे तितली बैठ जाती है

मुनव्वर राना (घर अकेला हो गया, पृष्ठ - 37)
तक्तीअ
बहुत पानी / बरसता है / तो मिट्टी बै / ठ जाती है
1222 / 1222 / 1222 / 1222
न रोया कर / बहुत रोने / से छाती बै / ठ जाती है
1222 / 1222 / 1222 / 1222
यही मौसम / था जब नंगे / बदन छत पर / टहलते थे
1222 / 1222 / 1222 / 1222
यही मौसम / है अब सीने / में सर्दी बै / ठ जाती है
1222 / 1222 / 1222 / 1222
नकाब उलटे / हुए जब भी / चमन से वह / गुज़रता है
1222 / 1222 / 1222 / 1222
(नकाब उलटे के अलिफ़ वस्ल द्वारा न/का/बुल/टे 1222 मानल गेल अछि)
समझ कर फ़ू / ल उसके लब / पे तितली बै / ठ जाती है
1222 / 1222 / 1222 / 1222
आब राहत इन्दौरी जीक ऐ गजलकेँ देखू--
ग़ज़ल (1222 / 1222 / 122) (बहर-ए-हजज केर मुजाइफ)
चरागों को उछाला जा रहा है
हवा पर रौब डाला जा रहा है

न हार अपनी न अपनी जीत होगी
मगर सिक्का उछाला जा रहा है

जनाजे पर मेरे लिख देना यारों
मुहब्बत करने वाला जा रहा है
राहत इन्दौरी (चाँद पागल है, पृष्ठ - 24)
तक्तीअ =
चरागों को / उछाला जा / रहा है
1222 / 1222 / 122
हवा पर रौ / ब डाला जा / रहा है
1222 / 1222 / 122

न हार अपनी / न अपनी जी / त होगी
1222 / 1222 / 122
(हार अपनी को अलिफ़ वस्ल द्वारा हा/रप/नी 222 गिना गया है)
मगर सिक्का / उछाला जा / रहा है
1222 / 1222 / 122
जनाजे पर / मेरे लिख दे / ना यारों
1222 / 1222 / 122
मुहब्बत कर / ने वाला जा / रहा है
1222 / 1222 / 122

फेरसँ मुनव्वर रानाजीक एकटा आर गजलकेँ देखू--
हमारी ज़िंदगी का इस तरह हर साल कटता है
कभी गाड़ी पलटती है कभी तिरपाल कटता है

सियासी वार भी तलवार से कुछ कम नहीं होता
कभी कश्मीर कटता है कभी बंगाल कटता है
(मुनव्वर राना)
1222 / 1222 / 1222 / 1222
(मुफाईलुन / मुफाईलुन / मुफाईलुन / मुफाईलुन)
हमारी ज़िं / दगी का इस / तरह हर सा / ल कटता है
कभी गाड़ी / पलटती है / कभी तिरपा / ल कटता है

सियासी वा/ र भी तलवा/ र से कुछ कम / नहीं होता
कभी कश्मी/ र कटता है / कभी बंगा / ल कटता है
आब दुष्यंत कुमारक ऐ गजलक तक्ती देखू--
2122 / 2122 / 2122 / 212
हो गई है / पीर पर्वत /-सी पिघलनी / चाहिए,
इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए।
आब अहाँ सभ ऐ गजलकेँ अंत धरि जा सकै छी। पूरा गजल हम दऽ रहल छी—


हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

आब कने अदम गोंडवी जीक दू टा गजलक तक्ती देखू—
1222 / 1222 / 1222 / 1222
ग़ज़ल को ले / चलो अब गाँ / व के दिलकश /नज़ारों में
मुसल्सल फ़न / का दम घुटता / है इन अदबी / इदारों में
आब अहाँ सभ ऐ गजलकेँ अंत धरि जा सकै छी। पूरा गजल हम दऽ रहल छी—

ग़ज़ल को ले चलो अब गाँव के दिलकश नज़ारों में
मुसल्सल फ़न का दम घुटता है इन अदबी इदारों में

न इनमें वो कशिश होगी, न बू होगी, न रानाई
खिलेंगे फूल बेशक लॉन की लम्बी क़तारों में

अदीबों! ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ
मुलम्मे के सिवा क्या है फ़लक़ के चाँद-तारों में

रहे मुफ़लिस गुज़रते बे-यक़ीनी के तज़रबे से
बदल देंगे ये इन महलों की रंगीनी मज़ारों में

कहीं पर भुखमरी की धूप तीखी हो गई शायद
जो है संगीन के साये की चर्चा इश्तहारों में.

फेर गोंडवीजीक दोसर गजल लिअ—
2122 / 2122 / 2122 / 212
भूख के एह / सास को शे / रो-सुख़न तक /ले चलो
या अदब को / मुफ़लिसों की / अंजुमन तक /ले चलो
आब अहाँ सभ ऐ गजलकेँ अंत धरि जा सकै छी। पूरा गजल हम दऽ रहल छी--
भूख के एहसास को शेरो-सुख़न तक ले चलो
या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो

जो ग़ज़ल माशूक के जल्वों से वाक़िफ़ हो गयी
उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो

मुझको नज़्मो-ज़ब्त की तालीम देना बाद में
पहले अपनी रहबरी को आचरन तक ले चलो

गंगा जल अब बुर्जुआ तहज़ीब की पहचान है
तिश्नगी को वोदका के आचरन तक ले चलो

ख़ुद को ज़ख्मी कर रहे हैं ग़ैर के धोखे में लोग
इस शहर को रोशनी के बाँकपन तक ले चलो.

आब आधुनिक उर्दूक प्राचीनतम गजलकार हरी चंद अख़्तरजीक ई गजल देखू--

सुना कर हाल क़िस्मत आज़मा कर लौट आए हैं
उन्हें कुछ और बेगाना बना कर लौट आए है
1222-1222-1222-1222
आब पूरा गजल देखू--
सुना कर हाल क़िस्मत आज़मा कर लौट आए हैं
उन्हें कुछ और बेगाना बना कर लौट आए है

फिर इक टूटा हुआ रिश्ता फिर इक उजड़ी हुई दुनिया
फिर इक दिलचस्प अफ़्साना सुना कर लौट आए हैं

फ़रेब-ए-आरज़ू अब तो न दे ऐ मर्ग-ए-मायूसी
हम उम्मीदों की इक दुनिया लुटा कर लौट आए हैं

ख़ुदा शाहिद है अब तो उन सा भी कोई नहीं मिला
ब-ज़ोम-ए-ख़ुवेश इन का आज़मा कर लौट आए हैं

बिछ जाते हैं या रब क्यूँ किसी काफ़िर के क़दमों में
वो सज्दे जो दर-ए-काबा जा कर लौट आए हैं

("फिर इक" मे अलिफ-वस्ल छूट छै आ एकर उच्चारण "फिरिक" छै। तेनाहिते "हम उम्मीदों “ लेल तेहने सन  बूझू।)
कतेक नाम आ गजल दिअ ऐ ठाम। कहबाक मतलब जे हरेक शाइर अपन गजलमे कथ्य आ तेवर बदलै छथि व्याकरण वएह रहै छै। मुदा मैथिलीक विद्वान तँ बस विद्वान छथि हुनका के टोकत। ऐ ठाम ई उदाहरण सभ देबाक मतलब मात्र सही पक्षकेँ उजागर करबाक अछि।
ओना सुरेन्द्रनाथजी कहता जे ई उदाहरण सभ हिंदी-उर्दूक अछि आ मैथिलीक अपन व्याकरण हेबाक चाही। पहिल गप्प जे ओ अपने कहै छथि जे हिंदीक गजलमे व्याकरण नै छै आ दोसर गप्प जे कोनो विधाक व्याकरण तँ मूले भाषासँ लेल जेतै खाली लक्ष्य भाषामे संशोधन हेतै । आब ई संशोधन केना हेतै से ऐ उदाहरणसँ बूझू—
1222-1222-1222-1222 (मने लघु-दीर्घ-दीर्घ, लघु-दीर्घ-दीर्घ,लघु-दीर्घ-दीर्घ,लघु-दीर्घ-दीर्घ केर चारि बेर प्रयोग) के अरबीमे बहरे-हज़ज कहल जाइत छै आ एकरा बहुत संगीतमय बूझल जाइत छै मुदा बहुत संभव जे भाषायी भिन्नताक कारण ई बहर या छंद मैथिलीमे कर्णप्रिय नै हो। आ एहन स्थितिमे मैथिलीमे 122-1222-222-1222 सनकेँ कोनो छंद आबि जाए। हमरा बुझने इएह संशोधन छै।
आब 1222-1222-1222-1222  केर गिनती करबाक लेल जे नियम छै सएह नियम 122-1222-222-1222 लेल सेहो रहतै या अन्य कोनो छंद लेल वएह रहतै।
तेनाहिते संस्कृत आ अरबीमे 122-122-122-122 छंदक समान रूपसँ प्रयोग होइत छै। संस्कृतमे एकरा भुजंगप्रयात कहल जाइत छै तँ अरबीमे बहरे-मुतकारिब। दूनू भाषामे ई उच्च संगीत क्षमता नेने भेटत। संस्कृतमे गोस्वामी तुलसीदासजीक ई रचना देखू जे भुजंगप्रयात ( बहरे मुतकारिब)मे अछि--

नमामी शमीशान निर्वाण रूपं
विभू व्यापकम् ब्रम्ह वेदः स्वरूपं
पहिल पाँतिकेँ मात्रा क्रम अछि---- ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ, दोसरो पाँतिकेँ मात्रा क्रम अछि-----ह्रस्व- दीर्घ -दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ
फेर उपरे जकाँ कही जे भऽ सकैए जे मैथिलीमे ऐ ढ़ाँचामे संगीत नै आबि सकै आ तँए 22-122-22-122 रूप आबि जाए वा 221-122-212-122 रूप आबि जाए। मुदा लघु-दीर्घ गिनती करबाक नियम तँ समाने रहतै। बदलतै नै। मैथिलीमे शाइर राजीवरंजन मिश्रजी एहने संशोधन ओ परिवर्तन करैत गजल कहि-लीखि रहल छथि। राजीवजी कोनो अरबी वा संस्कृतक मान्य छंद नै लै छथि मुदा गजलक पहिल पाँतिमे जे मात्राक्रम रहै छै तकर ओ पूरा गजलमे पालन करै छथि आ इएह तँ छंद वा बहरक निर्वाह केनाइ भेलै। उदाहरण लेल राजीवजीक एकटा गजल राखि रहल छी—

नै राम रहीमक झोक रहय  
नै वेद कुरानक टोक चलय

मतलाक दूनू पाँतिमे 221 122 2112 ढ़ाँचा अछि आ निच्चा आन शेर सभमे देखू इएह मात्राक्रम भेटत--
किछु आर भने नै होइ मुदा
बस संग धऽ लोकक लोक सहय 

नै ईद दिवाली भरिकँ मजा
आनंद सहित नित नेह लहय

हो राम रहीमक गान सदति
नै नामकँ खातिर जीव मरय

राजीव सुनब नै लोककँ कहल
किछु लोक तऽ अतबे खेल करय

की ऐ गजलमे समकालीन स्वर नै छै। सुरेन्द्रनाथजीकेँ मेहनति नै करबाक छनि तँ नै करथु मुदा भ्रम ओ अज्ञानता नै पसारथु से हमर आग्रह। हम ऐ ठाम मैथिलीक किछु गजल कारक दूटा कऽ शेर देखा रहल छी। सभ गोटा देखू जे कोना एकै संग समकालीन स्वर आ व्याकरण छै—
कविवर सीताराम झाजीक गजलक दूटा शेर--

हम की मनाउ चैती सतुआनि जूड़शीतल
भै गेल माघ मासहि धधकैत घूड़तीतल`

मतलाक छंद अछि 2212+ 122+2212+ 122 आब दोसर शेर मिला लिअ-
अछि देशमे दुपाटी कङरेस ओ किसानक
हम माँझमे पड़ल छी बनि कै बिलाड़ि तीतल

पहिल शेर आइयो ओतबे प्रासंगिक अछि जते पहिले छल। आइयो नव साल गरीबक लेल नै होइ छै।
दोसर शेरकेँ नीक जकाँ पढ़ू आइसँ साठि-सत्तर साल पहिलुक राजनीतिक चित्र आँखि लग आबि जाएत।
जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल" जीक गजलक दू टा शेर--

टूटल छी तँइ गजल कहै छी
भूखल छी तँइ गजल कहै छी

मतलाक दूनू पाँतिमे 2222 +12 + 122 छंद अछि आ एकर दोसर शेर देखू--

ऑफिस सबहक कथा कहू की
लूटल छी तँइ गजल कहै छी

पाठक निर्णय करता जे समकालीन स्वर छै की नै।
योगानंद हीराजीक गजलक दू टा शेर—

मोनमे अछि सवाल बाजू की
छल कपट केर हाल बाजू की

मतलाक दूनू पाँतिमे 2122-12-1222  अछि आ दोसर शेर देखू

छोट सन चीज कीनि ने पाबी
बाल बोधक सवाल बाजू की

की समकालीन स्वर नै छै?
समकालीन स्वरे नै कालातीत स्वरक संग विजयनाथ झा जीक ऐ गजलक दूटा शेर देखू--

जीवनक आशय सदाशय सूत्र शिवता सार किछु
बेस बीतल शेष एहिना अभिलषित आभार किछु

मतलाक छंद अछि 212-212-212-212 आब दोसर शेरक दूनू पाँतिकेँ जाँच कऽ लिअ संगे संग भाव केर सेहो।

द्वन्द अछि आनंद तैयो क्लेश प्रियगर वारुणी
पी रहल हम जानि गंगा मधु मदिर नहि आर किछु

ऐठाम हमरा लग उदहारणक नमहर लिस्ट अछि मुदा मुदा पत्रिकाक सीमा होइत छै तँए हम रुकि रहल छी।
सुरेन्द्रनाथजी कहै छथि जे रचनामे समकालीन स्वर हेबाक चाही। आ देखू जे दुष्यंत कुमार, अदम गोंडवी, निराला सहित मैथिलीक बहुत रास शाइर बिना व्याकरणकेँ तोड़ने केना समकालीन स्वर देने छथि अपन गजलमे। की ई हिम्मत आ मेहनति करबाक क्षमता सुरेन्द्रनाथ जीमे छनि? हमरा बुझने सुरेन्द्रनाथजी संशोधनक मतलब छोड़ि देनाइ-तोड़ि देनाइ आ विनाश केनाइ बुझै छथि। आ हुनकर ऐ अज्ञानतापर की कएल जा सकैए से पाठक निर्णय करता।

6) सुरेन्द्रनाथजी अपन आलेखमे योगानंद हीरा आ विजयनाथ झाजीक संदर्भमे ई प्रश्न केला जे "हिनका सभमे प्रतिभा छलनि तँ ई सभ घनगर किएक नै भेला"। एकर जबाबमे हम बस एतबा कहऽ चाहै छी जे जँ कोनो खेतिहर अपन खेतमे गहूँम बाउग करै छै। आ गहूमक संग बहुत रास घास सभ जनमै छै। आब जँ खेतिहर कमौट नै करतै तँ ओ घास सभ गहूमकेँ बढ़हे नै देतै। ई पूर्णतः सत्य छै आ पाठक एकर अंदाजा लगा सकै छथि। मैथिली गजलक संदर्भमे इएह भेलै। शुरूमे नीक गजल तँ एलै मुदा बिना आलोचकक ई विधा रहि गेल आ एकर परिणाम स्वरूप "सुरेन्द्रनाथ" सन-सन जंगली घास " योगानंद हीरा ओ विजयनाथ झा" सन गहूमकेँ झाँपि देलकै। बीच-बीचमे जे खाद पड़लै तकर तागति सेहो बहुसंख्यक घास द्वारा चूसि लेल गेलै।
7) सुरेन्द्रनाथजी हमर ऐ बातसँ बहुत तामसमे छथि जे " गजेन्द्र ठाकुर मैथिलीक पहिल  गजलशास्त्र देला"। सुरेन्द्रनाथजी कहै छथि जे मैथिलीमे बहुत पहिलेसँ गजलशास्त्र छै। हम हुनकर मतक आदर करै छी संगे संग पूछए चाहै छी जे " अराजक गजलकार सभ गजलशास्त्र कहिया लिखला" आ जँ लिखबो केला तकर सूचना सुरेन्द्रनाथजी नै दऽ रहल छथि। हुनका कहबाक चाही जे अमुक लेखक गजेन्द्र ठाकुरसँ पहिने गजलशास्त्र लिखने छथि। बस बात खत्म मुदा ओ नाम नै कहि रहल छथि। ऐ पत्रिकाक माध्यमें हम हुनकासँ आग्रह करैत छी जी जे ओ पाठककेँ मैथिलीक पहिल गजलशास्त्रक नाम ओ ओकर लेखकक नाम कहता। आ तकर बाद गजेन्द्र ठाकुर बला दावा हम अपने खारिज क लेब................. प्रतीक्षामे छी

8) ई जानल बात छै जे मैथिलीमे सरल वार्णिक बहरक अविष्कार मात्र एकसूत्रमे बन्हबाक लेल भेल छै। आ एकर लाभ मैथिलीक नव गजलकार सभकेँ भेलै से पूरा दुनियाँ जानि रहल अछि। मुदा सुरेन्द्रनाथजी बिना मूल ग्रंथ, पढ़ने तामसमे आबि लिखै छथि। तँए हुनकासँ गंभीरताक आशा करब बेकार।

9) पद्य बला प्रसंगमे सुरेन्द्रनाथजी अपने ओझरीमे छथि। हुनका बुझबाक चाही जे समस्त लिखित वस्तु काव्यक अंतर्गत आबै छै। बादमे गेय आ सरस काव्यकेँ "पद्य" कहल गेलै तँ शुष्क काव्यकेँ "गद्य"। कोनो निश्चित नियमसँ बान्हल पद्य एकटा विधा बनल जेना कोनो पद्यकेँ दोहाक नियममे दियौ तँ दोहा बनतै, सोरठाक नियममे दियौ तँ सोरठा।। तेनाहिते गजलक सेहो नियम छै। आब प्रश्न छै जे जँ कोनो दोहा की सोरठा की कुंडलिया की गजल ओइ निश्चित नियमक पालन नै सकल छै तँ ओ की कहेतै। निश्चित तौरपर ओ सभ पद्ये कहेतै। कारण ओइमे कोनो खास विधाक नियम नै छै मुदा गेयता आ सरसता तँ छैके। मुदा सुरेन्द्रनाथजी एतेक छोट आ सरल बात नै बूझि सकलाह तकर हमरा दुख अछि।

10) सुरेन्द्रनाथजी अपन आलेखमे बहुत दुविधाग्रस्त छथि। कतहुँ ओ लिखै छथि जे गजलमे व्याकरण नै होइ छै, तँ कतहुँ लिखै छथि जे गजलमे व्याकरण नै हेबाक चाही आ अंतमे कहै छथि जे मैथिलीक गजलकेँ अपन व्याकरण हेबाक चाही।
बहुत दुविधा छनि सुरेन्द्रनाथजीकेँ मुदा ऐ दुविधामे हम फँसऽ नै चाहैत छी आ तँए सोझे पाठक लग चलै छी.........................


कर्मामृतमे प्रकाशित सुरेन्द्रनाथजीक लेखक कटिंग--












कर्मामृतमे प्रकाशित आशीष अनचिन्हारक लेखक कटिंग--









मंगलवार, 26 जुलाई 2016

गजल

कनियें उप्पर बेसी तर
हुनकर मारल सभहँक घर

असगरुआ के जीवन की
अपने कनियाँ अपने बर

रावण चाहै राम लखन
सीता चाहथि जनकक हर

भेटत सभ चकमक चकमक
जल्दी पकड़ू कत्तौ  गर

अनचिन्हारो छै बुड़िबक
नै मानैए किनको डर

सभ पाँतिमे 222-222-2 मात्राक्रम अछि
दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

रविवार, 24 जुलाई 2016

गजल

किछु किछु रसधार जकाँ
किछु किछु बेकार जकाँ

हुनको सभहँक दुनियाँ
आने संसार जकाँ

साधल मातल लोकक
बोली ललकार जकाँ

बेरा बेरी हमरो
केलक उद्धार जकाँ

ओकर इच्छा लागै
अनमन कंसार जकाँ



सभ पाँतिमे 222-222 मात्राक्रम अछि
दू टा अलग-अलग लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि
सुझाव सादर आमंत्रित अछि



शनिवार, 23 जुलाई 2016

गजल

धार ताकै पानिकेँ
खूब चाहै पानिकेँ

हाल आसक की कहू
श्वास जानै पानिकेँ

संग रहितों सभ समय
पानि थाहै पानिकेँ

आँखि ओकर देखि देखि
आहि आबै पानिकेँ

केकरो लग रेत सभ
बान्हि राखै पानिकेँ

सभ पाँतिमे 2122 + 212 मात्राक्रम अछि
चारिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर लेल गेल अछि।
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

मंगलवार, 19 जुलाई 2016

रुबाइ

ओ जे कहियो ने बुझलक आइ लभ यू
ओ जे कहियो ने कहलक आइ लभ यू
तकरा एहन की भेले जे आइ हमर
सारापर बहुत बेर लिखलक आइ लभ यू

Ghazal

Keep smile on your lip dear
Doing love not cheap dear

I want to be your dream
Think about in deep dear

If you give me your hand
You will never slip dear

This is real voice of heart
Don't treat as gossip dear

'Kundan' is your lucky boy
You got good friendship dear

Hexameter (each line contains 6 syllables)


© Kundan Kumar Karna

गुरुवार, 30 जून 2016

गजल

ताकै छी, अपन पता चाही
जिनगी जे कहै, कथा चाही

हम छी खोलने करेजाकेँ
छै गुमकी, कनी हवा चाही

नै चाही जगतसँ किछु हमरा
हमरा बस सभक दुआ चाही

लूटलकै मजा बहुत सब यौ
हमरो आब ई मजा चाही

"ओम"क छै करेज ई पजरल
नेहक एकरा सजा चाही

गजल

हारल करेजक हाल की कहू
जागल सिनेहक हाल की कहू

प्रेमक नगरमे अछि बसल हिया
बारल विदेहक हाल की कहू

सदिखन लिखै छी नेह हम अपन
राखल सनेसक हाल की कहू

कोना क' बीतल राति ई हमर
काटल बिदेसक हाल की कहू

बेकल बनल "ओम"क करेज ई
मारल उछेहक हाल की कहू

गजल

अहाँ तोड़ैत रहू, हम जोड़ाइते रहब
नशा छी एहन, सबकेँ सोहाइते रहब

रहत छाती पर छापल ई नाम टा हमर
कते पोछब हमरा, हम ठोकाइते रहब

अहाँ कोड़ू हमरा नै बाजब किछो सुनू
बनल छी सागक बाड़ी, कोड़ाइते रहब

किया छी बारल नजरिसँ हम देखियौ कनी
सुनब चर्चा हमरो आ नोराइते रहब

करेजा 'ओम'क करबै टुकड़ी कतेक यौ
भ' गेलौं तार करेजक, मोड़ाइते रहब

मंगलवार, 28 जून 2016

गजल

देश देह दुबराएल छै
लोक मोन उधिआएल छै

पाप पुण्य एना केलकै
स्वर्ग नर्क भरमाएल छै

भोर साँझ हमरे मेहनति
घाम केकरो आएल छै

ठोर कहि रहल जे प्रीत केर
गीत ओकरे गाएल छै

गाछ गाछ जरि रहलै मुदा
डारि पात हरिआएल छै


सभ पाँतिमे 21-21-222-12 मात्राक्रम अछि
चारिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर लेल गेल अछि
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

गुरुवार, 23 जून 2016

गजल

नाम विकासक
काज विनाशक

धरती बेचि कऽ
बात अकासक

छुटिए  गेलै
संग हुलासक

माछे जानै
हाल पियासक

बेपारी छी
भाव लहासक

सभ पाँतिमे 22-22 मात्राक्रम अछि
दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

बुधवार, 22 जून 2016

गजल

एक ठोप नोर
साँझ राति भोर

टूटि गेल आस
की लगाउ जोर

प्राण देह मोन
माछ पानि बोर

देश धर्म चास
बीत बीत चोर

चाहि रहलै खाली
सिक्स सिक्स फोर

सभ पाँतिमे 21-21-21 मात्राक्रम अछि
अंतिम शेरक पहिल पाँतिमे दूटा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

Ghazal

My heart is on fire
Because of your desire

Forgone is the food
Forgotten are attire

You are the pearl
And the golden sapphire

Aspires all the senses
To make it square

Affection continues for sure
Till the moment of pyre

Love addicts in my vein
Going to be higher

I am incomplete soul
Only you can make me entire

If I get you for forever
Then what else is the require

These words are my feelings
Don't understand fake admire

[Couplets 2,3,4 and 5 are created by Rajeev Ranjan Mishra and remaining by Kundan Kumar Karna]

मंगलवार, 21 जून 2016

गजल

हारिकेँ बाद जीतो त' अबिते छै
रातिकेँ बाद सगरो इजोते छै

दुखक माला जपै छी किए दिन भरि
एहि जगमे घड़ी सुखक बहुते छै

नोर राखू पजारब गजल एहिसँ
किछु पुरनका खड़ेएल रहिते छै

बेंगकेँ जिन्दगी  नै इनारे भरि
भादबक बाढ़िमे ओ त जनिते छै

छोरि तकनाइ मुँह  हाथ नम्हर करु
किछु पबै लेल 'मनु' दाम लगिते छै
(मात्रा क्रम ; २१२-२१२-२१२-२२)
जगदानन्द झा 'मनु'

सोमवार, 13 जून 2016

गजल


अहाँक यादि में पागल पागल
अहाँक रूप के मारल मारल

गनैत मेघ के चंदा तारा
निछोह राति में जागल जागल

चमकि रहल छलै अँगना मोनक
अहींक लेल छल पोछल पाछल

कतेक बेर तक ताकब रस्ता
बिछोह आगि के जारल जारल

उछेह राखि हम नेहक सागर
फिरैत बाध में भागल भागल

सनेस यैह टा भेटल नीरज
करेज राख सन राखल राखल

प्रत्येक पाँति में मात्राक्रम 
121212-2222 अछि।
सुझाव सादर आमंत्रित 

गुरुवार, 19 मई 2016

मैथिली गजलक अंग्रेजी अनुवाद

ई हमर आ हमर गजलक सौभाग्य अछि जे हेमंत दासजी Hemant Das Patnaएकरा अंग्रेजीमे अनुवादित केलथि। हुनका धन्यवाद संगे-संग ओमप्रकाशजीकेँ सेहो धन्यवाद जे ओ ऐ गजलकेँ शेयर केलथि। हेमंतजीक मूल पोस्टक लिंक कमेंटमे देल जा रहल अछि। तँ अहूँ सभ पढ़ू मूल आ अनुवाद एकैठाम--

हम झुट्ठेमे अपसियाँत
तों सत्तेमे अपसियाँत

I am tired without any achievement.
You are exhausted with your Power

नहियें पी सकलै शराब
जे चिखनेमे अपसियाँत

He could never drink wine
Who felt exhausted merely in tasting

सभ खा गेलै खेनहार
किछु पत्तेमे अपसियाँत

Everything has been eaten by the eater
And some people are tired in fight for the leaf plates

जकरा लग सालक हिसाब
से महिनेमे अपसियाँत

I, who has to run the family through the year
Feel tired only in a month

के छै अनचिन्हार लेल
सभ अपनेमे अपसियाँत

Who is there for ‘Anchinhar’ (poet)
Everyone is exhausted for himself.”

रविवार, 15 मई 2016

मैथिली गजलक संसारमे ‘अनचिन्हार आखर’

मैथिली गजलक संसारमे ‘अनचिन्हार आखर’
(जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’) विदेह अंक 200 सँ साभार
मैथिली गजल आ शेरो-शाइरीक लेल ‘अनचिन्हार आखर’ बहुत महत्वपूर्ण नाम अछि |
2008 मे इन्टरनेट पर मैथिली गजल आ शेरो-शाइरीक स्वतंत्र अभियान ल’क’ ‘अनचिन्हार आखर’ नामक ब्लागक संग उपस्थित भेलाह युवा रचनाकार आशीष अनचिन्हार | पहिल बेर गजेन्द्र ठाकुर द्वारा तेरह खंडमे गजल शास्त्र प्रस्तुत कएल गेल आ एतहिसं शुरू भेल मैथिलीमे सरल वार्णिक बहर | स्वयं आशीष अनचिन्हार सेहो एहि ब्लॉगपर मैथिलीमे गजल लिखबाक लेल व्याकरण प्रस्तुत करैत कतेक गजल लिखलनि आ आनो रचनाकार सभसं संपर्क कए हुनका सभकें प्रेरित केलनि गजल लिखबाक लेल |बहुत रचनाकार एहि अभियानमे सम्मिलित  भेलाह |
इन्टरनेट पत्रिका ‘विदेह’क एक अंकमे सरल वार्णिक बहरमे आशीष अनचिन्हारक बहुत रास गजल प्रकाशित भेल |आशीषजीक एहेन 78  टा गजल 32  टा कता आ किछु रुबाइक संग वर्ष 2011  मे एक पोथीमे आएल जकर नाम अछि ‘अनचिन्हार आखर’जे हमरा जनैत मैथिलीमे पहिल एहेन पोथी अछि जाहिमे सरल वार्णिक बहरमे 78   टा गजल अछि |
एहि पोथीकें दू बेर पढलाक बाद हमर जे मंतव्य अछि से निम्नलिखित शब्दमे व्यक्त कएल जा रहल अछि :
1)      एहि पोथीक आरम्भमे गजलक इतिहास  आ  मैथिली गजलक व्याकरण प्रस्तुत भेल अछि |शेर, मतला, रदीफ़, काफिया, मकता आ बहरसं नीक जकां परिचय कराओल गेल अछि |
2)      पोथीमे 78  टा गजलक अतिरिक्त 32  टा कता आ 2  टा रुबाइ अछि |
3)      76 टा गजलमे रदीफ़ आ काफिया दूनू अछि | 2 टामे काफिया मात्र अछि |
4)       2  टा गजलमे 6 टा शेर अछि | शेषमे पांच-पांचटा शेर अछि |
5)       वर्णक संख्याक अनुसार गजलक संख्या एहि तरहें अछि :
8 वर्णक 1 टा गजल अछि
9 वर्णक 1 टा गजल अछि                                                               
10 वर्णक 2 टा गजल अछि                                                               
11 वर्णक 4 टा गजल अछि                                                              
12 वर्णक 8 टा गजल अछि
13 वर्णक 3 टा गजल अछि
14 वर्णक 11 टा गजल अछि                                                            
15 वर्णक 12 टा गजल अछि                                                           
16 वर्णक 13 टा गजल अछि
17 वर्णक 7 टा गजल अछि        
18 वर्णक 6 टा गजल अछि                                                              
19 वर्णक 4 टा गजल अछि                                                                                     20 वर्णक 6 टा गजल अछि  
21 वर्णक 1 टा गजल अछि                                                                                                              

(6 ) मतला : मतला सभमे रदीफ़/ काफियाक पालन नीक भेल अछि | अपवादमे निम्नलिखित गजल सभ अछि :
गजल क्रमांक--56 बुझाइत / मिझाइत                                                   गजल क्रमांक--71 तबीयत / रैयत     
गजल क्रमांक--77 ओन्नी / मुन्नी                                                        
(7 ) काफिया : मतलाक काफिया आ आन शेर सभक काफियामे मिलान अछि | अपवादमे निम्नलिखित गजल सभकें देखल जाए :
गजल क्रमांक    मतलाक काफिया            आन शेर सबहक काफिया
10            दुराचार /  भ्रष्टाचार              बेकार, सरकार,अन्हार, अनचिन्हार
20           भड़ुएक / पहरुएक                मालिएक, निशबदीएक
29           अदना/ पदना                    विपदा,तगमा,भगवा,सुगवा
35           रोकब/ ठोकब                      फ़ोड़ब,तोडब
36           बहन्ना / सन्ना                       जुन्ना
43                     राति / पांति                       आँखि, माटि, हडाहि
55             टूटैत / छूटैत                     लुटैत, कटैत,खसैत
65            जरैत / डरैत                  भरतैक, बजैत, रहैत
67            खसा/ बसा                    बना,सजा,नचा        
71      तबीयत / रैयत                   किस्मत
73             मानू / जानू                        बेकाबू                               

(8) मकता   :  बत्तीस टा गजलमे मकताक प्रयोग भेल अछि, से नीक भेल अछि |
(9) भाषा आ भाव पक्ष  : गजलकारक अनुसार गजलकें प्रेमी-प्रेमिका ( आत्मा-परमात्मा )क गप्प-सप्प सेहो मानल जाइत छैक आ गप्प-सप्प सदिखन गद्यमे होइत छैक, तें गजल लेल गद्यात्मक भाषा हेबाक चाही | से गद्यात्मक भाषाक नीक स्तरक आकर्षण सभ रचनामे अछि | 
गजलकार कहैत छथि : “हम अपन गजलमे (किछु शब्दक ) अपूर्ण रूपकें प्रधानता देने छी | पूर्ण रूपक प्रयोग हम खाली वर्ण आ मात्रा मिलेबाक लेल करैत छी |अपूर्ण भाषा गजलक लेल बेसी नीक |”
‘नहि’ के स्थानपर ‘नै’, ‘जाहिठाम’क बदला ‘जै ठाम’, ‘कतेक’ के बदला ‘कते’, हेतैक के बदला ‘हेतै’क प्रयोग शेर सभमे नीक लगैत छैक |
गजलमे मुख्य तत्व प्रेम होइत अछि |प्रेम कोनो मनुक्ख, प्रकृति,माटि-पानि, संस्कृति, भाषा, देश-दुनियासं भ’ सकैत अछि |
प्रेमक अभिव्यक्ति कतेक रूपमे भेल अछि : नोंक-झोंक, उलहन, उपराग,आक्रोश,आवेश आदि तत्व जहां-तहां विभिन्न गजलक शेर सभमे सुच्चा मैथिल दृष्टि  नेने भेटल अछि | बानगीक रूपमे देखल जाए निम्नलिखित शेर सभ :
‘भूखक दर्द होइत छैक प्रकाशोसँ तेज
देखू पेटक खातिर दलाल बनल लोक’

‘चुप्प रहत मनुख गिदर भुकबे करतै
निर्जीव तुलसी चौरा कुकुर मुतबे  करतै’

‘हरेक समय बितैए दुःख आ दर्दमे
गरीब लेल नव-पुरान की साल हेतै’

‘देहे जिन्दा भावना मरि गेलै
जग लगैए समसान सन’
‘नहि बनत केओ राम मुदा
सेवक चाही हनुमान सन ’          

‘रामक आदर्श तँ मरि गेल हुनके संगे
बुझू आब तँ खाली हुनक नाम चलैए’

‘ जे नै कमा सकए टका बेसीसं बेसी
लोक तँ ओकरे बुझैछै   बेकार सन ‘

‘घोघक रहस्य त एना बुझियौ
झरकल मूंह झपनहि  नीक.’

‘लोक जहर दैए मुस्किया कए
आब त हँसीसँ  डरनहि नीक’

‘हाथ सटेलासँ मोन केना भरतै
अहाँ करेजसं सटा लिअ हमरा’’

‘जाइ छी मुदा जेबाक मोन  नै अछि
कोनो सप्पतसं घुरा लिअ हमरा’

‘नून नै चटबए पड़तै बेटीकें 
आब तँ  गर्भपात लेल युद्ध’

‘बुड़िबक देवी कुरथी अक्षत
हम एहने विकास करैत छी’

‘अहाँक दरस-परस बड्ड महग अछि
सटि जैतहुँ अहाँक देहमे बसात भेने’
‘सबहक घरमे एकटा अगत्ती जन्मए
सरकारक निन्न टुटै छै खुरफात भेने ‘                                     

‘हमरा अहाँ नीक लगै छी सभ दिनसं
मुदा प्रेम अछि से कहि नहि पबैत छी’

अहाँकें प्रभावित करबाक लेल, चुप्प करबाक लेल, सोचबाक लेल, विचार करबाक लेल आ बेरपर मोन रखबाक लेल सैकडो  शेरसं भरल अछि एहि पोथीक गजल सभ  |
पोथीक सम्बन्धमे अपन टिप्पणी प्रस्तुत करैत गजेन्द्र ठाकुरजी कहैत  छथि :
“मैथिलीक पुनर्जागरणक ऐ समएमे ऐ पोथीक आगमन मैथिली आ मात्र मैथिलीक पक्षमे एकटा सार्थक हस्तक्षेप सिद्ध हएत | स्वतः स्फूर्त गजलमे जे गेयता आ प्रवाह होइ छै से ऐ संग्रहक सभ गजल, रुबाइ आ कतामे अहाँकें भेटत |”
हम एहि टिप्पणीक  समर्थन करैत छी |

शुक्रवार, 13 मई 2016

गजल

काज गुलाब बराबर
घाम शराब बराबर

सुख छै पन्ना पन्ना
दुख तँ किताब बराबर

छै धर्मक आँगनमे
घोघ नकाब बराबर

क्रेडिट जय डेबिट जय
फंड हिसाब बराबर

ठोरो चुप मोनो चुप
प्रश्न जबाब बराबर

सभ पाँतिमे 22-22-22 मात्राक्रम अछि।
दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि।
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

गुरुवार, 12 मई 2016

अपने एना अपने मूँह-35

सेप्टेम्बर 2015मे कुल 13 टा पोस्ट भेल जकर विवरण एना अछि--
कुंदन कुमार कर्णजीक 1 टा पोस्टमे 1 टा गजल अछि। आशीष अनचिन्हारक 12 टा पोस्टमे  6 टा रुबाइ, 3 टा गजल, 1 टा भक्ति गजल, 1टा विश्व गजलकार परिचय श्रृंखला आ 1टा अपने एना अपने मूँह अछि।

अक्टूबर 2015मे कुल 9 टा पोस्ट आएल जइमे आशीष अनचिन्हारक 6 टा गजल, 1 टा बाल गजल आ 2 टा विश्व गजलकार परिचय श्रृंखला आएल।

नवम्बर 2015 कुल  23 टा पोस्ट भेल जकर विवरण एना अछि--
गजलक आँगनमे नीरज कर्णजी एलाह आ हुनक 2 टा गजल आएल।
ओमप्रकाशजीक 12 टा पोस्टमे 5 टा रुबाइ आ 7 टा गजल आएल।
आशीष अनचिन्हारक 9टा पोस्टमे 6 टा गजल, 1 टा बाल गजल, 1 टा विश्वगजलकार परिचय श्रृंखला आ 1 टा पोस्टमे जियाउर रहमान जाफरीजीक गजल प्रस्तुत कएल गेल।

दिसम्बर 2015मे कुल 12 टा पोस्ट भेल जकर विवरण एना अछि--
ओमप्रकाशजीक 4 टा गजल आएल। जगदानंद झा मनु आ नीरज कर्णजीक 1-1 टा गजल आएल। आशीष अनचिन्हारक 6 टा पोस्टमे 5 टा गजल आ 1 टा बाल गजल आएल।


बुधवार, 11 मई 2016

गजल

कियो अपनेसँ क्लीन बोल्ड
कियो अनकेसँ क्लीन बोल्ड

कियो खेपैए कानि कानि
कियो हँसियेसँ क्लीन बोल्ड

कियो हाँ जी हाँ जीसँ जिंदा
कियो नहियेसँ क्लीन बोल्ड

कियो पसरल छथि झूठ मूठ
कियो सहियेसँ क्लीन बोल्ड

कियो छै पासी केर संग
कियो कटियेसँ क्लीन बोल्ड


सभ पाँतिमे 122+2221+21 मात्राक्रम अछि
तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि।

सुझाव सादर आमंत्रित अछि

मंगलवार, 10 मई 2016

गजल

जनतन्त्रमे जन राज्यसँ डेरा रहल छै
अपने चुनल सरकारसँ पेरा रहल छै

कानूनमे अधिकार मुदा काजमे नै
स्वतन्त्रता अभ्याससँ हेरा रहल छै

ठेकान नै कुर्सीक कखन के लऽ जेतै
सत्ताक भागी जल्दिसँ फेरा रहल छै

अन्याय अत्याचारसँ पीडित गरीबे
नेताक चक्रव्यूहसँ घेरा रहल छै

ककरासँ जनता आब करत कोन उल्हन
रक्षक सभक बन्दूकसँ रेरा रहल छै

सेनूर मेटा गेल कतेकोक कुन्दन
सरकार नै लोकसँ टेरा रहल छै

2212-221-122-122

© कुन्दन कुमार कर्ण

www.kundanghazal.com

शुक्रवार, 6 मई 2016

श्री जगदीश चन्द ठाकुर 'अनिल' जीक लिखल गजल संग्रह "गजल गंगा" केर समीक्षा

सभसँ पहिने अनिल जीकेँ ई गजल संग्रह लिखबाक लेल बहुत बहुत बधाइ आ शुभकामना । मैथिली गजलक आकाश गंगामे एकटा आओर नव गजल संग्रह "गजल गंगा"क आगमन मैथिली गजलक दशा आ दिशा लेल बहुत शुभ संकेत अछि । एक बेर फेरसँ अनिलजी सहित आन सभ गजल प्रेमी मैथिलकेँ बधाइ । हमर अपने गजल ज्ञान बेसी नहि अछि तथापि एहि संग्रहक मादे हम किछु नीक बेजए कहैक चेष्टा कए रहल छी । आशा करैत छी जे 'अनिल'जी हमर धृष्टताकेँ क्षमा करता ।
कुल ८१ टा गजल अपना भितर समेटने ई संग्रह बहुते नीक-नीक गजलक सुन्दर गजल गंगा बनल अछि । आब एहि गंगामे असनान कतएसँ शुरू करी अर्थात हम अप्पन गप्पक शुरूआत कतएसँ आरम्भ करी । तँ हम शुरूआत करैत छी;
गजलक व्याकरण पक्षसँ :- आ गजलक व्याकरणक अ आ अछि मतला, काफिया, रदीफ, बहर आ मकता ।
सभसँ पहिने मतला, मतला अर्थात गजलक पहिल शेर जे कि काफिया आ रदीफक निर्धारण करैत अछि । एहि संग्रहक सभ गजलमे अनिलजी मतलाक पालन बहुते सुन्दरसँ केने छथि । आब,
काफिया आ रदीफ : संग्रहक शुरूआतेमे अनिलजी संग्रहकेँ बहरक भिन्नताकेँ आधारपर दू भागमे  बँटैत ई लिखने छथि जे काफिया आ रदीफक पालन भेल अछि । आ ठीके रदीफक पालन एहि संग्रहक सभ गजलमे बड़ नीकसँ भेल अछि । सगरो संग्रहकेँ पढ़ला बाद बुझलौं जे बहुतो गजलमे काफियाक पालन सेहो नीकसँ भेल अछि । ओतए ३७% गजलक काफियाकेँ ठीक करैक  गुँजाइश अछि । चुकी ई संग्रह एखन अप्रकाशित अछि तेँ जँ सम्भव होइ तँ अनिलजी किछु संशोधित कएला बाद एकरा आओर बेसी उत्कृष्ट बना सकैत छथि ।
जेना कि संग्रहक प्रथमे गजलक मतला-
"पढ़बाक मोन होइए <लिखबाक> मोन होइए
किछु ने किछु सदिखन <सिखबाक> मोन होइए"
एहिठाम काफिया भेल " e खबाक" मुदा गजलक आन आन शेर सबहक काफिया अछि बिछबाक, झिकबाक, निपबाक, <चिखबाक>, छ्टबाक, छिनबाक । एहिठाम चिखबाक छोरि कए बाद बाँकी ????
एकबेर भाग पहिलकेँ गजल संख्या ५ केर मतला देखू-
"काँट फूस अछि <भरल> बाटपर जहाँ-तहाँ
नढ़िया कूकुर <मरल> बाटपर जहाँ-तहाँ"
आब एहि मतलाक रदीफ भेल "बाटपर जहाँ-तहाँ" जे की दुनू पाँतिमे काॅमन अछि । आब काफिया भरल आ मरलसँ भेल "रल" । मुदा आन शेर सबहक काफिया अछि दखल, पड़ल, जड़ल, महल, उड़ल, गड़ल । एहिमे पड़ल, जड़ल, उड़ल, गड़ल तँ ठीक मुदा दखल आ महल ?????
आगू बढ़ैत गजल १४ केर मतला-
"बहरक झंझटिसँ हमरा आजाद करु
हम गजल छी हमरा नै बरबाद करु"
एहि मतलाक काफिया भेल आकार बाद द (ाद) मुदा एहि गजलक आगूक शेर सबहक काफिया लेल गेल अछि याद, फरियाद, अनुवाद, लाज, काज, बात । याद, फरियाद, अनुवाद ठीक तँ लाज, काज, बात ???
एक बेर गजल १६ केर मतला देखल जेए -
"कानहापर गंगाजल ल' क' <बढ़लौं>कोना-कोना
मोन पड़ैए ऐ पहाड़पर <चढ़लौं>कोना-कोना"
एहिठाम काफिया भेल बढ़लौं, चढ़लौंसँ "ढ़लौं" मुदा एहि गजलक आन-आन शेर सबहक काफिया अछि; खसलौं, बचलौं, कटलौं, रखलौं आब ई सबटा कतेक ठीक ????
कनेक आओर आगू बढ़ैत गजल २७ केर मतला-
"जुनि पूछू की <करै>छी हम
नित्य स्वयंसँ <लड़ै> छी हम"
एहि मतलाक काफिया भेल "0रै" वा "0ड़ै" । आब एहि गजलक आगूक शेर सबहक काफिया जे लेल गेल अछि- डरै, बुझै, जगै, कनै, बजै, नचै, जनै, तकै । एहिमे "ड़रै"केँ छोरि बाद बाँकी सबटाकेँ की ठीक कहल जेए ??????
गजल संख्या २९ केर मतला-
"एतेक बाझल किएक रहै छी <अपनामे> अहाँ
अबै छी बड़ी बड़ी राति क' <सपनामे> अहाँ"
एहिठाम काफिया भेल अकार संग "पनामे" । मुदा शाइर एहि गजलक आगाँक शेर सभमे काफिया लेने छथि; पटनामे, सतनामे, घटनामे, अयनामे, बधनामे, गहनामे । मतलाक हिसाबे आन आन शेरक काफिया मेल नहि क' रहल अछि ।
कनिक आगू जा कए गजल संख्या ४० केर मतला-
"चिन्ता तनकेँ <दागि> रहल अछि की करियौ
मोन कतौ नै <लागि>रहल अछि की करियौ"
एहि मतलासँ जँ काफियाक निर्धारण हुए तँ काफिया  भेल, "0ागि" । मुदा शाइर एहि गजलक आन-आन शेरक काफिया देने छथि; भागि, ताकि, मांगि, कानि, आबि, काटि, कहब बेजए नहि जे " भागि"केँ छोरि आन कोनो मतलासँ मेल खाइत नहि अछि ।
एहि तरहे कम बेसी एहि संग्रहक भाग १ केर गजल संख्या ६,९,१३,३०,३३,३५,३७,५१,५३,५४,५५ केर काफिया ठीक नहि अछि ।
आब एहि भागक अन्तिम गजल, गजल ६१ केर मतला एक बेर देखल जेए-
" नदी छोड़ि क' <नहरमे>एलौं
गाम छोड़ि क' <शहरमे>एलौं"
आब एहि मतलासँ काफियाक निर्धारण हुए तँ काफिया भेल "हरमे" मुदा शाइर एहि गजलक आगूक शेर सबहक काफिया लेने छथि- कहलमे, जहलमे, महलमे, जूड़शितलमे, सहलमे, गजलमे । मतला आ आन-आन शेरक बिचमे काफियाक कोनो मिलान नहि ।
आब आबी संग्रहक भाग दूमे । पहिल भाग जकाँ एहि भागमे सेहो शाइर मतला आ रदीफक पालन नीकसँ केने छथि । आब देखी काफिया तँ सबसँ पहिले भाग दू केर गजल संख्या ४ केर मतला-
"खेल सभटा <उसरि> जाइए
लोक सभटा <बिसरि> जाइए"
आब एहि मतलासँ काफिया भेल "सरि", मुदा आगाँक शेर सबहक काफिया अछि झखडि, ससरि, पिछरि, बिगरि, कुतरि, नचरि । मतलासँ मेल खाति एकौटा शेरक काफिया नहि ।
भाग २, गजल ६ केर मतला-
"जीवनकेँ <आशा> बदलल
प्रेमक <परिभाषा> बदलल"
एहिठाम काफिया भेल आकार बादक शा, षा अथवा सा । आशा, परिभाषा, बारहमासा, भाषा, अभिलाषा, तक तँ ठीक मुदा अन्तिम दूटा शेरक काफिया मौसा आ पाछाँ ।
आब एकबेर देखी भाग २, गजल १७ केर मतला-
"सभ जिवइत अछि सुबिधामे
हम रहइत छी दुबिधामे"
एहिठाम काफिया भेल उकारकेँ बाद "बिधामे" । सुबिधामे, दुबिधामे केँ बाद आगाँक शेरक काफिया अछि, कवितामे, अनकामे, अपनामे, पटनामे, बसुधामे । एहिमे सँ एक्कोटा काफिया मतलासँ ठीक मेल नहि कए रहल अछि ।
किछु एहने-सन भाग २ केँ गजल ९,१२,१८ आ २० केर काफिया सेहो ठीक नहि अछि । एहि संग्रहक अन्तिम गजलक मतला एकबेर देख लेल जेए-
"नीक बात किछु <कहू> अहाँ
गीत गजलमे <रहू> अहाँ"
कहू/रहूमे समान भेल "हू" । मुदा शाइर आन आन शेरक काफिया लेने छथि; चलू, धरू, करू, बड़ू । खाली  ू   ू   ू   ू तँ बिना "ह"केँ   ू   ू   ू   ू   के की कहल जेए ???
कतेक रास गजल एहनो अछि जाहिठाम काफिया तँ ठीक बनिरहल अछि मुदा काफियामे एक्के आखरक प्रयोग एकसँ बेसी बेर कएल गेल अछि । जेना भाग एकक गजल ९,२०,३६,४२ आ भाग दू केर गजल १० मे ।
मतला, रदीफ, काफियाक बाद गजल व्याकरणक एकटा मुख अंग अछि मकता । मकता, अर्थात गजलक अन्तिम शेर जाहिमे शाइर अपन नाम वा उप नामक प्रयोग केने होथि । एहि संग्रहक कोनो गजलमे मकता़क प्रयोग नहि कएल गेल अछि ।
आब आबी गजल व्याकरणक एकटा  पैधि कलापक्ष बहरपर । तँ जेना स्वयं शाइर स्वीकार केने छथि जे भाग १ केर ६१ टा गजलमे ओ सरल वार्णिक बहरक प्रयोग केने छथि । आ जेकर निर्वाह ओ बहुते नीकसँ केने छथि । आब भाग दू जाहिमे कुल २० टा गजल अछि, कोनो निर्धारित अरबी बहरक प्रयोग तँ नहि कएल गेल अछि, हाँ एहि गप्पक धियान जरूर राखल गेल अछि जे सब पाँतिमे समान मात्रा क्रम रहेए । अर्थात समान मात्रा क्रमक प्रयोग करैक सफल प्रयास केएने छथि । किछुठाम छोरि दी तँ । सबसँ पहिने तँ चन्द्रविन्दूकेँ जगह विन्दूक (अन्सुआर) प्रयोग कएल गेल अछि । ई शाइद टाइपिंग ग़लती हुए मुदा एहि कारणे बहुतो जगह मात्रा क्रम बिगैड़ गेल अछि । दोसर जतअ जतअ संयुक्ताक्षरक प्रयोग कएल गेल अछि ओतअ ओतअ मात्रा क्रम केर गलती भ गेल अछि ।
जेना गजल संख्या ५ केर अन्तिम शेरक प्रथम पाँति-
"मोन केर प्रश्न अछि कते"
२१    २१  २१ -  २ १२ (शाइर द्वारा मानल)
२१    २२  २१ - २  १२ (वास्तविक)
एकटा आओर उदाहरण गजल ११ केर तेसर शेर देखल जेए-
"देश हमर अछि प्राण भाइजी"
२१    १२ - २   २१-  २१२ ( शाइर द्वारा मानल)
२१    १२-  १ २ २१ - २१२ (वास्तविक)
एहने तरहक दोख गजल १२ केँ दोसर शेरमे आ १८ म' गजलकेँ दोसर शेरमे अछि ।
भाषा आ भाव पक्ष ; भाषापर जबरदश्त पकड़ लेने सम्पूर्ण संग्रहमे भाषाक एकरूपताक दर्शन होइत अछि । संग-संग नव रचनाकार सभ लेल सिखबाक लेल नीक प्लेटफार्म थिक अनिलजीक ई गजल संग्रह । अनिलजी बिना कोनो बेसाहल शव्दक प्रयोग केने एतेक सरल व्यबहारिक मैथिलीक शव्द सबकेँ गूंठि कए एकता नव शुरूआत केने छथि । समान्यसँ समान्य लोक, एक-एकटा गजलक एक-एकटा शेरक आनन्द ओहि छन अर्थात पढ़ैत वा सुनैत मातर ल'  सकैत अछि ।
भाषा शिल्पक गप्प करी तँ एक-एकटा छोट-छोट शेरमे एतेक बेशी गप्प नुकेएल अछि जे सुनि आ सोचि कए मनक भितर ख़ुशिक लाबा फुटै लगै छैक । एकटा उदाहरण एहि संग्रहक पहिल गजलक एकटा शेर-
"दुइ ठोर थिक अथवा तिलकोर केर तडुआ
होइए तँ लाज लेकिन चिखबाक मोन होइए"
मिथिलाक भोजनक पाक-कलाक श्रेष्ठताक प्रतिक तिलकोरक तडुआ । जेकर स्वाद, कुड़कूड़ेनाइक जवाव नै, सुनिते मातर मुँहमे पानि एनाइ स्वभाविक । स्वादिष्ट, पातर, कड़कड़ तिलकोरक तुलना पातर ठोरसँ । जवरदश्त उपमय आ उपमानक प्रयोग । ओकर बादो, लाज होइतो चिखबाक मोन ।एहेन एहेन सरल व पारम्परिक शव्द चयन हिनक गजल कौशलमे चारि चान लगा रहल अछि ।
सम सामयिक मिथिला मैथिलीक समाजमे जतेक कोनो समस्या वा वाद विवाद अछि सभपर अपन कलम चलबैत सुन्दर-सुन्दर शेरक द्वारा अनिलजी लोकक आ समाजक धियान ओहि दिस दियाबैमे सफल भेल छथि ।  समाजक अव्यवस्थाकेँ देख संघर्ष आ छिनबाक गप्प एक्के संगे कोना, देखू एहि शेरमे-
"आजादीक लेल एखनहँु संघर्ष अछि जरूरी
व्यर्थ गेल सभ मांगब छिनबाक मोन होइए"
संग्रहक नामे अनुरूपे एहि "गजल गंगा"मे अनिलजी सभ किछु समेटने एकरा सुन्दर रूप देबैमे सफल भेल छथि ।
@ जगदानन्द झा 'मनु'
 मो० +९१ ९२१२ ४६ १००६

गजल

आइ मैया बजेलनि हमरा
अपन दर्शन दिएलनि हमरा

मनक शक्ती सगरो छनमे
आइ मैया दखेलनि हमरा

हुनक महिमा कते छनि भाड़ी
ज्ञानकेँ दिप जरेलनि हमरा

पाप सगरो हमर बिसरा कय
छोट बेटा बनेलनि हमरा

दय क' ममता अपन आँचरकेँ
मनु करेजसँ लगेलनि हमरा
(मात्रा क्रम; 2122-122-22)
जगदानन्द झा 'मनु'

गुरुवार, 5 मई 2016

गजल

जाहि घरमे भूखल दीन अहाँ देखने होयब
हाड़ मांसक बनल मशीन अहाँ देखने होयब

एक पाइक लेल पराण अपन बेच दै छै ओ
गाम घरमे एहन दीन अहाँ देखने होयब

खेतकेँ जे कोड़ि उगा रहलै सोन सन उपजा
ओकरो मन सदति मलीन अहाँ देखने होयब

आँखिमे जनमल सपना अचके तोड़ि दै विधना
डरसँ तेँ हेरायल नीन अहाँ देखने होयब

छूबि दै सोना जँ अमित तँ बनै माँटिकेँ टुकड़ा
खूब एहन भाग्यसँ हीन अहाँ देखने होयब


२१२२-२११२-११२२-१२२२
अमित मिश्र

बुधवार, 4 मई 2016

"शोणितायल पैरक निशान" गजल संग्रहपर चर्चा

हम नै आलोचक छी । नै समालोचक छी । आ हुनका सभहँक जागिर सेहो छिनऽ नै चाहै छी । तथापि एकटा सर्जककेँ हिसाबसँ मैथिल साहित्यक चर्चित नाऔं सियाराम झा 'सरस' जीक लिखल गजल संग्रहपर संक्षेपमे आइ किछु चर्चा करऽ चाहब ।

तँ पहिने सरला प्रकाशनद्वारा सन् 1989 मे प्रकाशित कएल गेलह हुनक गजल संग्रह "शोणितायल पैरक निशान"के देखि-

एहि संग्रहमे कुल ४८टा गजल छै । जकरा आजाद गजलक श्रेणीमे राखि पढल जा सकैछ । किछु गजल भावक दृष्टिकोणे तँ महत्वपूर्ण छहिए किछु शेर सेहो हृदयकेँ छूअवला छै । जेना बतीसम् गजलक ई मतला देखू-

फूलवन मे एक भँवरा युग युग सँ रहए पियासल
जनु भोजक खास भडारी रहि जाय निखण्ड उपासल

पोथीमे 'गजले किएक ?' विषयपर 6 पेज खर्च कए लिखल गेल छै मुदा 'गजले किएक ?' तकर तथ्यपरक तर्क नै भेट सकल ।

बहरक निर्वहन तँ दूरक बात संग्रहक अधिकांश गजलमे गजलक आधारभुत निअम पालन नै कएल गेल छै । जेना गजल संख्या 2, 3, 8, 11, 14, 15, 18, 21, 23, 24, 25, 26, 27, 30, 35, 36, 45, 46, 47, 48 लगायतके गलजमे काफिया दोष तँ छहिए, बहुत रास गजलमे काफिया आ रदिफक ठेकान नै । ढेर रास शेरकेँ अर्थ सेहो अस्पष्ट बुझाइत । जेना तीसम् गजलक ई मतला देखू-

भूमि डोलल तँ बहुत किछु डोलल
भूमि डोलल तँ कहाँ किछू डोलल

कहब कने नीक नै लागत मुदा गजलक नामपर गजलक मजाक उडाएल जकाँ बुझाएत । तखन एकरा गजल संग्रह कहनाइपर प्रश्नचिन्ह लागि रहल छै । संगे शाइर गजलक विविध पक्षक सम्बन्धमे अनभिज्ञ रहल बात उजागर होइ छै ।

तेनाहिते नव आरम्भ प्रकाशनद्वरा सन् 2008 मे प्रकाशित हुनके गजल संग्रह 'थोडे आगि थोडे पानि'मे सेहो एहने गल्ती सभ दोहराएल भेटत ।

गजल

गजल

भगत छै एहि ठाँ डलवाह नै छै
सते ककरो कतौ परवाह नै छै

रहै खेतक हरियरी बिन मवेशी
दुइभ बड छै मुदा चरवाह नै छै

कहै मिथिलाक हम उद्धार करबै
मुदा भाषा अपनपर वाह नै छै

बनै छै खेत उस्सर आब मीता
पलायन कारणसँ हरवाह नै छै

कहै छै सब मुहेंपर गजल सुन्नर
मुदा पुनि पीठ पाछू वाह नै छै

१२२२-१२२२-१२२
अमित मिश्र

मंगलवार, 3 मई 2016

गजल

भुक्खे भेलै पीयर रौद
मरिए गेलै सुंदर रौद

सोहागिन छै कारी राति
विधवा भेलै उज्जर रौद

निकहा निकहा जै श्री राम
सौंसे पसरल  बाँतर रौद

अनका लेखें छै भगवान
हमरा लेखें पाथर रौद

सोभै एना जेना होइ
सिंदुर टिकुली काजर रौद

सभ पाँतिमे 2222-2221 मात्राक्रम अछि
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

सोमवार, 2 मई 2016

गजल

बिनु पुछने हृदयसँ ककरो लगाबऽ चलल छलौँ हम
अनचिन्हार गाममे घर बनाबऽ चलल छलौँ हम

कारोबार एहि जिनगीक सुखसँ चलाबऽ खातिर
नेहक लेल मोल अपने घटाबऽ चलल छलौँ हम

चिन्हब लोककेँ कठिन अछि भरमसँ भरल जगतमे
बुझि कांटेक फूल हियामे सजाबऽ चलल छलौं हम

अपनो छाहपर जखन नै भरोस रहल मनुषकेँ
दोसरकेँ तखन हियामे बसाबऽ चलल छलौं हम

भगवानक दयासँ कुन्दन कपार हमर सही छल
अपने घेंचकेँ अनेरो कटाबऽ चलल छलौं हम

2221-2122-12112-122

© कुन्दन कुमार कर्ण

शनिवार, 30 अप्रैल 2016

गजल

शासन छै बीत भरि के
डाँटन छै बीत भरि के

संबंधो सभ हँसैए
आँगन छै बीत भरि के

नमहर छै मृत्यु ऐठाँ
जीबन छै बीत भरि के

महकल छै कर्म ओकर
चानन छै बीत भरि के

सभहँक हिस्सा पियासे
साबन छै बीत भरि के


सभ पाँतिमे 222-2122 मात्राक्रम अछि
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

गजल

गजल

अहींकेँ लेल हे प्रियतम हिया अजबारि रखने छी
अहाँकेँ देल सब टा यादिकेँ सम्हारि रखने छी

चलू चलि जाइ दुनियाँ छोड़ि हम निर्जन सघन वनमे
रहब हम आ अहाँ केवल कथा विचारि रखने छी

कथी छै मोल ई देहक कतहुँ नै देहकेँ मोजर
अनेरे रूपकेँ प्रियतम सजा संवारि रखने छी

उठै छै मोनमे पीड़ा जखन दै मीत सब धोखा
हँसय नै लोक दोस्तीपर, मनहिमे गाड़ि रखने छी

कहाँ छै जोर ई मनपर पथिक ई मस्त मौला छै
भटकि नै जाइ बाटसँ 'अमित' तेँ पुचकारि रखने छी

१२२२-१२२२-१२२२-१२२२

अमित मिश्र

शनिवार, 16 अप्रैल 2016

गजल

हाटो अनचिन्हार
दामो अनचिन्हार

निर्धन परजा केर
राजो अनचिन्हार

गायक वादक संग
भासो अनचिन्हार

श्वासक संगे-संग
आसो अनचिन्हार

पहिने हम तै बाद
ओहो अनचिन्हार

सभ पाँतिमे 222221 मात्राक्रम अछि
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

रविवार, 3 अप्रैल 2016

गजल

भक्ति गजल

विधिकेँ हाथ
विधिना साथ

सभहँक नाथ
भोलेनाथ

हुनका आगू
झूकै माथ

तोरा लग नै
कोनो लाथ

किछु भक्तिक तों
चिपड़ी पाथ

सभ पाँतिमे 2221 मात्राक्रम अछि
तेसर, चारिम आ पाँचम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि
सुझाव सादर आमंत्रित अछि



शनिवार, 2 अप्रैल 2016

गजल

केखनो बकलोल छी हम
केखनो अनमोल छी हम

केखनो मिठ आम जामुन
केखनो बस ओल छी हम

केखनो चुपचाप बैसल
केखनो अनघोल छी हम

सुर सधल नै जे बजेलक
एक फूटल ढ़ोल छी हम

ने हटेलक ने उठेलक
बड़ अभागल खोल छी हम

सभ पाँतिमे 2122 + 2122 मात्राक्रम अछि
सुझाव सादर आमंत्रित अछि

गुरुवार, 10 मार्च 2016

गजल

रूप मदिर, मदिराएल नैन
मेघ सनक करियाएल नैन
बालम बसि गेला कोन देस
राति बढ़ल अगुताएल नैन
चान पिया भेलौं हम चकोर
कानि कहल बिसराएल नैन
ओकर छवि देखै भोर-साँझ
यादि भरल सपनाएल नैन
"ओम" पिया अउता आइ सुनि क'
नाचि उठल हरखाएल नैन
मात्राक्रम 2-1, 1-2, 2-2-2-1, 2-1 प्रत्येक पाँतिमे एक बेर। सुझाव सादर आमंत्रित।
-ओम प्रकाश

गजल

रंगि दिय' हमरा रंग बसंती
आब चाही हम अंग बसंती
ओकरे नामे लीखल जिनगी
भेल छै ओकर संग बसंती
ढंग एहन बनि जाय हमर जे
सब कहै देखू ढंग बसंती
जोश जे नबका फेरसँ चढ़लै
विस्मयसँ भेलै दंग बसंती
शत्रु "ओम"क रण छोड़ि पड़ायत
हम लड़ब एहन जंग बसंती
मात्राक्रम 2-1-2, 2-2-2-1, 1-2-2 सब पाँतिमे एक बेर। सुझाव सादर आमंत्रित।

गजल

आसक डोरि टूटि चुकल अछि
भाग्यक घैल फूटि चुकल अछि
आबो मोन बाट तकै छै
रस्ता कहिये छूटि चुकल अछि
की कहियै समैक ई लीला
प्रेमक गीत कूटि चुकल अछि
छलियै प्रिय हुनकर कहियो
खिस्सा बनि क' छूटि चुकल अछि
"ओम"क मोन मोर बनल छै
मोनक तान लूटि चुकल अछि
दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व, दीर्घ-ह्रस्व, ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ प्रत्येक पाँतिमे एक बेर। दोसर शेरक दोसर पाँतिमे आ तेसर शेरक पहिल पाँतिमे एकटा दीर्घकेँ ह्रस्व मानबाक छूट लेल गेल अछि। सुझाव सादर आमंत्रित अछि।

गजल

छै मुद्दा बहुत गरम छै
छै बाझल सभक धरम छै
आँखिसँ कान पैघ भेलै
छै पसरल कते भरम छै
हुड़दंगक बजल बिगुल छै
छै बिगुलक किछो मरम छै
नै जानी मुँहसँ खसत की
छै लहकल हमर शरम छै
"ओम"क टोलमे रहत के
छै फूटल जकर करम छै
दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व + दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ प्रत्येक पाँतिमे एक बेर।
सुझाव सादर आमंत्रित।

गजल

रे हिया हमरा एतेक मजबूर नै कर
चाहमे ककरो हमरेसँ तूँ दूर नै कर

एकटा कित्ता अछि मोन सौँसे हमर ई
बाँटि टुकड़ी-टुकड़ीमे अलग धूर नै कर

काँच कोमल आ नवका जुआनी चढल छै
आगि यादक यौवनमे लगा घूर नै कर

एक त प्रेमक खातिर पिआसल रहै छी
ताहि पर आरो उकसाक आतूर नै कर

भागमे ककरा कुन्दन लिखल सब रहै छै
कल्पनामे डुबि एना मोनके झूर नै कर

212-2222-122-122

© कुन्दन कुमार कर्ण





























तोहर मतलब प्रेम प्रेमक मतलब जीवन आ जीवनक मतलब तों