शुक्रवार, 28 जून 2013

गजल

गजल-५१

एलै घोर कलयुग हरत अन्हार के
सभटा बदलि गेलै नियम संसारकें

पछ्बा रीत अबिते भेल सभकिछु खतम
चरित्र के हनन आ पतन संस्कारकें

साहित्येसँ छै शोभा समाजक अपन
साहित्यक त' काजे सृजन श्रृंगारकें

बिलटत सभ कला सेहो कलाकार सन
भेटत मान जाधरि नै कलाकारकें

मायसँ मोह आ ने मातृभूमिसँ मुदा
सभ बैसल करू गप अपन अधिकारकें

बाजब "नवल" हमहूँ बेर एतै जहन
सय सोनारकें आ एक लोहारकें

>बहरे कबीर/मात्रा क्रम : २२२१+२२२१+२२१२
(तिथि: ०२.०२.२०१३)
©पंकज चौधरी "नवलश्री

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